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बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर


>>>स्लाम के सम्बन्ध में स्वयं बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर के विचार –<<<

१. हिन्दू काफ़िर सम्मान के योग्य नहीं-”मुसलमानों के लिए हिन्दू काफ़िर हैं, और एक काफ़िर सम्मान के योग्य नहीं है। वह निम्न कुल में जन्मा होता है, और उसकी कोई सामाजिक स्थिति नहीं होती। इसलिए जिस देश में क़ाफिरों का शासनहो, वह मुसलमानों के लिए दार-उल-हर्ब है ऐसी सति में यह साबित करने के लिए और सबूत देने की आवश्यकता नहीं है कि मुसलमान हिन्दू सरकार के शासन को स्वीकार नहीं करेंगे।” (पृ. ३०४)

२. मुस्लिम भ्रातृभाव केवल मुसलमानों के लिए-”इस्लाम एक बंद निकाय की तरह है, जो मुसलमानों और गैर-मुसलमानों के बीच जो भेद यह करता है, वह बिल्कुल मूर्त और स्पष्ट है। इस्लाम का भ्रातृभाव मानवता का भ्रातृत्व नहीं है, मुसलमानों का मुसलमानों से ही भ्रातृभाव मानवता का भ्रातृत्व नहीं है, मुसलमानों का मुसलमानों से ही भ्रातृत्व है। यह बंधुत्व है, परन्तु इसका लाभ अपने ही निकाय के लोगों तक सीमित है और जो इस निकाय से बाहर हैं, उनके लिए इसमें सिर्फ घृणा ओर शत्रुता ही है। इस्लाम का दूसरा अवगुण यह है कि यह सामाजिक स्वशासन की एक पद्धति है और स्थानीय स्वशासन से मेल नहीं खाता, क्योंकि मुसलमानों की निष्ठा, जिस देश में वे रहते हैं, उसके प्रति नहीं होती, बल्कि वह उस धार्मिक विश्वास पर निर्भर करती है, जिसका कि वे एक हिस्सा है। एक मुसलमान के लिए इसके विपरीत या उल्टे सोचना अत्यन्त दुष्कर है। जहाँ कहीं इस्लाम का शासन हैं, वहीं उसका अपना विश्वासहै। दूसरे शब्दों में, इस्लाम एक सच्चे मुसलमानों को भारत को अपनी मातृभूमि और हिन्दुओं को अपना निकट सम्बन्धी मानने की इज़ाजत नहीं देता। सम्भवतः यही वजह थी कि मौलाना मुहम्मद अली जैसे एक महान भारतीय, परन्तु सच्चे मुसलमान ने, अपने, शरीर को हिन्दुस्तान की बजाए येरूसलम में दफनाया जाना अधिक पसंद किया।”

३. एक साम्प्रदायिक और राष्ट्रीय मुसलमान में अन्तर देख पाना मुश्किल-”लीग को बनाने वाले साम्प्रदायिक मुसलमानों और राष्ट्रवादी मुसलमानों के अन्तर को समझना कठिन है। यह अत्यन्त संदिग्ध है कि राष्ट्रवादी मुसलमान किसी वास्तविक जातीय भावना, लक्ष्य तथा नीति से कांग्रेस के साथ रहते हैं, जिसके फलस्वरूप वे मुस्लिम लीग् से पृथक पहचाने जाते हैं। यह कहा जाता है कि वास्तव में अधिकांश कांग्रेसजनों की धारण है कि इन दोनों में कोई अन्तर नहीं है, और कांग्रेस के अन्दर राष्ट्रवादी मुसलमानों की स्थिति साम्प्रदायिक मुसलमानों की सेना की एक चौकी की तरह है। यह धारणा असत्य प्रतीत नहीं होती। जब कोई व्यक्ति इस बात को याद करता है कि राष्ट्रवादी मुसलमानों के नेता स्वर्गीय डॉ. अंसारी ने साम्प्रदायिक निर्णय का विरोध करने से इंकार किया था, यद्यपिकांग्रेस और राष्ट्रवादी मुसलमानों द्वारा पारित प्रस्ताव का घोर विरोध होने पर भी मुसलमानों को पृथक निर्वाचन उपलब्ध हुआ।” (पृ. ४१४-४१५)

४. भारत में इस्लाम के बीज मुस्लिम आक्रांताओं ने बोए-”मुस्लिम आक्रांता निस्संदेह हिन्दुओं के विरुद्ध घृणा के गीत गाते हुए आए थे। परन्तु वे घृणा का वह गीत गाकर और मार्ग में कुछ मंदिरों को आग लगा कर ही वापस नहीं लौटे। ऐसा होता तो यह वरदान माना जाता। वे ऐसे नकारात्मक परिणाम मात्र से संतुष्ट नहीं थे। उन्होंने इस्लाम का पौधा लगाते हुए एक सकारात्मक कार्य भी किया। इस पौधे का विकास भी उल्लेखनीय है। यह ग्रीष्म में रोपा गया कोई पौधा नहीं है। यह तो ओक (बांज) वृक्ष की तरह विशाल और सुदृढ़ है। उत्तरी भारत में इसका सर्वाधिक सघन विकास हुआ है। एक के बाद हुए दूसरे हमले ने इसे अन्यत्र कहीं को भी अपेक्षा अपनी ‘गाद’ से अधिक भरा है और उन्होंने निष्ठावान मालियों के तुल्य इसमें पानी देने का कार्य किया है। उत्तरी भारत में इसका विकास इतना सघन है कि हिन्दू और बौद्ध अवशेष झाड़ियों के समान होकर रह गए हैं; यहाँ तक कि सिखों की कुल्हाड़ी भी इस ओक (बांज) वृक्ष को काट कर नहीं गिरा सकी।” (पृ. ४९)

