Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

#दाह_संस्कार

क्या ये सम्भव है कि किसी व्यक्ति का जन्म तो एक वार हो किन्तु उसे वीरगति दो वार मिले और उसका अंतिम संस्कार तीन वार हो ?? ….

मारवाड़ (जोधपुर) के महाराजा गजसिंह जी राठौड़ ने किसी कारणवश नाराज़ हो कर अपने ज्येष्ठ पुत्र कुंवर अमरसिंह को अपने राज्य से निर्वासित कर दिया और अपने छोटे पुत्र कुंवर जसवंतसिंह को मारवाड़/जोधपुर का अगला शासक घोषित कर दिया ….

संकटकाल में अमरसिंह राठौड़ जब जोधपुर छोड़ के जाने लगे तो उनकी मदद को सर्वप्रथम दो हाथ उठे …. पहला हाथ हरसोलाव (नागौर) के जागीरदार ठाकुर बल्लूजी चम्पावत (राठौड़) का और दूसरा हाथ भावसिंह जी कुम्पावत (राठौड़) का ….

बल्लूजी ने अमरसिंह जी को वचन दिया कि हुकुम ये आपका विपत्तिकाल है इसलिए मैं साये की तरह आपका सदैव साथ दूंगा ….

समय ने करवट ली …. अमरसिंह जी राठौड़ की वीरता से आगरा का बादशाह शाहजहां परिचित था इसलिए उसने अमरसिंह जी को आगरा बुला के डेढ़-हजारी जात और ढाई-हजारी के मनसब के साथ नागौर रियासत का शासक नियुक्त कर दिया ….

अमरसिंह जी को मेढ़े लड़ाने का बहुत शौक था इसलिए नागौर में बढ़िया नस्ल के मेढ़े पाले जाने लगे और उन मेढो की भेड़ियों से रक्षा के लिए बारी-बारी नागौर के मारवाड़ी राठौड़ सरदारों की नियुक्ति की जाने लगी ….

मेढो की रखवाली के लिए जब हरसोलाव (नागौर) के राठौड़ सरदार बल्लूजी चम्पावत की बारी आयी तो उन्होंने अमरसिंह जी से कहा …. हुकुम मैं यहां विपत्तिकाल मैं आपका साथ देने आया था मेढो की रखवाली करने नहीं आया था और अब आपका विपत्तिकाल टल गया और सुकाल शुरू हो गया इसलिए मैं तो यहां से चला ….

इतना कह के बल्लूजी नागौर छोड़ के मेवाड़ महाराणा राजसिंह जी सिसोदिया के पास शरण लेने गए ….

बल्लूजी की वीरता और वचनबद्धता की ख्याति दूर-दूर तक फैली थी इसलिए मेवाड़ पहुंचते ही महाराणा राजसिंह जी ने उनको जागीर बख्शते हुए अपने दरबार मे ऊंचा ओहदा प्रदान किया ….

बल्लूजी की दिन-प्रतिदिन बढ़ती ख्याति से मेवाड़ के सरदारों के माथे पे चिंता की सलवटें उभरने लगी और वो बल्लूजी को दरबार से हटाने की योजना बनाने लगे ….

अपने सरदारों द्वारा बल्लूजी के विरुद्ध रोज़-रोज़ कान भरे जाने के बाद एक दिन महाराणा राजसिंह जी ने अपने दरबार में पिंजरे में कैद एक भूखे खूंखार शेर को बुलाया और बल्लूजी से कहा आज मैं आपकी वीरता देखना चाहता हूं ….

बल्लूजी ने अपनी तलवार म्यान से बाहर निकाल के अपने आसन पे रखी और बिना देर किए भूखे खूंखार शेर के पिंजरे में दाखिल हो गए ….

बल्लूजी को क्षण भर भी नहीं लगा और उन्होंने उस जंगली खतरनाक शेर को जबड़ों से पकड़ के चिर दिया ….

महाराणा राजसिंह जी सहित समूचा मेवाड़ दरबार बल्लूजी की वीरता देख के स्तब्ध रह गया ….

बल्लूजी ने पिंजरे से बाहर निकल के अपनी तलवार उठाई और हाथ जोड़ के विनम्रतापूर्वक मेवाड़ महाराणा राजसिंह जी से कहा …. हुकुम योद्धा की वीरता की परीक्षा रणभूमि में शत्रु से लड़वाकर ली जाती है निहत्थे जानवर से लड़वाकर नहीं ….

इतना कह कर बल्लूजी मेवाड़ छोड़कर वहां से प्रस्थान कर गए ….

