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गंगा-जन्म की कथा (2) – बालकाण्ड (11)

ऋषि विश्वामित्र ने आगे कहा, “बहुत दिनों तक अपने पुत्रों की सूचना नहीं मिलने पर महाराज सगर ने अपने तेजस्वी पौत्र अंशुमान को अपने पुत्रों तथा घोड़े का पता लगाने के लिये आदेश दिया। वीर अंशुमान शस्त्रास्त्रों से सुसज्जित होकर अपने चाचाओं के द्वारा बनाए गए मार्ग से पाताल की ओर चल पड़ा। मार्ग में मिलने वाले पूजनीय ऋषि मुनियों का यथोचित सम्मान करके अपने लक्ष्य के विषय में पूछता हुआ उस स्थान तक पहुँच गया जहाँ पर उसके चाचाओं के भस्मीभूत शरीरों की राख पड़ी थी और पास ही यज्ञ का घोड़ा चर रहा था। अपने चाचाओं के भस्मीभूत शरीरों को देखकर उसे अत्यन्त क्षोभ हुआ। उसने उनका तर्पण करने के लिये जलाशय की खोज की किन्तु उसे कोई भी जलाशय दृष्टिगत नहीं हुआ। तभी उसकी दृष्टि अपने चाचाओं के मामा गरुड़ पर पड़ी। उन्हें सादर प्रणाम करके अंशुमान ने पूछा कि हे पितामह! मैं अपने चाचाओं का तर्पण करना चाहता हूँ। समीप में यदि कोई सरोवर हो तो कृपा करके उसका पता बताइये। यदि आपको इनकी मृत्यु के विषय में कुछ जानकारी है तो वह भी मुझे बताने की कृपा करें। गरुड़ जी ने बताया कि किस प्रकार किस प्रकार से इन्द्र ने घोड़े को चुरा कर कपिल मुनि के पास छोड़ दिया था और उसके चाचाओं ने कपिल मुनि के साथ उद्दण्ड व्यवहार किया था जिसके कारण कपिल मुनि ने उन सबको भस्म कर दिया। इसके पश्चात् गरुड जी ने अंशुमान से कहा कि ये सब अलौकिक शक्ति वाले दिव्य पुरुष के द्वारा भस्म किये गये हैं अतः लौकिक जल से तर्पण करने से इनका उद्धार नहीं होगा, केवल हिमालय की ज्येष्ठ पुत्री गंगा के जल से ही तर्पण करने पर इनका उद्धार सम्भव है। अब तुम घोड़े को लेकर वापस चले जाओ जिससे कि तुम्हारे पितामह का यज्ञ पूर्ण हो सके। गरुड़ जी की आज्ञानुसार अंशुमान वापस अयोध्या पहुँचे और अपने पितामह को सारा वृत्तान्त सुनाया। महाराज सगर ने दुःखी मन से यज्ञ पूरा किया। वे अपने पुत्रों के उद्धार करने के लिये गंगा को पृथ्वी पर लाना चाहते थे पर ऐसा करने के लिये उन्हें कोई भी युक्ति न सूझी।”

थोड़ा रुककर ऋषि विश्वामित्र कहा, “महाराज सगर के देहान्त के पश्चात् अंशुमान बड़ी न्यायप्रियता के साथ शासन करने लगे। अंशुमान के परम प्रतापी पुत्र दिलीप हुये। दिलीप के वयस्क हो जाने पर अंशुमान दिलीप को राज्य का भार सौंप कर हिमालय की कन्दराओं में जाकर गंगा को प्रसन्न करने के लिये तपस्या करने लगे किन्तु उन्हें सफलता नहीं प्राप्त हो पाई और वे स्वर्ग सिधार गए। इधर जब राजा दिलीप का धर्मनिष्ठ पुत्र भगीरथ बड़ा हुआ तो उसे राज्य का भार सौंपकर दिलीप भी गंगा को पृथ्वी पर लाने के लिये तपस्या करने चले गये। पर उन्हें भी सफलता नहीं मिली। भगीरथ बड़े प्रजावत्सल नरेश थे किन्तु उनकी कोई सन्तान नहीं हुई। इस पर वे अपने राज्य का भार मन्त्रियों को सौंपकर स्वयं गंगावतरण के लिये गोकर्ण नामक तीर्थ पर जाकर कठोर तपस्या करने लगे। उनकी अभूतपूर्व तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने उन्हें वर माँगने के लिये कहा। भगीरथ ने ब्रह्मा जी से कहा कि हे प्रभो! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मुझे यह वर दीजिये कि सगर के पुत्रों को मेरे प्रयत्नों से गंगा का जल प्राप्त हो जिससे कि उनका उद्धार हो सके। इसके अतिरिक्त मुझे सन्तान प्राप्ति का भी वर दीजिये ताकि इक्ष्वाकु वंश नष्ट न हो। ब्रह्मा जी ने कहा कि सन्तान का तेरा मनोरथ शीघ्र ही पूर्ण होगा, किन्तु तुम्हारे माँगे गये प्रथम वरदान को देने में कठिनाई यह है कि जब गंगा जी वेग के साथ पृथ्वी पर अवतरित होंगीं तो उनके वेग को पृथ्वी संभाल नहीं सकेगी। गंगा जी के वेग को संभालने की क्षमता महादेव जी के अतिरिक्त किसी में भी नहीं है। इसके लिये तुम्हें महादेव जी को प्रसन्न करना होगा। इतना कह कर ब्रह्मा जी अपने लोक को चले गये।