५. मुसलमानों की राजनीतिक दाँव-पेंच में गुंडागर्दी-”तीस री बात, मुसलमानों द्वारा राजनीति में अपराधियों के तौर-तरीके अपनाया जाना है। दंगे इस बात के पर्याप्त संकेत हैं कि गुंडागिर्दी उनकी राजनीति का एक स्थापित तरीका हो गया है।” (पृ. २६७)

६. हत्यारे धार्मिक शहीद-”महत्व की बात यह है कि धर्मांध मुसलमानों द्वारा कितने प्रमुख हिन्दुओं की हत्या की गई। मूल प्रश्न है उन लोगों के दृष्टिकोण का, जिन्होंने यह कत्ल किये। जहाँ कानून लागू किया जा सका, वहाँ हत्यारों को कानून के अनुसार सज़ा मिली; तथापि प्रमुख मुसलमानों ने इन अपराधियों की कभी निंदा नहीं की। इसके वपिरीत उन्हें ‘गाजी’ बताकर उनका स्वागत किया गया और उनके क्षमादान के लिए आन्दोलन शुरू कर दिए गए। इस दृष्टिकोण का एक उदाहरण है लाहौर के बैरिस्टर मि. बरकत अली का, जिसने अब्दुल कयूम की ओर से अपील दायर की। वह तो यहाँ तक कह गया कि कयूम नाथूराम की हत्या का दोषी नहीं है, क्योंकि कुरान के कानून के अनुसार यह न्यायोचित है। मुसलमानों का यह दृष्टिकोण तो समझ में आता है, परन्तु जो बात समझ में नहीं आती, वह है श्री गांधी का दृष्टिकोण।”(पृ. १४७-१४८)

७. हिन्दू और मुसलमान दो विभिन्न प्रजातियां-”आध् याम्कि दृष्टि से हिन्दू और मुसलमान केवल ऐसे दो वर्ग या सम्प्रदाय नहीं हैं जैसे प्रोटेस्टेंट्‌स और कैथोलिक या शैव और वैष्णव, बल्कि वे तो दो अलग-अलग प्रजातियां हैं।” (पृ. १८५)

८. इस्लाम और जातिप्रथा-”जाति प्रथा को लीजिए। इस्लाम भ्रातृ-भाव की बात कहता है। हर व्यक्ति यही अनुमान लगाता है कि इस्लाम दास प्रथा और जाति प्रथा से मुक्त होगा। गुलामी के बारे में तो कहने की आवश्यकता ही नहीं। अब कानून यह समाप्त हो चुकी है। परन्तु जब यह विद्यमान थी, तो ज्यादातर समर्थन इसे इस्लाम और इस्लामी देशों से ही मिलता था। कुरान में पैंगबर ने गुलामों के साथ उचित इस्लाम में ऐसा कुछ भी नहीं है जो इस अभिषाप के उन्मूलन के समर्थन में हो। जैसाकि सर डब्ल्यू. म्यूर ने स्पष्ट कहा है-

”….गुलाम या दासप्रथा समाप्त हो जाने में मुसलमानों का कोई हाथ नहीं है, क्योंकि जब इस प्रथा के बंधन ढीले करने का अवसर था, तब मुसलमानों ने उसको मजबूती से पकड़ लिया….. किसी मुसलमान पर यह दायित्व नहीं है कि वह अपने गुलामों को मुक्त कर दें…..”

”परन्तु गुलामी भले विदा हो गईहो, जाति तो मुसलमानों में क़ायम है। उदाहरण के लिए बंगाल के मुसलमानों की स्थिति को लिया जा सकता है। १९०१ के लिए बंगाल प्रांत के जनगणना अधीक्षक ने बंगाल के मुसलमानों के बारे में यह रोचक तथ्य दर्ज किए हैं :

”मुसलमानों का चार वर्गों-शेख, सैयद, मुग़ल और पठान-में परम्परागत विभाजन इस पांत (बंगाल) में प्रायः लागू नहीं है। मुसलमान दो मुखय सामाजिक विभाग मानते हैं-१. अशरफ अथवा शरु और २. अज़लफ। अशरफ से तात्पर्य है ‘कुलीन’, और इसमें विदेशियों के वंशज तथा ऊँची जाति के अधर्मांतरित हिन्दू शामिल हैं। शेष अन्य मुसलमान जिनमें व्यावसायिक वर्ग और निचली जातियों के धर्मांतरित शामिल हैं, उन्हें अज़लफ अर्थात्‌ नीचा अथवा निकृष्ट व्यक्ति माना जाता है। उन्हें कमीना अथवा इतर कमीन या रासिल, जो रिजाल का भ्रष्ट रूप है, ‘बेकार’ कहा जाता है। कुछ स्थानों पर एक तीसरा वर्ग ‘अरज़ल’ भी है, जिसमें आने वाले व्यक्ति सबसे नीच समझे जाते हैं। उनके साथ कोई भी अन्य मुसलमान मिलेगा-जुलेगा नहीं और न उन्हें मस्जिद और सार्वजनिक कब्रिस्तानों में प्रवेश करने दिया जाता है।

