Posted in जीवन चरित्र

बन्दा बैरागी


Yah atyachaar padhkar, sunkar bhi aapke lahu me ubaal nahin aata?
Yadi nahin, to jao dharm badal lo…….Swayam Hindu kahlwakar hame galatfahmi me mat rakho k hum sankhya me kitne hain , taaki hame apni shakti ka sahi anumaan lag sake…
*
https://www.facebook.com/photo.php?fbid=911664705514280&set=a.330646690282754.96131.100000122775763&type=1&theater

बन्दा बैरागी का जन्म  1670 को ग्राम तच्छल किला, पु॰छ में श्री रामदेव के घर में हुआ।
उनका बचपन का नाम लक्ष्मणदास था।  युवावस्था में शिकार खेलते समय उन्होंने एक
गर्भवती हिरणी पर तीर चला दिया। इससे उसके पेट से एक शिशु निकला और तड़पकर वहीं मर गया। यह देखकर उनका मन खिन्न हो गया। उन्होंने अपना नाम माधोदास रख लिया और घर छोड़कर तीर्थयात्रा पर चल दिये। अनेक साधुओं से योग साधना सीखी और फिर नान्देड़ में कुटिया बनाकर रहने लगे।  इसी दौरान गुरु गोविन्दसिंह जी माधोदास की कुटिया में आये। उनके चारों पुत्र बलिदान हो चुके थे। उन्होंने इस कठिन समय में माधोदास से वैराग्य छोड़कर देश में व्याप्त मुगलों आतंक से जूझने को कहा। इस भेंट से माधोदास का जीवन बदल गया।

गुरुजी ने उसे बन्दा बहादुर नाम दिया। फिर पाँच तीर, एक निशान साहिब, एक नगाड़ा और एक हुक्मनामा देकर दोनों छोटे पुत्रों को दीवार में चिनवाने वाले सरहिन्द के नवाब से बदला लेने को कहा। बन्दा हजारों सिख सैनिकों को साथ लेकर पंजाब की ओर चल दिये। उन्होंने सबसे पहले श्री गुरु तेगबहादुर जी का शीश काटने वाले जल्लाद जलालुद्दीन का सिर काटा। फिर सरहिन्द के नवाब वजीरखान का वध किया।  जिन हिन्दू राजाओं ने मुगलों का साथ
दिया था, बन्दा बहादुर ने उन्हें भी नहीं छोड़ा। इससे चारों ओर उनके नाम की धूम मच गयी।
उनके पराक्रम से भयभीत मुगलों ने दस लाख फौज लेकर उन पर हमला किया और विश्वासघात से 17 दिसम्बर 1715 को उन्हें पकड़ लिया। उन्हें लोहे के एक पिंजड़े में बन्दकर,  हाथी पर लादकर सड़क मार्ग से दिल्ली लाया गया। उनके साथ हजारों सिख भी कैद किये गये थे। इनमें बन्दा के वे 740 साथी भी थे, जो प्रारम्भ से ही उनके साथ
थे। युद्ध में वीरगति पाए सिखों के सिर काटकर उन्हें भाले की नोक पर टाँगकर दिल्ली लाया गया। रास्ते भर गर्म चिमटों से बन्दा बैरागी का माँस नोचा जाता रहा।  काजियों ने बन्दा और उनके साथियों को मुसलमान बनने को कहा; पर सबने यह प्रस्ताव ठुकरा दिया।

दिल्ली में आज जहाँ हार्डिंग लाइब्रेरी है,वहाँ 7 मार्च 1716 से प्रतिदिन सौ वीरों की हत्या की जाने लगी। एक दरबारी मुहम्मद अमीन ने पूछा - तुमने ऐसे बुरे काम क्यों किये, जिससे तुम्हारी यह दुर्दशा हो रही है। बन्दा ने सीना फुलाकर सगर्व उत्तर दिया - मैं तो प्रजा के पीड़ितों को दण्ड देने के लिए परमपिता परमेश्वर के हाथ का शस्त्र  था। क्या तुमने सुना नहीं कि जब संसार में दुष्टों की संख्या बढ़ जाती है, तो वह मेरे जैसे किसी सेवक को धरती पर भेजता है।  बन्दा से पूछा गया कि वे कैसी मौत मरना चाहते  हैं ? बन्दा ने उत्तर दिया, मैं अब मौत से नहीं डरता; क्योंकि यह शरीर ही दुःख का मूल है। यह सुनकर सब ओर सन्नाटा छा गया। भयभीत करने के लिए उनके पाँच वर्षीय पुत्र अजय सिंह को उनकी गोद में लेटाकर बन्दा के हाथ में छुरा देकर उसको मारने को कहा गया।  बन्दा ने इससे इन्कार कर दिया। इस पर जल्लाद ने  उस बच्चे के दो टुकड़ेकर उसके दिल का माँस बन्दा के मुँह में ठूँस दिया; पर वे तो इन सबसे ऊपर उठ चुके थे। गरम चिमटों से माँस नोचे जाने के कारण उनके शरीर में केवल हड्डियाँ शेष थी। फिर भी आठ जून, 1716 को उस वीर को हाथी से कुचलवा दिया गया। इस प्रकार बन्दा वीर बैरागी अपने नाम के तीनों शब्दों को सार्थक कर बलिपथ पर चल दिये।

हुतात्मा वीर बंदा बेरागी जी को हमारा शत शत नमन !!!!!!!!!

बन्दा बैरागी का जन्म 1670 को ग्राम तच्छल किला, पु॰छ में श्री रामदेव के घर में हुआ।
उनका बचपन का नाम लक्ष्मणदास था। युवावस्था में शिकार खेलते समय उन्होंने एक
र्भवती हिरणी पर तीर चला दिया। इससे उसके पेट से एक शिशु निकला और तड़पकर वहीं मर गया। यह देखकर उनका मन खिन्न हो गया। उन्होंने अपना नाम माधोदास रख लिया और घर छोड़कर तीर्थयात्रा पर चल दिये। अनेक साधुओं से योग साधना सीखी और फिर नान्देड़ में कुटिया बनाकर रहने लगे। इसी दौरान गुरु गोविन्दसिंह जी माधोदास की कुटिया में आये। उनके चारों पुत्र बलिदान हो चुके थे। उन्होंने इस कठिन समय में माधोदास से वैराग्य छोड़कर देश में व्याप्त मुगलों आतंक से जूझने को कहा। इस भेंट से माधोदास का जीवन बदल गया।

गुरुजी ने उसे बन्दा बहादुर नाम दिया। फिर पाँच तीर, एक निशान साहिब, एक नगाड़ा और एक हुक्मनामा देकर दोनों छोटे पुत्रों को दीवार में चिनवाने वाले सरहिन्द के नवाब से बदला लेने को कहा। बन्दा हजारों सिख सैनिकों को साथ लेकर पंजाब की ओर चल दिये। उन्होंने सबसे पहले श्री गुरु तेगबहादुर जी का शीश काटने वाले जल्लाद जलालुद्दीन का सिर काटा। फिर सरहिन्द के नवाब वजीरखान का वध किया। जिन हिन्दू राजाओं ने मुगलों का साथ
दिया था, बन्दा बहादुर ने उन्हें भी नहीं छोड़ा। इससे चारों ओर उनके नाम की धूम मच गयी।
उनके पराक्रम से भयभीत मुगलों ने दस लाख फौज लेकर उन पर हमला किया और विश्वासघात से 17 दिसम्बर 1715 को उन्हें पकड़ लिया। उन्हें लोहे के एक पिंजड़े में बन्दकर, हाथी पर लादकर सड़क मार्ग से दिल्ली लाया गया। उनके साथ हजारों सिख भी कैद किये गये थे। इनमें बन्दा के वे 740 साथी भी थे, जो प्रारम्भ से ही उनके साथ
थे। युद्ध में वीरगति पाए सिखों के सिर काटकर उन्हें भाले की नोक पर टाँगकर दिल्ली लाया गया। रास्ते भर गर्म चिमटों से बन्दा बैरागी का माँस नोचा जाता रहा। काजियों ने बन्दा और उनके साथियों को मुसलमान बनने को कहा; पर सबने यह प्रस्ताव ठुकरा दिया।

दिल्ली में आज जहाँ हार्डिंग लाइब्रेरी है,वहाँ 7 मार्च 1716 से प्रतिदिन सौ वीरों की हत्या की जाने लगी। एक दरबारी मुहम्मद अमीन ने पूछा – तुमने ऐसे बुरे काम क्यों किये, जिससे तुम्हारी यह दुर्दशा हो रही है। बन्दा ने सीना फुलाकर सगर्व उत्तर दिया – मैं तो प्रजा के पीड़ितों को दण्ड देने के लिए परमपिता परमेश्वर के हाथ का शस्त्र था। क्या तुमने सुना नहीं कि जब संसार में दुष्टों की संख्या बढ़ जाती है, तो वह मेरे जैसे किसी सेवक को धरती पर भेजता है। बन्दा से पूछा गया कि वे कैसी मौत मरना चाहते हैं ? बन्दा ने उत्तर दिया, मैं अब मौत से नहीं डरता; क्योंकि यह शरीर ही दुःख का मूल है। यह सुनकर सब ओर सन्नाटा छा गया। भयभीत करने के लिए उनके पाँच वर्षीय पुत्र अजय सिंह को उनकी गोद में लेटाकर बन्दा के हाथ में छुरा देकर उसको मारने को कहा गया। बन्दा ने इससे इन्कार कर दिया। इस पर जल्लाद ने उस बच्चे के दो टुकड़ेकर उसके दिल का माँस बन्दा के मुँह में ठूँस दिया; पर वे तो इन सबसे ऊपर उठ चुके थे। गरम चिमटों से माँस नोचे जाने के कारण उनके शरीर में केवल हड्डियाँ शेष थी। फिर भी आठ जून, 1716 को उस वीर को हाथी से कुचलवा दिया गया। इस प्रकार बन्दा वीर बैरागी अपने नाम के तीनों शब्दों को सार्थक कर बलिपथ पर चल दिये।

हुतात्मा वीर बंदा बेरागी जी को हमारा शत शत नमन !!!!!!!!!

