Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

अ मृ त वा णी

                          माया  ---  अहंकार

सिद्ध पुरुषों का अहंकार

  • एक भक्त — क्या नारदादि केवल भक्त थे या ज्ञानी भी थे ?
    श्रीरामकृष्ण — नारदादि आदि को ब्रह्मज्ञान प्राप्त हुआ था, किन्तु फिर भी वे कलनादिनी निर्झरिणी की तरह भगवन्महिमा का गुणगान करते हुए विचरण करते रहते थे । लोकशिक्षा और धर्मशिक्षा के लिए उन्होंने ‘विद्या का मैं’ रख छोड़ा था, ब्रह्म में पूर्ण विलीन न होकर अपने अलग अस्तित्व का मानो थोड़ा चिन्ह रख छोड़ा था ।
  • एक बार श्रीरामकृष्णदेव ने अपने एक शिष्य से विनोद में पूछा, “क्यों, क्या तुम्हें मुझमें कोई अभिमान नजर आता है ? क्या मुझमें अभिमान है ?”
    शिष्य ने कहा, “जी महाराज, थोड़ासा है, पर आपमें उतना अभिमान इन कारणों से रखा गया है — पहला, देहधारण के लिए; दूसरा, भगवद्भ़क्ति के उपयोग के लिए; तीसरा, भक्तों के साथ सत्संग करने के लिए; और चौथा, लोगों को उपदेश देने के लिए । फिर यह भी तो है कि इस ‘अहं’ को रखने के लिए आपने काफी प्रार्थना की है । वैसे देखा जाए तो आपके मन की स्वाभाविक प्रवृत्ति समाधि की ओर है। इसी से मैं कह रहा हूँ कि आपमें जो ‘अहं’ या अभिमान बचा है वह आपकी प्रार्थना का ही फल है ।”
    तब श्रीरामकृष्णदेव बोले, “ठीक है, लेकिन इस ‘मैं’ को बनाए रखने वाला मैं नहीं, जगदम्बा हैं । प्रार्थना को स्वीकार करना जगदम्बा के ही हाथ में है ।”

Anup sinha

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संजय गुप्ता Rpd
राजा भोज ने कराया था केदारनाथ मंदिर का निर्माण


मालवा के इस चक्रवर्ती, प्रतापी, काव्य और वास्तुशास्त्र में निपुण और विद्वान राजा राजा भोज के जीवन और कार्यों पर विश्व की अनेक यूनिवर्सिटीज में शोध कार्य हो रहा है।——————————————————–
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हनुमानजी द्वारा रचित रामकथा के शिलालेख समुद्र से निकलवाकर धारा नगरी में उनकी पुनर्रचना करवाई, जो हनुमान्नाटक के रूप में विश्वविख्यात है।
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उत्तराखंड में स्थित बारह ज्योतिर्लिंग में से एक केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग की उत्पत्ति और मंदिर के निर्माण को लेकर इतिहासकारों में मतभेद हैं। इस मंदिर को सर्वप्रथम किसने बनाया इसका कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है, लेकिन ज्ञात इतिहास अनुसार 3500 ईसापूर्व पांडवों ने इसका निर्माण किया, फिर 8वीं सदी में शंकराचार्य ने और बाद में 10वीं सदी के मध्य में इसका पुन:निर्माण कराया मालवा के राजा भोज ने।
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ग्वालियर से मिले राजा भोज के स्तुति पत्र के अनुसार केदारनाथ मंदिर का राजा भोज ने 1076 से 1099 के बीच पुन: निर्माण कराया था। राहुल सांकृत्यायन के अनुसार यह मंदिर 12-13वीं शताब्दी का है। इतिहासकार डॉ. शिव प्रसाद डबराल मानते हैं कि शैव लोग आदि शंकराचार्य से पहले से ही केदारनाथ जाते रहे हैं तब भी यह मंदिर मौजूद था।
कुछ विद्वान मानते हैं कि महान राजा भोज (भोजदेव) का शासनकाल 1010 से 1053 तक रहा। राजा भोज ने अपने काल में कई मंदिर बनवाए। राजा भोज के नाम पर भोपाल के निकट भोजपुर बसा है। धार की भोजशाला का निर्माण भी उन्होंने कराया था। कहते हैं कि उन्होंने ही मध्यप्रदेश की वर्तमान राजधानी भोपाल को बसाया था जिसे पहले भोजपाल कहा जाता था।
भोज के निर्माण कार्य : मध्यप्रदेश के सांस्कृतिक गौरव के जो स्मारक हमारे पास हैं, उनमें से अधिकांश राजा भोज की देन हैं, चाहे विश्वप्रसिद्ध भोजपुर मंदिर हो या विश्वभर के शिवभक्तों के श्रद्धा के केंद्र उज्जैन स्थित महाकालेश्वर मंदिर, धार की भोजशाला हो या भोपाल का विशाल तालाब- ये सभी राजा भोज के सृजनशील व्यक्तित्व की देन हैं। उन्होंने जहां भोज नगरी (वर्तमान भोपाल) की स्थापना की वहीं धार, उज्जैन और विदिशा जैसी प्रसिद्ध नगरियों को नया स्वरूप दिया। उन्होंने केदारनाथ, रामेश्वरम्, सोमनाथ, मुण्डीर आदि मंदिर भी बनवाए, जो हमारी समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर हैं।
राजा भोज ने शिव मंदिरों के साथ ही सरस्वती के मंदिरों का भी निर्माण किया। राजा भोज ने धार, मांडव तथा उज्जैन में सरस्वतीकण्ठभरण नामक भवन बनवाए थे जिसमें धार में ‘सरस्वती मंदिर’ सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। एक अंग्रेज अधिकारी सीई लुआर्ड ने 1908 के गजट में धार के सरस्वती मंदिर का नाम ‘भोजशाला’ लिखा था। पहले इस मंदिर में मां वाग्देवी की मूर्ति होती थी। मुगलकाल में मंद‍िर परिसर में मस्जिद बना देने के कारण यह मूर्ति अब ब्रिटेन के म्यूजियम में रखी है।
राजा भोज का परिचय : परमारवंशीय राजाओं ने मालवा के एक नगर धार को अपनी राजधानी बनाकर 8वीं शताब्दी से लेकर 14वीं शताब्दी के पूर्वार्ध तक राज्य किया था। उनके ही वंश में हुए परमार वंश के सबसे महान अधिपति महाराजा भोज ने धार में 1000 ईसवीं से 1055 ईसवीं तक शासन किया।
महाराजा भोज से संबंधित 1010 से 1055 ई. तक के कई ताम्रपत्र, शिलालेख और मूर्तिलेख प्राप्त होते हैं। भोज के साम्राज्य के अंतर्गत मालवा, कोंकण, खानदेश, भिलसा, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, चित्तौड़ एवं गोदावरी घाटी का कुछ भाग शामिल था। उन्होंने उज्जैन की जगह अपनी नई राजधानी धार को बनाया।
ग्रंथ रचना : राजा भोज खुद एक विद्वान होने के साथ-साथ काव्यशास्त्र और व्याकरण के बड़े जानकार थे और उन्होंने बहुत सारी किताबें लिखी थीं। मान्यता अनुसार भोज ने 64 प्रकार की सिद्धियां प्राप्त की थीं तथा उन्होंने सभी विषयों पर 84 ग्रंथ लिखे जिसमें धर्म, ज्योतिष, आयुर्वेद, व्याकरण, वास्तुशिल्प, विज्ञान, कला, नाट्यशास्त्र, संगीत, योगशास्त्र, दर्शन, राजनीतिशास्त्र आदि प्रमुख हैं।
उन्होंने ‘समरांगण सूत्रधार’, ‘सरस्वती कंठाभरण’, ‘सिद्वांत संग्रह’, ‘राजकार्तड’, ‘योग्यसूत्रवृत्ति’, ‘विद्या विनोद’, ‘युक्ति कल्पतरु’, ‘चारु चर्चा’, ‘आदित्य प्रताप सिद्धांत’, ‘आयुर्वेद सर्वस्व श्रृंगार प्रकाश’, ‘प्राकृत व्याकरण’, ‘कूर्मशतक’, ‘श्रृंगार मंजरी’, ‘भोजचम्पू’, ‘कृत्यकल्पतरु’, ‘तत्वप्रकाश’, ‘शब्दानुशासन’, ‘राज्मृडाड’ आदि ग्रंथों की रचना की। ‘भोज प्रबंधनम्’ नाम से उनकी आत्मकथा है। हनुमानजी द्वारा रचित रामकथा के शिलालेख समुद्र से निकलवाकर धारा नगरी में उनकी पुनर्रचना करवाई, जो हनुमान्नाटक के रूप में विश्वविख्यात है। तत्पश्चात उन्होंने चम्पू रामायण की रचना की, जो अपने गद्यकाव्य के लिए विख्यात है।
आईन-ए-अकबरी में प्राप्त उल्लेखों के अनुसार भोज की राजसभा में 500 विद्वान थे। इन विद्वानों में नौ (नौरत्न) का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। महाराजा भोज ने अपने ग्रंथों में विमान बनाने की विधि का विस्तृत वर्णन किया है। इसी तरह उन्होंने नाव व बड़े जहाज बनाने की विधि का विस्तारपूर्वक उल्लेख किया है। इसके अतिरिक्त उन्होंने रोबोट तकनीक पर भी काम किया था।