महाराणा राजसिंह जी को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने बल्लूजी को वापस मनाने के लिए अपने प्रमुख सिसोदिया सरदारों को भेजा साथ ही बल्लूजी के लिए महाराणा साहब ने उपहारस्वरूप एक सुंदर बलिष्ठ घोड़ा भी भेजा ….

बल्लूजी महाराणा साहब द्वारा भेजा घोड़ा देख के प्रसन्न हुए और घोड़ा रखते हुए मेवाड़ी सरदारों से कहा …. जा के कह देना अपने राणा जी से आप पे जब विपत्तिकाल आये बल्लू को याद कर लेना मैं उनकी सहायता के लिए हाज़िर-नाजिर मिलूंगा ….

पूर्व में ऐसा ही एक वचन बल्लूजी ने नागौर नरेश राव अमरसिंह जी राठौड़ को दिया था और ऐसा ही दूसरा वचन आज उन्होंने मेवाड़ नरेश महाराणा राजसिंह जी सिसोदिया को दे दिया ….

समय अपनी गति से आगे बढ़ता जा रहा था ….

बादशाह शाहजहां ने ईसवी सन 1644 में हाथी की चरवाई पे टैक्स लगा दिया था ….

आगरा दरबार में बादशाह शाहजहां ने एक दिन अमरसिंह जी से हाथी की चरवाई के टैक्स की मांग की इसपे अमरसिंह जी ने कहा मैं तो आपको ऐसा कोई टैक्स नहीं दूंगा …. संपति के नाम पे मेरे पास मेरी ये तलवार है …. है दम तो इसे (तलवार को) ले लो ….

दरबार मे मौजूद बादशाह शाहजहां के साले और प्रमुख सेनानायक शलावत-खां ने ये वाक्या देख के नागौर नरेश राव अमरसिंह जी राठौड़ को गंवार कह के सम्बोधित किया ….

इधर शलावत-खां द्वारा अमरसिंह जी को गंवार कहना हुआ और उधर अमरसिंह जी ने अपनी तलवार के एक भरपूर वार से भरे दरबार में शलावत-खां की गर्दन को उसकी धड़ से जुदा कर दिया ….

आगरा दरबार में एकदम सन्नाटा पसर गया ….

बादशाह के दरबार में मौजूद मुगल और राजपूत शासक सकते में आ गए …. दरबार मे मौजूद बादशाह शाहजहां का पुत्र शहजादा औरंगजेब खौफ से अपने आसन में दुबक गया ….

अमरसिंह जी तलवार ले के अब मुगल तख्त पे विराजमान शाहजहां की छाती पे चढ़ने को आगे बढ़ने लगे …. बादशाह और अमरसिंह के बीच चंद कदमों का फासला रह गया था कि मुगल सैनिको ने अमरसिंह को घेर लिया ….

आगरा के किले में मौजूद मुगल सैनिकों को चीरते हुए अमरसिंह अपने घोड़े बहादुर पे सवार हुए और बहादुर को ऐसी एड़ लगाई कि घोड़ा बहादुर आगरा से नागौर आ के ही रुका ….

(महाराणा प्रताप के स्वामिभक्त घोड़े चेतक की तरह राजस्थान में अमरसिंह राठौड़ के घोड़े बहादुर का नाम भी आदर और सत्कार के साथ लिया जाता है) ….

अमरसिंह जी के सगे साले अर्जुनसिंह गौड़ ने शाहजहां के प्रलोभन में आ के अमरसिंह जी को दुबारा आगरा ले जा के आगरा दरबार मे धोखे से उनकी हत्या कर दी और शव को शाही पहरे में आगरे के किले में खुले में रखवा दिया ….

अमरसिंह जी की हत्या के समाचार नागौर पहुंचे तो उनकी एक रानी हाड़ी (बूंदी के हाड़ा शासकों की पुत्री) ने अमरसिंह जी की पार्थिव देह के साथ सत्ति होने की इच्छा जताई ….

किन्तु ….

हाड़ी सत्ति हो कैसे ?? …. अमरसिंह जी का शव तो आगरा किले में मुगलों की गिरफ्त में कैद पड़ा था ….

हाड़ी को अपने विश्वासपात्र हरसोलाव (नागौर) के राठौड़ सरदार बल्लूजी चम्पावत की याद आयी ….

अमरसिंह को विपत्तिकाल में साथ देने का अपना कौल (वचन) निभाने बल्लूजी मेवाड़ महाराणा द्वारा प्राप्त घोड़े पे सवार हो के अपने 500 नागौरी/मारवाड़ी साथियों के साथ आगरा कूच कर गए ….