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

मारवाड़ी


पंडित जी को समर्पित जो सदेव मारवाड़ीयो पर कुछ ना कुछ लिखा करते है

एक मारवाड़ी मुबंई की बैँक मेँ गया, और बैँक मेनेजर से रु.50,000 का लोन मांगा.
बैँक मेनेजर ने गेरेँटर मांगा.
मारवाड़ी ने अपनी BMW कार जो बैँक के
सामने पार्क की हुई थी उसको गेरेँटी के तरीके से… जमा करवा दी.
मेनेजर ने गाडी के कागज चैक किए, और लोन देकर गाडी को कस्टडी मेँ खडी करने के लिए कर्मचारी को सुचना दी. मारवाड़ी 50,000 रुपये लेकर चला गया.
बैँक मेनेजर और कर्मचारी उस मारवाड़ी पर हँसने लगे और बात करने लगे कि यह
करोडपति होते हुए भी अपनी गाडी सिर्फ
50,000 मेँ गिरवी रख कर चला गया.
कितना बेवकुफ आदमी है.
उसके बाद 2 महीने बाद मारवाड़ी वापस बैँक मे गया और लोन की सभी रकम देकर
अपनी गाडी वापस लेने की इच्छा दर्शायी.
बैँक मेनेजर ने हिसाब-किताब किया और बोला : 50,000 मुल रकम के साथ 1250 रुपये ब्याज.
मारवाड़ी ने पुरे पैसे दे दिए.
बैँक मेनेजर से रहा नही गया और उसने पुछा :
कि आप इतने करोडपति होते हुए भी आपको 50,000 रुपयो कि जरुरत कैसे पडी.?
मारवाड़ी ने जवाब दिया : मैँ राजस्थान से
आया था. मैँ अमेरिका जा रहा था.
मुबंई से मेरी फ्लाइट थी.
मुबंई मेँ मेरी गाडी कहा पार्क करनी है यह
मेरी सबसे बडी प्रोबलम थी.
लेकिन इस प्रोबलम को आपने हल कर दिया.
मेरी गाडी भी सेफ कस्टडी मेँ दो महीने तक संभाल के रखा और 50,000 रुपये
खर्च करने के लिए भी दिए दोनो काम करने का चार्ज लगा सिर्फ 1250 रुपये.
आपका बहुत बहुत धन्यवाद.!

Posted in श्रीमद्‍भगवद्‍गीता

कुछ विश्व विख्यात लोगों का भगवत गीता के प्रति द्रष्टिकोण


कुछ विश्व विख्यात लोगों का भगवत गीता के प्रति द्रष्टिकोण

हमारी संस्कृति हमारी सोच

** अल्बर्ट आइन्स्टाइन- **
जब मैंने गीता पढ़ी और विचार किया कि कैसे ईश्वर ने इस ब्रह्माण्ड कि रचना की है, तो मुझे बाकी सब कुछ व्यर्थ प्रतीत हुआ।

** अल्बर्ट श्वाइत्जर – **
भागवतगीता का मानवता कि आत्मा पर गहन प्रभाव है, जो इसके कार्यों में झलकता है।

** अल्ड्स हक्सले -**
भगवत गीता ने सम्रद्ध आध्यात्मिक विकास का सबसे सुवयाव्स्थित बयान दिया है। यह आज तक केसबसे शाश्वत दर्शन का सबसे स्पष्ट और बोधगम्य सार है, इसलिए इसका मूल्य केवल भारत के लिए नही, वरन संपूर्ण मानवता के लिए है।

** हेनरी डी थोरो -**
हर सुबह मैं अपने ह्रदय और मस्तिष्क को भगवद गीता के उस अद्भुत और देवी दर्शन से स्नान कराता हूँ, जिसकी तुलना में हमारा आधुनिक विश्व और इसका साहित्य बहुत छोटा और तुच्छ जान पड़ता है।

** हर्मन हेस -**
भगवत गीता का अनूठापन जीवन के विवेक की उस सचमुच सुंदर अभिव्यक्ति में है, जिससे दर्शन प्रस्फुटित होकर धर्म में बदल जाता है।

** रौल्फ वाल्डो इमर्सन – **
मैं भागवत गीता का आभारी हूँ। मेरे लिए यह सभी पुस्तकों में प्रथम थी, जिसमे कुछ भी छोटा या अनुपयुक्त नहीं किंतु विशाल, शांत, सुसंगत, एक प्राचीन मेधा की आवाज जिसने एक – दूसरे युग और वातावरण में विचार किया था और इस प्रकार उन्हीं प्रश्नों को तय किया था, जो हमें उलझाते हैं।

** थॉमस मर्टन-**
गीता को विश्व की सबसे प्राचीन जीवित संस्कृति, भारत की महान धार्मिक सभ्यता के प्रमुख साहित्यिक प्रमाण के रूप में देखा जा सकता है।

** डा. गेद्दीज़ मैकग्रेगर – **
पाश्चात्य जगत में भारतीय साहित्य का कोई भी ग्रन्थ इतना अधिक उद्धरित नहीं होता जितना की भगवद गीता, क्योंकि यही सर्वाधिक प्रिय है|

हर हर महादेव

‪#‎princepandey‬

कुछ विश्व विख्यात लोगों का भगवत गीता के प्रति द्रष्टिकोण 

हमारी संस्कृति हमारी सोच

** अल्बर्ट आइन्स्टाइन- **
जब मैंने गीता पढ़ी और विचार किया कि कैसे ईश्वर ने इस ब्रह्माण्ड कि रचना की है, तो मुझे बाकी सब कुछ व्यर्थ प्रतीत हुआ।

** अल्बर्ट श्वाइत्जर - **
भागवतगीता का मानवता कि आत्मा पर गहन प्रभाव है, जो इसके कार्यों में झलकता है।

** अल्ड्स हक्सले -**
भगवत गीता ने सम्रद्ध आध्यात्मिक विकास का सबसे सुवयाव्स्थित बयान दिया है। यह आज तक केसबसे शाश्वत दर्शन का सबसे स्पष्ट और बोधगम्य सार है, इसलिए इसका मूल्य केवल भारत के लिए नही, वरन संपूर्ण मानवता के लिए है।

** हेनरी डी थोरो -**
हर सुबह मैं अपने ह्रदय और मस्तिष्क को भगवद गीता के उस अद्भुत और देवी दर्शन से स्नान कराता हूँ, जिसकी तुलना में हमारा आधुनिक विश्व और इसका साहित्य बहुत छोटा और तुच्छ जान पड़ता है।

** हर्मन हेस -**
भगवत गीता का अनूठापन जीवन के विवेक की उस सचमुच सुंदर अभिव्यक्ति में है, जिससे दर्शन प्रस्फुटित होकर धर्म में बदल जाता है।

** रौल्फ वाल्डो इमर्सन - **
मैं भागवत गीता का आभारी हूँ। मेरे लिए यह सभी पुस्तकों में प्रथम थी, जिसमे कुछ भी छोटा या अनुपयुक्त नहीं किंतु विशाल, शांत, सुसंगत, एक प्राचीन मेधा की आवाज जिसने एक - दूसरे युग और वातावरण में विचार किया था और इस प्रकार उन्हीं प्रश्नों को तय किया था, जो हमें उलझाते हैं।

** थॉमस मर्टन-**
गीता को विश्व की सबसे प्राचीन जीवित संस्कृति, भारत की महान धार्मिक सभ्यता के प्रमुख साहित्यिक प्रमाण के रूप में देखा जा सकता है।

** डा. गेद्दीज़ मैकग्रेगर - **
पाश्चात्य जगत में भारतीय साहित्य का कोई भी ग्रन्थ इतना अधिक उद्धरित नहीं होता जितना की भगवद गीता, क्योंकि यही सर्वाधिक प्रिय है|

हर हर महादेव 

#princepandey
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प्रियंका रोबर्ट शादी का कारण


1-प्रियंका रोबर्ट  शादी   का  कारण 

रॉबर्ट  और  प्रियंका   की  शादी   सन  1997   में  हुई  थी .लेकिन  अगर कोई  रॉबर्ट   को ध्यान  से देखे तो यह बात  सोचेगा कि सोनिया जैसी   चालाक  और  घाट  घाट  पानी  पीने  वाली  औरत  ने  रॉबर्ट जैसे  कुरूप  और  साधारण   व्यक्ति  से  प्रियंका की  शादी कैसे  करवा   दी ? क्या उसे प्रियंका   के लिए   कोई उपयुक्त  वर   नहीं  मिला  , और यह शादी जल्दी में   और चुपचाप  क्यों   की गयी .  वास्तव  में   सोनिया ने  रॉबर्ट  से  प्रियंका  की  शादी अपनी  पोल  खुलने  के  डर  से की  थी .  क्योंकि  जिस  समय  सोनिया इंगलैंड में एक कैंटीन   में  बार  गर्ल  थी .  उसी  समय   उसी  जगह  रोबट की  माँ  मौरीन  (Maureen) भी  यही काम  करती  थी . मौरीन को  सोनिया   और  माधव राव  सिंधिया  की  रास  लीला   की  बात  पता  थी ,जब वह उसी  कैंटीन  सोनिया उनको शराब   पिलाया  करती  थी .मौरीन  यह  भी  जानती  थी कि  किन किन  लोगों  के साथ  सोनिया  के अवैध  सम्बन्ध   थे .जब  सोनिया  राजिव  गांन्धी  के शादी  करके  दिल्ली   आ  गयी , तो  कुछ  समय बाद  मौरीन   भी दिल्ली  में  बस गयी . मौरीन  जानती थी कि सोनिया  सत्ता   के लिए  कुछ  भी  कर  सकती   है , क्योंकि जो भी  व्यक्ति उसके खतरा  बन  सकता  था  सोनिया ने उसका पत्ता  साफ  कर  दिया  , जैसे  संजय  गांधी , माधव  राव  सिंधिया  , राजेश  पायलेट  ,जितेन्द्र  प्रसाद  ,  बाल योगी , यहाँ तक  लोग तो  यह भी  शक  है कि  राजीव   गांधी  की हत्या में  सोनिया का  भी हाथ   है , वर्ना  वह अपने  पति  के हत्यारों   को  माफ़ क्यों  कर देती ?
चूँकि  मौरीन  का पति  और रॉबर्ट  का  पिता  राजेंदर  वडरा   पुराना जनसंघी   था , और  सोनिया  को डर  था कि अगर  अपने पति के  दवाब ने  मौरीन  अपना मुंह   खोल  देगी  तो मुझे भारत  पर  हुकूमत  करने  और अपने  नालायक  कुपुत्र  राहुल  को प्रधान मंत्री   बनाने में  सफलता  नहीं    मिलेगी .इसी  लिए  सोनिया ने मौरीन   के लडके रॉबर्ट  की शादी  प्रियंका  से करवा   दी .

