Posted in राजनीति भारत की - Rajniti Bharat ki

हिंदू मुस्लिम सिक्ख ईसाई….


हिंदू मुस्लिम सिक्ख ईसाई……
आपस मे सब भाई भाई…….

सभी को नारा सुनने मे अच्छा लगता है. किंतु नारे के पीछे के षड्यंत्र को शायद कोई नहीं देख पाया…….
नारे मे हिंदू और सिक्ख को अलग अलग कर दिया गया है. जबकि सिक्ख तो महा हिंदू होते हैं. हिंदू धर्म के रक्षक होते हैं……..
आज भी काफ़ी लोग सरदार के नाम पर चुटकुला सुना कर खुश हो लेते हैं. किंतु वो ये नहीं जानते की सिक्ख को सरदार क्यों कहा गया है? सिक्ख समुदाय का हर व्यक्ति हिंदुत्व के लिए प्राणों की आहुति हेतु हमेशा तत्पर रहा है. इसीलिए इन्हें सरदार यानी दल के मुखिया के उपाधि दी गयी. हर हिंदू सिक्ख है और हर सिक्ख हिंदू है. इन्हें भूल कर भी अलग नज़र से देखने की ग़लती ना करें………
विनम्र निवेदन है की आज की युवा पीढ़ी एक बार इतिहास उठा कर देख ले “हिंदुत्व रक्षा के लिए सिक्ख समुदाय द्वारा दी गई क़ुर्बानियाँ और जानें इतनी संख्या में हैं, जिनका वर्णन भी कठिन है.”…….
सिक्ख जैन बौद्ध सब हिंदू हें इन्हें अलग समझने की भूल न करें………
जय श्री राम……
Hamare is Rashtawadi Page se bhi jude “http://www.facebook.com/WeWantToBeNarendraModi

हिंदू मुस्लिम सिक्ख ईसाई......
आपस मे सब भाई भाई.......

सभी को नारा सुनने मे अच्छा लगता है. किंतु नारे के पीछे के षड्यंत्र को शायद कोई नहीं देख पाया.......
नारे मे हिंदू और सिक्ख को अलग अलग कर दिया गया है. जबकि सिक्ख तो महा हिंदू होते हैं. हिंदू धर्म के रक्षक होते हैं........
आज भी काफ़ी लोग सरदार के नाम पर चुटकुला सुना कर खुश हो लेते हैं. किंतु वो ये नहीं जानते की सिक्ख को सरदार क्यों कहा गया है? सिक्ख समुदाय का हर व्यक्ति हिंदुत्व के लिए प्राणों की आहुति हेतु हमेशा तत्पर रहा है. इसीलिए इन्हें सरदार यानी दल के मुखिया के उपाधि दी गयी. हर हिंदू सिक्ख है और हर सिक्ख हिंदू है. इन्हें भूल कर भी अलग नज़र से देखने की ग़लती ना करें.........
विनम्र निवेदन है की आज की युवा पीढ़ी एक बार इतिहास उठा कर देख ले "हिंदुत्व रक्षा के लिए सिक्ख समुदाय द्वारा दी गई क़ुर्बानियाँ और जानें इतनी संख्या में हैं, जिनका वर्णन भी कठिन है.".......
सिक्ख जैन बौद्ध सब हिंदू हें इन्हें अलग समझने की भूल न करें.........
जय श्री राम......
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Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