इन वर्गों में भी हिन्दुओं में प्रचलित जैसी सामाजिक वरीयताऔर जातियां हैं।

१. ‘अशरफ’ अथवा उच्च वर्ग के मुसलमान (प) सैयद, (पप) शेख, (पपप) पठान, (पअ) मुगल, (अ) मलिक और (अप) मिर्ज़ा।

२. ‘अज़लफ’ अथवा निम्न वर्ग के मुसलमान

(i) खेती करने वाले शेख और अन्य वे लोग जो मूलतः हिन्दू थे, किन्तु किसी बुद्धिजीवी वर्ग से सम्बन्धित नहीं हैं और जिन्हें अशरफ समुदाय, अर्थात्‌ पिराली और ठकराई आदि में प्रवेश नहीं मिला है।

( ii) दर्जी, जुलाहा, फकीर और रंगरेज।

(iii) बाढ़ी, भटियारा, चिक, चूड़ीहार, दाई, धावा, धुनिया, गड्‌डी, कलाल, कसाई, कुला, कुंजरा, लहेरी, माहीफरोश, मल्लाह, नालिया, निकारी।

(iv) अब्दाल, बाको, बेडिया, भाट, चंबा, डफाली, धोबी, हज्जाम, मुचो, नगारची, नट, पनवाड़िया, मदारिया, तुन्तिया।

३. ‘अरजल’ अथवा निकृष्ट वर्ग

भानार, हलालखोदर, हिजड़ा, कसंबी, लालबेगी, मोगता, मेहतर।

जनगणना अधीक्षक ने मुस्लिम सामाजिक व्यवस्था के एक और पक्ष का भी उल्लेख किया है। वह है ‘पंचायत प्रणाली’ का प्रचलन। वह बताते हैं :

”पंचायत का प्राधिकार सामाजिक तथा व्यापार सम्बन्धी मामलों तक व्याप्त है और……..अन्य समुदायों के लोगों से विवाह एक ऐसा अपराध है, जिस पर शासी निकायकार्यवाही करता है। परिणामत: ये वर्ग भी हिन्दू जातियों के समान ही प्रायः कठोर संगोती हैं, अंतर-विवाह पर रोक ऊंची जातियों से लेकर नीची जातियों तक लागू है। उदाहरणतः कोई घूमा अपनी ही जाति अर्थात्‌ घूमा में ही विवाह कर सकता है। यदि इस नियम की अवहेलना की जाती है तो ऐसा करने वाले को तत्काल पंचायत के समक्ष पेश किया जाता है। एक जाति का कोई भी व्यक्ति आसानी से किसी दूसरी जाति में प्रवेश नहीं ले पाता और उसे अपनी उसी जाति का नाम कायम रखना पड़ता है, जिसमें उसने जन्म लिया है। यदि वह अपना लेता है, तब भी उसे उसी समुदाय का माना जाता है, जिसमें कि उसने जन्म लिया था….. हजारों जुलाहे कसाई का धंधा अपना चुके हैं, किन्तु वे अब भी जुलाहे ही कहे जाते हैं।”

इसी तरह के तथ्य अन्य भारतीय प्रान्तों के बारे में भी वहाँ की जनगणना रिपोर्टों से वे लोग एकत्रित कर सकते हैं, जो उनका उल्लेख करना चाहते हों। परन्तु बंगाल के तयि ही यह दर्शाने के लिए पर्याप्त हैं कि मुसलमानों में जाति प्राणी ही नहीं, छुआछूत भी प्रचलित है।” (पृ. २२१-२२३)

९. इस्लामी कानून समाज-सुधार के विरोधी-”मुसलमान ों में इन बुराइयों का होना दुखदहैं। किन्तु उससे भी अधिक दुखद तथ्य यह है कि भारत के मुसलमानों में समाज सुधार का ऐसा कोई संगठित आन्दोलन नहीं उभरा जो इन बुराईयों का सफलतापूर्वक उन्मूलन कर सके। हिन्दुओं में भी अनेक सामाजिक बुराईयां हैं। परन्तु सन्तोषजनक बात यह है कि उनमें से अनेक इनकी विद्यमानता के प्रति सजग हैं और उनमें से कुछ उन बुराईयों के उन्मूलन हेतु सक्रिय तौर पर आन्दोलन भी चला रहे हैं। दूसरी ओर, मुसलमान यह महसूस ही नहीं करते कि ये बुराईयां हैं। परिणामतः वे उनके निवारण हेतु सक्रियता भी नहीं दर्शाते। इसके विपरीत, वे अपनी मौजूदा प्रथाओं में किसी भी परिवर्तन का विरोध करते हैं। यह उल्लेखनीय है कि मुसलमानों ने केन्द्रीय असेंबली में १९३० में पेश किए गए बाल विवाह विरोधी विधेयक का भी विरोध किया था, जिसमें लड़की की विवाह-योग्य आयु १४ वर्ष् और लड़के की १८ वर्ष करने का प्रावधान था। मुसलमानों ने इस विधेयक का विरोध इस आधार पर किया कि ऐसा किया जाना मुस्लिम धर्मग्रन्थ द्वारा निर्धारित कानून के विरुद्ध होगा। उन्होंने इस विधेयक का हर चरण पर विरोध ही नहीं किया, बल्कि जब यह कानून बन गया तो उसके खिलाफ सविनय अवज्ञाअभियान भी छेड़ा। सौभाग्य से उक्त अधिनियम के विरुद्ध मुसलमानों द्वारा छोड़ा गया वह अभ्यिान फेल नहीं हो पाया, और उन्हीं दिनों कांग्रेस द्वारा चलाए गए सविनय अवज्ञा आन्दोलन में समा गया। परन्तु उस अभियान से यह तो सिद्ध हो ही जाता है कि मुसलमान समाज सुधार के कितने प्रबल विरोधी हैं।” (पृ. २२६)