2-जैसी  माँ  वैसी  बेटी 
 इस बात से  कोई  भी व्यक्ति  इनकार  नहीं कर सकता कि   जैसे  गुण  माँ  में  होते हैं  , वैसे  ही गुण  बेटी में  पाए  जाते हैं  .इसलिए जैसे सोनिया   अपने    कुपुत्र     के  सहारे  सत्ता  पर  एकाधिकार    बनाये  रखना  चाहती  है , वैसे ही  शादी के बाद  प्रियंका ने   पति  साथ  संपत्ति  पर  एकाधिकार  जमानेके लिए वडरा   परिवार के  सभी  सदस्यों   को अपने  रास्ते  से   हटा  दिया .राजेंदर  वडरा   के  दो  पुत्र  , रिचार्ड  और रॉबर्ट  और एक  पुत्री  मिशेल   थे . और  प्रियंका  की शादी  के  बाद   सभी  एक एक  कर  मर गए    या   मार दिए  गए  .जैसे ,   मिशेल ( Michelle )सन 2001  में  कार  दुर्घटना  में  मारी  गयी , रिचार्ड ( Richard )ने  सन 2003  में  आत्मह्त्या   कर ली . और प्रियंका   के ससुर सन  2009  में  एक  मोटेल  में  मरे हुए  पाए  गए  थे .   लेकिन  इनकी  मौत के  कारणों  की  कोई  जाँच नहीं  कराई गयी ,और  इसके बाद  सोनिया ने  रॉबर्ट  को  राष्ट्रपति  और  प्रधान मंत्री   के बराबर का दर्जा  इनाम के तौर पर दे दिया  . तब  इस  अधिकार को   पर जिस  रॉबर्ट  को कोई  पडौसी  भी नहीं  जानता  था , उसने  मात्र  आठ  महीनों   में  करोड़ों   की संपत्ति  बना  ली  ,और कई  कंपनियों   का मालिक   बन गया , साथ ही   सैकड़ों  एकड़  कीमती  जमीने भी  हथिया   लीं .जिनका  विवरण  इस  प्रकार   है

3-रॉबर्ट की  कंपनियाँ 
आज  से करीब  15 साल  पहले  रॉबर्ट  ने ' आर्टेक्स -Artex "   नाम से  एक  फर्म   बनायीं  थी .जो हैडीक्राफ्ट    की  चीजों  का   व्यापर  करती  थी  .  लेकिन  इस से कोई  खास  कमाई   नहीं  होती थी . लेकिन  नवम्बर2007  से लेकर  जून 2008   तक सिर्फ  आठ  ही  महीनों में रॉबर्ट  पांच  बड़ी  बड़ी  कंपनियों   का  मालिक  बन  गया ,जिनका ब्यौरा   इस  प्रकार   है ,
1.स्काई  लाईट  होस्पेटीलिटी  प्रा . लि (Sky Light Hospitality). स्थापना  1  नवम्बर  2007 .पूंजी   5  लाख 
2.स्काई  लाईट  रियल्टी प्रा .लि (Sky Light Realty( .स्थापना  16 नवम्बर   2007 . पूंजी  5  लाख 
3.नार्थ  इण्डिया आई टी   पार्क   प्रा .लि .(North India IT Parks) स्थापना  19  जून  2008 . पूंजी  25  लाख 
4.रियल  अर्थ  एस्टेट  प्रा .लि .(Real Earth Estates ) स्थापना  18  फरवरी  2008  पूंजी  10  लाख  
5.ब्ल्यू  ब्रीज  ट्रेडिंग  प्रा . लि (Blue Breeze Trading )स्थापना  1  नवम्बर  2007  पूंजी  5  लाख
इस विवरण   के अनुसार  रॉबर्ट  वडरा  के  पास  केवल  40  लाख   रुपये  की पूंजी  थी  . तब इतनी सी  पूंजी से उसने  करोड़ों  की संपत्ति कैसे अर्जित कर ली ? जिनका विवरण   इस  प्रकार है
4-रॉबर्ट की  संपत्तियां 
लगता है कि  रॉबर्ट  वडरा  ने  प्रियंका  से नहीं    नोट  छापने की  मशीन  से शादी   की   थी ,जभी तो  केवल  चालीस  लाख की  पूंजी से  करोड़ों  की  जमीने  और संपत्ति  खरीद  डाली  . जिन में से जिनके बारे में लोगों ने पता कर लिया   है उनका   विवरण यह है ,जो उसकी  बैलेंस  शीट    में दिया  गया है ,
1.दिल्ली   की  हिल्टन गार्डन इन  में पचास  प्रतिशत  हिस्सा  -  कीमत 31.7  करोड़   रूपया .
2.गुड़गाँव  में 10000   वर्गफीट का  फ़्लैट   कीमत  89  लाख  रुपये 
3.गुड़गाँव  के डी एल  ऍफ़  के मेग्नोलिया   में 7  फ़्लैट   कीमत 5.2   करोड़  रुपये 
4-दिल्ली के  डी  एल ऍफ़  के कैपिटल  ग्रीन  में 1  फ़्लैट   कीमत  5 करोड़  रुपये 
5-दिल्ली के   ग्रेटर  कैलाश में  1 फ़्लैट   कीमत 1.2   करोड़  रुपये 
6.बीकानेर में  161  एकड़   जमीन कीमत  1.2   करोड़  रुपये 
7.बीकानेर में   प्लाट क्षेत्रफल150    एकड़ 2.43 कीमत  करोड़  रुपये 
8.मानेसर   में  जमीन  कीमत  15.38  करोड़  रुपये 
9.महाराष्ट्र  के पनवेल  में  जमीन  कीमत  4.2   करोड़  रूपये 
10.गुड़गाँव  में  जमीन  कीमत 4  करोड़  रुपये 
11.हसन  पुर  में जमीन   कीमत 76  लाख   रुपये 
12.हरियाणा   में जमीन  कीमत 95  लाख  रुपये 
सोनिया    का  दामाद  यानि  प्रियंका  का पति  होने  का   क्या  मतलब  होता   है  ,यह  रोबर्ट  वडरा के  जीवन  शैली  के स्तर से और उसकी  आठ  महीने की  लगभग  चालीस  करोड़ की  संपत्ति  से  साफ़  झलकता है ,  कुछ    साल पहले जो व्यक्ति रेल का   टिकट  तक   नहीं  खरीद  सकता  था , आज बड़ी बड़ी  लक्जरी   कारों   में  शान से  घूमता  रहता   है .पहले  जो व्यक्ति   किरणे वाले का  उधार   समय पे नहीं   चूका सकता  था  , आज  रोज  बड़ी  बड़ी   महगी  पार्टियाँ    देता  रहता है .इन सभी  तथ्यों   से  एक ही  सवाल  उठता   है कि दुनिया की  सबसे  बड़ी  धूर्त  और षडयंत्र कारी   सोनिया  को रॉबर्ट  में  कौन सी   खूबी  दिखाई दी , जिस से प्रभावित होकर  उसने  अचानक  अपनी लड़की  की शादी  रॉबर्ट   वडरा   से  करा  दी . कहीं  ऐसा तो नहीं  कि  रॉबर्ट  वडरा की  माँ  मौरीन  ने  सोनिया  की  कमजोर  नस   को  दबा  दिया हो .  जिस  से  सोनिया  की  भारत  की  तानाशाह   और राहुल  को देश  का प्रधानमंत्री   बनाने की  योजना खटाई  में  पड़  सकती   थी .भले  आज  यह  बात  रहस्य के गर्भ में छुपी  हो . लेकिन   एक दिन  सोनिया   का  भंडा जरुर  फूट   जायेगा .

1-प्रियंका रोबर्ट शादी का कारण

रॉबर्ट और प्रियंका की शादी सन 1997 में हुई थी .लेकिन अगर कोई रॉबर्ट को ध्यान से देखे तो यह बात सोचेगा कि सोनिया जैसी चालाक और घाट घाट पानी पीने वाली औरत ने रॉबर्ट जैसे कुरूप और साधारण व्यक्ति से प्रियंका की शादी कैसे करवा दी ? क्या उसे प्रियंका के लिए कोई उपयुक्त वर नहीं मिला , और यह शादी जल्दी में और चुपचाप क्यों की गयी . वास्तव में सोनिया ने रॉबर्ट से प्रियंका की शादी अपनी पोल खुलने के डर से की थी . क्योंकि जिस समय सोनिया इंगलैंड में एक कैंटीन में बार गर्ल थी . उसी समय उसी जगह रोबट की माँ मौरीन (Maureen) भी यही काम करती थी . मौरीन को सोनिया और माधव राव सिंधिया की रास लीला की बात पता थी ,जब वह उसी कैंटीन सोनिया उनको शराब पिलाया करती थी .मौरीन यह भी जानती थी कि किन किन लोगों के साथ सोनिया के अवैध सम्बन्ध थे .जब सोनिया राजिव गांन्धी के शादी करके दिल्ली आ गयी , तो कुछ समय बाद मौरीन भी दिल्ली में बस गयी . मौरीन जानती थी कि सोनिया सत्ता के लिए कुछ भी कर सकती है , क्योंकि जो भी व्यक्ति उसके खतरा बन सकता था सोनिया ने उसका पत्ता साफ कर दिया , जैसे संजय गांधी , माधव राव सिंधिया , राजेश पायलेट ,जितेन्द्र प्रसाद , बाल योगी , यहाँ तक लोग तो यह भी शक है कि राजीव गांधी की हत्या में सोनिया का भी हाथ है , वर्ना वह अपने पति के हत्यारों को माफ़ क्यों कर देती ?
चूँकि मौरीन का पति और रॉबर्ट का पिता राजेंदर वडरा पुराना जनसंघी था , और सोनिया को डर था कि अगर अपने पति के दवाब ने मौरीन अपना मुंह खोल देगी तो मुझे भारत पर हुकूमत करने और अपने नालायक कुपुत्र राहुल को प्रधान मंत्री बनाने में सफलता नहीं मिलेगी .इसी लिए सोनिया ने मौरीन के लडके रॉबर्ट की शादी प्रियंका से करवा दी .