Sanjay gupta

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अंतिम गुज़ारिश
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अंधेरे को चीरती ट्रेन बड़ी तेज़ी से अपने लक्ष्य की ओर भागी जा रही थी. मेरे कंपार्टमेंट के सभी यात्री सो गए थे. बस, एक मेरी ही आंखों से नींद कोसों दूर थी. सुबह-सुबह आए हरीश के फोन ने मन में अजीब-सी हलचल मचा रखी थी, जिससे मेरी समग्र चेतना एकाकार हो हरीश के आसपास ही विचरण कर रही थी.
मैं हरीश के सबसे क़रीबी दोस्तों में से एक था. बचपन से ही हम साथ खेल-कूदकर, पढ़कर बड़े हुए थे. बड़े होने पर नौकरी भी हमें एक ही बैंक में मिली. शायद यही कारण था कि हम इतने घनिष्ठ हो गए थे कि एक-दूसरे से कोई बात कभी नहीं छुपाते थे. अगर कोई भी परेशानी हमारे जीवन में आती, हम दोनों मिलकर कोई न कोई रास्ता निकाल ही लेते.
हमारी शादी के लिए दुल्हन की तलाश भी एक साथ ही शुरू हुई, लेकिन हरीश की शादी मुझसे पहले हुई. हरीश की पत्नी निशा भाभी बेहद सुंदर, नाज़ुक, नेक और काफ़ी सुलझे विचारोंवाली थीं. घर के काम-काज में भी काफ़ी निपुण थीं. जल्द ही उन्होंने घर की सारी ज़िम्मेदारियां भी संभाल ली थीं. घर में किसी को किसी चीज़ की ज़रूरत होती, तो निशा भाभी के नाम की ही गुहार लगाते. मेहमानों की खातिरदारी में भी वह कभी पीछे नहीं रहतीं. अक्सर शाम को मैं उनके घर पहुंच जाता. वह कुछ न कुछ ख़ास डिश बनाकर मुझे ज़रूर खिलातीं, साथ ही अपनी चटपटी बातों से सबको हंसाती रहतीं. उनकी यही खनकती हंसी उस घर को जीवंतता प्रदान करती थी.
कुछ दिनों बाद मेरी भी शादी हो गई. मेरी पत्नी सुनंदा जमशेदपुर के एक स्कूल में पढ़ाती थी, इसलिए मैंने भी अपना ट्रांसफर वहीं करवा लिया. जब भी मैं पटना आता, हरीश और निशा भाभी से मिलने ज़रूर जाता. शादी के मात्र तीन बरस बाद ही मुझे लगने लगा था कि निशा भाभी काफ़ी तनावग्रस्त रहने लगी थीं, जिसके कारण उनकी सुंदरता भी अपनी ताज़गी खोने लगी थी. कामकाज में भी पहले की तरह ऊर्जावान नज़र नहीं आती थीं. भरे-पूरे परिवार में रहने के बावजूद बिल्कुल शांत, गंभीर और अकेली लगतीं. जो लोग कभी उनकी प्रशंसा करते नहीं थकते थे, आज उन्हीं लोगों की व्यंग्यात्मक बोलियां और निगाहें उन्हें आहत करती रहती थीं. उनके व्यक्तित्व की इतनी विपन्नता का कुछ कारण समझ में नहीं आ रहा था.
मेरी निगाहों के सवाल पढ़ने में हरीश को देर नहीं लगी थी. एक दिन मौक़ा मिलते ही वह निशा भाभी की उदासी का कारण बताने लगा था- “निशा के मां बनने में काफ़ी अड़चनें हैं. उसके दोनों फैलोपियन ट्यूब जाम हैं. दो बार माइक्रो सर्जरी हो चुकी है. डॉक्टरों का कहना है कि उसे मां बनने में थोड़ा व़क़्त लगेगा. अगर फिर भी वह मां नहीं बन सकी, तो अंतिम उपाय टेस्ट ट्यूब बेबी है. मेरी मां है कि उन्हेंे सब्र ही नहीं है, कुछ न कुछ बोलती रहती हैं.”
“तू चिंता क्यूं करता है? विज्ञान ने इतनी तऱक्क़ी कर ली है कि कोई न कोई रास्ता निकल ही आएगा.”
आश्वासन तो मैं दे आया था, पर कहीं न कहीं मेरे मन में भी कुछ खटक रहा था. देखते-देखते हरीश की शादी को पूरे आठ वर्ष गुज़र गए, पर निशा भाभी की गोद सूनी ही रही. इस दौरान मेरा ट्रांसफर भी जमशेदपुर से बाहर हो गया, जिससे बहुत दिनों तक पटना जा ही नहीं पाया. जब अपनी भतीजी की शादी में पटना जाने का मौक़ा मिला, तो दूसरे ही दिन मैं हरीश से मिलने उसके घर जा पहुंचा. वहां पहुंचते ही मुझे लगा, जैसे यहां सब कुछ बदल गया है. पहलेवाली रौनक़ ही नहीं थी. पूरा परिवार शाम के समय बाहर बरामदे में ही बैठा था. पहली बार वहां ठंडे ढंग से मेरा औपचारिक स्वागत हुआ. हरीश के बुलाने पर थोड़ी देर में निशा भाभी भी वहां आकर बैठ गईं. कांतिहीन, कृष्णकाय निशा भाभी को देखकर मैं हक्का-बक्का रह गया.
थोड़ी देर में ही वह उठते हुए बोलीं, “मैं चाय बनाती हूं.” इतने में ही उनकी बड़ी ननद सीमा दी ने तुरंत अपने नौकर शंकर को बुलाकर चाय-नाश्ता बनाने की हिदायत दे दी. ठिठककर भाभी रुक गईं और चुपचाप वहीं बैठ गईं. जल्द ही शंकर सब के लिए चाय ले आया. स़िर्फ निशा भाभी को चाय नहीं मिली. जब मैंने उसे एक कप चाय और लाने के लिए कहा, तो वह सहमी-सी निगाह हरीश की मां और दीदी पर डालता हुआ वापस किचन में चला गया.
थोड़ी देर के इंतज़ार के बाद भी जब शंकर निशा भाभी के लिए चाय नहीं लाया, तो न जाने क्यूं मेरा मन खिन्न हो गया और मैं चाय का अधूरा प्याला वहीं छोड़कर जाने के लिए उठ खड़ा हुआ. मेरे साथ हरीश भी टहलता हुआ सड़क तक आ गया. मुझे लगा उसके अंदर कुछ अनकही बातों का मंथन चल रहा था, जिसे वह अपनी खिसियानी हंसी से दबाने की कोशिश करते-करते बोल ही पड़ा था, “यार… केशव मैं अजीब से दोराहे पर खड़ा हूं. मां ने मेरी शादी बड़ी भाभी की विधवा बहन नेहा से तय कर दी है. मैं सरकारी नौकरी करता हूं, तो तलाक़ लिए बिना दूसरी शादी करने पर आफत में फंस सकता हूं. निशा मुझे तलाक़ देने को तैयार ही नहीं है. मैं बार-बार उसे समझा रहा हूं कि तलाक़ स़िर्फ काग़ज़ पर होगा. निशा के सारे अधिकार वैसे ही रहेंगे, जो एक पत्नी के होते हैं, लेकिन वह किसी भी शर्त पर तलाक़ देने को तैयार नहीं है.”
“ये तू कैसी बातें कर रहा है यार? हमेशा से महिला सशक्तिकरण की बातें करनेवाला तू, आज अपनी पत्नी के साथ ही इतना बड़ा अन्याय करने जा रहा है?”
“मैं भी क्या करूं? निशा का इलाज करवाते-करवाते धन और शक्ति, दोनों चुक गए हैं. बच्चों के लिए अब ज़्यादा इंतज़ार करूंगा, तो उनका भविष्य संवारने में परेशानी आएगी.”
“बच्चे गोद भी तो लिए जा सकते हैं.”
“मां बच्चा गोद लेने के पक्ष में नहीं हैं. उनका कहना है मेरा एक ही बेटा है, मैं अपने वंश को डूबने नहीं दूंगी. निशा किसी भी शर्त पर न
तलाक़ देने को तैयार है, न ही घर छोड़ने को. इसी वजह से उसका पूरे परिवार से सामंजस्य ही बिगड़ गया है. घर के लोगों के लिए उसका घर में होना या न होना कोई मायने नहीं रखता है, वे उसे बुरी तरह अपमानित भी करते हैं कि वह घर छोड़कर चली जाए, पर वह भी हार माननेवालों में से नहीं है. उसका यूं अपमान मुझे भी कम आहत नहीं करता है, क्योंकि मैं उसे बहुत प्यार करता हूं. मैं उसे बार-बार समझाता हूं कि आपसी सहमती से तलाक़ के लिए हस्ताक्षर कर दो. हमारा रिश्ता काग़ज़ी-खानापूर्ति का मोहताज नहीं है, पर उसे न
मेरे प्यार पर भरोसा है, न ही हमारे रिश्ते पर, खीझकर कभी-कभी मैं भी उसे अपमानित कर बैठता हूं.”
“एक बात कहूं हरीश… रिश्ते तो प्यार से बंधे होते हैं, जिसे हम ही बनाते हैं और हम ही तोड़ते हैं. उसे आधा-अधूरा बनानेवाले भी हम ही होते हैं, फिर रिश्तों से शिकायत कैसी? कभी रिश्तों का आकलन निशा भाभी की तरफ़ से भी कर लिया करो. एक औरत चाहे अपने सारे रिश्ते तोड़ दे, पर अपने पति के साथ बंधे रिश्ते को मरते दम तक निभाने की कोशिश करती है. अगर निशा भाभी के साथ कुछ ग़लत हो रहा है, तो विरोध जताना स्वाभाविक है. एक बार खुले दिमाग़ से सारी परिस्थिति को सोच, अपने शादी के वचनों को याद कर, जिसका मतलब ही होता है कि जब एक कमज़ोर पड़ जाए, तो दूसरा उसका साथ देगा. फिर तू कैसे अपने वचनों से मुकर सकता है?”