१०. मुस्लिम राजनीतिज्ञों द्वारा धर्मनिरपेक्षता का विरोध-”मुस्लिम राजनीतिज्ञ जीवन के धर्मनिरपेक्ष पहलुओं को अपनी राजनीति का आधार नहीं मानते, क्योंकि उने लिए इसका अर्थ हिन्दुओं के विरुद्ध अपने संघर्ष में अपने समुदाय को कमजोर करना ही है। गरीब मुसलमान धनियों से इंसाु पाने के लिए गरीब हिन्दुओं के साथ नहीं मिलेंगे। मुस्लिम जोतदार जमींदारों के अन्याय को रोकने के लिए अपनी ही श्रेणी के हिन्दुओं के साथ एकजुट नहीं होंगे। पूंजीवाद के खिलाफ श्रमिक के संघर्ष में मुस्लिम श्रमिक हिन्दू श्रमिकों के साथ शामिल नहीं होंगे। क्यों ? उत्तर बड़ा सरल है। गरीब मुसलमान यह सोचता है कि यदि वह धनी के खिलाफ गरीबों के संघर्ष में शामिल होता है तो उसे एक धनी मुसलमान से भी टकराना पड़ेगा। मुस्लिम जोतदार यह महसूस करते हैं कि यदि वे जमींदारों के खिलाफ अभियान में योगदान करते हैं तो उन्हें एक मुस्लिम जमींदार के खिलाफ भी संघर्ष करना पड़ सकता है। मुसलमान मजदूर यह सोचता है कि यदि वह पूंजीपति के खिलाफ श्रमिक के संघर्ष में सहभागी बना तो वह मुस्लिम मिल-मालिक की भावाओं को आघात पहुंचाएगा। वह इस बारे में सजग हैं कि किसी धनी मुस्लिम, मुस्लिम ज़मींदार अथवा मुस्लिम मिल-मालिक को आघात पहुंचाना मुस्लिम समुदाय को हानि पहुंचाना है और ऐसा करने का तात्पर्य हिन्दू समुदाय के विरुद्ध मुसलमानों के संघर्ष को कमजोर करना ही होगा।” (पृ. २२९-२३०)

११. मुस्लिम कानूनों के अनुसार भरत हिन्दुओं और मुसलमानों की समान मातृभूमि नहीं हो सकती-”मुस्लिम धर्म के सिद्धान्तों के अनुसार, विश्व दो हिस्सो में विभाजित है-दार-उल-इस्ला म तथा दार-उल-हर्ब। मुस्लिम शासित देश दार-उल-इस्लाम हैं। वह देश जिसमें मुसलमान सिर्फ रहते हैं, न कि उस पर शासन करते हैं, दार-उल-हर्ब है। मुस्लिम धार्मिक कानून का ऐसा होने के कारण भारत हिन्दुओं तथा मुसलमानों दोनों की मातृभूमि नहीं हो सकती है। यह मुसलमानों की धरती हो सकती है-किन्तु यह हिन्दुओं और मुसलमानों की धरती, जिसमें दोनोंसमानता से रहें, नहीं हो सकती। फिर, जब इस पर मुसलमानों का शासन होगा तो यह मुसलमानों की धरती हो सकती है। इस समय यह देश गैर-मुस्लिम सत्ता के प्राधिकार के अन्तर्गत हैं, इसलिए मुसलमानों की धरती नहीं हो सकती। यह देश दार-उल-इस्लाम होने की बजाय दार-उल-हर्ब बन जाताप है। हमें यह नहीं मान लेना चाहिए कि यह दृष्टिकोण केवल शास्त्रीय है। यह सिद्धान्त मुसलमानों को प्रभावित करने में बहुत कारगर कारण हो सकता है।” (पृ. २९६-२९७)