2-जैसी माँ वैसी बेटी
इस बात से कोई भी व्यक्ति इनकार नहीं कर सकता कि जैसे गुण माँ में होते हैं , वैसे ही गुण बेटी में पाए जाते हैं .इसलिए जैसे सोनिया अपने कुपुत्र के सहारे सत्ता पर एकाधिकार बनाये रखना चाहती है , वैसे ही शादी के बाद प्रियंका ने पति साथ संपत्ति पर एकाधिकार जमानेके लिए वडरा परिवार के सभी सदस्यों को अपने रास्ते से हटा दिया .राजेंदर वडरा के दो पुत्र , रिचार्ड और रॉबर्ट और एक पुत्री मिशेल थे . और प्रियंका की शादी के बाद सभी एक एक कर मर गए या मार दिए गए .जैसे , मिशेल ( Michelle )सन 2001 में कार दुर्घटना में मारी गयी , रिचार्ड ( Richard )ने सन 2003 में आत्मह्त्या कर ली . और प्रियंका के ससुर सन 2009 में एक मोटेल में मरे हुए पाए गए थे . लेकिन इनकी मौत के कारणों की कोई जाँच नहीं कराई गयी ,और इसके बाद सोनिया ने रॉबर्ट को राष्ट्रपति और प्रधान मंत्री के बराबर का दर्जा इनाम के तौर पर दे दिया . तब इस अधिकार को पर जिस रॉबर्ट को कोई पडौसी भी नहीं जानता था , उसने मात्र आठ महीनों में करोड़ों की संपत्ति बना ली ,और कई कंपनियों का मालिक बन गया , साथ ही सैकड़ों एकड़ कीमती जमीने भी हथिया लीं .जिनका विवरण इस प्रकार है

3-रॉबर्ट की कंपनियाँ
आज से करीब 15 साल पहले रॉबर्ट ने ‘ आर्टेक्स -Artex ” नाम से एक फर्म बनायीं थी .जो हैडीक्राफ्ट की चीजों का व्यापर करती थी . लेकिन इस से कोई खास कमाई नहीं होती थी . लेकिन नवम्बर2007 से लेकर जून 2008 तक सिर्फ आठ ही महीनों में रॉबर्ट पांच बड़ी बड़ी कंपनियों का मालिक बन गया ,जिनका ब्यौरा इस प्रकार है ,
1.स्काई लाईट होस्पेटीलिटी प्रा . लि (Sky Light Hospitality). स्थापना 1 नवम्बर 2007 .पूंजी 5 लाख
2.स्काई लाईट रियल्टी प्रा .लि (Sky Light Realty( .स्थापना 16 नवम्बर 2007 . पूंजी 5 लाख
3.नार्थ इण्डिया आई टी पार्क प्रा .लि .(North India IT Parks) स्थापना 19 जून 2008 . पूंजी 25 लाख
4.रियल अर्थ एस्टेट प्रा .लि .(Real Earth Estates ) स्थापना 18 फरवरी 2008 पूंजी 10 लाख
5.ब्ल्यू ब्रीज ट्रेडिंग प्रा . लि (Blue Breeze Trading )स्थापना 1 नवम्बर 2007 पूंजी 5 लाख
इस विवरण के अनुसार रॉबर्ट वडरा के पास केवल 40 लाख रुपये की पूंजी थी . तब इतनी सी पूंजी से उसने करोड़ों की संपत्ति कैसे अर्जित कर ली ? जिनका विवरण इस प्रकार है
4-रॉबर्ट की संपत्तियां
लगता है कि रॉबर्ट वडरा ने प्रियंका से नहीं नोट छापने की मशीन से शादी की थी ,जभी तो केवल चालीस लाख की पूंजी से करोड़ों की जमीने और संपत्ति खरीद डाली . जिन में से जिनके बारे में लोगों ने पता कर लिया है उनका विवरण यह है ,जो उसकी बैलेंस शीट में दिया गया है ,
1.दिल्ली की हिल्टन गार्डन इन में पचास प्रतिशत हिस्सा – कीमत 31.7 करोड़ रूपया .
2.गुड़गाँव में 10000 वर्गफीट का फ़्लैट कीमत 89 लाख रुपये
3.गुड़गाँव के डी एल ऍफ़ के मेग्नोलिया में 7 फ़्लैट कीमत 5.2 करोड़ रुपये
4-दिल्ली के डी एल ऍफ़ के कैपिटल ग्रीन में 1 फ़्लैट कीमत 5 करोड़ रुपये
5-दिल्ली के ग्रेटर कैलाश में 1 फ़्लैट कीमत 1.2 करोड़ रुपये
6.बीकानेर में 161 एकड़ जमीन कीमत 1.2 करोड़ रुपये
7.बीकानेर में प्लाट क्षेत्रफल150 एकड़ 2.43 कीमत करोड़ रुपये
8.मानेसर में जमीन कीमत 15.38 करोड़ रुपये
9.महाराष्ट्र के पनवेल में जमीन कीमत 4.2 करोड़ रूपये
10.गुड़गाँव में जमीन कीमत 4 करोड़ रुपये
11.हसन पुर में जमीन कीमत 76 लाख रुपये
12.हरियाणा में जमीन कीमत 95 लाख रुपये
सोनिया का दामाद यानि प्रियंका का पति होने का क्या मतलब होता है ,यह रोबर्ट वडरा के जीवन शैली के स्तर से और उसकी आठ महीने की लगभग चालीस करोड़ की संपत्ति से साफ़ झलकता है , कुछ साल पहले जो व्यक्ति रेल का टिकट तक नहीं खरीद सकता था , आज बड़ी बड़ी लक्जरी कारों में शान से घूमता रहता है .पहले जो व्यक्ति किरणे वाले का उधार समय पे नहीं चूका सकता था , आज रोज बड़ी बड़ी महगी पार्टियाँ देता रहता है .इन सभी तथ्यों से एक ही सवाल उठता है कि दुनिया की सबसे बड़ी धूर्त और षडयंत्र कारी सोनिया को रॉबर्ट में कौन सी खूबी दिखाई दी , जिस से प्रभावित होकर उसने अचानक अपनी लड़की की शादी रॉबर्ट वडरा से करा दी . कहीं ऐसा तो नहीं कि रॉबर्ट वडरा की माँ मौरीन ने सोनिया की कमजोर नस को दबा दिया हो . जिस से सोनिया की भारत की तानाशाह और राहुल को देश का प्रधानमंत्री बनाने की योजना खटाई में पड़ सकती थी .भले आज यह बात रहस्य के गर्भ में छुपी हो . लेकिन एक दिन सोनिया का भंडा जरुर फूट जायेगा .

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Prithviraj Chauhan


हमारे हिंदुस्तान में हमारी शिक्षा प्रणाली ने हमें कभी भी सही तरीके से हमारा गौरव पूर्ण इतिहास हमें कभी नहीं बताया क्योंकि ये हमारे देश और हम सब का दुर्भाग्य है, हमें कभी भी ये नहीं पता चल सका की हमारे अपने देश में लोग कैसे थे या फिर कितनो ने राज किया, ये सारी बातें कुछ ही लोगो को पता होगी। मुझे याद है की मैं जब पांचवी कक्षा में पहुंचा था तब से लेकर दसवी तक मैं अगर अपने स्वतंत्रता सेनानियों को छोड़ दूं तो और किसी भी शाषक के बारे में कहीं नहीं पढ़ा था, बल्कि मैं अमेरिका। पेरिस और पता नहीं किन किन देशों के बारे में पढ़ा था, जिनमे लिखा था की वो क्या पहनते थे, क्या खाते थे, मैंने उस समय भी अपने शिक्षकों से कहा था की हमें अपने देश के बारे तो कुछ पता नहीं और पेरिस के बारे में पढ़ रहे है, पर मेरे अध्यापक ने इसे हमारा दुर्भाग्य बताया और भारत की शिक्षा निति यही है ये बता कर मुझे समझाया था, खैर उसके बारे में तो मैं कुछ नहीं कर सकता हूँ।शुरुवात से ही हमें एक गलत इतिहास बताया गया है।एक लेखक ने तो महाराज पृथ्वीराज चौहान को गद्दार तक लिख दिया जिसकी गूँज संसद तक उठी और ये बात उस लेखक ने अपने निजी उपन्यास या किताब में नहीं लिखी बल्कि 11वी कक्षा के इतिहास के किताब में लिख दी थी, जिसे बाद में बदला गया। खैर सच्चाई कभी किसी से छुपती नहीं है। पृथ्वीराज चौहान के चरित्र के बारे में ऊँगली उठाने वाले निश्चित ही उनके बैरी ही है।
हमारे हिन्दुस्तान में पृथ्वीराज चौहान कोई परिचय या तारीफ का मोहताज़ नहीं है पर क्या आप उनकी इस वीरता की कहानी को अच्छी तरह से जानते है।।।।।मुझे लगता है की आप में से बहुत कोई को उनके जीवन के कुछ पहलू या बेहतरीन लम्हों को छोड़ कर बहुत ज्यादा कुछ नहीं पता होगा ।आप यहाँ पर उनके हर पहलू को अलग अलग पेज में जाकर पढ़ सकते है जो की लिंक से जोड़ दिए गए है। पृथ्वीराज चौहान के समय की कुछ खास जानकारी नहीं मिलती है चंदरबरदाई को छोड़ दे तो बहुत इतिहासकार का अपना अपना अलग अलग मत है। कुछ टीवी सीरियल में भी उनके चरित्रों को दर्शाया गया है पर उनके निर्देशकों ने कुछ ज्यादा ही छूट लेकर उन्हें आप सभों के सामने प्रस्तुत किया। खैर अब आप उनके जीवन का सारांश हमारे इस वेबसाइट में पढ़ सकते है। कृपया हमारा साथ दे और छोटी गलतियों को नज़र अंदाज़ करें।
मुसलमानों ने मुहम्मद गौरी से युद्ध के अतिरिक्त और कोई भी बात नहीं लिखी है। रासो में उनकी मौत के बारे में लिखी है की तेरायन की दूसरी युद्ध में उन्हें बंदी बना लिया गया और उन्हें गजनी ले जाया गया जिसे आप आगे विस्तार से पढेंगे वहां पर उनके साथ बहुत बुरी तरह से जुल्म किये गए, मुह्हमद गौरी के आंख नीचे करने के आदेश को जब पृथ्वी ने नहीं माना तब उनकी आंखे फोड़ दी गयी, तब चन्द्रबरदाई के कहने पर उसी हालत में शब्द भेदी बाण विद्या का इस्तेमाल करके उन्होंने मुहम्मद गौरी को मारा।और वे एक दुसरे को भी मार दिए। हमें दुःख तो इस बात का है की पृथ्वीराज चौहान को 900 सालो तक अपने देश की मिटटी नहीं नसीब हुई, कई बार भारत सरकार को उनके कब्र को भारत लाने की मांग की गयी पर यहाँ के नेताओं को अपनी जेब भरने से फुर्सत मिले तब तो, फिर जो काम भारत सरकार नहीं कर पायी वो एक राजपूत वीर ने सन 2001 में शेर सिंह राणा ने कर दिखाया, वो अफगानिस्तान जा कर उनकी अश्थियाँ को भारत वापस लाये और उन्हें गंगा में विसर्जित कर उनके आत्मा को शांति दी, इतना ही नहीं उन्होंने पृथ्वीराज की समाधी भी कानपूर के बेवर में बनवाया। वो अवश्य ही पृथ्वीराज के कोई पुत्र होंगे जिसने अगले जनम में अपने पुत्र होने का फर्ज निभाया।
इस वेबसाइट में हम आपके सामने पृथ्वीराज रासो पर लिखी हुई बातों के अनुसार ही जानकारियां दे रहे है पृथ्वीराज के पतन के साथ ही भारत के स्वतंत्रता का सुरज हमेशा के लिए अस्त जो गया। उसी समय से लोगो के मन में ये विश्वास है की मुसलमानों के आगमन से ही हमारे देश का ये हाल हुआ है पर गौर करने वाली बात ये है की अगर हम में उसी समय आपस में फूट न पड़ी होती तो क्या हमारे पास ये दिन देखने को आता। हमारी ही कमजोरी ने ही उन्हें यहाँ आने का आमंत्रण दिया। जो हो पर ये बात तो पक्की थी की जब तक हमारे देश में पृथ्वीराज चौहान और उनके दोस्तों के जैसे वीर हिन्दुस्तान के धरती पर थे मुसलमान इधर आँख उठा कर भी देख नहीं पाए पर उनके कुछ गलतियों के कारण ही हमारा हिन्दुस्तान परतंत्रता की जंजीर में लगभग 800 सालों तक बंध गया। पर एक बात अब भी है क्या हम इस सरकार में पूरी तरह से आजाद हो चुके है?????