“भगीरथ ने साहस नहीं छोड़ा। वे एक वर्ष तक पैर के अँगूठे के सहारे खड़े होकर महादेव जी की तपस्या करते रहे। केवल वायु के अतिरिक्त उन्होंने किसी अन्य वस्तु का भक्षण नहीं किया। अन्त में इस महान भक्ति से प्रसन्न होकर महादेव जी ने भगीरथ को दर्शन देकर कहा कि हे भक्तश्रेष्ठ! हम तेरी मनोकामना पूरी करने के लिये गंगा जी को अपने मस्तक पर धारण करेंगे। इसकी सूचना पाकर विवश होकर गंगा जी को सुरलोक का परित्याग करना पड़ा। उस समय वे सुरलोक से कहीं जाना नहीं चाहती थीं, इसलिये वे यह विचार करके कि मैं अपने प्रचण्ड वेग से शिव जी को बहा कर पाताल लोक ले जाऊँगी वे भयानक वेग से शिव जी के सिर पर अवतरित हुईं। गंगा का यह अहंकार महादेव जी से छुपा न रहा। महादेव जी ने गंगा की वेगवती धाराओं को अपने जटाजूट में उलझा लिया। गंगा जी अपने समस्त प्रयत्नों के बाद भी महादेव जी के जटाओं से बाहर न निकल सकीं। गंगा जी को इस प्रकार शिव जी की जटाओं में विलीन होते देख भगीरथ ने फिर शंकर जी की तपस्या की। भगीरथ के इस तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने गंगा जी को हिमालय पर्वत पर स्थित बिन्दुसर में छोड़ा। छूटते ही गंगा जी सात धाराओं में बँट गईं। गंगा जी की तीन धाराएँ ह्लादिनी, पावनी और नलिनी पूर्व की ओर प्रवाहित हुईं। सुचक्षु, सीता और सिन्धु नाम की तीन धाराएँ पश्चिम की ओर बहीं और सातवीं धारा महाराज भगीरथ के पीछे पीछे चली। जिधर जिधर भगीरथ जाते थे, उधर उधर ही गंगा जी जाती थीं। स्थान स्थान पर देव, यक्ष, किन्नर, ऋषि-मुनि आदि उनके स्वागत के लिये एकत्रित हो रहे थे। जो भी उस जल का स्पर्श करता था, भव-बाधाओं से मुक्त हो जाता था। चलते चलते गंगा जी उस स्थान पर पहुँचीं जहाँ ऋषि जह्नु यज्ञ कर रहे थे। गंगा जी अपने वेग से उनके यज्ञशाला को सम्पूर्ण सामग्री के साथ बहाकर ले जाने लगीं। इससे ऋषि को बहुत क्रोध आया और उन्होंने क्रुद्ध होकर गंगा का सारा जल पी लिया। यह देख कर समस्त ऋषि मुनियों को बड़ा विस्मय हुआ और वे गंगा जी को मुक्त करने के लिये उनकी स्तुति करने लगे। उनकी स्तुति से प्रसन्न होकर जह्नु ऋषि ने गंगा जी को अपने कानों से निकाल दिया और उन्हें अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार कर लिया। तब से गंगा जाह्नवी कहलाने लगीँ। इसके पश्चात् वे भगीरथ के पीछे चलते चलते समुद्र तक पहुँच गईं और वहाँ से सगर के पुत्रों का उद्धार करने के लिये रसातल में चली गईं। उनके जल के स्पर्श से भस्मीभूत हुये सगर के पुत्र निष्पाप होकर स्वर्ग गये। उस दिन से गंगा के तीन नाम हुये, त्रिपथगा, जाह्नवी और भागीरथी।

“हे रामचन्द्र! कपिल आश्रम में गंगा जी के पहुँचने के पश्चात् ब्रह्मा जी ने प्रसन्न होकर भगीरथ को वरदान दिया कि तेरे पुण्य के प्रताप से प्राप्त इस गंगाजल से जो भी मनुष्य स्नान करेगा या इसका पान करेगा, वह सब प्रकार के दुःखो से रहित होकर अन्त में स्वर्ग को प्रस्थान करेगा। जब तक पृथ्वी मण्डल में गंगा जी प्रवाहित होती रहेंगी तब तक उसका नाम भागीरथी कहलायेगा और सम्पूर्ण भूमण्डल में तेरी कीर्ति अक्षुण्ण रूप से फैलती रहेगी। सभी लोग श्रद्धा के साथ तेरा स्मरण करेंगे। यह कह कर ब्रह्मा जी अपने लोक को लौट गये। भगीरथ ने पुनः अपने पितरों को जलांजलि दी।”

कथा समाप्त होने पर वे सब विश्राम करने चले गये।

मुकेश अग्नि

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संजय गुप्ताRpd
एक अनोखा संबंध अवश्य पढे