कूटनीति से आगरा के किले में प्रवेश लेने के बाद बल्लूजी ने अमरसिंह जी के शव को अकेले मुगलों की कैद से निकाला और घोड़े पे सवार हो के किले के बुर्ज से नीचे छलांग लगा दी ….

बल्लूजी ने किले के बाहर मौजूद अपने नागौरी/मारवाड़ी राठोड़ों को अमरसिंह जी का शव सौंप के नागौर रवाना किया और अपने चंद मुट्ठी भर साथियों के साथ मुगल सेना को रोकने के लिए खुद दुबारा आगरा किले में प्रवेश कर गए ….

घोड़े की लगाम को मुंह मे दबाकर दोनों हाथों में तलवार ले के बल्लूजी मुगल सेना से भीड़ गए ….

आगरा का किला नागौरी राठोड़ों के रक्त से लाल हो गया …. मुगलों से लड़ते हुए बल्लूजी भी आगरा के किले में खेत हो गए ….

लेकिन ….

बल्लूजी ने मुगलों को अमरसिंह के शव के आसपास नहीं फटकने दिया ….

आगरा में यमुना नदी के तट पे सैन्य सम्मान के साथ बल्लूजी का दाह-संस्कार किया गया गया ….

(ये बल्लूजी की प्रथम वीरगति व प्रथम दाह-संस्कार था) ….

(आगरा के किले के सामने यमुना नदी के तट पे बल्लूजी की छतरी व उनके घोड़े की समाधि आज भी अडिग खड़ी है/बनी हुई है) ….

(आगरा के किले के मुख्य द्वार को अमरसिंह द्वार कहा जाता है) ….

समय एक वार फिर अपनी गति से आगे बढ़ने लगा ….

देबारी (मेवाड़) के मैदान में आज मेवाड़ महाराणा राजसिंह जी और मुगल बादशाह औरंगजेब की सेनाएं आमने-सामने डटी थी ….

संख्याबल में ज्यादा मुगल आज मुट्ठी भर मेवाड़ी शूरमाओं पे अत्यधिक भारी पड़ रहे थे ….

रणभूमि में विचलित महाराणा राजसिंह जी को आज बल्लूजी जी चम्पावत की याद आयी और विपत्तिकाल में साथ निभाने के बल्लूजी के वचन की याद आयी ….

देबारी की घाटी में मेवाड़ महाराणा राजसिंह जी आंखे बंद कर के और हाथ जोड़ के अरदास करते हैं …. काश आज बल्लूजी जैसे योद्धा मेवाड़ की और से लड़ रहे होते ….

कुछ पलों बाद मेवाड़ी और मुगल सेना भौचक्की रह गयी ….

मेवाड़ नरेश द्वारा दिये घोड़े पे सवार बल्लूजी चम्पावत दोनों हाथों में तलवार लिए मुगल सेना पे कहर ढा रहे हैं …. बल्लूजी जबरदस्त वीरता से युद्ध लड़ते हुए देबारी घाटी में मुगल सेना को चीरते चले जा रहे थे ….

देखते ही देखते मुगल सेना में हाहाकार मच गया ….

इस युद्ध में मेवाड़ की विजयी हुई …. देबारी घाटी की रणभूमि में बल्लूजी चम्पावत एक वार फिर दुबारा वीरगति को प्राप्त हो गए ….

मेवाड़ महाराणा राजसिंह जी ने सैन्य सम्मान के साथ एक वार पुनः बल्लूजी चम्पावत का दाह-संस्कार करवाया ….

(यह बल्लूजी का दूसरा दाह-संस्कार था …. साथ ही मेवाड़ महाराणा राजसिंह जी ने मेवाड़ की देबारी घाटी में बल्लूजी जी की दूसरी छतरी का निर्माण करवाया) ….

आज के भौतिकवादी युग में दुनिया में किसी के लिए भी यहां तक कि आप पाठकों के लिए भी ये घटना अविश्वसनीय हो सकती है ….

किन्तु ….

यह घटना बिल्कुल सत्य है ….

आगरा और देबारी में स्थित बल्लूजी की छतरी को कोई भी मित्र/पाठक पुष्टि के लिए जा के देख सकता है ….

अपने संकटकाल में बल्लूजी ने लाडनूँ जिला नागौर मारवाड़ (मेरे शहर) के एक ओसवाल बणिया के पास अपनी मुच्छ का एक बाल गिरवी रख के कुछ धन उधार लिया था ….

अपने जीवनकाल में लाडनूँ के इस बणिया से बल्लूजी उधार लिया हुआ धन लौटा के अपनी मुच्छ का वो बाल बंधक से छुड़वा नहीं पाये थे ….

