Posted in भारतीय उत्सव - Bhartiya Utsav

गंगा दशहरा

गंगा दशहरा

ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को गंगा दशहरा मनाया जाता है. इस दिन पवित्र नदी गंगा जी भागीरथ द्वारा स्वर्ग लोग से पृ्थ्वी लोक पर अवतीर्ण हुई थी. इस दिन स्नान, दान, तर्पण से जीवन के समस्त पापों का नाश होता है.यही कारण है, कि इस पर्व का नाम दशहरा पडा है. पर्वों की श्रेणी में गंगा दशहरा श्रद्वा और विश्वास का पर्व है. प्राचीन पुराण के अनुसार इस तिथि में स्नान, दान करना विशेष कल्याणकारी रहता है. सभी नदियों में गंगा नदी को सबसे अधिक पवित्र और पापमोचिनी माना गया है. गंगा में डूबकी लगाने से मनुष्यों को मुक्ति प्राप्त होती है.

ऋषि भागीरथ ने अपनी कई वर्षो की कठोर तपस्या कर गंगा को पृ्थ्वी पर आने के लिये मनाया था. गंगा दशहरा पर्व पर प्यासे राहगीरों को शर्बल पिलाकर उनकी प्यास बुझाना कल्याणकारी माना जाता है. इस दिन भारत के विभिन्न क्षेत्रों में बडे-बडे मेलों का आयोजन किया जाता है. जगह-जगह पर प्याऊ लगाने के साथ साथ इस दिन छतरी, वस्त्र, जूते और गर्मी की ताप से बचने के सभी साधनों को दान में देना शुभ माना जाता है. यह सभी कार्य करने से व्यक्ति के पाप दूर होते है. और वह सदमार्ग की ओर अग्रसर होता है.

गंगा दशहरा

ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को गंगा दशहरा मनाया जाता है. इस दिन पवित्र नदी गंगा जी भागीरथ द्वारा स्वर्ग लोग से पृ्थ्वी लोक पर अवतीर्ण हुई थी. इस दिन स्नान, दान, तर्पण से जीवन के समस्त पापों का नाश होता है.यही कारण है, कि इस पर्व का नाम दशहरा पडा है. पर्वों की श्रेणी में गंगा दशहरा श्रद्वा और विश्वास का पर्व है. प्राचीन पुराण के अनुसार इस तिथि में स्नान, दान करना विशेष कल्याणकारी रहता है. सभी नदियों में गंगा नदी को सबसे अधिक पवित्र और पापमोचिनी माना गया है. गंगा में डूबकी लगाने से मनुष्यों को मुक्ति प्राप्त होती है.

ऋषि भागीरथ ने अपनी कई वर्षो की कठोर तपस्या कर गंगा को पृ्थ्वी पर आने के लिये मनाया था. गंगा दशहरा पर्व पर प्यासे राहगीरों को शर्बल पिलाकर उनकी प्यास बुझाना कल्याणकारी माना जाता है. इस दिन भारत के विभिन्न क्षेत्रों में बडे-बडे मेलों का आयोजन किया जाता है. जगह-जगह पर प्याऊ लगाने के साथ साथ इस दिन छतरी, वस्त्र, जूते और गर्मी की ताप से बचने के सभी साधनों को दान में देना शुभ माना जाता है. यह सभी कार्य करने से व्यक्ति के पाप दूर होते है. और वह सदमार्ग की ओर अग्रसर होता है.

गंगा दशहरा

ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को गंगा दशहरा मनाया जाता है. इस दिन पवित्र नदी गंगा जी भागीरथ द्वारा स्वर्ग लोग से पृ्थ्वी लोक पर अवतीर्ण हुई थी. इस दिन स्नान, दान, तर्पण से जीवन के समस्त पापों का नाश होता है.यही कारण है, कि इस पर्व का नाम दशहरा पडा है. पर्वों की श्रेणी में गंगा दशहरा श्रद्वा और विश्वास का पर्व है. प्राचीन पुराण के अनुसार इस तिथि में स्नान, दान करना विशेष कल्याणकारी रहता है. सभी नदियों में गंगा नदी को सबसे अधिक पवित्र और पापमोचिनी माना गया है. गंगा में डूबकी लगाने से मनुष्यों को मुक्ति प्राप्त होती है.