इससे कोई फर्क नहीं पङता की आप विवाहित हैं या अविवाहित,
अगर पुरा पोस्ट पडेगे, तो प्रेम के आंसू छलक आयेंगे………
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मुकदमा दो साल तक चला …… आखिर पति-पत्नी में तलाक हो गया |
तलाक का कारण बहुत मामूली बातें थीं, इन मामूली बातों को बड़ी घटना में रिश्तेदारों ने बदला।
हुआ यों कि पति ने पत्नी को किसी बात पर तीन थप्पड़ जड़ दिए, पत्नी ने इसके जवाब में अपना सैंडिल पति की तरफ़ फेंका, सैंडिल का एक सिरा पति के सिर को छूता हुआ निकल गया।
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मामला रफा-दफा हो भी जाता, लेकिन पति ने इसे अपनी तौहिनी समझी, रिश्तेदारों ने मामला और पेचीदा बना दिया,
न सिर्फ़ पेचीदा बल्कि संगीन, सब रिश्तेदारों ने इसे खानदान की नाक कटना कहा, यह भी कहा कि पति को सैडिल मारने वाली औरत न वफादार होती है न पतिव्रता।
इसे घर में रखना, अपने शरीर में मियादी बुखार पालते रहने जैसा है।
कुछ रिश्तेदारों ने यह भी पश्चाताप जाहिर किया कि ऐसी औरतों का भ्रूण ही समाप्त कर देना चाहिए।
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बुरी बातें चक्रवृत्ति ब्याज की तरह बढ़ती है, सो दोनों तरफ खूब आरोप उछाले गए। ऐसा लगता था जैसे दोनों पक्षों के लोग आरोपों का वॉलीबॉल खेल रहे हैं। लड़के ने लड़की के बारे में और लड़की ने लड़के के बारे में कई असुविधाजनक बातें कही।
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मुकदमा दर्ज कराया गया।
पति ने पत्नी की चरित्रहीनता का तो पत्नी ने दहेज उत्पीड़न का मामला दर्ज कराया। छह साल तक शादीशुदा जीवन बीताने और एक बच्ची के माता-पिता होने के बाद आज दोनों में तलाक हो गया।
पति-पत्नी के हाथ में तलाक के काग़ज़ों की प्रति थी।
दोनों चुप थे, दोनों शांत, दोनों निर्विकार।
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मुकदमा दो साल तक चला था। दो साल से पत्नी अलग रह रही थी और पति अलग,
मुकदमे की सुनवाई पर दोनों को आना होता। दोनों एक दूसरे को देखते जैसे चकमक पत्थर आपस में रगड़ खा गए हों।
दोनों गुस्से में होते। दोनों में बदले की भावना का आवेश होता। दोनों के साथ रिश्तेदार होते जिनकी हमदर्दियों में ज़रा-ज़रा विस्फोटक पदार्थ भी छुपा होता।
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लेकिन कुछ महीने पहले जब पति-पत्नी कोर्ट में दाखिल होते तो एक-दूसरे को देख कर मुँह फेर लेते। जैसे जानबूझ कर एक-दूसरे की उपेक्षा कर रहे हों, वकील औऱ रिश्तेदार दोनों के साथ होते।
दोनों को अच्छा-खासा सबक सिखाया जाता कि उन्हें क्या कहना है। दोनों वही कहते। कई बार दोनों के वक्तव्य बदलने लगते। वो फिर सँभल जाते।
अंत में वही हुआ जो सब चाहते थे यानी तलाक …………….
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पहले रिश्तेदारों की फौज साथ होती थी, आज थोड़े से रिश्तेदार साथ थे। दोनों तरफ के रिश्तेदार खुश थे, वकील खुश थे, माता-पिता भी खुश थे।
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तलाकशुदा पत्नी चुप थी और पति खामोश था।
यह महज़ इत्तेफाक ही था कि दोनों पक्षों के रिश्तेदार एक ही टी-स्टॉल पर बैठे , कोल्ड ड्रिंक्स लिया।
यह भी महज़ इत्तेफाक ही था कि तलाकशुदा पति-पत्नी एक ही मेज़ के आमने-सामने जा बैठे।
लकड़ी की बेंच और वो दोनों …….
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”कांग्रेच्यूलेशन …. आप जो चाहते थे वही हुआ ….” स्त्री ने कहा।
”तुम्हें भी बधाई ….. तुमने भी तो तलाक दे कर जीत हासिल की ….” पुरुष बोला।
”तलाक क्या जीत का प्रतीक होता है????” स्त्री ने पूछा।
”तुम बताओ?”
पुरुष के पूछने पर स्त्री ने जवाब नहीं दिया, वो चुपचाप बैठी रही, फिर बोली, ”तुमने मुझे चरित्रहीन कहा था….
अच्छा हुआ…. अब तुम्हारा चरित्रहीन स्त्री से पीछा छूटा।”
”वो मेरी गलती थी, मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था” पुरुष बोला।
”मैंने बहुत मानसिक तनाव झेली है”, स्त्री की आवाज़ सपाट थी न दुःख, न गुस्सा।
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”जानता हूँ पुरुष इसी हथियार से स्त्री पर वार करता है, जो स्त्री के मन और आत्मा को लहू-लुहान कर देता है… तुम बहुत उज्ज्वल हो। मुझे तुम्हारे बारे में ऐसी गंदी बात नहीं करनी चाहिए थी। मुझे बेहद अफ़सोस है, ” पुरुष ने कहा।
स्त्री चुप रही, उसने एक बार पुरुष को देखा।
कुछ पल चुप रहने के बाद पुरुष ने गहरी साँस ली। कहा, ”तुमने भी तो मुझे दहेज का लोभी कहा था।”