बल्लूजी की छविं पीढ़ी के वंशज हरसोलाव (नागौर) के ठाकुर सूरतसिंह जी चम्पावत ने लाडनूँ के बणिया की छविं पीढ़ी को धन का भुगतान कर के बल्लूजी चम्पावत द्वारा गिरवी/बंधक रखे बाल को मुक्त करवाया/छुड़वाया ….

ठाकुर सूरतसिंह जी चम्पावत ने लाडनूँ से अपने पूर्वज बल्लूजी का बाल बंधक से छुड़वाकर उस बाल का सम्पूर्ण विधि-विधान से अंतिम-संस्कार करवाया ….

बल्लूजी के इस दाह-संस्कार में सारे बल्लुदासोत चम्पावत एकत्रित हुए तथा सम्पूर्ण विधि-विधान से बल्लूजी के तेरहवीं तक के सारे शोक के दस्तूर पूरे किए गए ….

(हरसोलाव/नागौर के महापराक्रमी शूरवीर योद्धा और वचन के पक्के ठाकुर बल्लूजी चम्पावत राठौड़ का ये तीसरा दाह-संस्कार था) ….

नागौर सहित सम्पूर्ण मेवाड़ और सम्पूर्ण मारवाड़ में बल्लूजी का नाम बड़े आदर व सत्कार से लिया जाता है ….

बल्लूजी ने जन्म भी एक वार लिया और शादी भी एक ही क्षत्राणी से की किन्तु वीरगति दो वार प्राप्त की और उनका अंतिम-संस्कार तीन वार हुआ ….

नागौर सहित समस्त राजपुताना के इतिहास में बल्लूजी की वीरता का अध्याय स्वर्णाक्षरों में अंकित है ….

राजस्थान के कण-कण में गोरा-बादल और बल्लूजी जैसे निष्ठावान योद्धा/सेनानायक/रणबांकुरे पैदा होते आये हैं ….

Posted in रामायण - Ramayan

#सुंदरकाणड सें जुङी 5 अहम बातें

1 :- सुंदरकाणड का नाम सुंदरकाणड क्यों रखा गया ?

हनुमानजी, सीताजी की खोज में लंका गए थें और लंका त्रिकुटाचल पर्वत पर बसी हुई थी ! त्रिकुटाचल पर्वत यानी यहां 3 पर्वत थें !

पहला सुबैल पर्वत,
जहां कें मैदान में युद्ध हुआ था !

दुसरा नील पर्वत,
जहां राक्षसों कें महल बसें हुए थें ! और

तीसरे पर्वत का नाम है सुंदर पर्वत, जहां अशोक वाटिका नीर्मित थी ! इसी वाटिका में हनुमानजी और सीताजी की भेंट हुई थी !

इस काण्ड की यहीं सबसें प्रमुख घटना थी , इसलिए इसका नाम सुंदरकाणड रखा गया है !

2 :- शुभ अवसरों पर ही सुंदरकाणड का पाठ क्यों ?

शुभ अवसरों पर गोस्वामी तुलसीदासजी द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस कें सुंदरकाणड का पाठ किया जाता हैं ! शुभ कार्यों की शुरूआत सें पहलें सुंदरकाणड का पाठ करनें का विशेष महत्व माना गया है !
जबकि किसी व्यक्ति कें जीवन में ज्यादा परेशानीयाँ हो , कोई काम नहीं बन पा रहा हैं, आत्मविश्वास की कमी हो या कोई और समस्या हो , सुंदरकाणड कें पाठ सें शुभ फल प्राप्त होने लग जाते है, कई ज्योतिषी या संत भी विपरित परिस्थितियों में सुंदरकाणड करनें की सलाह देते हैं !

3 :- जानिए सुंदरकाणड का पाठ विषेश रूप सें क्यों किया जाता हैं ?

माना जाता हैं कि सुंदरकाणड कें पाठ सें हनुमानजी प्रशन्न होतें है !
सुंदरकाणड कें पाठ में बजरंगबली की कृपा बहुत ही जल्द प्राप्त हो जाती हैं !
जो लोग नियमित रूप सें सुंदरकाणड का पाठ करतें हैं , उनके सभी दुख दुर हो जातें हैं , इस काण्ड में हनुमानजी नें अपनी बुद्धि और बल सें सीता की खोज की हैं !
इसी वजह सें सुंदरकाणड को हनुमानजी की सफलता के लिए याद किया जाता

4 :- सुंदरकाणड सें मिलता हैं मनोवैज्ञानिक लाभ ?