ऋषि भागीरथ ने अपनी कई वर्षो की कठोर तपस्या कर गंगा को पृ्थ्वी पर आने के लिये मनाया था. गंगा दशहरा पर्व पर प्यासे राहगीरों को शर्बल पिलाकर उनकी प्यास बुझाना कल्याणकारी माना जाता है. इस दिन भारत के विभिन्न क्षेत्रों में बडे-बडे मेलों का आयोजन किया जाता है. जगह-जगह पर प्याऊ लगाने के साथ साथ इस दिन छतरी, वस्त्र, जूते और गर्मी की ताप से बचने के सभी साधनों को दान में देना शुभ माना जाता है. यह सभी कार्य करने से व्यक्ति के पाप दूर होते है. और वह सदमार्ग की ओर अग्रसर होता है.

पतंजलि योगपीठ और भारत स्वाभिमान माँ गंगा पवित्रता की रक्षा के लिए कृत संकल्पित है और माँ गंगा की सफाई और स्वच्छता के लिये सदैव प्रयास करता रहेगा।‪#‎watchAasthaChannel5amTo8am‬

गंगा दशहरा ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को गंगा दशहरा मनाया जाता है. इस दिन पवित्र नदी गंगा जी भागीरथ द्वारा स्वर्ग लोग से पृ्थ्वी लोक पर अवतीर्ण हुई थी. इस दिन स्नान, दान, तर्पण से जीवन के समस्त पापों का नाश होता है.यही कारण है, कि इस पर्व का नाम दशहरा पडा है. पर्वों की श्रेणी में गंगा दशहरा श्रद्वा और विश्वास का पर्व है. प्राचीन पुराण के अनुसार इस तिथि में स्नान, दान करना विशेष कल्याणकारी रहता है. सभी नदियों में गंगा नदी को सबसे अधिक पवित्र और पापमोचिनी माना गया है. गंगा में डूबकी लगाने से मनुष्यों को मुक्ति प्राप्त होती है. ऋषि भागीरथ ने अपनी कई वर्षो की कठोर तपस्या कर गंगा को पृ्थ्वी पर आने के लिये मनाया था. गंगा दशहरा पर्व पर प्यासे राहगीरों को शर्बल पिलाकर उनकी प्यास बुझाना कल्याणकारी माना जाता है. इस दिन भारत के विभिन्न क्षेत्रों में बडे-बडे मेलों का आयोजन किया जाता है. जगह-जगह पर प्याऊ लगाने के साथ साथ इस दिन छतरी, वस्त्र, जूते और गर्मी की ताप से बचने के सभी साधनों को दान में देना शुभ माना जाता है. यह सभी कार्य करने से व्यक्ति के पाप दूर होते है. और वह सदमार्ग की ओर अग्रसर होता है. गंगा दशहरा ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को गंगा दशहरा मनाया जाता है. इस दिन पवित्र नदी गंगा जी भागीरथ द्वारा स्वर्ग लोग से पृ्थ्वी लोक पर अवतीर्ण हुई थी. इस दिन स्नान, दान, तर्पण से जीवन के समस्त पापों का नाश होता है.यही कारण है, कि इस पर्व का नाम दशहरा पडा है. पर्वों की श्रेणी में गंगा दशहरा श्रद्वा और विश्वास का पर्व है. प्राचीन पुराण के अनुसार इस तिथि में स्नान, दान करना विशेष कल्याणकारी रहता है. सभी नदियों में गंगा नदी को सबसे अधिक पवित्र और पापमोचिनी माना गया है. गंगा में डूबकी लगाने से मनुष्यों को मुक्ति प्राप्त होती है. ऋषि भागीरथ ने अपनी कई वर्षो की कठोर तपस्या कर गंगा को पृ्थ्वी पर आने के लिये मनाया था. गंगा दशहरा पर्व पर प्यासे राहगीरों को शर्बल पिलाकर उनकी प्यास बुझाना कल्याणकारी माना जाता है. इस दिन भारत के विभिन्न क्षेत्रों में बडे-बडे मेलों का आयोजन किया जाता है. जगह-जगह पर प्याऊ लगाने के साथ साथ इस दिन छतरी, वस्त्र, जूते और गर्मी की ताप से बचने के सभी साधनों को दान में देना शुभ माना जाता है. यह सभी कार्य करने से व्यक्ति के पाप दूर होते है. और वह सदमार्ग की ओर अग्रसर होता है. गंगा दशहरा ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को गंगा दशहरा मनाया जाता है. इस दिन पवित्र नदी गंगा जी भागीरथ द्वारा स्वर्ग लोग से पृ्थ्वी लोक पर अवतीर्ण हुई थी. इस दिन स्नान, दान, तर्पण से जीवन के समस्त पापों का नाश होता है.यही कारण है, कि इस पर्व का नाम दशहरा पडा है. पर्वों की श्रेणी में गंगा दशहरा श्रद्वा और विश्वास का पर्व है. प्राचीन पुराण के अनुसार इस तिथि में स्नान, दान करना विशेष कल्याणकारी रहता है. सभी नदियों में गंगा नदी को सबसे अधिक पवित्र और पापमोचिनी माना गया है. गंगा में डूबकी लगाने से मनुष्यों को मुक्ति प्राप्त होती है. ऋषि भागीरथ ने अपनी कई वर्षो की कठोर तपस्या कर गंगा को पृ्थ्वी पर आने के लिये मनाया था. गंगा दशहरा पर्व पर प्यासे राहगीरों को शर्बल पिलाकर उनकी प्यास बुझाना कल्याणकारी माना जाता है. इस दिन भारत के विभिन्न क्षेत्रों में बडे-बडे मेलों का आयोजन किया जाता है. जगह-जगह पर प्याऊ लगाने के साथ साथ इस दिन छतरी, वस्त्र, जूते और गर्मी की ताप से बचने के सभी साधनों को दान में देना शुभ माना जाता है. यह सभी कार्य करने से व्यक्ति के पाप दूर होते है. और वह सदमार्ग की ओर अग्रसर होता है. पतंजलि योगपीठ और भारत स्वाभिमान माँ गंगा पवित्रता की रक्षा के लिए कृत संकल्पित है और माँ गंगा की सफाई और स्वच्छता के लिये सदैव प्रयास करता रहेगा।#watchAasthaChannel5amTo8am