”गलत कहा था”…. पुरुष की ओऱ देखती हुई स्त्री बोली।
कुछ देर चुप रही फिर बोली, ”मैं कोई और आरोप लगाती लेकिन मैं नहीं…”
प्लास्टिक के कप में चाय आ गई।
स्त्री ने चाय उठाई, चाय ज़रा-सी छलकी। गर्म चाय स्त्री के हाथ पर गिरी।
स्सी… की आवाज़ निकली।
पुरुष के गले में उसी क्षण ‘ओह’ की आवाज़ निकली। स्त्री ने पुरुष को देखा। पुरुष स्त्री को देखे जा रहा था।
”तुम्हारा कमर दर्द कैसा है?”
”ऐसा ही है कभी वोवरॉन तो कभी काम्बीफ्लेम,” स्त्री ने बात खत्म करनी चाही।
”तुम एक्सरसाइज भी तो नहीं करती।” पुरुष ने कहा तो स्त्री फीकी हँसी हँस दी।
”तुम्हारे अस्थमा की क्या कंडीशन है… फिर अटैक तो नहीं पड़े????” स्त्री ने पूछा।
”अस्थमा।डॉक्टर सूरी ने स्ट्रेन… मेंटल स्ट्रेस कम करने को कहा है, ” पुरुष ने जानकारी दी।
स्त्री ने पुरुष को देखा, देखती रही एकटक। जैसे पुरुष के चेहरे पर छपे तनाव को पढ़ रही हो।
”इनहेलर तो लेते रहते हो न?” स्त्री ने पुरुष के चेहरे से नज़रें हटाईं और पूछा।
”हाँ, लेता रहता हूँ। आज लाना याद नहीं रहा, ” पुरुष ने कहा।
”तभी आज तुम्हारी साँस उखड़ी-उखड़ी-सी है, ” स्त्री ने हमदर्द लहजे में कहा।
”हाँ, कुछ इस वजह से और कुछ…” पुरुष कहते-कहते रुक गया।
”कुछ… कुछ तनाव के कारण,” स्त्री ने बात पूरी की।
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पुरुष कुछ सोचता रहा, फिर बोला, ”तुम्हें चार लाख रुपए देने हैं और छह हज़ार रुपए महीना भी।”
”हाँ… फिर?” स्त्री ने पूछा।
”वसुंधरा में फ्लैट है… तुम्हें तो पता है। मैं उसे तुम्हारे नाम कर देता हूँ। चार लाख रुपए फिलहाल मेरे पास नहीं है।” पुरुष ने अपने मन की बात कही।
”वसुंधरा वाले फ्लैट की कीमत तो बीस लाख रुपए होगी??? मुझे सिर्फ चार लाख रुपए चाहिए….” स्त्री ने स्पष्ट किया।
”बिटिया बड़ी होगी… सौ खर्च होते हैं….” पुरुष ने कहा।
”वो तो तुम छह हज़ार रुपए महीना मुझे देते रहोगे,” स्त्री बोली।
”हाँ, ज़रूर दूँगा।”
”चार लाख अगर तुम्हारे पास नहीं है तो मुझे मत देना,” स्त्री ने कहा।
उसके स्वर में पुराने संबंधों की गर्द थी।
पुरुष उसका चेहरा देखता रहा….
कितनी सह्रदय और कितनी सुंदर लग रही थी सामने बैठी स्त्री जो कभी उसकी पत्नी हुआ करती थी।
स्त्री पुरुष को देख रही थी और सोच रही थी, ”कितना सरल स्वभाव का है यह पुरुष, जो कभी उसका पति हुआ करता था। कितना प्यार करता था उससे… एक बार हरिद्वार में जब वह गंगा में स्नान कर रही थी तो उसके हाथ से जंजीर छूट गई। फिर पागलों की तरह वह बचाने चला आया था उसे। खुद तैरना नहीं आता था लाट साहब को और मुझे बचाने की कोशिशें करता रहा था… कितना अच्छा है… मैं ही खोट निकालती रही…”
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पुरुष एकटक स्त्री को देख रहा था और सोच रहा था, ”कितना ध्यान रखती थी, स्टीम के लिए पानी उबाल कर जग में डाल देती। उसके लिए हमेशा इनहेलर खरीद कर लाती, सेरेटाइड आक्यूहेलर बहुत महँगा था। हर महीने कंजूसी करती, पैसे बचाती, और आक्यूहेलर खरीद लाती। दूसरों की बीमारी की कौन परवाह करता है? ये करती थी परवाह! कभी जाहिर भी नहीं होने देती थी। कितनी संवेदना थी इसमें। मैं अपनी मर्दानगी के नशे में रहा। काश, जो मैं इसके जज़्बे को समझ पाता।”
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दोनों चुप थे, बेहद चुप।
दुनिया भर की आवाज़ों से मुक्त हो कर, खामोश।
दोनों भीगी आँखों से एक दूसरे को देखते रहे….
”मुझे एक बात कहनी है, ” उसकी आवाज़ में झिझक थी।
”कहो, ” स्त्री ने सजल आँखों से उसे देखा।
”डरता हूँ,” पुरुष ने कहा।
”डरो मत। हो सकता है तुम्हारी बात मेरे मन की बात हो,” स्त्री ने कहा।
”तुम बहुत याद आती रही,” पुरुष बोला।
”तुम भी,” स्त्री ने कहा।
”मैं तुम्हें अब भी प्रेम करता हूँ।”
”मैं भी.” स्त्री ने कहा।
दोनों की आँखें कुछ ज़्यादा ही सजल हो गई थीं।
दोनों की आवाज़ जज़्बाती और चेहरे मासूम।
”क्या हम दोनों जीवन को नया मोड़ नहीं दे सकते?” पुरुष ने पूछा।
”कौन-सा मोड़?”
”हम फिर से साथ-साथ रहने लगें… एक साथ… पति-पत्नी बन कर… बहुत अच्छे दोस्त बन कर।”
”ये पेपर?” स्त्री ने पूछा।
”फाड़ देते हैं।” पुरुष ने कहा औऱ अपने हाथ से तलाक के काग़ज़ात फाड़ दिए। फिर स्त्री ने भी वही किया। दोनों उठ खड़े हुए। एक दूसरे के हाथ में हाथ डाल कर मुस्कराए।
दोनों पक्षों के रिश्तेदार हैरान-परेशान थे।
दोनों पति-पत्नी हाथ में हाथ डाले घर की तरफ चले गए।
घर जो सिर्फ और सिर्फ पति-पत्नी का था।
कहानी यदि दिल को छुआ हो तो कमेन्ट करें