वास्तव में श्रीरामचरितमानस कें सुंदरकाणड की कथा सबसे अलग हैं , संपूर्ण श्रीरामचरितमानस भगवान श्रीराम कें गुणों और उनके पुरूषार्थ को दर्शाती हैं , सुंदरकाणड ऐक मात्र ऐसा अध्याय हैं जो श्रीराम कें भक्त हनुमान की विजय का काण्ड हैं !
मनोवैज्ञानिक नजरिए सें देखा जाए तो यह आत्मविश्वास और इच्छाशक्ति बढ़ाने वाला काण्ड हैं , सुंदरकाणड कें पाठ सें व्यक्ति को मानसिक शक्ति प्राप्त होती हैं , किसी भी कार्य को पुर्ण करनें कें लिए आत्मविश्वास मिलता हैं !

5 :- सुंदरकाणड सें मिलता है धार्मिक लाभ ?

सुंदरकाणड कें लाम सें मिलता हैं धार्मिक लाभ हनुमानजी की पूजा सभी मनोकामनाओं को पुर्ण करनें वालीं मानी गई हैं , बजरंगबली बहुत जल्दी प्रशन्न होने वालें देवता हैं , शास्त्रों में इनकी कृपा पाने के कई उपाय बताएं गए हैं , इन्हीं उपायों में सें ऐक उपाय सुंदरकाणड का पाठ करना हैं , सुंदरकाणड कें पाठ सें हनुमानजी कें साथ ही श्रीराम की भी विषेश कृपा प्राप्त होती हैं !

किसी भी प्रकार की परेशानी हो सुंदरकाणड कें पाठ सें दुर हो जाती हैं , यह ऐक श्रेष्ठ और सरल उपाय है , इसी वजह सें काफी लोग सुंदरकाणड का पाठ नियमित रूप सें करते हैं , हनुमानजी जो कि वानर थें , वे समुद्र को लांघकर लंका पहुंच गए वहां सीता की खोज की , लंका को जलाया सीता का संदेश लेकर श्रीराम के पास लौट आए , यह ऐक भक्त की जीत का काण्ड हैं , जो अपनी इच्छाशक्ति के बल पर इतना बड़ा चमत्कार कर सकता है , सुंदरकाणड में जीवन की सफलता के महत्वपूर्ण सूत्र भी दिए गए हैं , इसलिए पुरी रामायण में सुंदरकाणड को सबसें श्रेष्ठ माना जाता हैं , क्योंकि यह व्यक्ति में आत्मविश्वास बढ़ाता हैं , इसी वजह सें सुंदरकाणड का पाठ विषेश रूप सें किया जाता हैं !!

जय श्री राम !
जय श्री राम !
जय श्री राम !
जय श्री राम !
जय श्री राम !

जय जय जय सीयाराम !
सीयाराम जय जय राम !

सीता राम
सीता राम
सीता राम

जय श्री राम भक्त हनुमानजी नमो नमः !!

Posted in हिन्दू पतन

असम में एक ईसाई धर्मप्रचारक भेजे गए थे,
नाम था फादर क्रूज़
इन्हें असम के एक प्रभावशाली परिवार के लड़के को घर आकर अंग्रेजी पढ़ाने का अवसर मिला,
पादरी साहब धीरे-धीरे घर का निरीक्षण करने लगे,
उन्हें पता चल गया कि, बच्चे की दादी इस घर में सबसे प्रभाव वाली हैं,
इसलिए उनको यदि ईसा की शिक्षाओं के जाल में फंसाया जाए तो,
उनके माध्यम से पूरा परिवार
और फिर पूरा गा़व ईसाई बनाया जा सकता है!
पादरी साहब दादी मां को बताने लगे
कैसे ईसा कोढ़ी का कोढ़ ठीक कर देते थे,
कैसे वो नेत्रहीनों को नेत्र ज्योति देते थे, आदि-आदि !
दादी ने कहा, बेटा, हमारे “राम-कृष्ण” के चमत्कारों के आगे तो कुछ भी नहीं ये सब !
तुमने सुना है कि हमारे राम ने एक पत्थर का स्पर्श किया तो
वो जीवित स्त्री में बदल गई
राम जी के नाम के प्रभाव से पत्थर भी तैर जाता था पानी में,आज भी तैर रहे है
पादरी साहब खामोश हो जाते पर प्रयास जारी रखते अपना !
एक दिन पादरी साहब चर्च से केक लेकर आ गए और दादी को खाने को दिया,
पादरी साहब को विश्वास था कि दादी न खायेंगी
पर उसकी आशा के विपरीत दादी ने केक लिया और खा गई !
पादरी साहब आंखों में गर्वोक्त उन्माद भरे अट्टहास कर उठे,
दादी तुमने चर्च का प्रसाद खा लिया !
अब तुम ईसाई हो ,
दादी ने पादरी साहब के कान खींचते हुए कहा,
वाह रे गधे !
मुझे एक दिन केक खिलाया
तो मैं ईसाई हो गई
और मैं जो प्रतिदिन तुमको अपने घर का खिलाती ह़ू ,
तो तू हिन्दू क्यों नहीं हुआ ?
तू तो प्रतिदिन सनातन धर्म की इस आदि भूमि का
वायु ,जल लेता है
फिर तो तेरा रोम-रोम हिन्दू बन जाना चाहिए!