१२. दार-उल-हर्व भारत को दार-उल-इस्लाम बनाने के लिए जिहाद-”यह उल्लेखनीय है कि जो मुसलमान अपने आपको दार-उल-हर्ब में पाते हैं, उनके बचाव के लिए हिजरत ही उपाय नहीं हैं मुस्लिम धार्मिक कानून की दूसरी आज्ञा जिहाद (धर्म युद्ध) है, जिसके तहत हर मुसलमान शासक का यह कर्त्तव्य हो जाता है कि इस्लाम के शासन का तब तक विस्तार करता रहे, जब तक सारी दुनिया मुसलमानों के नियंत्रण में नहीं आ जाती। संसार के दो खेमों में बंटने की वजह से सारे देश या दो दार-उल-इस्लाम (इस्लाम का घर) या दार-उल-हर्ब (युद्ध का घर) की श्रेणी में आते हैं। तकनीकी तौर पर हर मुस्लिम शासक का, जो इसके लिए सक्षम है, कर्त्तव्य है कि वह दार-उल-हब्र कोदार-उल-इस्लाम में बदल दे; और भारत में जिस तरह मुसलमानों के हिज़रत का मार्ग अपनाने के उदाहरण हैं, वहाँ ऐसेस भी उदाहरण हैं कि उन्होंने जिहाद की घोषणा करने में संकोच नहीं किया।”

”तथ्य यह है कि भारत, चाहे एक मात्र मुस्लिम शासन के अधीन न हो, दार-उल-हर्ब है, और इस्लामी सिद्धान्तों के अनुसार मुसलमानों द्वारा जिहाद की घोषणा करना न्यायसंगत है। वे जिहाद की घोषणा ही नहीं कर सकते, बल्कि उसकी सफलता के लिए विदेशी मुस्लिम शक्ति की मदद भी ले सकते हैं, और यदि विदेशी मुस्लिम शक्ति जिहाद की घोषणा करना चाहती है तो उसकी सफलता के लिए सहायता दे सकते हैं।” (पृ. २९७-२९८)

१३. हिन्दू-मुस्लिम एकता असफल क्यों रही ?-”हिन्दू-मुस्ल िम एकता की विफलता का मुखय कारण इस अहसास का न होना है कि हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच जो भिन्नताएं हैं, वे मात्र भिन्नताएं ही नहीं हैं, और उनके बीच मनमुटाव की भावना सिर्फ भौतिक कारणों से ही नहीं हैं इस विभिन्नता का स्रोत ऐतिहासिक, धार्मिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक दुर्भावना है, और राजनीतिक दुर्भावना तो मात्र प्रतिबिंब है। ये सारी बातें असंतोष का दरिया बना लेती हैं जिसका पोषण उन तमाम बातों से होता है जो बढ़ते-बढ़ते सामान्य धाराओं को आप्लावित करता चला जाता हैं दूसरे स्रोत से पानी की कोई भी धारा, चाहे वह कितनी भी पवित्र क्यों न हो, जब स्वयं उसमें आ मिलती है तो उसका रंग बदलने के बजाय वह स्वयं उस जैसी हो जाती हैं दुर्भावना का यह अवसाद, जो धारा में जमा हो गया हैं, अब बहुत पक्का और गहरा बन गया है। जब तक ये दुर्भावनाएं विद्यमान रहती हैं, तब तक हिन्दू और मुसलमानों के बीच एकता की अपेक्षा करना अस्वाभाविक है।” (पृ. ३३६)

१४. हिन्दू-मुस्लिम एकता असम्भव कार्य-”हिन्दू-म ुस्लिम एकता की निरर्थकता को प्रगट करने के लिए मैं इन शब्दों से और कोई शबदावली नहीं रख सकता। अब तक हिन्दू-मुस्लिम एकता कम-से-कम दिखती तो थी, भले ही वह मृग मरीचिका ही क्यों न हो। आज तो न वह दिखती हे, और न ही मन में है। यहाँ तक कि अब तो गाांी ने भी इसकी आशा छोड़ दी है और शायद अब वह समझने लगे हैं कि यह एक असम्भव कार्य है।” (पृ. १७८)

१५. साम्प्रदायिक शान्ति के लिए अलपसंखयकों की अदला-बदली ही एक मात्र हल-”यह बात निश्चित है कि साम्प्रदायिक शांति स्थापित करने का टिकाऊ तरीका अल्पसंखयकों की अदला-बदली ही हैं।यदि यही बात है तो फिर वह व्यर्थ होगा कि हिन्दू और मुसलमान संरक्षण के ऐसे उपाय खोजने में लगे रहें जो इतने असुरक्षित पाए गए हैं। यदि यूनान, तुकी और बुल्गारिया जैसे सीमित साधनों वाले छोटे-छोटे देश भी यह काम पूरा कर सके तो यह मानने का कोई कारण नहीं है कि हिन्दुस्तानी ऐसा नहीं कर सकते। फिर यहाँ तो बहुत कम जनता को अदला-बदली करने की आवश्यकता पड़ेगी ओर चूंकि कुछ ही बाधाओं को दूर करना है। इसलिए साम्प्रदायिक शांति स्थापित करने के लिए एक निश्चित उपाय को न अपनाना अत्यन्त उपहासास्पद होगा।” (पृ. १०१)