संजय गुप्ता

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(((( राधारानी से ब्रजदास का नाता ))))
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बरसाना मे एक भक्त थे ब्रजदास। उनके एक पुत्री थी, नाम था रतिया। यही ब्रजदास का परिवार था।
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ब्रजदास दिन मे अपना काम क़रतै और शाम को श्री जी के मन्दिर मे जाते दर्शन करते और जो भी संत आये हुवे हो तै उनके साथ सत्संग करते। यह उनका नियम था।
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एक बार एक संत ने कहा भइया हमें नन्दगांव जाना है। सामान ज्यादा है पैसे है नही नही तो सेवक क़र लेते। तुम हम को नन्दगाँव पहुँचा सकते हो क्या ? ब्रजदास ने हां भर ली ।
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ब्रजदास ने कहा गर्मी का समय है सुबह जल्दी चलना ठीक रहेगा जिससे मै 10 बजे तक वापिस आ जाऊ। संत ने भी कहा ठीक है मै 4 बजे तैयार मिलूँगा।
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ब्रज दास ने अपनी बेटी से कहा मुझे एक संत को नन्दगाँव पहुचाना है। समय पर आ जाऊँगा प्रतीक्षा मत करना।
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ब्रजदास सुबह चार बजे राधे राधे करतै नंगे पांव संत के पास गये। सन्त ने सामान ब्रजदास को दिया और ठाकुर जी की पैटी और बर्तन स्वयं ने लाई लिये।
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रवाना तो समय पर हुवे लैकिन संत को स्वास् रोग था कुछ दूर चलते फिर बैठ जाते। इस प्रकार नन्दगाँव पहुँचने मे ही 11 बज गये।
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ब्रजदास ने सामान रख कर जाने की आज्ञा मांगी। संत ने कहा जून का महीना है 11 बजे है जल पी लो। कुछ जलपान कर लो, फिर जाना।
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ब्रजदास ने कहा बरसाने की वृषभानु नंदनी नन्दगाँव मे ब्याही हुई है अतः मै यहाँ जल नही पी सकता।
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संत की आँखो से अश्रुपात होने लगा। कितने वर्ष पुरानी बात है ,कितना गरीब आदमी है पर दिल कितना ऊँचा है।
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ब्रजदास वापिस राधे राधे करते रवाना हुवे। ऊपर से सूरज की गर्मी नीचे तपती रेत। भगवान को दया आ गयी वे भक्त ब्रजदास के पीछै पीछै चलने लगे।
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एक पेड़ की छाया में ब्रजदास रुके और वही मूर्छित हो कर गिर पड़ै। भगवान ने मूर्छा दूर क़रने के प्रयास किये पर मूर्छा दूर नही हुई।
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भगवान ने विचार किया कि मेने अजामिल, गीध, गजराज को तारा, द्रोपदी को संकट से बचाया पर इस भक्त के प्राण संकट मे है कोई उपाय नही लग रहा है।
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ब्रजदास राधारानी का भक्त है वे ही इस के प्राणों की रक्षा कर सकती है । उनको ही बुलाया जावे।
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भगवान भरी दुपहरी मे राधारानी के पास महल मे गये। राधा रानी ने इस गर्मी मे आने का कारण पूछा।
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भगवान भी पूरे मसखरे है। उन्होंने कहा तुम्हारे पिता जी बरसाना और नन्दगाँव की डगर मे पड़ै है तुम चलकर संभालो।
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राधा जी ने कहा कौन पिता जी ? भगवान ने सारी बात समझाई और चलने को कहा। यह भी कहा की तुमको ब्रजदास की बेटी की रूप मे भोजन जल लेकर चलना है।
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राधा जी तैयार होकर पहुँची। पिता जी.. पिता जी.. आवाज लगाई।
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ब्रजदास जागे। बेटी के चरणों मे गिर पड़े आज तू न आती तो प्राण चले जाते। बेटी से कहा आज तुझे बार बार देखने का मन कर रहा है।
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राधा जी ने कहा माँ बाप को संतान अच्छी लगती ही है। आप भोजन लीजिये।
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ब्रजदास भोजन लेंने लगे तो राधा जी ने कहा घर पर कुछ मेहमान आये है मैं उनको संभालू आप आ जाना। कुछ दूरी के बाद राधारानी अदृश्य हो गयी। ब्रजदास ने ऐसा भोजन कभी नही पाया।
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शाम को घर आकर ब्रजदास बेटी के चरणों मे गिर पड़े। बेटी ने कहा आप ये क्या कर ऱहै है ?
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ब्रजदास ने कहा आज तुमने भोजन, जल ला कर मेरे प्राण बचा लिये।
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बेटी ने कहा मै तो कही नही गयी। ब्रजदास ने कहा अच्छा बता मेहमान कहॉ है ? बेटी ने कहा कोई मेहमान नही आया।
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अब ब्रजदास के समझ में सारी बात आई। उसनै बेटी से कहा कि आज तुम्हारे ही रूप मे राधा रानी के दर्शन हुवे।
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बाँसुरी बना लो कान्हा,
होठों से लगा लो…
काजल बना कर मुझको
आँखों में बसा लो..
कुंडल बना कर मोहन,
कानो से लगा लो…
हार बना कर मुझको,
गले से लगा लो…
मैं हूँ दास तुम्हारा,
प्यारे कन्हैया…
पायल बना कर मुझको,
चरणों से लगा लो…

(((((((((( जय जय श्री राधे ))))))))))
RADHE RADHE JAI SHREE KRISHNA JI

संजय गुप्ता

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हनुमान के अजर-अमर होने के दस पक्के प्रमाण ! प्रमाण नंबर पांच पढ़कर आप हनुमान के परम भक्त बन जाओगे!!!!!