“मेरे ़फैसले को चाहे तू जो नाम दे, मुझे स्वार्थी समझ, पर मुझे भी मां की बातों में दम लगता है. अपने वंश को आगे बढ़ाने के लिए अपना एक बच्चा तो होना ही चाहिए. अगर निशा तलाक़ नहीं देगी, तो उस पर चरित्रहीन होने का झूठा आरोप लगाकर भी तलाक़ प्राप्त करूंगा. अगर तू उसे समझा सकता है, तो समझा कि वह अपनी ज़िद छोड़ दे. इससे उसे कोई फ़ायदा नहीं होनेवाला है.”
उसकी बातों से मैं अचंभित था. वास्तव में जब तक आदमी के मन में स्वार्थ नहीं आता है, तभी तक उसकी आत्मा का उसके कर्मों पर नियंत्रण रहता है. जैसे-जैसे उसकी आंखों पर बच्चे के मोह की पट्टी बंधती जा रही थी, वैसे-वैसे उसका पतन भी होता जा रहा था.
मैं हाथ जोड़ते हुए उसे बोला, “तू मुझे माफ़ कर. मुझसे यह काम नहीं होगा.”
पटना से वापस आए छह महीने गुज़र गए थे, लेकिन हरीश के कृत्य से आहत मैंने एक बार भी उसे फोन नहीं किया. उसका भी कोई फोन नहीं आया.
आज सुबह-सुबह अचानक हरीश का फोन आया, “केशव… एक ख़ुशख़बरी है, ईश्वर ने अपना चमत्कार दिखाया है, निशा मां बननेवाली है.”
“बधाई हो! ईश्वर ने दूसरी शादी के पाप से तुझे बचा लिया.”
“वो तो ठीक है, पर दूसरी समस्या आ गई है.”
“बोल-बोल, मैं तेरे लिए क्या कर सकता हूं? मेरी जान भी हाज़िर है.”
“क्या बताऊं, कई बरसों से बेचारी बनी तुम्हारी निशा भाभी अब पूरी आरी बन गई है. जब सब कुछ ठीक हो गया है, तो ज़िद किए बैठी है कि वह अब मुझे तलाक़ देकर ही दम लेगी. पहले मैंने इसे मज़ाक समझा था, लेकिन एक दिन बिना किसी को बताए अपना सारा सामान समेट मायके चली गई. इतना ही नहीं, उसने वकील के साथ कोर्ट में जाकर अपने ऊपर लगाए गए सारे चरित्रहीनता के आरोप को स्वीकार कर केस को नया मोड़ दे दिया. उसका यही रवैया रहा, तो हम दोनों का तलाक़ निश्चित है. मैं किसी तरह केस के डेट बढ़वा रहा हूं. तू जल्दी से आकर अपनी भाभी को समझा.”
और मैं बिना देर किए पटना के लिए चल पड़ा था. पटना पहुंचते ही मैं सबसे पहले निशा भाभी से मिलने उनके मायके जा पहुंचा. मुझे देखते ही एक व्यंग्यात्मक हंसी उनके होंठों पर छा गई. थोड़ी-सी औपचारिक बातों के बाद अपने स्वभाव के विपरीत मौक़ा मिलते ही मुझे अपने शब्दों के बाणों से बेधने लगीं, “तो तुम अपने सारे काम छोड़ मुझे समझाने आ ही गए. निश्चित रूप से हरीश ने हम दोनों के तलाक़ को रोकने के लिए तुम्हें भेजा होगा. हरीश के कहने पर तुम यहां तक दौड़े चले आए, पर तुम तब कहां थे, जब इसी तलाक़ के कारण घोर मानसिक और शारीरिक पीड़ा झेलती मैं घायल पंछी-सी व्यथित और व्याकुल अकथनीय मानसिक पीड़ा का सामना कर रही थी?”
“भाभी… आप ग़लत समझ रही हैं. मैं तो स़िर्फ आप दोनों की भलाई चाहता हूं. पहले भी मैंने हरीश के ग़लत ़फैसले का विरोध किया था, आज भी आपके ़फैसले के विरुद्ध नहीं हूं. मैं तो यह सोचकर अचंभित हूं, जब हरीश ने आपसे तलाक़ का ़फैसला लिया था, तब आपने डाइवोर्स पेपर पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया था, अपने ऊपर लगाए गए सारे झूठे आरोपों का डटकर अकेले ही मुक़ाबला किया था और तलाक़ नहीं देेने के लिए अडिग थीं. आज जब ईश्वर ने पूरी परिस्थिति को आपके अनुकूल कर दिया, पति और घरवाले आपको हाथोंहाथ लेने को तैयार बैठे हैं, फिर आपका यह विपरीत ़फैसला क्यूं? कुछ समझ नहीं पा रहा हूं.”
“समझोगे कैसे? पुरुष हो, तो पुुरुषत्व का अहम् तो रहेगा ही. किसी औरत का छलनी आत्मसम्मान तुम्हें कैसे दिखेगा? घरवाले चाहे कितना भी प्रताड़ित करते, अगर पति ने मेरा साथ दिया होता, तो मैं सारी प्रताड़ना भुला देती. लेकिन जब मेरे पति ने ही अपनी शराफ़त छोड़कर, अपने परिवार के लोगों के साथ मिलकर मेरे सामने बेहयाई पूर्ण प्रस्ताव रखा था, जिसके अनुसार एक छत के नीचे अगर मैं दूसरी औरत के साथ उसको बांटूं, तो मेरी रोटी, कपड़ा और मकान की समस्या हल हो जाएगी, तो सोचो, क्या गुज़री होगी मेरे दिल पर? सैकड़ों नश्तर जैसे एक साथ मेरे दिल में उतार दिए गए, जो मेरी आत्मा तक को छलनी कर गए. औरत का अपने पति के जीवन में क्या इतना ही अस्तित्व है कि वह बच्चा पैदा करनेवाली एक मशीन मात्र है? बच्चा है, तो उसका अस्तित्व पति के जीवन में है, वरना इस एक कारण मात्र से ही पति उसके सारे प्यार और गुणों को भुला देता है. मैं हरीश से कितना प्यार करती थी. उसकी उन्नति, सफलता और उसकी दीर्घायु के लिए कितने ही व्रत-त्योहार करती. मंदिरों में प्रार्थना करती और उसके बदले मुझे क्या मिला? अपने रिश्तेदारों के बीच तिल-तिल मरने के लिए मुझे छोड़कर, मेरा रक्षक, मेरा भवतारक वो मेरा पति दूर खड़ा मुझे टूटता, हारता और अपमानित होते देख रहा था. उसका प्रेम अब अहंकार में बदलता जा रहा था.”
“सच कहूं केशव, तो मैं तब न उसके साथ रहना चाहती थी, न अब. वह तो यह सोचकर ख़ुश हो रहा था कि मैं सुविधा भोगी थी, इसलिए घर छोड़कर दर-दर की ठोकरें नहीं खाना चाहती थी. वह यह नहीं सोच सका कि ज़रूरत से ़ज़्यादा अत्याचार औरत को साहसी और कठोर बना देता है. मैं अपमान, दुख और बदले की आग में झुलसती उसकी दूसरी शादी में पूर्णतः बाधक बनी, उसके मनसूबों पर पानी फेर रही थी और इसी कारण से घोर प्रताड़ना का सामना भी साहस से कर रही थी.”
मेरी एक कमज़ोरी उसकी ताक़त बन गई थी, जिसके बलबूते पर वह मेरे धैर्य की परीक्षा ले रहा था. आज उसकी कमज़ोरी यानी उसकी संतान मेरी ताक़त बन गई है, जिसे मैं उसे कभी छूने नहीं दूंगी. उसके झूठे चरित्रहीनता के आरोप को मैंने कोर्ट में सच्चा बना दिया है, जो हमारे तलाक़ का कारण बनेगा और यह तलाक़ अब होकर रहेगा. वह शौक़ से दूसरी शादी कर अपना घर बसा ले और भूल जाए मुझे और अपने अजन्मे शिशु को, जो अब मेरे जीने का मक़सद है. विवाह के मंत्रों को पढ़े जाने से एक स्त्री-पुरुष सात जन्मों के बंधन में नहीं बंध जाते हैं. इस संबंध को निभाने के लिए सबसे ज़रूरी शर्त है, एक-दूसरे के लिए दिल में समर्पित प्यार और विश्वास का होना. लेकिन हरीश ने तो मेरे विश्वास को ही छला था. मैं कहती हूं केशव, अगर कोई दूसरा जन्म होता भी है, तो मैं ईश्वर से यही प्रार्थना करूंगी कि मेरा किसी भी जन्म में हरीश से सामना न हो. अपना घर मैं ख़ुद बनाऊंगी अपने बलबूते पर.”
“एक अंतिम गुज़ारिश है, जो उस तक पहुंचा देना. उसे कहना कि आगे वह किसी और के साथ ऐसा न करे. किसी भी स्त्री को अपने जीवन में, अपने ही घर में पराया न बनाए, क्योंकि भले ही उस घर को बनाने में पुरुष ने पैसे ख़र्च किए हों, पर उसके कण-कण से स्त्री की पूरी अस्मिता जुड़ी होती है.”
मैं चाहकर भी निशा भाभी को वापस लौटने के लिए नहीं बोल पाया. आख़िर औरत हमेशा दूसरों के इशारे और दूसरों की मर्ज़ी से क्यों जीए? हरीश की तरह मेरे लिए स्त्री स्वतंत्रता और महिला सशक्तिकरण की बातें स़िर्फ काग़ज़ी नहीं थीं. मैं वहां से उठते हुए बोला, “मेरी ईश्वर से यही प्रार्थना है कि आप अपने मक़सद में पूरी तरह क़ामयाब हों. जीवन में आपको कभी भी किसी सहायता की ज़रूरत हो, तो निःसंकोच मुझे याद कीजिएगा. मैं और मेरा पूरा परिवार आपके साथ हैं.”