गंगा दशहरा हिन्दुओं का एक प्रमुख त्योहार है। ज्येष्ठ शुक्ला दशमी को दशहरा कहते हैं। इसमें स्नान, दान, रूपात्मक व्रत होता है। स्कन्दपुराण में लिखा हुआ है कि, ज्येष्ठ शुक्ला दशमी संवत्सरमुखी मानी गई है इसमें स्नान और दान तो विशेष करके करें। किसी भी नदी पर जाकर अर्घ्य (पू‍जादिक) एवं तिलोदक (तीर्थ प्राप्ति निमित्तक तर्पण) अवश्य करें।
ऐसा करने वाला महापातकों के बराबर के दस पापों से छूट जाता है।

पुराणों के अनुसार गंगा दशहरा के दिन गंगा स्नान का विशेष महत्व है। इस दिन स्वर्ग से गंगा का धरती पर अवतरण हुआ था, इसलिए यह महापुण्यकारी पर्व माना जाता है। गंगा दशहरा के दिन सभी गंगा मंदिरों में भगवान शिव का अभिषेक किया जाता है। वहीं इस दिन मोक्षदायिनी गंगा का पूजन-अर्चना भी किया जाता है।

गंगा दशहरे का महत्व –
भगीरथी की तपस्या के बाद जब गंगा माता धरती पर आती हैं उस दिन ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की दशमी थी. गंगा माता के धरती पर अवतरण के दिन को ही गंगा दशहरा के नाम से पूजा जाना जाने लगा. इस दिन गंगा नदी में खड़े होकर जो गंगा स्तोत्र पढ़ता है वह अपने सभी पापों से मुक्ति पाता है. स्कंद पुराण में दशहरा नाम का गंगा स्तोत्र दिया हुआ है.
गंगा दशहरे के दिन श्रद्धालु जन जिस भी वस्तु का दान करें उनकी संख्या दस होनी चाहिए और जिस वस्तु से भी पूजन करें उनकी संख्या भी दस ही होनी चाहिए. ऎसा करने से शुभ फलों में और अधिक वृद्धि होती है.
गंगा दशहरे का फल –
ज्येष्ठ शुक्ल दशमी के दिन गंगा स्नान करने से व्यक्ति के दस प्रकार के पापों का नाश होता है. इन दस पापों में तीन पाप कायिक, चार पाप वाचिक और तीन पाप मानसिक होते हैं. इन सभी से व्यक्ति को मुक्ति मिलती है.