*प्रनवउँ पवनकुमार खल बन पावक ग्यान घन।
जासु हृदय आगार बसहिं राम सर चाप धर॥

भावार्थ:-मैं पवनकुमार श्री हनुमान्‌जी को प्रणाम करता हूँ, जो दुष्ट रूपी वन को भस्म करने के लिए अग्निरूप हैं, जो ज्ञान की घनमूर्ति हैं और जिनके हृदय रूपी भवन में धनुष-बाण धारण किए श्री रामजी निवास करते हैं॥

कलयुग में अगर आप सुखी रहना चाहते हैं तो आपको हनुमान की पूजा जरूर करनी होगी। आप किसी को भी अपना प्रिय देवता मानते रहें लेकिन अगर आप हनुमान की पूजा नहीं करते हैं तो आपको दुःख और परेशानियाँ घेरती रहेंगी।

अब आप ऐसा मत सोचिये कि आपको यह बातें हम बता रहे हैं किन्तु यह तो कलयुग के शास्त्रों में लिखा है कि हनुमान कलयुग के भगवान हैं. साथ ही साथ हनुमान ही ऐसे देवता हैं जो साक्षात् धरती पर कलयुग में विराजमान भी रहेंगे।

तो आज हम आपको हनुमान जी के जीवन से जुड़ी कुछ रहस्यमयी बातें बताते हैं – हनुमान के होने के सबूत बताते है –

हनुमान के होने के सबूत –

  1. रामायण में बताया गया है कि जब लक्ष्मण मुर्छित पड़ें हुए थे तो वैद जी ने जिन जड़ी बूटियों का नाम बताया था वह हिमालय पर्वत पर ही मिलती थी. तब हनुमान जी हिमालय गये थे और वहां से पूरा पहाड़ ही उठाकर लाए थे. बाद में विज्ञान के समय श्रीलंका के अन्दर जो वह पहाड़ है उसकी जांच हुई तो वह और हिमालय के पहाड़ एक समान पाए गये थे. यह बात दर्शाती है कि हनुमान जी हिमालय से पहाड़ लेकर गये थे।

  2. श्रीलंका का एक आदिवासी कबीला है जिसका नाम मातंग कबीला है. हनुमान जी इस कबीले के लोगों से आज भी साक्षात् प्रकट होकर मुलाकात करते हैं. यह कबीला विभीषण के ही खून का कबीला है. इस बात की पुष्टि रीसर्च में भी हुई है।

  3. हनुमान के साक्षात् होने का एक सबूत यह भी है कि शास्त्रों में लिखा गया है कि कलयुग में हनुमान जी गंधमादन पर्वत पर निवास करेंगे. कई साधू-संतों से आप कुंभ में मिलिए और इस सच को जानिए, तो आपको हैरान करने वाली जानकारी मिलेगी।

  4. महाभारत में भी हनुमान जी का जिक्र आता है. एक तो भीम से हनुमान जी की मुलाकात जंगलों में होती है और दूसरा कि अर्जुन के रथ के ऊपर भी हनुमान जी विराजमान थे, यह कृष्ण खुद स्वीकार करते हैं।

  5. हनुमान का कलयुग में चमत्कार नैनीताल के कैंची धाम में देखा जा सकता है. खुद फेसबुक के प्रमुख मार्क जुकरबर्ग ने और एप्पल प्रमुख स्टीव जॉब ने इस हनुमान मंदिर का जिक्र किया है।

  6. जुग सहस्त्र जोजन पर भानू । लिल्यो ताहि मधुर फल जानू… हनुमान चालीसा की यह पंक्तियाँ सूर्य और धरती के बीच की सही दूरी हजारों साल पहले बता देती हैं. नासा ने जो दूरी आज बताई है यह लगभग उतनी ही है, जितनी की हनुमान चालीसा की यह पंक्ति बताती है।

  7. आज एक बड़ा सच यह भी है कि हनुमान जी की जिस रूप में पूजा हम कर रहे हैं वह उस रूप में नहीं हैं. हनुमान का वानर रूप गलत बताया गया है. हनुमान किसी भी रूप में आ सकते हैं. और उनका कोई एक रूप नहीं है।

  8. अमेरिका की माया सभ्यता जो हजारों साल पुरानी है. यह सभ्यता जिसकी पूजा करती है, वह MONKEY HAWKER GOD हैं और आप कभी इनके भगवान की तस्वीर देखते हैं तो आपको मालुम चलेगा कि वह हनुमान ही हैं।

  9. शिमला के अन्दर एक मंदिर है जिसका नाम जाखू मंदिर है. इस मंदिर में हनुमान जी के पैरों के निशान मौजूद हैं।

  10. हनुमान चालीसा की हर पंक्ति और शब्द में इतनी शक्ति है कि व्यक्ति इसका जापकर, कुछ भी प्राप्त कर सकता है. यहाँ तक की हनुमान चालीसा के पढ़ने के समय व्यक्ति का तेज कई लाखों गुना बढ़ जाता है, इस बात को विज्ञानं भी स्वीकार करने लगा है।
    संजय गुप्ता