Sanjay gupta

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मम्मी आपने दाल में नमक ही नहीं डाला, क्या खाना बनाया है?’ श्रुति ने ठुनकते हुए नम्रता से कहा। ‘क्या बात कर रही हो? अभी-अभी तो पापा खाना खाकर गए हैं उन्होंने तो कुछ नहीं कहा’, नम्रता ने कहा। तभी नम्रता की ननद रीतिका चुटकी लेते हुए बोली ‘भैया तो आपके प्यार में बिना नमक का खाना भी स्वाद लेकर खा लेते हैं। वो क्या बोलेंगे।’ नम्रता को तब भी विश्वास नहीं हुआ, उसने खुद दाल चखी। दाल बिल्कुल बेस्वाद थी। नम्रता परेशान हो उठी, ‘अभिनव कहीं किसी परेशानी में तो नहीं है’, जो उन्हें खाने में भी स्वाद का पता नहीं चला।’

नम्रता की परेशानी को भाँपते हुए रीतिका बोली ‘भाभी आप भी न खामखाँ परेशान हो रही हैं। आप दोनों हर वक्त एक दूसरे के लिए परेशान रहते हो। बिना बोले ही एक दूसरे के मन की बात समझ जाते हो, परेशानी भाँप जाते हो। आप परेशान या शर्मिंदा न हों, इसलिए भैया ने कुछ नहीं बोला होगा।’ रीतिका के समझाने पर नम्रता थोड़ी शांत हो गई।

शाम को श्रुति दौड़ती हुई आई – ‘मम्मी-मम्मी ये देखो पापा आपके लिए क्या लाए हैं?’ नम्रता पूछती है ‘पापा आ गए? कहाँ हैं?’ श्रुति ने बताया ड्राइंगरूम में हैं। नम्रता हाथ में पैकेट लिए अभिनव के पास ही चली आई,’ ये क्या लाए हैं आप?’ अभिनव अखबार पर नज़र गड़ाए हुए ही बोले ‘यह एक मशीन है, इससे प्याज, गाजर, गोभी और भी सारी सब्जियाँ बहुत आराम से कट जाती हैं। तुम्हें इससे रसोई का काम करने में बहुत आराम होगा इसलिए ले लिया।’ कितने की आई?’