१६. विभाजन के बाद भी अल्पसंखयक-बहुसं खयक की समस्या बनी ही रहेगी-”यह बात स्वीकार कर लेनी चाहिए कि पाकिस्तान बनने से हिन्दुस्तान साम्प्रदायिक समस्यासे मुक्त नहीं हो जाएगा। सीमाओं का पुनर्निर्धारण करके पाकिस्तान को तो एक सजातीय देश बनाया जा सकता हे, परन्तु हिन्दुस्तान तो एक मिश्रित देश बना ही रहेगा। मुसलमान समूचे हिन्दुस्तान में छितरे हुए हैं-यद्यपि वे मुखयतः शहरों और कस्बों में केंद्रित हैं। चाहे किसी भी ढंग से सीमांकन की कोशिश की जाए, उसे सजातीय देश नहीं बनायाजा सकता। हिन्दुस्तान को सजातीय देश बनाने काएकमात्र तरीका है, जनसंखया की अदला-बदली की व्यवस्था करना। यह अवश्य विचार कर लेना चाहिए कि जब तक ऐसा नहीं कियाजाएगा, हिन्दुस्तान में बहुसंखयक बनाम अल्पसंखयक की समस्या और हिन्दुस्तान की राजनीति में असंगति पहले की तरह बनी ही रहेगी।” (पृ. १०३)

१७. अल्पसंखयकों की सुरक्षा के लिए संवैधानिक उपाय-”अब मैं अल्पसंखयकों की उस समस्या की ओर आपका ध्यान दिलाना चाहता हूँ जो सीमाओं के पुनः निर्धारण के उपरान्त भी पाकिस्तान में बनी रहेंगी। उनके हितों की रक्षा करने के दो तरीके हैं। सबसे पहले, अल्पसंखयकों के राजनीतिक और सांस्कृतिक अधिकारों की रक्षा के लिए संविधान में सुरक्षा उपाय प्रदान करने हैं। भारतीय के लिए यह एक सुपरिचित मामला है और इस बात पर विस्तार से विचार करना आवश्यक है।” (पृ. ३८५)

१८. अल्पसंखयकों की अदला-बदली-एक संभावित हल-”दूसरा तरीका है पाकिस्तान से हिन्दुस्तान में उनका स्थानान्तरणकरने की स्थिति पैदा करना। अधिकांश जनता इस समाधान को अधिक पसंद करती हे और वह पाकिस्तान की स्वीकृति के लिए तैयार और इच्छुक हो जाएगी, यदि यह प्रदर्शित किया जा से कि जनसंखया का आदान-प्रदान सम्भव है। परन्तु इसे वे होश उड़ा देने वालीऔर दुरूह समस्या समझते हैं। निस्संदेह यह एक आतंकित दिमाग की निशनी है। यदि मामले पर ठंडे और शांतिपूर्ण एंग से विचार किया जाए तो पता लग जाएगा कि यह समस्या न तो होश उड़ाने वाली है, और न दुरूह।” (पृ. ३८५)

(सभी उद्धरण बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाड्‌मय, खंड १५-’पाकिस्तान और भारत के विभाजन, २००० से लिए गए हैं)
Esh de hui
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ryavrata-Bharata History


British distorted Hindu Aryavrata-Bharata History of India and now same is being done by Communists and Islamists: Hindustan Times, dated 01 Feb 2013
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The flawed Aryan invasion theory (AIT) was actually part of the British policy of divide and rule, French historian Michel Danino, an expert on ancient Indian history, said on Thursday on the sidelines of the Kolkata Literary Meet. Danino, who authored books such as The Lost River: On The Trail of Saraswati and Indian Culture and India’s Future, blames the British for distorting Indian history and challenged the Arayan invasion theory, while maintaining that there was no actual Aryan-Dravidian divide.
“No ancient or medieval Indian text would support the Aryan invasion theory. It is genetically proven that Aryans and Dravidians belong to the same race, ”said Danino, who settle in India in 1977 and has since acquired Indian citizenship.

Danino said that early Tamil literature displayed a cultural fusion with north Indian literature. Even the name of the city Maduri was influence from the ancient north Indian heritage city, Mathura, Danino claimed.

“Indians are basically a mixed breed and the mixing started as early as the Stone Age. After the Saraswati river dried up, leading to the collapse of the Indus Valley civilization, people started settling on the banks of the Ganges. This phenomenon that occurred around 2000 BC led to massive mixing up of the populace as a while has to shift its base,” Danino explained.

“The Mahabharata defined ethnic groups as jatis, whereas the British brought in the term tribes to describe the same thing, thus denigrating the homogenous culture of India. Jatis were defined on ecological terms. There is a popular perception that casteism started in India since the Vedas but that is not true. There was no casteism even during the Mahabharata period,” he said.

Danino also rued the fact that Indians are apathetic towards the preservation of their rich culture and heritage. “1170 sites of the ancient Harappan civilization have been identified during its mature phase. But till date only around 100 sites have been excavated. There is a fear that 90% of the sites might disappear due to expansion of urban areas or agricultural land being converted to residential high rises,” Danino said.

He went on to give an example of how the archaeological Survey of India (ASI) could recover only eight kilos of Harappan gold when about 80 kilos of the same was unearthed at Mandi in Uttar Pradesh. Villagers pilfered the rest, depriving India of a useful insight into its rich heritage.

“ASI admitted to a Parliament query that 42 protected sites vanished from Delhi alone. No one noticed as land sharks went to grab the sites and construct high-rises on them,” Danino said.