अपने स्वधर्म और
राष्ट्र को पथभ्रष्ट होने और
गलत दिशा में जाने से बचाने वाली
ये दादी मां थी
असम की
सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी “कमला देवी हजारिका

कौन जानता है इनको असम से बाहर ?
क्या हमारा कर्तव्य नहीं है कि, देश इनके बारे में जाने ?

साभार-अभिजीत सिंह

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

🙏🏻शुभ रात्रि🙏🏻
एक बार यात्रियों से भरी एक बस कहीं जा रही थी। अचानक मौसम बदला धुलभरी आंधी के बाद बारिश की बूंदे गिरने लगी बारिश तेज होकर तूफान मे बदल चुकी थी घनघोर अंधेरा छा गया भयंकर बिजली चमकने लगी बिजली कडककर बस की तरफ आती और वापस चली जाती ऐसा कई बार हुआ सब की सांसे ऊपर की ऊपर
और नीचे की नीचे।
ड्राईवर ने आखिरकार बस को एक बडे से पेड से करीब पचास कदम की दूरी पर रोक दी और यात्रियों से कहा कि इस बस मे कोई ऐसा यात्री बैठा है जिसकी मौत आज निश्चित है उसके साथ साथ कहीं हमे भी अपनी जिन्दगी से हाथ न धोना पडे इसलिए सभी यात्री एक एक कर जाओ और उस पेड के हाथ लगाकर आओ जो भी बदकिस्मत होगा उस पर बिजली गिर जाएगी और बाकी सब बच जाएंगे।
सबसे पहले जिसकी बारी थी उसको दो तीन यात्रियों ने जबरदस्ती धक्का देकर बस से नीचे उतारा वह धीरे धीरे पेड तक गया डरते डरते पेड के हाथ लगाया और भाग कर आकर बस मे बैठ गया।
ऐसे ही एक एक कर सब जाते और भागकर आकर बस मे बैठ चैन की सांस लेते। अंत मे केवल एक आदमी बच गया उसने सोचा तेरी मौत तो आज निश्चित है सब उसे किसी अपराधी की तरह देख रहे थे जो आज उन्हे अपने साथ ले मरता उसे भी जबरदस्ती बस से नीचे उतारा गया वह भारी मन से पेड के पास पहुँचा और जैसे ही पेड के
हाथ लगाया तेज आवाज से बिजली कडकी और बिजली बस पर गिर गयी बस धूं धूं कर जल उठी सब यात्री मारे गये सिर्फ उस एक को छोडकर जिसे सब बदकिस्मत मान रहे थे वो नही जानते थे कि उसकी वजह से ही सबकी जान बची हुई थी।
“दोस्तो हम सब अपनी सफलता का श्रेय खुद लेना चाहते है जबकि क्या पता हमारे साथ रहने वाले की वजह से हमे यह हासिल हो पाया हो।

Posted in कविता - Kavita - કવિતા

“👩पत्नी की फटकार” का महत्व- 😍😳🤣

पत्नी की फटकार सुनी जब,
तुलसी भागे छोड़ मकान l
राम चरित मानस रच डाला,
जग में बन गए भक्त महान ll

पत्नी छोड़ भगे थे जो जो,
वही बने विद्वान महान l
गौतम बुद्ध महावीर तीर्थंकर,
पत्नी छोड़ बने भगवान ll

पत्नी छोड़ जो भागे मोदी
हुए आज हैं पंत प्रधान l
अडवाणी ना छोड़ सके तो,
देख अभी तक हैं परेशान ll

नहीं किया शादी पप्पू ने,
नहीं सुनी पत्नी की तान l
इसीलिए फिरता है भटकता,
बन न सका नेता महान ll

हम भी पत्नी छोड़ न पाए,
इसीलिए तो हैं परेशान l
पत्नी छोड़ बनो सन्यासी,
पाओ मोक्ष और निर्वाण ll

कविता का केवल आनन्द लें, रिस्क केवल अपने दम पर लें…. क्योंकि, लेखक स्वयं लापता है
😂😍🤩😎🤓😳🤣