नम्रता के इस सवाल पर अभिनव सिर ऊपर उठा के मुस्कुराते हुए बोले ‘क्यों पसंद नहीं आई? पैसे से तुम्हें क्या करना?’ नम्रता ने हँसते हुए कहा ‘क्यों? सुबह की दाल में नमक नहीं डालने का इनाम लाए हो?’ इस पर अभिनव हँसने लगे और कहा – ‘अरे वो तो मुझे पता भी नहीं चला, सब्जियाँ जो बहुत स्वादिष्ट थीं। अच्छा! एक प्याला चाय बना दो।’ नम्रता हँसते हुए बोली ‘वो भी बिना चीनी के बना देती हूँ। क्यों? चलेगी? ‘और मुस्कुराती हुई चली जाती है।

नम्रता का यह मुस्कुराता चेहरा देख रीतिका ने कहा – ‘देखा भाभी, आप तो यूँ ही परेशान हो रही थीं और एक भैया का प्यार है आपके प्रति, जो बिना बोले ही आपकी परेशानी को समझ लेते हैं। मैं तो भगवान से प्रार्थना करती हूँ कि हंसों का यह जोड़ा यूँ ही सदा हँसता-मुस्कुराता रहे।

आपके प्यार को किसी की नजर न लगे। टच वुड! काश! मुझे भी इतना ही प्यार करने वाला पति मिल जाए, मैं तो ख्वाबों के आसमान में पंख लगा के उड़ जाऊँ।’ नम्रता ने कहा – ‘हाँ, हाँ जरूर उड़ना, लेकिन ऐसा पति मिल गया न तो बस भगवान ही मालिक है। न कभी प्यार की दो बातें करते हैं, न कोई हँसी मजाक।

बस, हर वक्त पढ़ाई में ही लगे रहते हैं। प्यार का इजहार तो दूर की बात है, कभी जताते तक नहीं। रोमांस क्या होता है, ये बस फिल्मों में ही देखा है। कभी सचाई के धरातल पर इसका अनुभव करने का मौका ही नहीं मिला। अगर ऐसे पति मिल गए न, तो दो-चार मीठी बातों के लिए भी तरसोगी।’ इतना कहते-कहते नम्रता के दिल का दर्द उसकी आँखों में उतर आया, जिस देख रीतिका ने कहा ‘पता है भाभी! कुछ इंसान बोलते हैं ज्यादा, करते हैं कम, दिखाते हैं ज्यादा, करते हैं कम, दिखाते हैं ज्यादा और होते हैं कुछ नहीं।

याद है आपको? एक बार आप और भैया बाजार गए थे। आपने लाल वाली साड़ी देखकर बस, इतना कहा था ‘वाह! कितनी सुंदर साड़ी है?’ उस वक्त भैया ने सिर्फ उसे देखा था। और अगले ही दिन वह आपके हाथ में थी। ये प्यार नहीं तो और क्या है? आपको पता नहीं है भाभी, कुछ लोग मान-मर्यादा, रीतिरिवाज का हवाला देकर पत्नियों को परेशान करते हैं?

ये मत पहनो, उससे बात मत करो, कहाँ गई थी? इतना समय कहाँ लगा दिया? इतने पैसे कहाँ खर्च कर दिए? जैसे अनगिनत सवालों से अपनी पत्नी को अपमानित करते हैं। भैया ने तो शादी के बाद आपकी इच्छा पर आपको एम.ए.करवाया। आपने पेंटिंग कोर्स करना चाहा तो भैया ने आपके शौक को पूरा करने के लिए कभी ना नहीं कहा। कितनों के पति सिर्फ पत्नी की खुशी के लिए यह सब करने देते हैं? आपने कहा कि ब्यूटी पार्लर खोलना चाहती हैं, चुपचाप बिना रकम भरा चेक काट के आपको चेक दे दिया।

भाभी आप तो बहुत भाग्यशाली हैं जो आपको इतना प्यार करने वाला पति मिला है। जरूर आपने पिछले जन्म में मोती दान किए होंगे।’ इतना सुनने के बाद नम्रता सचाई के स्वरूप को समझ गई। वह समझ गई कि वाकई में अभिनव उसे कितना प्यार करते हैं। उनके बीच भावनाओं का बंधन है। जीने की आजादी है। इतनी देर में प्यार से भरी एक प्याली चाय तैयार हो चुकी थी, ‍जिसके साथ मीठे जज्बात के बिस्कुट थे, जिसे लेकर वो ड्राइंगरूम में आ गई। दोनों चुप थे पर दोनों एक-दूसरे के दिलों के एहसास को समझ रहे थे तभी श्रुति कूदती-फानती हुई पापा के गोद में आ बैठी और बाप-बेटी दोनों अपनी ही बातों में लग गए। मुस्कुरा कर नम्रता दोनों को एक भरपूर नजर से निहारने लगती है।

रात को सारे काम निपटाने के बाद जब नम्रता बेडरूम में आई तो, अभिनव ने कहा ‘तुम्हारे लिए अलमारी में कुछ रखा है।’ नम्रता ने जैसे ही अलमारी खोली वहाँ एक लाल रंग का लिफाफा रखा हुआ था उसने आश्चर्यचकित होकर उसे खोला। पत्नी को समर्पित एक संगीत वाला कार्ड था उसमें जो ‘आई लव यू’ बोल रहा था। साथ ही एक पत्र था –

मेरी जिंदगी की हर सुबह खुशनसीब होती है क्योंकि वो तुम्हारे सुंदर चेहरे को देखकर शुरू होती है। मैं चाहता हूँ कि अंत भी ऐसा ही हो। तुमने जैसे पति की कल्पना की थी वैसा मैं नहीं हो सका इसके लिए माफी चाहता हूँ, क्योंकि मेरी परवरिश बहुत गरीबी में हुई, जहाँ मुझे फिल्म देखने का मौका नहीं मिला। मामा के यहाँ रह कर किसी तरह पढ़-लिखकर एक नौकरी हासिल करने के लक्ष्य के आगे कभी कुछ सोच ही नहीं पाया। परंतु, अब मैं कोशिश करूँगा तुम्हारे ख्वाबों का पति बनने की, क्या तुम थोड़ी मदद करोगी?
तुम्हारा और सिर्फ तुम्हारा अभिनव।

पत्र पढ़कर नम्रता की आँखें भर आईं, जिसे देख अभिनव घबराए से नम्रता के पास आए। ‘अरे! ये क्या हुआ? मेरा इरादा ऐसा तो कतई नहीं था। मैंने तुम्हारी और रीतिका की बातें सुन ली थीं इसलिए… लेकिन मैं तो तुम्हें खुशी देने के लिए यह सब किया और तुम तो रोने लगीं।’

नम्रता अभिनव के सीने से लग कर रोते हुए बोली ‘आप बहुत अच्छे हैं। आप बिल्कुल मत बदलिए आप जैसे हैं वैसे ही मुझे प्यारे हैं। मैं क्यों न आप से ही आपकी तरह ही प्यार करूँ।

Sanjay gupta

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// चिरकुंवारी नर्मदा की अधूरी प्रेम-कथा //
कहते हैं नर्मदा ने अपने प्रेमी शोणभद्र से धोखा खाने के बाद आजीवन कुंवारी रहने का फैसला किया लेकिन क्या सचमुच वह गुस्से की आग में चिरकुवांरी बनी रही या फिर प्रेमी शोणभद्र को दंडित करने का यही बेहतर उपाय लगा कि आत्मनिर्वासन की पीड़ा को पीते हुए स्वयं पर ही आघात किया जाए। नर्मदा की प्रेम-कथा लोकगीतों और लोककथाओं में अलग-अलग मिलती है लेकिन हर कथा का अंत कमोबेश वही कि शोणभद्र के नर्मदा की दासी जुहिला के साथ संबंधों के चलते नर्मदा ने अपना मुंह मोड़ लिया और उलटी दिशा में चल पड़ीं। सत्य और कथ्य का मिलन देखिए कि नर्मदा नदी विपरीत दिशा में ही बहती दिखाई देती है।