गंगा दशहरा

ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को गंगा दशहरा मनाया जाता है. इस दिन पवित्र नदी गंगा जी भागीरथ द्वारा स्वर्ग लोग से पृ्थ्वी लोक पर अवतीर्ण हुई थी. इस दिन स्नान, दान, तर्पण से जीवन के समस्त पापों का नाश होता है.यही कारण है, कि इस पर्व का नाम दशहरा पडा है. पर्वों की श्रेणी में गंगा दशहरा श्रद्वा और विश्वास का पर्व है. प्राचीन पुराण के अनुसार इस तिथि में स्नान, दान करना विशेष कल्याणकारी रहता है. सभी नदियों में गंगा नदी को सबसे अधिक पवित्र और पापमोचिनी माना गया है. गंगा में डूबकी लगाने से मनुष्यों को मुक्ति प्राप्त होती है.

ऋषि भागीरथ ने अपनी कई वर्षो की कठोर तपस्या कर गंगा को पृ्थ्वी पर आने के लिये मनाया था. गंगा दशहरा पर्व पर प्यासे राहगीरों को शर्बल पिलाकर उनकी प्यास बुझाना कल्याणकारी माना जाता है. इस दिन भारत के विभिन्न क्षेत्रों में बडे-बडे मेलों का आयोजन किया जाता है. जगह-जगह पर प्याऊ लगाने के साथ साथ इस दिन छतरी, वस्त्र, जूते और गर्मी की ताप से बचने के सभी साधनों को दान में देना शुभ माना जाता है. यह सभी कार्य करने से व्यक्ति के पाप दूर होते है. और वह सदमार्ग की ओर अग्रसर होता है.

गंगा दशहरा

ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को गंगा दशहरा मनाया जाता है. इस दिन पवित्र नदी गंगा जी भागीरथ द्वारा स्वर्ग लोग से पृ्थ्वी लोक पर अवतीर्ण हुई थी. इस दिन स्नान, दान, तर्पण से जीवन के समस्त पापों का नाश होता है.यही कारण है, कि इस पर्व का नाम दशहरा पडा है. पर्वों की श्रेणी में गंगा दशहरा श्रद्वा और विश्वास का पर्व है. प्राचीन पुराण के अनुसार इस तिथि में स्नान, दान करना विशेष कल्याणकारी रहता है. सभी नदियों में गंगा नदी को सबसे अधिक पवित्र और पापमोचिनी माना गया है. गंगा में डूबकी लगाने से मनुष्यों को मुक्ति प्राप्त होती है.

ऋषि भागीरथ ने अपनी कई वर्षो की कठोर तपस्या कर गंगा को पृ्थ्वी पर आने के लिये मनाया था. गंगा दशहरा पर्व पर प्यासे राहगीरों को शर्बल पिलाकर उनकी प्यास बुझाना कल्याणकारी माना जाता है. इस दिन भारत के विभिन्न क्षेत्रों में बडे-बडे मेलों का आयोजन किया जाता है. जगह-जगह पर प्याऊ लगाने के साथ साथ इस दिन छतरी, वस्त्र, जूते और गर्मी की ताप से बचने के सभी साधनों को दान में देना शुभ माना जाता है. यह सभी कार्य करने से व्यक्ति के पाप दूर होते है. और वह सदमार्ग की ओर अग्रसर होता है.

गंगा दशहरा

ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को गंगा दशहरा मनाया जाता है. इस दिन पवित्र नदी गंगा जी भागीरथ द्वारा स्वर्ग लोग से पृ्थ्वी लोक पर अवतीर्ण हुई थी. इस दिन स्नान, दान, तर्पण से जीवन के समस्त पापों का नाश होता है.यही कारण है, कि इस पर्व का नाम दशहरा पडा है. पर्वों की श्रेणी में गंगा दशहरा श्रद्वा और विश्वास का पर्व है. प्राचीन पुराण के अनुसार इस तिथि में स्नान, दान करना विशेष कल्याणकारी रहता है. सभी नदियों में गंगा नदी को सबसे अधिक पवित्र और पापमोचिनी माना गया है. गंगा में डूबकी लगाने से मनुष्यों को मुक्ति प्राप्त होती है.