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

🚩 केवल पांच मिनट का समय 🚩
👍 शिक्षाप्रद लघु कथा👍
👹🙏😢👹🙏😢👹🙏😢थ

एक बार एक व्यक्ति को रास्ते में यमराज मिल गये वो व्यक्ति उन्हें पहचान नहीं सका। यमराज ने पीने के लिए व्यक्ति से पानी माँगा, बिना एक क्षण गवाए उसने पानी पिला दिया। पानी पीने के बाद यमराज ने बताया कि वो उसके प्राण लेने आये हैं
लेकिन चूँकि तुमने मेरी प्यास बुझाई है इसलिए मैं तुम्हें अपनी किस्मत बदलने का एक मौका देता हूँ |

यह कहकर यमराज ने एक डायरी देकर उस आदमी से कहा कि तुम्हारे पास 5 मिनट का समय है | इसमें तुम जो भी लिखोगे वही हो जाएगा लेकिन ध्यान रहे केवल 5 मिनट |

उस व्यक्ति ने डायरी खोलकर देखा तो उसने देखा कि पहले पेज पर लिखा था कि उसके पड़ोसी की लॉटरी निकलने वाली है और वह करोड़पति बनने वाला है | उसने वहां लिख दिया कि उसके पड़ोसी की लॉटरी न निकले |

अगले पेज पर लिखा था कि उसका एक दोस्त चुनाव जीतकर मंत्री बनने वाला है, तो उसने लिख दिया कि उसका दोस्त चुनाव हार जाए |

इस तरह, वह पेज पलटता रहा और, अंत में उसे अपना पेज दिखाई दिया | जैसे ही उसने कुछ लिखने के लिए अपना पेन उठाया यमराज ने उस व्यक्ति के हाथ से डायरी ले ली और कहा वत्स तुम्हारा पांच मिनट का समय पूरा हुआ , अब कुछ नहीं हो सकता |

तुमने अपना पूरा समय दूसरों का बुरा करने में व्यतीत दिया और अपना जीवन खतरे में डाल दिया | अंतत: तुम्हारा अंत निश्चित है |

यह सुनकर वह व्यक्ति बहुत पछताया लेकिन सुनहरा मौका उसके हाथ से निकल चुका था |
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शिक्षा – यदि ईश्वर ने आपको कोई शक्ति प्रदान की है तो कभी किसी का बुरा न सोचे, और न ही बुरा करें | दूसरों का भला करने वाला सदा सुखा रहता है और, ईश्वर की कृपा सदा उस पर बनी रहती है |
🙏🙏सादर जय जिनेन्द्र जी 🙏🙏

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अरुण सुक्ला

भीषण अंधेरी रात और लताओं से घिरा वन, एक शिला की टेक लेकर अपनी थकान मिटाने के लिए अघोरी रुका। शिला से आवाज आई- “सुनो, ध्यान से मेरी बात सुनो। 8 दशक पूर्व की बात है, दक्षिण पूर्व एशिया और शेष विश्व के छोटे छोटे द्वीपों के लाखों गिरमिटिया मजदूर और उनके बीच कुछ निर्वासित क्रांतिकारी, कवि और विद्वान जीवित होकर भी शव की भांति पड़े थे। उनके निश्चेष्ट, निरुद्देश्य अस्तित्व को किसी अघोरी की प्रतीक्षा थी जो व्योम से जीवात्मा का आह्वान करके उनके भीतर आत्मा का संचार कर दे।”

अघोरी ने पूछा- आप कौन हैं महापुरुष?

उत्तर मिला- “मैं मलय से थाईलैंड और जापान की सीमाओं तक घूमता रहा; पर योजनाओं का क्रियान्वयन नही हो पाया। भीड़ जुटती थी, सभी मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए व्यग्र थे पर भीड़ का कोई निर्णय नही होता, भीड़ का कोई एक लक्ष्य नही होता अतः भीड़ ने कोई क्रांति नही की। ऐसे में एक अवतारी मेरे सामने प्रकट हुआ और उसने वह कर दिया जो दुनिया की सबसे शक्तिशाली सरकारें भी नही कर पाई। उस सुभाष चंद्र बोस ने भीड़ के अंदर आत्मा का संचार कर दिया और पलक झपकते ही भीड़ एक अनुशासित सेना बन गई।”