 

http://hinduhistory.blogspot.com/2008/02/prithviraj-chauhan.html

http://prithvirajraso.info/

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Prithviraj Chauhan


Prithviraj Chauhan

Prithviraj Chauhan
Prithviraj Chauhan was born at Ajaymeru (Ajmer) in 1166 A.D. His father was Someshwar Chauhan and mother Karpuri Devi, a Kalachuri (Chedi) princess, daughter of Achalaraja of Tripuri.
Muhammad Ghori attacked India multiple times. First time he was routed in present day Gujarat by Rajputs. Mularaja-II was not even a teen yet and his mother organized the defences of Pattan. Battle was fought at Kayadara near Mount Abu, in 1178 A.D. and Ghori was resoundingly defeated. After this defeat he never entered India through Gujarat. In first battle of Taraori in 1191 Prithviraj Chauhan’s cavalry charged and routed the Ghurid cavalry and captured Ghori. Ghori begged for his life. Prithviraj allowed him to go despite his generals asking him not to do so.


Prithviraj Chauhan lived at Taragarh fort which was also known as Ajaymeru after which the town of Ajmer got its name.

Following year Ghori came again. Prithviraj advanced with his army and sent a letter to Ghori. In this letter Ghori was asked to return as he had been defeated the previous year and was spared his life. Ghori replied that he was in India on the orders of his brother, Ghiasuddin, and that he could only retreat after he got a word from his brother. This letter was sent in the evening and after sending the letter Ghori moved his camp back a few kilometers to feign retreat. On receiving this letter and seeing Muhammad move his camp back Prithviraj assumed that Ghori was not interested in fighting. Ghori also knew that rajputs did not fight in the night and only started fighting after sun had come up. (This is an ancient Kshatriya practice e.g Mahabharata was also fought mostly in day time). Ghori treacherously attacked in the early morning hours when Prithviraj and his army were sleeping and was able to win this war

The founder of the Gahadwala line was Govindchandra Gahadwala. He was an astute ruler and ruled from Kannauj. Most of North India, including the university town of Nalanda was a part of his kingdom. He stoutly defended his kingdom from further Muslims incursions. He instituted a tax for this purpose which was called Turushka Danda (i.e. tax to fight the Turushkas or Turks). His grandson was Jaichandra Gahadwala (Rathod) who played a tragic role in Indian History.

The Story of Prithviraj Chouhan and Mahmud Ghori

In Jaichand’s days, a rival Rajput clan had established itself in Delhi (Pithoragarh). The ruler there was Prithviraj Chouhan. Pritiviraj was a romantic, chivalrous and an extremely fearless person. After ceaseless military campaigns, Pritiviraj extended his original kingdom of Sambhar (Shakambara) to Rajasthan, Gujarat, and Eastern Punjab. He ruled from his twin capitals at Delhi and Ajmer. His fast rise caught the envy of the then powerful ruler Jaichandra Gahadwala and there was a lot of ill-feeling between the two.

Prithiviraj’s Love for Sanyogita – Jaichandra’s Daughter

The story of Prithviraj’s bold exploits spread far and wide in the country and he was the center of much discussion in the circle of the nobility. Sanyogita, the daughter of Jaichandra Gahadwala fell secretly in love with Prithiviraj and she started a secret poetic correspondence with him. Her father the haughty Jaichandra got wind of this and he decided to teach his daughter and her upstart lover a lesson. So he arranged a Swayamwara (a ceremony where a bride can select her husband from the assembled princes. She had the right to garland any prince and she became his queen. This is an ancient Hindu custom among Royalty). Jaichandra invited all the big and small princes of the country to Kannauj for the royal Swayamwara. But he deliberately ignored Prithiviraj.

To add insult to injury, he even made a statue of Prithiviraj and kept him as a dwarpala (doorman).

The Elopement of Sanyogita with Prithviraj

Prithviraj got to know of this and he confided his plans to his lover.
On the said day, Sanyogita walked down the aisle where the royals had assembled and bypassed all of them only to reach the door and garland the statue of Pritiviraj as a doorman. The assemblage was stunned at this brash act of hers. But what stunned them and her father Jaichandra was the next thing that happened.

Prithiviraj who was hiding behind the statue, also in the garb of a doorman, whisked Sanyogita away and put her up on his steed to make a fast getaway to his capital at Delhi

Chouhan-Rathod Warfare Leads to Weakening of both Rajput Kingdoms 

Jaichandra and his army gave earnest chase and in the resultant string of battles between the two kingdoms fought between 1189 and 1190, both of them sufferred heavily. While this drama was being enacted, another ruler also named Mahmud who was from Ghori in Afghanistan had grown powerful and had captured Ghazni and subsequently attacked the Ghaznavid Governor of Punjab and defeated him. The kingdom of Mahmud Ghori now stretched up to the domains of Prithiviraj Chouhan. A clash was inevitable

The 1st Battle of Tarain 1191 C.E. – Victory of Prithiviraj Chouhan

Mahmud Ghori threw the gauntlet by laying siege to the fortress of Bhatinda in East Punjab which was on the frontier of Prithiviraj’s domains. Prithviraj’s appeal for help from his father-in-law was scornfully rejected by the haughty Jaichandra. But undaunted Prithviraj marched on to Bhatinda and met his enemy at a place called Tarain (also called Taraori) near the ancient town of Thanesar. In face of the persistent Rajput attacks, the battle was won as the Muslim army broke ranks and fled leaving their general Mahmud Ghori as a prisoner in Pritiviraj’s hands.

Mahmud Ghori was brought in chains to Pithoragarh – Prithviraj’s capital and he begged his victor for mercy and release. Prithviraj’s ministers advised against pardoning the aggressor. But the chivalrous and valiant Prithviraj thought otherwise and respectfully released the vanquished Ghori.

The 2nd Battle of Tarain 1192 C.E. – Defeat of Prithiviraj Chouhan

The very next year Prithiviraj’s gesture was repaid by Ghori who re-attacked Prithiviraj with a stronger army and guilfully defeated him by attacking the Rajput army before daybreak. (The Hindus incidentally followed a hoary practice of battling only from sunrise up to sunset. Before Sunrise and after Sunset there was to be no fighting- as per a time honoured battle code).The defeated Prithiviraj was pursued up to his capital and in chains he was taken as a captive to Ghor in Afghanistan.

The Blinding of Prithviraj

The story of Prithiviraj does not end here. As a prisoner in Ghor he was presented before Mahmud, where he looked Ghori straight into the eye


Ghori ordered him to lower his eyes, whereupon a defiant Prithiviraj scornfully told him how he had treated Ghori as a prisoner and said that the eyelids of a Rajputs eyes are lowered only in death.On hearing this, Ghori flew into a rage and ordered that Prithviraj’s eyes be burnt with red hot iron rods

This heinous deed being done, Prithiviraj was regularly brought to the court to be taunted by Ghori and his courtiers. In those days Prithiviraj was joined by his former biographer Chand Bardai, who had composed a ballad-biography on Pritiviraj in the name of Prithviraj Raso (Songs of Prithviraj). Chand Bardai told Prithiviraj, that he should avenge Ghori’s betrayal and daily insults.

The Blind Prithviraj Avenges the Injustice done to him

The two got an opportunity when Ghori announced a game of Archery. On the advice of Chand Bardai, Prithviraj, who was then at court said he would also like to participate. On hearing his suggestion, the courtiers guffawed at him and he was taunted by Ghori as to how he could participate when he could not see. Whereupon, Prithiviraj told Mahmud Ghori to order him to shoot, and he would reach his target.

Ghori became suspicious and asked Prithviraj why he wanted Ghori himself to order and not anyone else. On behlaf of Prithiviraj, Chand Bardai told Ghori that he as a king would not accept orders from anyone other than a king. His ego satisfied, Mahmud Ghori agreed.