अगर भगवान नहीं हे तो उसका ज़िक्र क्यो?? और अगर भगवान हे तो फिर फिक्र क्यों


पैसे। सेठ ने उससे कहा कि पंदह पैसे में
देगा क्या?
यह सुनकर लड़का हल्की मुस्कान
दबाए पानी वापस घड़े में उड़ेलता हुआ
आगे बढ़ गया।
उसी डिब्बे में एक महात्मा बैठे थे,
जिन्होंने यह नजारा देखा था कि लड़का मुस्कराय मौन रहा।
जरूर कोई रहस्य उसके मन में होगा।
महात्मा नीचे उतरकर उस लड़के के
पीछे- पीछे गए।
बोले : ऐ लड़के, ठहर जरा, यह तो बता तू हंसा क्यों?
वह लड़का बोला, महाराज, मुझे
हंसी इसलिए आई कि सेठजी को प्यास
तो लगी ही नहीं थी। वे तो केवल
पानी के गिलास का रेट पूछ रहे थे। महात्मा ने पूछा, लड़के, तुझे ऐसा क्यों लगा कि सेठजी को प्यास लगी ही नहीं थी।
लड़के ने जवाब दिया, महाराज, जिसे
वाकई प्यास लगी हो वह कभी रेट
नहीं पूछता। वह तो गिलास लेकर पहले पानी पीता है।
फिर बाद में पूछेगा कि कितने पैसे देने हैं? पहले कीमत पूछने का अर्थ हुआ कि प्यास
लगी ही नहीं है।
वास्तव में जिन्हें ईश्वर और जीवन में
कुछ पाने की तमन्ना होती है, वे वाद-विवाद में नहीं पड़ते। पर जिनकी प्यास सच्ची नहीं होती, वे ही वाद-विवाद में पड़े रहते हैं। वे साधना के पथ पर आगे नहीं बढ़ते. 
अगर भगवान नहीं हे तो उसका ज़िक्र क्यो??
और अगर भगवान हे तो फिर फिक्र क्यों ??
एक बार किसी रेलवे प्लैटफॉर्म पर जब
गाड़ी रुकी तो एक लड़का पानी बेचता हुआ निकला। ट्रेन में बैठे एक सेठ ने उसे आवाज दी, ऐ लड़के, इधर आ। लड़का दौड़कर आया।
उसने पानी का गिलास भरकर सेठ
की ओर बढ़ाया तो सेठ ने पूछा,
कितने पैसे में? लड़के ने कहा, पच्चीस
पैसे। सेठ ने उससे कहा कि पंदह पैसे में
देगा क्या?
यह सुनकर लड़का हल्की मुस्कान
दबाए पानी वापस घड़े में उड़ेलता हुआ
आगे बढ़ गया।
उसी डिब्बे में एक महात्मा बैठे थे,
जिन्होंने यह नजारा देखा था कि लड़का मुस्कराय मौन रहा।
जरूर कोई रहस्य उसके मन में होगा।
महात्मा नीचे उतरकर उस लड़के के
पीछे- पीछे गए।
बोले : ऐ लड़के, ठहर जरा, यह तो बता तू हंसा क्यों?
वह लड़का बोला, महाराज, मुझे
हंसी इसलिए आई कि सेठजी को प्यास
तो लगी ही नहीं थी। वे तो केवल
पानी के गिलास का रेट पूछ रहे थे। महात्मा ने पूछा, लड़के, तुझे ऐसा क्यों लगा कि सेठजी को प्यास लगी ही नहीं थी।
लड़के ने जवाब दिया, महाराज, जिसे
वाकई प्यास लगी हो वह कभी रेट
नहीं पूछता। वह तो गिलास लेकर पहले पानी पीता है।
फिर बाद में पूछेगा कि कितने पैसे देने हैं? पहले कीमत पूछने का अर्थ हुआ कि प्यास
लगी ही नहीं है।
वास्तव में जिन्हें ईश्वर और जीवन में
कुछ पाने की तमन्ना होती है, वे वाद-विवाद में नहीं पड़ते। पर जिनकी प्यास सच्ची नहीं होती, वे ही वाद-विवाद में पड़े रहते हैं। वे साधना के पथ पर आगे नहीं बढ़ते. 󾮞󾮞󾮞󾮞󾮞
अगर भगवान नहीं हे तो उसका ज़िक्र क्यो??
और अगर भगवान हे तो फिर फिक्र क्यों ??