“तुम्हें क्या लगता है अघोरी, क्या संसार के बड़े परिवर्तन किसी भीड़ ने किए? भीड़ कभी कुछ नही करती, संसार के सबसे बड़े कार्य कुछ सिरफिरे अकेले लोगों ने ही किए हैं। संसार के सबसे बड़े भाड़ अकेले चनों ने ही फोड़े हैं। फ्लेमिंग न होता तो चिकित्सा विज्ञान वह नही होता जो आज है। पास्चर नही होते तो जीवन और रोगों को नई दृष्टि से हमने देखा नही होता। मंगल पांडे न होते तो वैसा 1857 नही हुआ होता। रोज रोज योजनाएं बनाकर कुछ नही होता है क्योंकि विश्व की 99% अद्भुत योजनाएं कभी भूमि पर नही उतरती हैं। सबसे अविश्वसनीय कार्य अकेले सिरफिरे पागलों ने ही किया है। वाणभट्ट और चाणक्य जैसे अकेले व्यक्तियों ने ही सम्पूर्ण भारत का एकीकरण किया है।
जीवन के हर क्षेत्र में यह बात सत्य है। गांधी हजारो हो सकते हैं क्योंकि गांधी होने में कोई खतरा नही है, सबकी तुष्टि करो;सबसे संवाद करो और वार्ता तथा गोष्ठियां करो पर देश के लिए बलिदान हो जाने के लिए जो अदम्य साहस चाहिए वह भगत सिंह एक ही हो सकता है। कांग्रेसी भीड़ के बिना गांधी कुछ नही थे, विशाल भीड़ के साथ अनेकों आंदोलन करके भी गांधी सफल नही हुए(स्वयं स्वीकारा है उन्होंने)। 23 वर्ष की वय में लोग रंगीन सपनों से बाहर नही निकलते और भगतसिंह इस उम्र में फांसी चढ़ गए, फांसी चढ़ने के पूर्व देश के सैकड़ों शहर और हजारों गांव की खाक भी छानी, गहन अध्ययन भी किया, बम भी बनाए और बलिदानी परिवारों की जिम्मेदारी भी निभाई।

असेम्बली में बम फेंकना एक सुनियोजित, सुविचारित और अद्भुत प्रक्रिया थी। उन्होंने सरकार को पूरे विश्व में नंगा कर दिया। जो पर्चे फेंके गए उसके एक एक शब्द में देश के लिए संदेश था, अंग्रेजों के लिए सन्देश था। इस अकेले दीवाने ने थर्रा दिया था पूरे देश को, हँसते हँसते बलिदान होने का जो उदाहरण इन्होंने दिया उसने पूरे भारत का वह जागरण किया जिसकी तुलना में पूरी कांग्रेस शून्य हो गई थी।
अकेले मदनलाल की एक गोली ने ब्रिटिश तंत्र को इतना डरा दिया जितना विश्वयुद्ध के भय ने भी उन्हें आतंकित नही किया था, पढ़ो लन्दन के अधिकारियों की पत्नियों की डायरी के अंश जिन्होंने मदनलाल धींगरा की गोलियों की धमक बकिंघम पैलेस के ठीक सामने सुनी थी।

भगतसिंह ने कहा था कि बहरों को सुनाने के लिए धमाके की आवश्यकता होती है, यह उनकी समस्या है जो आज भी उनका योगदान नही समझते। फांसी के पहले जो अपनी माँ से कहता है कि लाश लेने तुम मत आना, छोटे को भेजना। उसके बलिदान को और आत्मबल को गालियां देने वाले आज भी भारत में हैं यही दुःखद है।

सावरकर जब काला पानी जा रहे थे तो एक अंग्रेज अधिकारी ने कहा- दोहरे कालापानी तक तो यह सूखा आदमी जी ही नही पाएगा। सावरकर ने कहा- तबतक तुम्हारी सरकार ही नही बचेगी। इन क्रांतिकारियों के समक्ष खड़ा होने योग्य कौन है, कहो?”

अघोरी ने पूछा- आप कौन हैं प्रभु?

शिला से आवाज आई- “मैं कौन हूँ यह महत्वपूर्ण नहीं है, क्रांति की परंपरा महत्वपूर्ण है क्योंकि क्रांतियाँ अकेले लोगों ने ही की है, सिरफिरे पागलों ने की है, अचानक ही की है। होशियार लोगों जीवनभर योजनाएं बनाकर इन क्रांतियों का राजनैतिक भोग करते रहे हैं।”

अघोरी बोला- “आपको नमन है क्योंकि आपके लिए ही नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने कहा था कि पूरी आजाद हिंद फौज न होती अगर आप अकेले न होते।”

तभी आकाश में बिजली चमकी और शिला पर अंकित अक्षर चमक उठे- रास बिहारी बोस।
#अघोरी एकला चलो रे