Historian Sanjeev Sanyal, speaking on the continuity of Indian history claimed that east European and north Indian people share genetic similarities.
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Source : Hindustan Times

Link : http://www.hindustantimes.com/India-news/Kolkata/Indian-history-was-distorted-by-the-British/Article1-1004972.aspx

British distorted Hindu Aryavrata-Bharata History of India and now same is being done by Communists and Islamists: Hindustan Times, dated 01 Feb 2013
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The flawed Aryan invasion theory (AIT) was actually part of the British policy of divide and rule, French historian Michel Danino, an expert on ancient Indian history, said on Thursday on the sidelines of the Kolkata Literary Meet. Danino, who authored books such as The Lost River: On The Trail of Saraswati and Indian Culture and India’s Future, blames the British for distorting Indian history and challenged the Arayan invasion theory, while maintaining that there was no actual Aryan-Dravidian divide.
“No ancient or medieval Indian text would support the Aryan invasion theory. It is genetically proven that Aryans and Dravidians belong to the same race, ”said Danino, who settle in India in 1977 and has since acquired Indian citizenship.

Danino said that early Tamil literature displayed a cultural fusion with north Indian literature. Even the name of the city Maduri was influence from the ancient north Indian heritage city, Mathura, Danino claimed.

“Indians are basically a mixed breed and the mixing started as early as the Stone Age. After the Saraswati river dried up, leading to the collapse of the Indus Valley civilization, people started settling on the banks of the Ganges. This phenomenon that occurred around 2000 BC led to massive mixing up of the populace as a while has to shift its base,” Danino explained.

“The Mahabharata defined ethnic groups as jatis, whereas the British brought in the term tribes to describe the same thing, thus denigrating the homogenous culture of India. Jatis were defined on ecological terms. There is a popular perception that casteism started in India since the Vedas but that is not true. There was no casteism even during the Mahabharata period,” he said.

Danino also rued the fact that Indians are apathetic towards the preservation of their rich culture and heritage. “1170 sites of the ancient Harappan civilization have been identified during its mature phase. But till date only around 100 sites have been excavated. There is a fear that 90% of the sites might disappear due to expansion of urban areas or agricultural land being converted to residential high rises,” Danino said.

He went on to give an example of how the archaeological Survey of India (ASI) could recover only eight kilos of Harappan gold when about 80 kilos of the same was unearthed at Mandi in Uttar Pradesh. Villagers pilfered the rest, depriving India of a useful insight into its rich heritage.

“ASI admitted to a Parliament query that 42 protected sites vanished from Delhi alone. No one noticed as land sharks went to grab the sites and construct high-rises on them,” Danino said.

Historian Sanjeev Sanyal, speaking on the continuity of Indian history claimed that east European and north Indian people share genetic similarities.
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Source : Hindustan Times

Link : http://www.hindustantimes.com/India-news/Kolkata/Indian-history-was-distorted-by-the-British/Article1-1004972.aspx
Posted in जीवन चरित्र

Duggirala Gopalakrishnayya


Duggirala Gopalakrishnayya (2 June 1889 – 10 June 1928) was an freedom fighter of Bharat from the southern state of Andhra Pradesh. He was popularly known by title – “Andhra Ratna”

Gopalakrishnayya was a devotee of the Hindu deity Rama and he organised a cadre of workers whom he called Rama Dandu (meaning Rama’s Army) to work for the cause of swaraj. In 1921 the Congress held its annual session at Bezwada (or Vijayawada) where the Rama Dandu played a prominent role in organising it. Members of the Dandu wore saffron clothes and donned Rrudraksha beeds and vermilion and they participated in the meeting in large numbers. Mohammed Ali, the president of the session, was impressed enough to call it the Red Army of India.

Duggirala Gopalakrishnayya (2 June 1889 - 10 June 1928) was an freedom fighter of Bharat from the southern state of Andhra Pradesh. He was popularly known by title - "Andhra Ratna"

Gopalakrishnayya was a devotee of the Hindu deity Rama and he organised a cadre of workers whom he called Rama Dandu (meaning Rama's Army) to work for the cause of swaraj. In 1921 the Congress held its annual session at Bezwada (or Vijayawada) where the Rama Dandu played a prominent role in organising it. Members of the Dandu wore saffron clothes and donned Rrudraksha beeds and vermilion and they participated in the meeting in large numbers. Mohammed Ali, the president of the session, was impressed enough to call it the Red Army of India.
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Posted in सुभाषित - Subhasit

Subhasit


ढोल गवार शुद्र पशु नारी ये सब सकल ताडना के अधिकारी |//
अवधि भाषा मे ताडना के कई अर्थ है, लोग़ पीटना अर्थ लेते है और इस अर्थ से तों महाकवि तुलसीदास कोई पागल ही सिद्ध होते है जो अकारण ही पीटने की बात कह रहे है | ताडना के अन्य अर्थ है घूरना या देखते रहना, जासूसी करते वक्त देखते रहना या नजर रखना, समझना | मैं यहाँ समझना अर्थ ही लेता हू क्यों के उसी से सही और सार्थक अर्थ निकलता है |
हर ढोल के कसाव को अलग-२ स्तर पर समायोजित करना होता है | सीधे किसी भी ढोल को या बिना कसे या बिना समझे पीटना चालु कर दिया जाए तों सही ताल नहीं मिलेगी चाहे जितना बड़ा ढोलचि क्यों ना हों | इसलिए ढोल के कसाव को समझना आवश्यक है |
ग्वार व्यक्ति अपेक्षा का शिकार होता है | पर उनसे भी बहुत कुछ सीखा जा सकता है | तुलसीदास स्वयं उसी श्रेणी मे थे एक समय इसलिए उन्होंने गवार का उल्लेख किया होगा |