ऋषि भागीरथ ने अपनी कई वर्षो की कठोर तपस्या कर गंगा को पृ्थ्वी पर आने के लिये मनाया था. गंगा दशहरा पर्व पर प्यासे राहगीरों को शर्बल पिलाकर उनकी प्यास बुझाना कल्याणकारी माना जाता है. इस दिन भारत के विभिन्न क्षेत्रों में बडे-बडे मेलों का आयोजन किया जाता है. जगह-जगह पर प्याऊ लगाने के साथ साथ इस दिन छतरी, वस्त्र, जूते और गर्मी की ताप से बचने के सभी साधनों को दान में देना शुभ माना जाता है. यह सभी कार्य करने से व्यक्ति के पाप दूर होते है. और वह सदमार्ग की ओर अग्रसर होता है.

पतंजलि योगपीठ और भारत स्वाभिमान माँ गंगा पवित्रता की रक्षा के लिए कृत संकल्पित है और माँ गंगा की सफाई और स्वच्छता के लिये सदैव प्रयास करता रहेगा।

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गंगा दशहरा प्रारम्भ : 26 मई, समाप्त : 4 जून

मां गंगा की महिमा
गंगा दशहरा प्रारम्भ : 26 मई, समाप्त : 4 जून
गंगा
नदी उत्तर भारतकी केवल जीवनरेखा नहीं, अपितु हिंदू धर्मका सर्वोत्तम तीर्थ
है । ‘आर्य सनातन वैदिक संस्कृति’ गंगाके तटपर विकसित हुई, इसलिए गंगा
हिंदुस्थानकी राष्ट्ररूपी अस्मिता है एवं भारतीय संस्कृतिका मूलाधार है ।
इस कलियुगमें श्रद्धालुओंके पाप-ताप नष्ट हों, इसलिए ईश्वरने उन्हें इस
धरापर भेजा है । वे प्रकृतिका बहता जल नहीं; अपितु सुरसरिता (देवनदी) हैं ।
उनके प्रति हिंदुओंकी आस्था गौरीशंकरकी भांति सर्वोच्च है । गंगाजी
मोक्षदायिनी हैं; इसीलिए उन्हें गौरवान्वित करते हुए पद्मपुराणमें (खण्ड ५,
अध्याय ६०, श्लोक ३९) कहा गया है, ‘सहज उपलब्ध एवं मोक्षदायिनी गंगाजीके
रहते विपुल धनराशि व्यय (खर्च) करनेवाले यज्ञ एवं कठिन तपस्याका क्या लाभ
?’ नारदपुराणमें तो कहा गया है, ‘अष्टांग योग, तप एवं यज्ञ, इन सबकी
अपेक्षा गंगाजीका निवास उत्तम है । गंगाजी भारतकी पवित्रताकी सर्वश्रेष्ठ
केंद्रबिंदु हैं, उनकी महिमा अवर्णनीय है ।’
ganga dashahara
मां गंगा का #ब्रह्मांड में उत्पत्ति
‘वामनावतारमें
श्रीविष्णुने दानवीर बलीराजासे भिक्षाके रूपमें तीन पग भूमिका दान मांगा ।
राजा इस बातसे अनभिज्ञ था कि श्रीविष्णु ही वामनके रूपमें आए हैं, उसने
उसी क्षण वामनको तीन पग भूमि दान की । वामनने विराट रूप धारण कर पहले पगमें
संपूर्ण पृथ्वी तथा दूसरे पगमें अंतरिक्ष व्याप लिया । दूसरा पग उठाते समय
वामनके ( #श्रीविष्णुके) बाएं पैरके अंगूठेके धक्केसे ब्रह्मांडका
सूक्ष्म-जलीय कवच (टिप्पणी १) टूट गया । उस छिद्रसे गर्भोदककी भांति
‘ब्रह्मांडके बाहरके सूक्ष्म-जलनेब्रह्मांडमें प्रवेश किया । यह सूक्ष्म-जल
ही गंगा है ! गंगाजीका यह प्रवाह सर्वप्रथम सत्यलोकमें गया ।ब्रह्मदेवने
उसे अपने कमंडलु में धारण किया । तदुपरांत सत्यलोकमें ब्रह्माजीने अपने
कमंडलुके जलसे श्रीविष्णुके चरणकमल धोए । उस जलसे गंगाजीकी उत्पत्ति हुई ।
तत्पश्चात गंगाजी की यात्रा सत्यलोकसे क्रमशः #तपोलोक, #जनलोक, #महर्लोक,