On the said day, Ghori sitting in his royal enclosure had Prithiviraj brought to the ground and had him unchained for the event. On Ghori’s ordering Prithviraj to shoot, we are told Prithiviraj turned in the direction from where he heard Ghori speak and struck Ghori dead with his arrow. This event is described by Chand Bardai in the couplet, “Dus kadam aggey, bees kadam daey, baitha hai Sultan. Ab mat chuko Chouhan, chala do apna baan.” (Ten feet ahead of you and twenty feet to your right, is seated the Sultan, do not now miss him Chouhan, release your baan – arrow).

Thus ended the story of the brave but unrealistic Prithviraj Chouhan – the last Hindu ruler of Delhi. Delhi was to remain under Muslim rule for the next 700 years till 1857 and under British rule till 1947. Those few Hindus who came close to liberating Delhi during the seven centuries of Muslim rule were Rana Sanga in 1527, Raja (Hemu) Vikramaditya in around 1565 (2nd battle of Panipat), and Shrimant Vishwas Rao who was the Peshwa’s son and was co-commander of the Maratha forces in the 3rd battle of Panipat in 1761. Metaphorically speaking, the next Hindu ruler to actually preside over Delhi was to be Dr. Rajendra Prasad, the first President of Independent India (and Jawarharlal Nehru – who was the President’s first Minister).

 

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गंगा दशहरा


गंगा दशहरा

ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को गंगा दशहरा मनाया जाता है. इस दिन पवित्र नदी गंगा जी भागीरथ द्वारा स्वर्ग लोग से पृ्थ्वी लोक पर अवतीर्ण हुई थी. इस दिन स्नान, दान, तर्पण से जीवन के समस्त पापों का नाश होता है.यही कारण है, कि इस पर्व का नाम दशहरा पडा है. पर्वों की श्रेणी में गंगा दशहरा श्रद्वा और विश्वास का पर्व है. प्राचीन पुराण के अनुसार इस तिथि में स्नान, दान करना विशेष कल्याणकारी रहता है. सभी नदियों में गंगा नदी को सबसे अधिक पवित्र और पापमोचिनी माना गया है. गंगा में डूबकी लगाने से मनुष्यों को मुक्ति प्राप्त होती है.

ऋषि भागीरथ ने अपनी कई वर्षो की कठोर तपस्या कर गंगा को पृ्थ्वी पर आने के लिये मनाया था. गंगा दशहरा पर्व पर प्यासे राहगीरों को शर्बल पिलाकर उनकी प्यास बुझाना कल्याणकारी माना जाता है. इस दिन भारत के विभिन्न क्षेत्रों में बडे-बडे मेलों का आयोजन किया जाता है. जगह-जगह पर प्याऊ लगाने के साथ साथ इस दिन छतरी, वस्त्र, जूते और गर्मी की ताप से बचने के सभी साधनों को दान में देना शुभ माना जाता है. यह सभी कार्य करने से व्यक्ति के पाप दूर होते है. और वह सदमार्ग की ओर अग्रसर होता है.

गंगा दशहरा

ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को गंगा दशहरा मनाया जाता है. इस दिन पवित्र नदी गंगा जी भागीरथ द्वारा स्वर्ग लोग से पृ्थ्वी लोक पर अवतीर्ण हुई थी. इस दिन स्नान, दान, तर्पण से जीवन के समस्त पापों का नाश होता है.यही कारण है, कि इस पर्व का नाम दशहरा पडा है. पर्वों की श्रेणी में गंगा दशहरा श्रद्वा और विश्वास का पर्व है. प्राचीन पुराण के अनुसार इस तिथि में स्नान, दान करना विशेष कल्याणकारी रहता है. सभी नदियों में गंगा नदी को सबसे अधिक पवित्र और पापमोचिनी माना गया है. गंगा में डूबकी लगाने से मनुष्यों को मुक्ति प्राप्त होती है.

ऋषि भागीरथ ने अपनी कई वर्षो की कठोर तपस्या कर गंगा को पृ्थ्वी पर आने के लिये मनाया था. गंगा दशहरा पर्व पर प्यासे राहगीरों को शर्बल पिलाकर उनकी प्यास बुझाना कल्याणकारी माना जाता है. इस दिन भारत के विभिन्न क्षेत्रों में बडे-बडे मेलों का आयोजन किया जाता है. जगह-जगह पर प्याऊ लगाने के साथ साथ इस दिन छतरी, वस्त्र, जूते और गर्मी की ताप से बचने के सभी साधनों को दान में देना शुभ माना जाता है. यह सभी कार्य करने से व्यक्ति के पाप दूर होते है. और वह सदमार्ग की ओर अग्रसर होता है.

गंगा दशहरा

ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को गंगा दशहरा मनाया जाता है. इस दिन पवित्र नदी गंगा जी भागीरथ द्वारा स्वर्ग लोग से पृ्थ्वी लोक पर अवतीर्ण हुई थी. इस दिन स्नान, दान, तर्पण से जीवन के समस्त पापों का नाश होता है.यही कारण है, कि इस पर्व का नाम दशहरा पडा है. पर्वों की श्रेणी में गंगा दशहरा श्रद्वा और विश्वास का पर्व है. प्राचीन पुराण के अनुसार इस तिथि में स्नान, दान करना विशेष कल्याणकारी रहता है. सभी नदियों में गंगा नदी को सबसे अधिक पवित्र और पापमोचिनी माना गया है. गंगा में डूबकी लगाने से मनुष्यों को मुक्ति प्राप्त होती है.

ऋषि भागीरथ ने अपनी कई वर्षो की कठोर तपस्या कर गंगा को पृ्थ्वी पर आने के लिये मनाया था. गंगा दशहरा पर्व पर प्यासे राहगीरों को शर्बल पिलाकर उनकी प्यास बुझाना कल्याणकारी माना जाता है. इस दिन भारत के विभिन्न क्षेत्रों में बडे-बडे मेलों का आयोजन किया जाता है. जगह-जगह पर प्याऊ लगाने के साथ साथ इस दिन छतरी, वस्त्र, जूते और गर्मी की ताप से बचने के सभी साधनों को दान में देना शुभ माना जाता है. यह सभी कार्य करने से व्यक्ति के पाप दूर होते है. और वह सदमार्ग की ओर अग्रसर होता है.

पतंजलि योगपीठ और भारत स्वाभिमान माँ गंगा पवित्रता की रक्षा के लिए कृत संकल्पित है और माँ गंगा की सफाई और स्वच्छता के लिये सदैव प्रयास करता रहेगा।‪#‎watchAasthaChannel5amTo8am‬

गंगा दशहरा ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को गंगा दशहरा मनाया जाता है. इस दिन पवित्र नदी गंगा जी भागीरथ द्वारा स्वर्ग लोग से पृ्थ्वी लोक पर अवतीर्ण हुई थी. इस दिन स्नान, दान, तर्पण से जीवन के समस्त पापों का नाश होता है.यही कारण है, कि इस पर्व का नाम दशहरा पडा है. पर्वों की श्रेणी में गंगा दशहरा श्रद्वा और विश्वास का पर्व है. प्राचीन पुराण के अनुसार इस तिथि में स्नान, दान करना विशेष कल्याणकारी रहता है. सभी नदियों में गंगा नदी को सबसे अधिक पवित्र और पापमोचिनी माना गया है. गंगा में डूबकी लगाने से मनुष्यों को मुक्ति प्राप्त होती है. ऋषि भागीरथ ने अपनी कई वर्षो की कठोर तपस्या कर गंगा को पृ्थ्वी पर आने के लिये मनाया था. गंगा दशहरा पर्व पर प्यासे राहगीरों को शर्बल पिलाकर उनकी प्यास बुझाना कल्याणकारी माना जाता है. इस दिन भारत के विभिन्न क्षेत्रों में बडे-बडे मेलों का आयोजन किया जाता है. जगह-जगह पर प्याऊ लगाने के साथ साथ इस दिन छतरी, वस्त्र, जूते और गर्मी की ताप से बचने के सभी साधनों को दान में देना शुभ माना जाता है. यह सभी कार्य करने से व्यक्ति के पाप दूर होते है. और वह सदमार्ग की ओर अग्रसर होता है. गंगा दशहरा ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को गंगा दशहरा मनाया जाता है. इस दिन पवित्र नदी गंगा जी भागीरथ द्वारा स्वर्ग लोग से पृ्थ्वी लोक पर अवतीर्ण हुई थी. इस दिन स्नान, दान, तर्पण से जीवन के समस्त पापों का नाश होता है.यही कारण है, कि इस पर्व का नाम दशहरा पडा है. पर्वों की श्रेणी में गंगा दशहरा श्रद्वा और विश्वास का पर्व है. प्राचीन पुराण के अनुसार इस तिथि में स्नान, दान करना विशेष कल्याणकारी रहता है. सभी नदियों में गंगा नदी को सबसे अधिक पवित्र और पापमोचिनी माना गया है. गंगा में डूबकी लगाने से मनुष्यों को मुक्ति प्राप्त होती है. ऋषि भागीरथ ने अपनी कई वर्षो की कठोर तपस्या कर गंगा को पृ्थ्वी पर आने के लिये मनाया था. गंगा दशहरा पर्व पर प्यासे राहगीरों को शर्बल पिलाकर उनकी प्यास बुझाना कल्याणकारी माना जाता है. इस दिन भारत के विभिन्न क्षेत्रों में बडे-बडे मेलों का आयोजन किया जाता है. जगह-जगह पर प्याऊ लगाने के साथ साथ इस दिन छतरी, वस्त्र, जूते और गर्मी की ताप से बचने के सभी साधनों को दान में देना शुभ माना जाता है. यह सभी कार्य करने से व्यक्ति के पाप दूर होते है. और वह सदमार्ग की ओर अग्रसर होता है. गंगा दशहरा ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को गंगा दशहरा मनाया जाता है. इस दिन पवित्र नदी गंगा जी भागीरथ द्वारा स्वर्ग लोग से पृ्थ्वी लोक पर अवतीर्ण हुई थी. इस दिन स्नान, दान, तर्पण से जीवन के समस्त पापों का नाश होता है.यही कारण है, कि इस पर्व का नाम दशहरा पडा है. पर्वों की श्रेणी में गंगा दशहरा श्रद्वा और विश्वास का पर्व है. प्राचीन पुराण के अनुसार इस तिथि में स्नान, दान करना विशेष कल्याणकारी रहता है. सभी नदियों में गंगा नदी को सबसे अधिक पवित्र और पापमोचिनी माना गया है. गंगा में डूबकी लगाने से मनुष्यों को मुक्ति प्राप्त होती है. ऋषि भागीरथ ने अपनी कई वर्षो की कठोर तपस्या कर गंगा को पृ्थ्वी पर आने के लिये मनाया था. गंगा दशहरा पर्व पर प्यासे राहगीरों को शर्बल पिलाकर उनकी प्यास बुझाना कल्याणकारी माना जाता है. इस दिन भारत के विभिन्न क्षेत्रों में बडे-बडे मेलों का आयोजन किया जाता है. जगह-जगह पर प्याऊ लगाने के साथ साथ इस दिन छतरी, वस्त्र, जूते और गर्मी की ताप से बचने के सभी साधनों को दान में देना शुभ माना जाता है. यह सभी कार्य करने से व्यक्ति के पाप दूर होते है. और वह सदमार्ग की ओर अग्रसर होता है. पतंजलि योगपीठ और भारत स्वाभिमान माँ गंगा पवित्रता की रक्षा के लिए कृत संकल्पित है और माँ गंगा की सफाई और स्वच्छता के लिये सदैव प्रयास करता रहेगा।#watchAasthaChannel5amTo8am

