Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

यशवंती को जानते हैं..?

यशवंती…. नाम में ही यश है। कोंढाणा को हिंदवी स्वराज्य में फिर से जोड़ने वाली एक कड़ी थी यशवंती।

मराठे उत्तुंग सह्याद्री की गोद में पले थे। उसके ऊँचे-ऊँचे स्कंधों पर चढ़कर उन्होंने भगवा लहराया था। ‘गनिमी कावा’ माने छापामार युद्ध करते हुए ऊँचे दुर्गों पर साए की तरह चढ़ जाना उनके बाएँ हाथ का खेल था और इस खेल की बेजोड़ साथी होती थी उनकी घोरपड़ अर्थात् गोह।

तानाजी की गोह यशवंती.. गोह क्या, बिटिया सी प्यारी थी। गढ़ चढ़कर अपने मजबूत नाखून पथरीली दीवारों में रोपती। उसकी पीठ पर बंधी रस्सी के सहारे कोई वजन में हल्का मावळा सरपट गढ़ चढ़ जाता और साथियों के लिए डोर बांध देता और फिर गढ़ पर रणचंडी जो हुंकार भरती.. कि मुगल हों या आदिलशाही या कुतुबशाही… सब थर्राते। कहते कि शिवाजी और उसके मावळे आसमान से अचानक प्रकट होते हैं.. हवा में गायब होना जानते हैं!!!

तो तानाजी ने कोंढाणा विजय की मुहिम हाथ में ली। वह माघ वद्य अष्टमी की रात थी। तानाजी अपने साढ़े तीन सौ मावळो के साथ कोंढाणा की तलहटी पर खड़े थे।
(कोंढाणा की ऊंचाई का अंदाज़ा ऐसे लगाइए कि आज उसपर चढ़ना माउंटेनियरिंग/ट्रेकिंग में आता है।)

सही जगह देखकर तानाजी ने यशवंती को आगे किया.. “जा बये! गढ़ चढ़ जा.. स्वराज्य के लिए, स्वाभिमान के लिए यश लेकर आ।”

और इस बार यशवंती ने गढ़ चढ़ने से इनकार कर दिया! वह कुछ आगे बढ़ी, पलटकर लौट आई।

गोह का यूँ लौट आना मामूली बात न थी। मान्यता थी कि ये मूक प्राणी अपने स्वामी की मृत्यु को पहले ही सूंघ लेते और आगे बढ़ने से इनकार कर देते! साथी मावळो ने अपशकुन जानकर तानाजी को चेताया.. मृत्यु का भय बताया पर भय से पीछे हट जाए वह तानाजी कैसे!
तानाजी ने फिर से यशवंती को पुचकारा। अपने सम्मान की आन दी मगर वह जानवर तो अड़ा था अपने स्वामी के प्राणों की रक्षा के लिए!

और तब सिंह दहाड़ा- “यशवंती! अगर इस बार लौटकर आई तो तेरा यह बाप अपनी तलवार से तेरे टुकड़े-टुकड़े कर तुझे पकवा देगा।”

और फिर यशवंती कोंढाणा चढ़ी। पीछे आए साढ़े तीन सौ मावळे गढ़ पर मौजूद 5000 मुगलिया सैनिकों पर टूट पड़े।

शेष कथा केवल सुवर्णाक्षरों में लिखी जा सकती है। तानाजी के रक्त से कोंढाणा पावन हुआ। एक सिंह को वीरश्री देकर सिंहगढ़ बना…

लेकिन उस दिन गढ़ पर शिवबा ने अपना बचपन का साथी खो दिया था… जिजाऊ ने अपने एक और पुत्र को, मावळ ने विकट योद्धा और रायबा ने अपने पिता को खोया था।

और यशवंती? हम नहीं जानते कि अपने स्वामी के स्नेह स्पर्श से वंचित उस मूक प्राणी का क्या हुआ.. बस हमें यशवंती का नाम सुनकर हमारे दिवंगत पिता के कभी पहनकर उतारे हुए शर्ट पर सिर रखकर सोती हमारी (आप क्या कहेंगे उसे.. Pet?) अपू ध्यान आती है।

यशवंती की कहानी तानाजी फ़िल्म में है या नहीं, मुझे पता नहीं। कई इतिहासकार यशवंती को कोरी गप्प मानते हैं। लेकिन कुछ गाथाएँ वैसी ही चलती रहनी चाहिए… वे हमारी चेतना का प्रतिबिंब हैं।

मराठी जनमानस में यशवंती का स्थान लगभग वही है जो राजस्थान में महाराणा प्रताप के चेतक का है।

हम मूक पशुओं के प्रति भी कृतज्ञ होना जानते हैं। हम उन्हें भी अपनी गाथाओं में गूँथकर पीढ़ी दर पीढ़ी याद रखते चले जाते हैं…

हम किसी की नजर में असहिष्णु हैं तो होंगे! मगर राष्ट्र और धर्म के युद्ध में काम आने वाली एक पाटागोह भी हमें प्यारी है।

तानाजी की वीरगाथा अमर है…
और हमारी यशवंती भी।

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