कथा 1 : नर्मदा और शोण भद्र की शादी होने वाली थी। विवाह मंडप में बैठने से ठीक एन वक्त पर नर्मदा को पता चला कि शोण भद्र की दिलचस्पी उसकी दासी जुहिला(यह आदिवासी नदी मंडला के पास बहती है) में अधिक है। प्रतिष्ठत कुल की नर्मदा यह अपमान सहन ना कर सकी और मंडप छोड़कर उलटी दिशा में चली गई। शोण भद्र को अपनी गलती का एहसास हुआ तो वह भी नर्मदा के पीछे भागा यह गुहार लगाते हुए’ लौट आओ नर्मदा’… लेकिन नर्मदा को नहीं लौटना था सो वह नहीं लौटी।

अब आप कथा का भौगोलिक सत्य देखिए कि सचमुच नर्मदा भारतीय प्रायद्वीप की दो प्रमुख नदियों गंगा और गोदावरी से विपरीत दिशा में बहती है यानी पूर्व से पश्चिम की ओर। कहते हैं आज भी नर्मदा एक बिंदू विशेष से शोण भद्र से अलग होती दिखाई पड़ती है। कथा की फलश्रुति यह भी है कि नर्मदा को इसीलिए चिरकुंवारी नदी कहा गया है और ग्रहों के किसी विशेष मेल पर स्वयं गंगा नदी भी यहां स्नान करने आती है। इस नदी को गंगा से भी पवित्र माना गया है।

मत्स्यपुराण में नर्मदा की महिमा इस तरह वर्णित है -‘कनखल क्षेत्र में गंगा पवित्र है और कुरुक्षेत्र में सरस्वती। परन्तु गांव हो चाहे वन, नर्मदा सर्वत्र पवित्र है। यमुना का जल एक सप्ताह में, सरस्वती का तीन दिन में, गंगाजल उसी दिन और नर्मदा का जल उसी क्षण पवित्र कर देता है।’ एक अन्य प्राचीन ग्रन्थ में सप्त सरिताओं का गुणगान इस तरह है।

गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती।
नर्मदा सिन्धु कावेरी जलेSस्मिन सन्निधिं कुरु।।

कथा 2 : इस कथा में नर्मदा को रेवा नदी और शोणभद्र को सोनभद्र के नाम से जाना गया है। नद यानी नदी का पुरुष रूप। (ब्रह्मपुत्र भी नदी नहीं ‘नद’ ही कहा जाता है।) बहरहाल यह कथा बताती है कि राजकुमारी नर्मदा राजा मेखल की पुत्री थी। राजा मेखल ने अपनी अत्यंत रूपसी पुत्री के लिए यह तय किया कि जो राजकुमार गुलबकावली के दुर्लभ पुष्प उनकी पुत्री के लिए लाएगा वे अपनी पुत्री का विवाह उसी के साथ संपन्न करेंगे। राजकुमार सोनभद्र गुलबकावली के फूल ले आए अत: उनसे राजकुमारी नर्मदा का विवाह तय हुआ।

नर्मदा अब तक सोनभद्र के दर्शन ना कर सकी थी लेकिन उसके रूप, यौवन और पराक्रम की कथाएं सुनकर मन ही मन वह भी उसे चाहने लगी। विवाह होने में कुछ दिन शेष थे लेकिन नर्मदा से रहा ना गया उसने अपनी दासी जुहिला के हाथों प्रेम संदेश भेजने की सोची। जुहिला को सुझी ठिठोली। उसने राजकुमारी से उसके वस्त्राभूषण मांगे और चल पड़ी राजकुमार से मिलने। सोनभद्र के पास पहुंची तो राजकुमार सोनभद्र उसे ही नर्मदा समझने की भूल कर बैठा। जुहिला की ‍नियत में भी खोट आ गया। राजकुमार के प्रणय-निवेदन को वह ठुकरा ना सकी। इधर नर्मदा का सब्र का बांध टूटने लगा। दासी जुहिला के आने में देरी हुई तो वह स्वयं चल पड़ी सोनभद्र से मिलने।

वहां पहुंचने पर सोनभद्र और जुहिला को साथ देखकर वह अपमान की भीषण आग में जल उठीं। तुरंत वहां से उल्टी दिशा में चल पड़ी फिर कभी ना लौटने के लिए। सोनभद्र अपनी गलती पर पछताता रहा लेकिन स्वाभिमान और विद्रोह की प्रतीक बनी नर्मदा पलट कर नहीं आई।

अब इस कथा का भौगोलिक सत्य देखिए कि जैसिंहनगर के ग्राम बरहा के निकट जुहिला (इस नदी को दुषित नदी माना जाता है, पवित्र नदियों में इसे शामिल नहीं किया जाता) का सोनभद्र नद से वाम-पार्श्व में दशरथ घाट पर संगम होता है और कथा में रूठी राजकुमारी नर्मदा कुंवारी और अकेली उल्टी दिशा में बहती दिखाई देती है। रानी और दासी के राजवस्त्र बदलने की कथा इलाहाबाद के पूर्वी भाग में आज भी प्रचलित है।

कथा 3 : कई हजारों वर्ष पहले की बात है। नर्मदा जी नदी बनकर जन्मीं। सोनभद्र नद बनकर जन्मा। दोनों के घर पास थे। दोनों अमरकंट की पहाड़ियों में घुटनों के बल चलते। चिढ़ते-चिढ़ाते। हंसते-रुठते। दोनों का बचपन खत्म हुआ। दोनों किशोर हुए। लगाव और बढ़ने लगा। गुफाओं, पहाड़‍ियों में ऋषि-मुनि व संतों ने डेरे डाले। चारों ओर यज्ञ-पूजन होने लगा। पूरे पर्वत में हवन की पवित्र समिधाओं से वातावरण सुगंधित होने लगा। इसी पावन माहौल में दोनों जवान हुए। उन दोनों ने कसमें खाई। जीवन भर एक-दूसरे का साथ नहीं छोड़ने की। एक-दूसरे को धोखा नहीं देने की।

एक दिन अचानक रास्ते में सोनभद्र ने सामने नर्मदा की सखी जुहिला नदी आ धमकी। सोलह श्रृंगार किए हुए, वन का सौन्दर्य लिए वह भी नवयुवती थी। उसने अपनी अदाओं से सोनभद्र को भी मोह लिया। सोनभद्र अपनी बाल सखी नर्मदा को भूल गया। जुहिला को भी अपनी सखी के प्यार पर डोरे डालते लाज ना आई। नर्मदा ने बहुत कोशिश की सोनभद्र को समझाने की। लेकिन सोनभद्र तो जैसे जुहिला के लिए बावरा हो गया था।

नर्मदा ने किसी ऐसे ही असहनीय क्षण में निर्णय लिया कि ऐसे धोखेबाज के साथ से अच्छा है इसे छोड़कर चल देना। कहते हैं तभी से नर्मदा ने अपनी दिशा बदल ली। सोनभद्र और जुहिला ने नर्मदा को जाते देखा। सोनभद्र को दुख हुआ। बचपन की सखी उसे छोड़कर जा रही थी। उसने पुकारा- ‘न…र…म…दा…रूक जाओ, लौट आओ नर्मदा।

लेकिन नर्मदा जी ने हमेशा कुंवारी रहने का प्रण कर लिया। युवावस्था में ही सन्यासिनी बन गई। रास्ते में घनघोर पहाड़ियां आईं। हरे-भरे जंगल आए। पर वह रास्ता बनाती चली गईं। कल-कल छल-छल का शोर करती बढ़ती गईं। मंडला के आदिमजनों के इलाके में पहुंचीं। कहते हैं आज भी नर्मदा की परिक्रमा में कहीं-कहीं नर्मदा का करूण विलाप सुनाई पड़ता है।

नर्मदा ने बंगाल सागर की यात्रा छोड़ी और अरब सागर की ओर दौड़ीं। भौगोलिक तथ्य देखिए कि हमारे देश की सभी बड़ी नदियां बंगाल सागर में मिलती हैं लेकिन गुस्से के कारण नर्मदा अरब सागर में समा गई।

नर्मदा की कथा जनमानस में कई रूपों में प्रचलित है लेकिन चिरकुवांरी नर्मदा का सात्विक सौन्दर्य, चारित्रिक तेज और भावनात्मक उफान नर्मदा परिक्रमा के दौरान हर संवेदनशील मन महसूस करता है। कहने को वह नदी रूप में है लेकिन चाहे-अनचाहे भक्त-गण उनका मानवीयकरण कर ही लेते है। पौराणिक कथा और यथार्थ के भौगोलिक सत्य का सुंदर सम्मिलन उनकी इस भावना को बल प्रदान करता है और वे कह उठते हैं नमामि देवी नर्मदे…. !