गंगा दशहरा हिन्दुओं का एक प्रमुख त्योहार है। ज्येष्ठ शुक्ला दशमी को दशहरा कहते हैं। इसमें स्नान, दान, रूपात्मक व्रत होता है। स्कन्दपुराण में लिखा हुआ है कि, ज्येष्ठ शुक्ला दशमी संवत्सरमुखी मानी गई है इसमें स्नान और दान तो विशेष करके करें। किसी भी नदी पर जाकर अर्घ्य (पू‍जादिक) एवं तिलोदक (तीर्थ प्राप्ति निमित्तक तर्पण) अवश्य करें।
ऐसा करने वाला महापातकों के बराबर के दस पापों से छूट जाता है।

पुराणों के अनुसार गंगा दशहरा के दिन गंगा स्नान का विशेष महत्व है। इस दिन स्वर्ग से गंगा का धरती पर अवतरण हुआ था, इसलिए यह महापुण्यकारी पर्व माना जाता है। गंगा दशहरा के दिन सभी गंगा मंदिरों में भगवान शिव का अभिषेक किया जाता है। वहीं इस दिन मोक्षदायिनी गंगा का पूजन-अर्चना भी किया जाता है।

गंगा दशहरे का महत्व –
भगीरथी की तपस्या के बाद जब गंगा माता धरती पर आती हैं उस दिन ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की दशमी थी. गंगा माता के धरती पर अवतरण के दिन को ही गंगा दशहरा के नाम से पूजा जाना जाने लगा. इस दिन गंगा नदी में खड़े होकर जो गंगा स्तोत्र पढ़ता है वह अपने सभी पापों से मुक्ति पाता है. स्कंद पुराण में दशहरा नाम का गंगा स्तोत्र दिया हुआ है.
गंगा दशहरे के दिन श्रद्धालु जन जिस भी वस्तु का दान करें उनकी संख्या दस होनी चाहिए और जिस वस्तु से भी पूजन करें उनकी संख्या भी दस ही होनी चाहिए. ऎसा करने से शुभ फलों में और अधिक वृद्धि होती है.
गंगा दशहरे का फल –
ज्येष्ठ शुक्ल दशमी के दिन गंगा स्नान करने से व्यक्ति के दस प्रकार के पापों का नाश होता है. इन दस पापों में तीन पाप कायिक, चार पाप वाचिक और तीन पाप मानसिक होते हैं. इन सभी से व्यक्ति को मुक्ति मिलती है.


गंगा दशहरा

ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को गंगा दशहरा मनाया जाता है. इस दिन पवित्र नदी गंगा जी भागीरथ द्वारा स्वर्ग लोग से पृ्थ्वी लोक पर अवतीर्ण हुई थी. इस दिन स्नान, दान, तर्पण से जीवन के समस्त पापों का नाश होता है.यही कारण है, कि इस पर्व का नाम दशहरा पडा है. पर्वों की श्रेणी में गंगा दशहरा श्रद्वा और विश्वास का पर्व है. प्राचीन पुराण के अनुसार इस तिथि में स्नान, दान करना विशेष कल्याणकारी रहता है. सभी नदियों में गंगा नदी को सबसे अधिक पवित्र और पापमोचिनी माना गया है. गंगा में डूबकी लगाने से मनुष्यों को मुक्ति प्राप्त होती है.

ऋषि भागीरथ ने अपनी कई वर्षो की कठोर तपस्या कर गंगा को पृ्थ्वी पर आने के लिये मनाया था. गंगा दशहरा पर्व पर प्यासे राहगीरों को शर्बल पिलाकर उनकी प्यास बुझाना कल्याणकारी माना जाता है. इस दिन भारत के विभिन्न क्षेत्रों में बडे-बडे मेलों का आयोजन किया जाता है. जगह-जगह पर प्याऊ लगाने के साथ साथ इस दिन छतरी, वस्त्र, जूते और गर्मी की ताप से बचने के सभी साधनों को दान में देना शुभ माना जाता है. यह सभी कार्य करने से व्यक्ति के पाप दूर होते है. और वह सदमार्ग की ओर अग्रसर होता है.

गंगा दशहरा

ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को गंगा दशहरा मनाया जाता है. इस दिन पवित्र नदी गंगा जी भागीरथ द्वारा स्वर्ग लोग से पृ्थ्वी लोक पर अवतीर्ण हुई थी. इस दिन स्नान, दान, तर्पण से जीवन के समस्त पापों का नाश होता है.यही कारण है, कि इस पर्व का नाम दशहरा पडा है. पर्वों की श्रेणी में गंगा दशहरा श्रद्वा और विश्वास का पर्व है. प्राचीन पुराण के अनुसार इस तिथि में स्नान, दान करना विशेष कल्याणकारी रहता है. सभी नदियों में गंगा नदी को सबसे अधिक पवित्र और पापमोचिनी माना गया है. गंगा में डूबकी लगाने से मनुष्यों को मुक्ति प्राप्त होती है.

ऋषि भागीरथ ने अपनी कई वर्षो की कठोर तपस्या कर गंगा को पृ्थ्वी पर आने के लिये मनाया था. गंगा दशहरा पर्व पर प्यासे राहगीरों को शर्बल पिलाकर उनकी प्यास बुझाना कल्याणकारी माना जाता है. इस दिन भारत के विभिन्न क्षेत्रों में बडे-बडे मेलों का आयोजन किया जाता है. जगह-जगह पर प्याऊ लगाने के साथ साथ इस दिन छतरी, वस्त्र, जूते और गर्मी की ताप से बचने के सभी साधनों को दान में देना शुभ माना जाता है. यह सभी कार्य करने से व्यक्ति के पाप दूर होते है. और वह सदमार्ग की ओर अग्रसर होता है.

गंगा दशहरा

ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को गंगा दशहरा मनाया जाता है. इस दिन पवित्र नदी गंगा जी भागीरथ द्वारा स्वर्ग लोग से पृ्थ्वी लोक पर अवतीर्ण हुई थी. इस दिन स्नान, दान, तर्पण से जीवन के समस्त पापों का नाश होता है.यही कारण है, कि इस पर्व का नाम दशहरा पडा है. पर्वों की श्रेणी में गंगा दशहरा श्रद्वा और विश्वास का पर्व है. प्राचीन पुराण के अनुसार इस तिथि में स्नान, दान करना विशेष कल्याणकारी रहता है. सभी नदियों में गंगा नदी को सबसे अधिक पवित्र और पापमोचिनी माना गया है. गंगा में डूबकी लगाने से मनुष्यों को मुक्ति प्राप्त होती है.

ऋषि भागीरथ ने अपनी कई वर्षो की कठोर तपस्या कर गंगा को पृ्थ्वी पर आने के लिये मनाया था. गंगा दशहरा पर्व पर प्यासे राहगीरों को शर्बल पिलाकर उनकी प्यास बुझाना कल्याणकारी माना जाता है. इस दिन भारत के विभिन्न क्षेत्रों में बडे-बडे मेलों का आयोजन किया जाता है. जगह-जगह पर प्याऊ लगाने के साथ साथ इस दिन छतरी, वस्त्र, जूते और गर्मी की ताप से बचने के सभी साधनों को दान में देना शुभ माना जाता है. यह सभी कार्य करने से व्यक्ति के पाप दूर होते है. और वह सदमार्ग की ओर अग्रसर होता है.

पतंजलि योगपीठ और भारत स्वाभिमान माँ गंगा पवित्रता की रक्षा के लिए कृत संकल्पित है और माँ गंगा की सफाई और स्वच्छता के लिये सदैव प्रयास करता रहेगा।

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गंगा दशहरा प्रारम्भ : 26 मई, समाप्त : 4 जून