इस मार्गसे #स्वर्गलोक तक हुई ।
पृथ्वी पर उत्पत्ति
 #सूर्यवंशके राजा सगरने #अश्वमेध यज्ञ आरंभ किया । उन्होंने दिग्विजयके
लिए यज्ञीय अश्व भेजा एवं अपने ६० सहस्त्र पुत्रोंको भी उस अश्वकी रक्षा
हेतु भेजा । इस यज्ञसे भयभीत इंद्रदेवने यज्ञीय अश्वको कपिलमुनिके आश्रमके
निकट बांध दिया । जब सगरपुत्रोंको वह अश्व कपिलमुनिके आश्रमके निकट प्राप्त
हुआ, तब उन्हें लगा, ‘कपिलमुनिने ही अश्व चुराया है ।’ इसलिए सगरपुत्रोंने
ध्यानस्थ कपिलमुनिपर आक्रमण करनेकी सोची । कपिलमुनिको अंतर्ज्ञानसे यह बात
ज्ञात हो गई तथा अपने नेत्र खोले । उसी क्षण उनके नेत्रोंसे प्रक्षेपित
तेजसे सभी सगरपुत्र भस्म हो गए । कुछ समय पश्चात सगरके प्रपौत्र राजा
अंशुमनने सगरपुत्रोंकी मृत्युका कारण खोजा एवं उनके उद्धारका मार्ग पूछा ।
कपिलमुनिने अंशुमनसे कहा, ‘`गंगाजीको स्वर्गसे भूतलपर लाना होगा ।
सगरपुत्रोंकी अस्थियोंपर जब गंगाजल प्रवाहित होगा, तभी उनका उद्धार होगा
!’’ मुनिवरके बताए अनुसार गंगाको पृथ्वीपर लाने हेतु अंशुमनने तप आरंभ किया
।’  ‘अंशुमनकी मृत्युके पश्चात उसके सुपुत्र राजा दिलीपने भी गंगावतरणके
लिए तपस्या की । #अंशुमन एवं दिलीपके सहस्त्र वर्ष तप करनेपर भी गंगावतरण
नहीं हुआ; परंतु तपस्याके कारण उन दोनोंको स्वर्गलोक प्राप्त हुआ ।’
(वाल्मीकिरामायण, काण्ड १, अध्याय ४१, २०-२१)
‘राजा
दिलीपकी #मृत्युके पश्चात उनके पुत्र राजा भगीरथने कठोर तपस्या की । उनकी
इस तपस्यासे प्रसन्न होकर गंगामाताने भगीरथसे कहा, ‘‘मेरे इस प्रचंड
प्रवाहको सहना पृथ्वीके लिए कठिन होगा । अतः तुम भगवान शंकरको प्रसन्न करो
।’’ आगे भगीरथकी घोर तपस्यासे भगवान शंकर प्रसन्न हुए तथा भगवान शंकरने
गंगाजीके प्रवाहको जटामें धारण कर उसे पृथ्वीपर छोडा । इस प्रकार हिमालयमें
अवतीर्ण गंगाजी भगीरथके पीछे-पीछे #हरद्वार, प्रयाग आदि स्थानोंको पवित्र
करते हुए बंगालके उपसागरमें (खाडीमें) लुप्त हुईं ।’
ज्येष्ठ
मास, शुक्ल पक्ष, दशमी तिथि, भौमवार (मंगलवार) एवं हस्त नक्षत्रके शुभ
योगपर #गंगाजी स्वर्गसे धरतीपर अवतरित हुईं ।  जिस दिन #गंगा पृथ्वी पर
अवतरित हुईं वह दिन ‘गंगा दशहरा’ के नाम से जाना जाता है ।
जगद्गुरु
आद्य शंकराचार्यजी, जिन्होंने कहा है : एको ब्रह्म द्वितियोनास्ति ।
द्वितियाद्वैत भयं भवति ।। उन्होंने भी ‘गंगाष्टक’ लिखा है, गंगा की महिमा
गायी है । रामानुजाचार्य, रामानंद स्वामी, चैतन्य महाप्रभु और स्वामी
रामतीर्थ ने भी गंगाजी की बड़ी महिमा गायी है । कई साधु-संतों,
अवधूत-मंडलेश्वरों और जती-जोगियों ने गंगा माता की कृपा का अनुभव किया है,
कर रहे हैं तथा बाद में भी करते रहेंगे ।
अब
तो विश्व के #वैज्ञानिक भी गंगाजल का परीक्षण कर दाँतों तले उँगली दबा रहे
हैं ! उन्होंने दुनिया की तमाम नदियों के जल का परीक्षण किया परंतु गंगाजल
में रोगाणुओं को नष्ट करने तथा आनंद और सात्त्विकता देने का जो अद्भुत गुण