(मित्र अजय दास जी की वाल से)

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😎 सत्य कथा :- एक लड़का मुम्बई से रेलवे का परीक्षा देकर, अपने सीट पर जैसे ही बैठा। एक लड़की हाँफते हुए आयी। लड़के से बोली, की मुझे बचा लो, प्लीज! लड़का कुछ समझता कि वह लड़की कम्बल लेकर लड़के के पैर के ऊपर अपना सर रखकर सो गयी। काफी दूर जब ट्रेन निकल गयी। तो उस लड़की ने लड़के से पूछी की यह ट्रेन कहाँ तक जायेगी।

लड़के ने कहा कि लखनऊ! तब तक टीसी आया। बोला कि टिकट दिखाइये। लड़की ने कहा कि आप लखनऊ तक का टिकट बना दीजिये। लड़का लखनऊ तक आते आते उस लड़की से घुलमिल गया था। ट्रेन जब लखनऊ स्टेशन पर रुकी। तो उस लड़के से बोली कि, मैं इस शहर में नई हूँ। मेरे एक रिश्तेदार रहते हैं। लेकिन बैग में पता रखते समय भूल गयी। आप दो चार दिन अपने घर मुझे रख लीजिये। लड़के ने कहा कि ठीक हैं। जब लड़का अपने घर पहुँचा, घर की बेल बजायी। तो लड़के की बहन देख कर हैरान रह गयी। कि भैया परीक्षा देने गया था। तो रिजेल्ट भी साथ लाया हैं। लड़के ने लड़की की मजबूरी बतायी। घर वाले राजी हो गए। लड़की दूसरे दिन घर मे इतना राशन खरीद कर रख दी। कि घर वाले भूल ही गये कि, इस लड़की को इसके रिश्तेदार के यहाँ छोड़ना हैं। लड़के के बहन की शादी तो तय हो गयी। लेकिन 80 हजार रुपये दहेज में कम पड़ रहे थे। लड़के के पिता जी लोन लेने की बात कर रहे थे। इतने में वह लड़की बोली कि बाबू जी, आप लोन मत लीजिये। हम आप को दे देंगे। शादी बड़ी धूमधाम से हुई।

बहन की शादी के बाद लड़के ने लड़की से कहा कि, मैं तुमसे प्यार करता हूँ। मुझसे शादी करोगी। लड़की बोली कि यही बात अम्मा बाबूजी के सामने रखिये। लड़के ने कहा कि यह बात अम्मा बाबूजी जी से राय लेकर बोला हूँ। लड़की सबके सामने कही की मेरे बारे में बेगैर जाने ही आप लोग शादी के बारे में सोच लिये। सच्चाई जानने के बाद क्या आप मुझसे शादी करेंगे। जब वह बतायी कि, मुम्बई के रेड एलर्ड एरिया के एक कोठे के मालकिन की बेटी हूँ। जब मुझे मालूम हुआ कि आज मेरी कीमत लग गयी हैं। तो माँ से बोली कि इस दलदल में मुझे मत डालो। मुझे पढ़ा लिखाकर क्या यही करने के लिये सोची हो। मुझे मेरी माँ ने कहा कि, बेटी तू ग्राहक आने से पहले कही भाग जा।

तब मैं भाग कर यहाँ आ गयी। यह सुनकर सबके पाव तले जमीन खिसक गई। और उस लड़की से बोलना बन्द कर दिए। यह बात तत्काल बेटी को ससुराल में मालूम हुई। लड़की ने अपने पति से बोली कि, मुझे अपने मायके जाना हैं। वह तत्काल अपने मायके जैसे ही पहुँची। लड़की अपना कपड़ा समेट कर घर से निकलने वाली थी। लड़की ने कहा कि कहाँ जा रही हो। तो वह बोली कि भगवान जाने। इतना कहकर वह फफककर रोने लगी। और कहने लगी कि आप लोग का प्यार बहुत मिला।

लड़की ने अपने माता पिता भाई से बोली कि, आप लोग बहुत गिरे इंसान हो। जबसे भाभी घर मे आयी। आज दो साल से यह साग सब्जी राशन पानी लायी। तब गन्दी नही थी। जब मेरे शादी में 80 हजार दी तब गन्दी नही थी। मेरे शादी का सारा सामान खरीदकर मुझे दी। तब गन्दी नही थी। ये जेवर बनवाकर मुझे दी। तब गन्दी नही थी। मेरे शादी में सारा खर्च जब यह उठाई तो गन्दी नही थी। तब तो आप लोग प्रसन्सा की पुल आप लोग बांधते थे। की यह बेटी नही साक्षात लक्ष्मी हैं। अगर भाभी की जगह आप की बेटी होती तो आप मुझे भी घर से निकाल देते। भाई का हाथ पकड़ कर बोली, क्यो भैया जब आप भाभी को लेकर दिन रात घुमते थे। तब गन्दी नही थी। आज गन्दी हो गयी। अगर भाभी से आप भैया शादी नही किये। तो मैं कभी नही आप के दरवाजे पर आऊँगी। हम लड़कियों को यही समाज गन्दा बनाता हैं। कोठे पर ले जाकर बेच देता हैं। और कोठे पर जाकर सोता हैं। तब कुछ इज्जत के बारे में नही सोचता हैं। अपनाने में इज्जत चली जाती हैं। बेटी की बात सुनकर सब कहे कि शादी होगी।

लड़की ने कहा कि नही बाबू जी, शादी तब करूँगी। जब यह घर इस महल्ले में सबसे आलीशान बन जायेगा। लड़के ने कहा कि मेरे बाबूजी के पास इतना पैसा नही हैं। लड़की ने कहा कि मैं बनवाऊँगी। लड़की ने अपने माँ को टेलीफोन की। लड़की की माँ ने 50 लाख रुपया एक आदमी के माध्यम से भेजवा दी। आलीशान मकान बनने के बाद, एक बहुत बड़ी TV फ्रिज की दुकान खोलवाई। तब शादी की। यह समाज जानने के बाद भी, शादी में गया। किसीं ने कोई गलत बात नही की। सच्चाई जानने के बाद भी समाज ने यह कहना शुरू कर दिया। कि यह तो साक्षात लक्ष्मी हैं। घर की तस्वीर बदल दी।

आप लोग भी कुछ प्रतिक्रिया प्रकट करे।

धीरज सुक्ला

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प्रेरक प्रसंग

दोस्ती के हाथ

  स्वामी रामतीर्थ जहाज द्वारा जापान से अमेरिका जा रहे थे ।  जब सैनफ्रान्सिस्को बन्दरगाह आया, तो सब लोग उतरने लगे, लेकिन स्वामीजी निश्चिन्त भाव से डेक पर टहलने लगे ।  एक अमेरिकी का जब उनकी ओर ध्यान गया, तो उसने पूछा,  "महाशय् !  आपका समान कहाँ है ?"
  "मेरे पास कोई समान नहीं है, जो कुछ है, मेरे शरीर पर ही है ।"
  "क्या आपके पास पैसे भी नहीं हैं ?"
  "नहीं",  स्वामीजी ने उत्तर दिया ।
  "तब आपका जीवन कैसे चलता है ?"
  सबके साथ प्रेमपूर्वक व्यवहार करना ही मेरा जीवन है ।  जब मुझे प्यास लगती है, तो पानी मिल जाता है ।  जब भूख लगती है, तो कोई रोटी का टुकड़ा दे ही देता है !"
  "क्या अमेरिका में आपका कोई दोस्त है ?"
  "हाँ !  है क्यों नहीं ?  एक अमेरिकी मेरा दोस्त है", और यह कह उन्होंने उसके कन्धे पर हाथ रखकर कहा,  "मेरा दोस्त यह है !"
  उनके इस आत्मीयतापूर्ण स्पर्श का उस पर जादू का-सा असर पड़ा।  उसे ऐसा महसूस हुआ, मानों उनके साथ उसकी पुरानी मित्रता है ।  वह एक सच्चे दोस्त की भाँति उनका मित्र हो गया ।  इसके बाद स्वामीजी जब कभी सैनफ्रान्सिस्को आये, उसने उन्हें अपने यहाँ ही सम्मानपूर्वक रखा और उनका बराबर ख्याल किया ।