मां गंगा की महिमा
गंगा दशहरा प्रारम्भ : 26 मई, समाप्त : 4 जून
गंगा
नदी उत्तर भारतकी केवल जीवनरेखा नहीं, अपितु हिंदू धर्मका सर्वोत्तम तीर्थ
है । ‘आर्य सनातन वैदिक संस्कृति’ गंगाके तटपर विकसित हुई, इसलिए गंगा
हिंदुस्थानकी राष्ट्ररूपी अस्मिता है एवं भारतीय संस्कृतिका मूलाधार है ।
इस कलियुगमें श्रद्धालुओंके पाप-ताप नष्ट हों, इसलिए ईश्वरने उन्हें इस
धरापर भेजा है । वे प्रकृतिका बहता जल नहीं; अपितु सुरसरिता (देवनदी) हैं ।
उनके प्रति हिंदुओंकी आस्था गौरीशंकरकी भांति सर्वोच्च है । गंगाजी
मोक्षदायिनी हैं; इसीलिए उन्हें गौरवान्वित करते हुए पद्मपुराणमें (खण्ड ५,
अध्याय ६०, श्लोक ३९) कहा गया है, ‘सहज उपलब्ध एवं मोक्षदायिनी गंगाजीके
रहते विपुल धनराशि व्यय (खर्च) करनेवाले यज्ञ एवं कठिन तपस्याका क्या लाभ
?’ नारदपुराणमें तो कहा गया है, ‘अष्टांग योग, तप एवं यज्ञ, इन सबकी
अपेक्षा गंगाजीका निवास उत्तम है । गंगाजी भारतकी पवित्रताकी सर्वश्रेष्ठ
केंद्रबिंदु हैं, उनकी महिमा अवर्णनीय है ।’
ganga dashahara
मां गंगा का #ब्रह्मांड में उत्पत्ति
‘वामनावतारमें
श्रीविष्णुने दानवीर बलीराजासे भिक्षाके रूपमें तीन पग भूमिका दान मांगा ।
राजा इस बातसे अनभिज्ञ था कि श्रीविष्णु ही वामनके रूपमें आए हैं, उसने
उसी क्षण वामनको तीन पग भूमि दान की । वामनने विराट रूप धारण कर पहले पगमें
संपूर्ण पृथ्वी तथा दूसरे पगमें अंतरिक्ष व्याप लिया । दूसरा पग उठाते समय
वामनके ( #श्रीविष्णुके) बाएं पैरके अंगूठेके धक्केसे ब्रह्मांडका
सूक्ष्म-जलीय कवच (टिप्पणी १) टूट गया । उस छिद्रसे गर्भोदककी भांति
‘ब्रह्मांडके बाहरके सूक्ष्म-जलनेब्रह्मांडमें प्रवेश किया । यह सूक्ष्म-जल
ही गंगा है ! गंगाजीका यह प्रवाह सर्वप्रथम सत्यलोकमें गया ।ब्रह्मदेवने
उसे अपने कमंडलु में धारण किया । तदुपरांत सत्यलोकमें ब्रह्माजीने अपने
कमंडलुके जलसे श्रीविष्णुके चरणकमल धोए । उस जलसे गंगाजीकी उत्पत्ति हुई ।
तत्पश्चात गंगाजी की यात्रा सत्यलोकसे क्रमशः #तपोलोक, #जनलोक, #महर्लोक,
इस मार्गसे #स्वर्गलोक तक हुई ।
पृथ्वी पर उत्पत्ति
 #सूर्यवंशके राजा सगरने #अश्वमेध यज्ञ आरंभ किया । उन्होंने दिग्विजयके
लिए यज्ञीय अश्व भेजा एवं अपने ६० सहस्त्र पुत्रोंको भी उस अश्वकी रक्षा
हेतु भेजा । इस यज्ञसे भयभीत इंद्रदेवने यज्ञीय अश्वको कपिलमुनिके आश्रमके
निकट बांध दिया । जब सगरपुत्रोंको वह अश्व कपिलमुनिके आश्रमके निकट प्राप्त
हुआ, तब उन्हें लगा, ‘कपिलमुनिने ही अश्व चुराया है ।’ इसलिए सगरपुत्रोंने
ध्यानस्थ कपिलमुनिपर आक्रमण करनेकी सोची । कपिलमुनिको अंतर्ज्ञानसे यह बात
ज्ञात हो गई तथा अपने नेत्र खोले । उसी क्षण उनके नेत्रोंसे प्रक्षेपित
तेजसे सभी सगरपुत्र भस्म हो गए । कुछ समय पश्चात सगरके प्रपौत्र राजा
अंशुमनने सगरपुत्रोंकी मृत्युका कारण खोजा एवं उनके उद्धारका मार्ग पूछा ।
कपिलमुनिने अंशुमनसे कहा, ‘`गंगाजीको स्वर्गसे भूतलपर लाना होगा ।
सगरपुत्रोंकी अस्थियोंपर जब गंगाजल प्रवाहित होगा, तभी उनका उद्धार होगा
!’’ मुनिवरके बताए अनुसार गंगाको पृथ्वीपर लाने हेतु अंशुमनने तप आरंभ किया
।’  ‘अंशुमनकी मृत्युके पश्चात उसके सुपुत्र राजा दिलीपने भी गंगावतरणके
लिए तपस्या की । #अंशुमन एवं दिलीपके सहस्त्र वर्ष तप करनेपर भी गंगावतरण
नहीं हुआ; परंतु तपस्याके कारण उन दोनोंको स्वर्गलोक प्राप्त हुआ ।’
(वाल्मीकिरामायण, काण्ड १, अध्याय ४१, २०-२१)
‘राजा
दिलीपकी #मृत्युके पश्चात उनके पुत्र राजा भगीरथने कठोर तपस्या की । उनकी
इस तपस्यासे प्रसन्न होकर गंगामाताने भगीरथसे कहा, ‘‘मेरे इस प्रचंड
प्रवाहको सहना पृथ्वीके लिए कठिन होगा । अतः तुम भगवान शंकरको प्रसन्न करो
।’’ आगे भगीरथकी घोर तपस्यासे भगवान शंकर प्रसन्न हुए तथा भगवान शंकरने
गंगाजीके प्रवाहको जटामें धारण कर उसे पृथ्वीपर छोडा । इस प्रकार हिमालयमें
अवतीर्ण गंगाजी भगीरथके पीछे-पीछे #हरद्वार, प्रयाग आदि स्थानोंको पवित्र
करते हुए बंगालके उपसागरमें (खाडीमें) लुप्त हुईं ।’
ज्येष्ठ
मास, शुक्ल पक्ष, दशमी तिथि, भौमवार (मंगलवार) एवं हस्त नक्षत्रके शुभ
योगपर #गंगाजी स्वर्गसे धरतीपर अवतरित हुईं ।  जिस दिन #गंगा पृथ्वी पर
अवतरित हुईं वह दिन ‘गंगा दशहरा’ के नाम से जाना जाता है ।
जगद्गुरु
आद्य शंकराचार्यजी, जिन्होंने कहा है : एको ब्रह्म द्वितियोनास्ति ।
द्वितियाद्वैत भयं भवति ।। उन्होंने भी ‘गंगाष्टक’ लिखा है, गंगा की महिमा
गायी है । रामानुजाचार्य, रामानंद स्वामी, चैतन्य महाप्रभु और स्वामी
रामतीर्थ ने भी गंगाजी की बड़ी महिमा गायी है । कई साधु-संतों,
अवधूत-मंडलेश्वरों और जती-जोगियों ने गंगा माता की कृपा का अनुभव किया है,
कर रहे हैं तथा बाद में भी करते रहेंगे ।
अब
तो विश्व के #वैज्ञानिक भी गंगाजल का परीक्षण कर दाँतों तले उँगली दबा रहे
हैं ! उन्होंने दुनिया की तमाम नदियों के जल का परीक्षण किया परंतु गंगाजल
में रोगाणुओं को नष्ट करने तथा आनंद और सात्त्विकता देने का जो अद्भुत गुण
है, उसे देखकर वे भी आश्चर्यचकित हो उठे ।
 #हृषिकेश में स्वास्थ्य-अधिकारियों ने पुछवाया कि यहाँ से हैजे की कोई खबर
नहीं आती, क्या कारण है ? उनको बताया गया कि यहाँ यदि किसीको हैजा हो जाता
है तो उसको गंगाजल पिलाते हैं । इससे उसे दस्त होने लगते हैं तथा हैजे के
कीटाणु नष्ट हो जाते हैं और वह स्वस्थ हो जाता है । वैसे तो हैजे के समय
घोषणा कर दी जाती है कि पानी उबालकर ही पियें । किंतु गंगाजल के पान से तो
यह रोग मिट जाता है और केवल हैजे का रोग ही मिटता है ऐसी बात नहीं है, अन्य
कई रोग भी मिट जाते हैं । तीव्र व दृढ़ श्रद्धा-भक्ति हो तो गंगास्नान व
गंगाजल के पान से जन्म-मरण का रोग भी मिट सकता है ।
सन्
1947 में जलतत्त्व विशेषज्ञ कोहीमान भारत आया था । उसने वाराणसी से
#गंगाजल लिया । उस पर अनेक परीक्षण करके उसने विस्तृत लेख लिखा, जिसका सार
है – ‘इस जल में कीटाणु-रोगाणुनाशक विलक्षण शक्ति है ।’
दुनिया
की तमाम #नदियों के जल का विश्लेषण करनेवाले बर्लिन के डॉ. जे. ओ. लीवर ने
सन् 1924 में ही गंगाजल को विश्व का सर्वाधिक स्वच्छ और
#कीटाणु-रोगाणुनाशक जल घोषित कर दिया था ।
‘आइने
अकबरी’ में लिखा है कि ‘अकबर गंगाजल मँगवाकर आदरसहित उसका पान करते थे ।
वे गंगाजल को अमृत मानते थे ।’ औरंगजेब और मुहम्मद तुगलक भी गंगाजल का पान
करते थे । शाहनवर के नवाब केवल गंगाजल ही पिया करते थे ।
कलकत्ता
के हुगली जिले में पहुँचते-पहुँचते तो बहुत सारी नदियाँ, झरने और नाले
गंगाजी में मिल चुके होते हैं । अंग्रेज यह देखकर हैरान रह गये कि हुगली
जिले से भरा हुआ गंगाजल दरियाई मार्ग से यूरोप ले जाया जाता है तो भी कई-कई
दिनों तक वह बिगड़ता नहीं है । जबकि यूरोप की कई बर्फीली नदियों का पानी
हिन्दुस्तान लेकर आने तक खराब हो जाता है ।
अभी रुड़की विश्वविद्यालय के #वैज्ञानिक कहते हैं कि ‘गंगाजल में जीवाणुनाशक और हैजे के कीटाणुनाशक तत्त्व विद्यमान हैं ।’
फ्रांसीसी
चिकित्सक हेरल ने देखा कि गंगाजल से कई रोगाणु नष्ट हो जाते हैं । फिर
उसने गंगाजल को कीटाणुनाशक औषधि मानकर उसके इंजेक्शन बनाये और जिस रोग में
उसे समझ न आता था कि इस रोग का कारण कौन-से कीटाणु हैं, उसमें गंगाजल के वे
इंजेक्शन रोगियों को दिये तो उन्हें लाभ होने लगा !
संत #तुलसीदासजी कहते हैं :
गंग सकल मुद मंगल मूला । सब सुख करनि हरनि सब सूला ।।
(श्रीरामचरित. अयो. कां. : 86.2)
सभी
सुखों को देनेवाली और सभी शोक व दुःखों को हरनेवाली माँ गंगा के तट पर
स्थित तीर्थों में पाँच तीर्थ विशेष आनंद-उल्लास का अनुभव कराते हैं :
गंगोत्री, हर की पौड़ी (हरिद्वार),  #प्रयागराज त्रिवेणी, काशी और #गंगासागर
। #गंगादशहरे के दिन गंगा में गोता मारने से सात्त्विकता, प्रसन्नता और
विशेष पुण्यलाभ होता है ।
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