शुद्र यानी श्रमिक वर्ग, उस समय ये वर्ग प्रमुखता से खेती मे काम कर्ता था | मुग़ल काल मे कृषि ही अधिक प्रभावित हुई थी | कुम्हार लोहार कृषक ये सब वैश्य मे ही आते थे | इसलिए समझने के अधिकारी थे | ना के अकारण पीटने के |
पशु केवल चतुष्पद के लिए नहीं है, और पशुओ मारने के अधिकारी है समझने के नहीं ये लोगो की समझ पर है | और पशु पीटने के अधिकारी है ये अर्थ ले तों तुलसीदास भक्त नहीं कोई निर्दयी व्यक्ति ही सिद्ध होंगे |
नारी, मंडन मिश्र के समय जो नारी शास्त्रार्थ करती थी वो मुगल काल मे परदे मे पहुच गई थी इसलिए उनको समझने की आवयश्कता सर्वाधिक थी | पुरुष घरों मे कैद नहीं थे के मुस्लमान उठा ले जायेंगे |
ये मेरा अनुमान है, गलत भी हों सकता हू क्यों के कवी की भाषा कवी ही जाने हम सिर्फ अनुमान कर सकते है व्यक्ति के अन्य कार्यों को देख कर | पर ढोल गवार शुद्र पशु नारी ये सब पीटने के अधिकारी है यदि ये लोग़ अर्थ लेते है तुलसीदास जी को भक्त नहीं खलनायक ही कहना होगा क्यों के अकारण बस किसी को पीटा जाए किसी के बस होने पर ये अधिक मूर्खतापूर्ण मान्यता है | आप लोगो के विचार आमंत्रित है |
Posted in भारतीय शिक्षा पद्धति

वर्तमान शिक्षा पद्धति


वर्तमान शिक्षा पद्धति : कमियां एवं विकल्प=आनन्द सुब्रमण्यम शास्त्री

वर्तमान शिक्षा में गुरु या अध्यापक श्रध्दा का पात्र न होकर वेतन भोगी नौकर बन गया। अध्यापक की भूमिका गौण हो गई तथा विद्यालय-विश्वविद्यालय के प्रबन्ध तन्त्र की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है।
वर्तमान शिक्षा का इतिहास अधिक प्राचीन नहीं है। प्राय: लोग इसे मैकाले की शिक्षा प्रणाली के नाम से पुकारते हैं। लार्ड मैकाले ब्रिटिश पार्लियामेन्ट के ऊपरी सदन (हाउस आफ लार्ड्स) का सदस्य था। 1857 की क्रान्ति के बाद जब 1860 में भारत के शासन को ईस्ट इण्डिया कम्पनी से छीनकर महारानी विक्टोरिया के अधीन किया गया तब मैकाले को भारत में अंग्रेजों के शासन को मजबूत बनाने के लिये आवश्यक नीतियां सुझाने का महत्वपूर्ण कार्य सौंपा गया था। उसने सारे देश का भ्रमण किया। उसे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि यहां झाडू देने वाला, चमड़ा उतारने वाला, करघा चलाने वाला, कृषक, व्यापारी (वैश्य), मंत्र पढ़ने वाला आदि सभी वर्ण के लोग अपने-अपने कर्म को बड़ी श्रध्दा से हंसते-गाते कर रहे थे। सारा समाज संबंधोें की डोर से बंधा हुआ था। शूद्र भी समाज में किसी का भाई, चाचा या दादा था तथा ब्राहमण भी ऐसे ही रिश्तों से बंधा था। बेटी गांव की हुआ करती थी तथा दामाद, मामा आदि रिश्ते गांव के हुआ करते थे। इस प्रकार भारतीय समाज भिन्नता के बीच भी एकता के सूत्र में बंधा हुआ था। इस समय धार्मिक सम्प्रदायों के बीच भी सौहार्दपूर्ण संबंध था। यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि 1857 की क्रान्ति में हिन्दू-मुसलमान दोनों ने मिलकर अंग्रेजों का विरोध किया था। मैकाले को लगा कि जब तक हिन्दू-मुसलमानों के बीच वैमनस्यता नहीं होगी तथा वर्ण व्यवस्था के अन्तर्गत संचालित समाज की एकता नहीं टूटेगी तब तक भारत पर अंग्रेजों का शासन मजबूत नहीं होगा।
भारतीय समाज की एकता को नष्ट करने तथा वर्णाश्रित कर्म के प्रति घृणा उत्पन्न करने के लिए मैकाले ने वर्तमान शिक्षा प्रणाली को बनाया। अंग्रेजों की इस शिक्षा नीति का लक्ष्य था संस्कृत, फारसी तथा लोक भाषाओं के वर्चस्व को तोड़कर अंग्रेजी का वर्चस्व कायम करना। साथ ही सरकार चलाने के लिए देशी अंग्रेजों को तैयार करना। इस प्रणाली के जरिए वंशानुगत कर्म के प्रति घृणा पैदा करने और परस्पर विद्वेष फैलाने की भी कोशिश की गई थी। इसके अलावा पश्चिमी सभ्यता एवं जीवन पध्दति के प्रति आकर्षण पैदा करना भी मैकाले का लक्ष्य था।