अनूप सिन्हा

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(((( खुशियाँ बाँटने का सुख ))))
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मनीष बैंक में एक सरकारी अफसर था। रोज बाइक से ऑफिस जाता और शाम को घर लौट के आता।
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शहर में चकाचौंध तो बहुत रहती है लेकिन जीवन कहीं सिकुड़ सा गया है, आत्मीयता की भावना तो जैसे किसी में है ही नहीं बस हर इंसान व्यस्त है खुद की लाइफ में, यही सोचता हुआ मनीष घर ऑफिस से घर की ओर जा रहा था।
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फुटपाथ पे एक छोटी सी डलिया लिए एक बूढ़ी औरत बैठी थी, शायद कुछ बेच रही थी। मनीष पास गया तो देखा कि छोटी सी डलिया में वो बूढ़ी औरत संतरे बेच रही थी।
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देखो कैसा जमाना है लोग मॉल जाकर महँगा सामान खरीदना पसंद करते हैं कोई इस बेचारी की तरफ देख भी नहीं रहा, मनीष मन ही मन ये बात सोच रहा था।
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बाइक रोककर मनीष बुढ़िया के पास गया, बोला – अम्मा 1 किलो संतरे दे दो। बुढ़िया की आखों में उसे देखकर एक चमक सी आई और तेजी से वो संतरे तौलने लगी।
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पैसे देकर मनीष ने थैली से एक संतरा निकाला और खाते हुए बोला यह – अम्मा संतरे मीठे नहीं हैं और यह कहकर वो एक संतरा उस बुढ़िया को दिया, वो संतरा चखकर बोली मीठा तो है बाबू। मनीष बिना कुछ बोले थैली उठाये चलता बना।
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अब ये रोज का क्रम हो गया, मनीष रोज उस बुढ़िया से संतरे खरीदता और थैली से एक संतरा निकालकर खाता और बोलता – अम्मा संतरे मीठे नहीं हैं, और कहकर बचा संतरा अम्मा को देता, बूढी संतरा खाकर बोलती -मीठा तो है बाबू। बस फिर मनीष थैली लेकर चला जाता।
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कई बार मनीष की बीवी भी उसके साथ होती थी वो ये सब देखकर बड़ा आश्चर्यचकित होती थी। एक दिन उसने मनीष से कहा – सुनो जी, ये सारे संतरे रोज इतने अच्छे और मीठे होते हैं फिर भी तुम क्यों रोज उस बेचारी के संतरों की बुराई करते हो।
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मनीष हल्की मुस्कान के साथ बोला – उस बूढी माँ के सारे संतरे मीठे ही होते हैं लेकिन वो बेचारी कभी खुद उन संतरों को नहीं खाती। मैं तो बस ऐसा इसलिए करता हूँ कि वो माँ मेरे संतरों में से एक खाले और उसका नुकसान भी न हो।
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उनके रोज का यही क्रम पास ही सब्जी बेचती मालती भी देखती थी। एक दिन वो बूढी अम्मा से बोली ये लड़का रोज संतरा खरीदने में कितना चिकचिक करता है। रोज तुझे परेशान करता है फिर भी मैं देखती हूँ कि तू उसको एक संतरा फालतू तौलती है, क्यों ?
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बूढ़ी बोली – मालती, वो लड़का मेरे संतरों की बुराई नहीं करता बल्कि मुझे रोज एक संतरा खिलाता है और उसको लगता है कि जैसे मुझे पता नहीं है लेकिन उसका प्यार देखकर खुद ही एक संतरा उसकी थैली में फालतू चला जाता है।
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विश्वास कीजिये दोस्तों, कभी कभी ऐसी छोटी छोटी बातों में बहुत आनंद भरा होता है। खुशियाँ पैसे से नहीं खरीदी जा सकतीं, दूसरों के प्रति प्रेम और आदर की भावना जीवन में मिठास घोल देती है।
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हाँ एक बात और – “देने में जो सुख है वो पाने में नहीं”। दोस्तों हमेशा याद रखना कि खुशियाँ बाँटने से बढ़ती हैं।

  ((((((( जय जय श्री राधे )))))))

ज्योति अग्रवाल

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🍃🍁बाहर या भीतर🍁🍃

माँ रबिया सभी से बहुत ही दिव्य ज्ञान की चर्चा किया करती थी पर कुछ युवक उनकी बात को समझने का प्रयास नही करते ओर यही कहते हम ईशवर को बहुत मानते है मंदिर जाते है एक दिन ईशवर भी मिल जाएंगे ! तो एक दिन माँ अपनी कुटिया के बाहर कुछ खोज रही थी तभी वो युवक वहा से निकले ओर हँसते हुए आगे बड गए । परन्तु जब संध्या होने को थी वो युवक लोटे तो क्या देखते है कि माँ रबिया अब भी बेचैनी से मिट्टी मे कुछ खोज रही है तो उन्होने पुछा —
माँ सुबह से क्या खोज रही हो??
रबिया- बेटा मेरी सुई खो गई है जो सुबह से मिल नही रही ओर अब अंधेरा होने वाला है।
युवक- वो भी ढूंढने लगे ।
तभी एक युवक ने कहा — माँ आपकी सुई गिरी कहा थी अच्छे से याद करके बताओ ??
रबिया- बेटा वो तो कुटिया मे गिरी थी ।
युवक- हैरान ! माँ यदि आपकी सूई भीतर गिरी है तो भीतर ही खोजो ना बाहर क्यो खोज रही हो सुबह से समय खराब कर रही हो ।
रबिया- वो अंदर अंधेरा है ना तो ,,,,,,
युवक- अरे तो दिया जला लो ना ! जो वस्तु जहा है वही तो मिलेगी ना।
रबिया वही बैठ गई- ओर कहने लगी यही बात तो मै समझाती हूँ
युवक- क्या ?
रबिया कि जो ईशवर आपके भीतर है तो उसे भीतर से ही प्राप्त करो बाहर नही मिलेगा चाहे सारा जीवन खोज लो सारा जहाँ मे ढूंढ लो भीतर रोशन कर लो सारा जहा रोशन हो जाएंगा ।नही तो मानव जीवन व्यर्थ चला जाएगा। अंधकार अंदर है तो अंदर प्रकाश करना है नही तो व्यर्थ है
जैसे सुबह से शाम तुम कह रहे हो समय खराब किया मैने वैसे ही ,,,,,,
युवक- ओह ! सही कहा ! माँ आपने
वस्तु कही ढूढे कही ,केहि विधि आवे हाथ
कहे कबीर तब ही पाए जब भेदी लीना साथ

विचार—-
अब आप स्वयं करे
समझदार को इशारा काफी होता है ओर वह राह पर चल पडता मंजिल को पा जाता है
नही तो महापुरूष तो क्या भगवान भी नही समझा सकते।
विचार महापुरूषो के मनन आपका

🙏🚩ॐ श्री आशुतोषाय नमः🚩🙏

Jyoti Agravaal

Posted in सुभाषित - Subhasit

बुद्धयो भयं प्रणुदति तपसा विन्दते महत्।
गुरुशुश्रूषया ज्ञानं शान्तिं योगेन विन्दति॥

अर्थात् :- ज्ञान द्वारा मनुष्य का डर दूर होता है, तप द्वारा उसे ऊँचा पद मिलता है। गुरु की सेवा द्वारा विद्या प्राप्त होती है तथा योग द्वारा शांति प्राप्त होती है।।