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(((( मिटटी का घड़ा ))))
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महाकवि कालिदास जी, राजा विक्रमादित्य के दरबार में मुख्य कवि थे। एक दिन ऐसे ही सभी लोग दरबार मैं बैठ हुए थे। गर्मियों का समय था उन दिनों बिजली और कूलर तो थे नहीं, तो सारे लोग पसीने से लथपथ हुए बैठे थे।
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राजा विक्रमादित्य दिखने में बहुत सुन्दर थे, बलिष्ठ भुजाएं और चौड़ा सीना उनकी खूबसूरती में चार चाँद लगा देता था। विक्रमादित्य के माथे से छलकता पसीना भी एक मोती जैसा दिखाई देता था।
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वहीँ कालिदास जी एकदम कुरूप थे और पसीने की वजह से उनकी दशा बुरी बनी हुई थी।
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कालिदास को देखकर विक्रमादित्य को तेज हंसी आ गई और वो कालिदास से बोले – महाकवि आप कितने कुरूप हैं, और इस गर्मी में पसीने से लथपथ होकर आप और भी बदसूरत दिखाई दे रहे हैं।
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कालिदास जी को राजा विक्रमादित्य की बात बहुत बुरी लगी, उन्होंने पास खड़ी दासी से दो घड़े मंगाए – एक घड़ा सोने का और दूसरा मिटटी का
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इसके बाद कालिदास ने उन दोनों घड़ों में पानी भरकर रख दिया। राजा विक्रमादित्य बड़े आश्चर्य से कालिदास के कारनामे देख रहे थे।
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कालिदास जी ने कहा – महाराज, देखिये ये मिटटी का घड़ा कितना कुरूप दिखता है, और ये सोने का घड़ा देखिये कैसा चमक रहा है। चलिए मैं आप को सोने के घड़े से पानी पिलाता हूँ।
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विक्रमादित्य ने सोने के घड़े का पानी पिया, पानी घड़े में रखा रखा उबल जैसा गया था।
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इसके बाद कालिदास जी ने मिटटी के घड़े से पानी लेकर राजा को दिया। वाह ! मिटटी के घड़े का पानी एकदम शीतल था। तब कहीं जाके राजा विक्रमादित्य की प्यास बुझी।
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कालिदास ने धीरे से मुस्कुराते हुए कहा – देखा महाराज, रूप और सुंदरता किसी काम की नहीं है, कर्म ही आपको सुन्दर और शीतल बनाते हैं।
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सोने का घड़ा दिखने में चाहे जितना सुन्दर हो लेकिन शीतल जल केवल मिटटी का घड़ा ही दे सकता है।
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राजा विक्रमादित्य भी हल्की मुस्कान के साथ कालिदास जी की बातों से सहमत नजर आये।
🙏🏼🌹🙏🏼

ज्योति अग्रवाल

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महादेव जी को एक बार बिना कारण के किसी को प्रणाम करते देखकर पार्वती जी ने पूछा आप किसको प्रणाम करते रहते हैं?

शिव जी पार्वती जी से कहते हैं कि हे देवी ! जो व्यक्ति एक बार राम कहता है उसे मैं तीन बार प्रणाम करता हूँ।

पार्वती जी ने एक बार शिव जी से पूछा आप श्मशान में क्यूँ जाते हैं और ये चिता की भस्म शरीर पे क्यूँ लगाते हैं?

उसी समय शिवजी पार्वती जी को श्मशान ले गए। वहाँ एक शव अंतिम संस्कार के लिए लाया गया। लोग राम नाम सत्य है कहते हुए शव को ला रहे थे।

शिव जी ने कहा कि देखो पार्वती ! इस श्मशान की ओर जब लोग आते हैं तो राम नाम का स्मरण करते हुए आते हैं। और इस शव के निमित्त से कई लोगों के मुख से मेरा अतिप्रिय दिव्य राम नाम निकलता है उसी को सुनने मैं श्मशान में आता हूँ, और इतने लोगों के मुख से राम नाम का जप करवाने में निमित्त बनने वाले इस शव का मैं सम्मान करता हूँ, प्रणाम करता हूँ, और अग्नि में जलने के बाद उसकी भस्म को अपने शरीर पर लगा लेता हूँ।

राम नाम बुलवाने वाले के प्रति मुझे अगाध प्रेम रहता है।

एक बार शिवजी कैलाश पर पहुंचे और पार्वती जी से भोजन माँगा। पार्वती जी विष्णु सहस्रनाम का पाठ कर रहीं थीं। पार्वती जी ने कहा अभी पाठ पूरा नही हुआ, कृपया थोड़ी देर प्रतीक्षा कीजिए।

शिव जी ने कहा कि इसमें तो समय और श्रम दोनों लगेंगे। संत लोग जिस तरह से सहस्र नाम को छोटा कर लेते हैं और नित्य जपते हैं वैसा उपाय कर लो।

पार्वती जी ने पूछा वो उपाय कैसे करते हैं? मैं सुनना चाहती हूँ।

शिव जी ने बताया, केवल एक बार राम कह लो तुम्हें सहस्र नाम, भगवान के एक हज़ार नाम लेने का फल मिल जाएगा।

एक राम नाम हज़ार दिव्य नामों के समान है।

पार्वती जी ने वैसा ही किया।

पार्वत्युवाच –
केनोपायेन लघुना विष्णोर्नाम सहस्रकं?
पठ्यते पण्डितैर्नित्यम् श्रोतुमिच्छाम्यहं प्रभो।।