है, उसे देखकर वे भी आश्चर्यचकित हो उठे ।
 #हृषिकेश में स्वास्थ्य-अधिकारियों ने पुछवाया कि यहाँ से हैजे की कोई खबर
नहीं आती, क्या कारण है ? उनको बताया गया कि यहाँ यदि किसीको हैजा हो जाता
है तो उसको गंगाजल पिलाते हैं । इससे उसे दस्त होने लगते हैं तथा हैजे के
कीटाणु नष्ट हो जाते हैं और वह स्वस्थ हो जाता है । वैसे तो हैजे के समय
घोषणा कर दी जाती है कि पानी उबालकर ही पियें । किंतु गंगाजल के पान से तो
यह रोग मिट जाता है और केवल हैजे का रोग ही मिटता है ऐसी बात नहीं है, अन्य
कई रोग भी मिट जाते हैं । तीव्र व दृढ़ श्रद्धा-भक्ति हो तो गंगास्नान व
गंगाजल के पान से जन्म-मरण का रोग भी मिट सकता है ।
सन्
1947 में जलतत्त्व विशेषज्ञ कोहीमान भारत आया था । उसने वाराणसी से
#गंगाजल लिया । उस पर अनेक परीक्षण करके उसने विस्तृत लेख लिखा, जिसका सार
है – ‘इस जल में कीटाणु-रोगाणुनाशक विलक्षण शक्ति है ।’
दुनिया
की तमाम #नदियों के जल का विश्लेषण करनेवाले बर्लिन के डॉ. जे. ओ. लीवर ने
सन् 1924 में ही गंगाजल को विश्व का सर्वाधिक स्वच्छ और
#कीटाणु-रोगाणुनाशक जल घोषित कर दिया था ।
‘आइने
अकबरी’ में लिखा है कि ‘अकबर गंगाजल मँगवाकर आदरसहित उसका पान करते थे ।
वे गंगाजल को अमृत मानते थे ।’ औरंगजेब और मुहम्मद तुगलक भी गंगाजल का पान
करते थे । शाहनवर के नवाब केवल गंगाजल ही पिया करते थे ।
कलकत्ता
के हुगली जिले में पहुँचते-पहुँचते तो बहुत सारी नदियाँ, झरने और नाले
गंगाजी में मिल चुके होते हैं । अंग्रेज यह देखकर हैरान रह गये कि हुगली
जिले से भरा हुआ गंगाजल दरियाई मार्ग से यूरोप ले जाया जाता है तो भी कई-कई
दिनों तक वह बिगड़ता नहीं है । जबकि यूरोप की कई बर्फीली नदियों का पानी
हिन्दुस्तान लेकर आने तक खराब हो जाता है ।
अभी रुड़की विश्वविद्यालय के #वैज्ञानिक कहते हैं कि ‘गंगाजल में जीवाणुनाशक और हैजे के कीटाणुनाशक तत्त्व विद्यमान हैं ।’
फ्रांसीसी
चिकित्सक हेरल ने देखा कि गंगाजल से कई रोगाणु नष्ट हो जाते हैं । फिर
उसने गंगाजल को कीटाणुनाशक औषधि मानकर उसके इंजेक्शन बनाये और जिस रोग में
उसे समझ न आता था कि इस रोग का कारण कौन-से कीटाणु हैं, उसमें गंगाजल के वे
इंजेक्शन रोगियों को दिये तो उन्हें लाभ होने लगा !
संत #तुलसीदासजी कहते हैं :
गंग सकल मुद मंगल मूला । सब सुख करनि हरनि सब सूला ।।
(श्रीरामचरित. अयो. कां. : 86.2)
सभी
सुखों को देनेवाली और सभी शोक व दुःखों को हरनेवाली माँ गंगा के तट पर
स्थित तीर्थों में पाँच तीर्थ विशेष आनंद-उल्लास का अनुभव कराते हैं :
गंगोत्री, हर की पौड़ी (हरिद्वार),  #प्रयागराज त्रिवेणी, काशी और #गंगासागर
। #गंगादशहरे के दिन गंगा में गोता मारने से सात्त्विकता, प्रसन्नता और
विशेष पुण्यलाभ होता है ।
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Author:

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