ईश्वर उवाच-
श्री राम राम रामेति, रमे रामे मनोरमे।
सहस्र नाम तत्तुल्यम राम नाम वरानने।।

यह राम नाम सभी आपदाओं को हरने वाला, सभी सम्पदाओं को देने वाला दाता है, सारे संसार को विश्राम/शान्ति प्रदान करने वाला है। इसीलिए मैं इसे बार बार प्रणाम करता हूँ।

आपदामपहर्तारम् दातारम् सर्वसंपदाम्।
लोकाभिरामम् श्रीरामम् भूयो भूयो नमयहम्।

भव सागर के सभी समस्याओं और दुःख के बीजों को भूंज के रख देनेवाला/समूल नष्ट कर देने वाला, सुख संपत्तियों को अर्जित करने वाला, यम दूतों को खदेड़ने/भगाने वाला केवल राम नाम का गर्जन(जप) है।

भर्जनम् भव बीजानाम्, अर्जनम् सुख सम्पदाम्।
तर्जनम् यम दूतानाम्, राम रामेति गर्जनम्।

प्रयास पूर्वक स्वयम् भी राम नाम जपते रहना चाहिए और दूसरों को भी प्रेरित करके राम नाम जपवाना चाहिए। इस से अपना और दूसरों का तुरन्त कल्याण हो जाता है। यही सबसे सुलभ और अचूक उपाय है।

इसीलिए हमारे देश में प्रणाम–
राम राम कहकर किया जाता है।

🌷जय श्री राम🌷

ग्रूप मे जितने भी राम भक्त हैं वह भी अपने राम भक्त मित्रो को जोड़कर राम भक्ति का परिचयदेने की कृपा करे जयश्रीराम

………………✍विकास खुराना ( ज्योतिष विशेषज्ञ )👳‍♂🔱🚩

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आइए जानें मां के इस भयंकर रूप के पीछे की कथा:
जय माँ महाकाली

एक बार दारुक नाम के असुर ने ब्रह्मा को प्रसन्न किया. उनके द्वारा दिए गए वरदान से वह देवों और ब्राह्मणों को प्रलय की अग्नि के समान दुःख देने लगा. उसने सभी धर्मिक अनुष्ठान बंद करा दिए और स्वर्गलोक में अपना राज्य स्थापित कर लिया. सभी देवता, ब्रह्मा और विष्णु के धाम पहुंचे. ब्रह्मा जी ने बताया की यह दुष्ट केवल स्त्री दवारा मारा जायेगा. तब ब्रह्मा, विष्णु सहित सभी देव स्त्री रूप धर दुष्ट दारुक से लड़ने गए. परतु वह दैत्य अत्यंत बलशाली था, उसने उन सभी को परास्त कर भगा दिया.

ब्रह्मा, विष्णु समेत सभी देव भगवान शिव के धाम कैलाश पर्वत पहुंचे तथा उन्हें दैत्य दारुक के विषय में बताया. भगवान शिव ने उनकी बात सुन मां पार्वती की ओर देखा और कहा हे कल्याणी जगत के हित के लिए और दुष्ट दारुक के वध के लिए में तुमसे प्रार्थना करता हुं. यह सुन मां पार्वती मुस्कराई और अपने एक अंश को भगवान शिव में प्रवेश कराया. जिसे मां भगवती के माया से इन्द्र आदि देवता और ब्रह्मा नहीं देख पाए उन्होंने देवी को शिव के पास बैठे देखा.

मां भगवती का वह अंश भगवान शिव के शरीर में प्रवेश कर उनके कंठ में स्थित विष से अपना आकार धारण करने लगा. विष के प्रभाव से वह काले वर्ण में परिवर्तित हुआ. भगवान शिव ने उस अंश को अपने भीतर महसूस कर अपना तीसरा नेत्र खोला. उनके नेत्र द्वारा भयंकर-विकराल रूपी काले वर्ण वाली मां काली उत्तपन हुई. मां काली के लालट में तीसरा नेत्र और चन्द्र रेखा थी. कंठ में कराल विष का चिन्ह था और हाथ में त्रिशूल व नाना प्रकार के आभूषण व वस्त्रों से वह सुशोभित थी. मां काली के भयंकर व विशाल रूप को देख देवता व सिद्ध लोग भागने लगे.

मां काली के केवल हुंकार मात्र से दारुक समेत, सभी असुर सेना जल कर भस्म हो गई. मां के क्रोध की ज्वाला से सम्पूर्ण लोक जलने लगा. उनके क्रोध से संसार को जलते देख भगवान शिव ने एक बालक का रूप धारण किया. शिव श्मशान में पहुंचे और वहां लेट कर रोने लगे. जब मां काली ने शिवरूपी उस बालक को देखा तो वह उनके उस रूप से मोहित हो गई. वातसल्य भाव से उन्होंने शिव को अपने हृदय से लगा लिया तथा अपने स्तनों से उन्हें दूध पिलाने लगी. भगवान शिव ने दूध के साथ ही उनके क्रोध का भी पान कर लिया. उनके उस क्रोध से आठ मूर्ति हुई जो क्षेत्रपाल कहलाई.

शिवजी द्वारा मां काली का क्रोध पी जाने के कारण वह मूर्छित हो गई. देवी को होश में लाने के लिए शिवजी ने शिव तांडव किया. होश में आने पर मां काली ने जब शिव को नृत्य करते देखा तो वे भी नाचने लगी जिस कारण उन्हें योगिनी भी कहा गया.

संजय गुप्ता