Posted in स्वाध्याय

હે પ્રભુ,
જન્મથી શરૂ કરીને મૃત્યુ સુધી પલે-પલ તારો પ્રેમ વરસતો રહ્યો છે,
મારા પર…!!!
મારૂં ઊંઘવું એ તારી કૃપા વિના શક્ય નથી…!!!
ક્યું બટન દબાવે છે તું,
કે, મને ઊંઘ આવે છે..?
હું નથી જાણતો…!!!
ઊંઘમાં હું બધું ભૂલી જાઉં છું તેથી તો ઊંઘ આવે છે..
બધું ભુલાવવા માટે તું ક્યું બટન દબાવે છે..?
હું નથી જાણતો..!!!
હું જાગ્યો એટલે સ્ફૂર્તિ અને સ્મૃતિ લઈને જાગું છું..
થાકીને લોથપોથ થઈને સૂતો હોઉં..!!
પણ સવારે સ્ફૂર્તિ ક્યાંથી આવી જાય છે..???
મેં શું કર્યું એના માટે..???
પ્રભુ,રોજ સવારે સ્ફૂર્તિ આપનાર તું જ છે..!!!
એના માટે ક્યું બટન દબાવે છે તું..?
હું નથી જાણતો..!!!
રોજ સવારે મારી બધી સ્મૃતિઓ યથાવત પાછી મળી જાય છે..!!!
કઈ રીતે મળે છે એ..?
હું નથી જાણતો..!!!
જો મારી યાદ શક્તિ ચાલી જાય તો, મારા સંબંધો,વ્યવસાય,વ્યવહાર,મન-મરતબો-બધું જ ખલાસ..!!!!
પ્રભુ,મને રોજ સવારે યાદ-શક્તિ તારી કૃપાથી જ મળે છે,
એ વાત મને રોજ સવારે
સૌથી પહેલા કેમ યાદ નથી આવતી..?
શું થાય મારૂં,
જો રોજ સવારે મારી યાદ-શક્તિ પાછી ન મળે તો..???
મને રોજ સવારે *સ્ફૂર્તિ અને *સ્મૃતિ* આપનાર તું જ છે પ્રભુ..!!!
તું શું કામ આપે છે…?
ફક્ત ને ફક્ત તારો પ્રેમ જ..!!
તારા “પ્રેમની વર્ષા” થતી રહેલી છે મારા જીવનમાં અવિરતપણે…!!!
કૃતજ્ઞ છું પ્રભુ ..!!
તારા એ પ્રેમને સમજી શકું એવી સમજણ દે,અને અનુભવી શકું એવું હૃદય દે…!!!

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

🥶😜🥶

: एक बादशाह अपने कुत्ते के साथ नाव में यात्रा कर रहा था।

उस नाव में अन्य यात्रियों के साथ एक दार्शनिक भी था।

कुत्ते ने कभी नौका में सफर नहीं किया था, इसलिए वह अपने को सहज महसूस नहीं कर पा रहा था।

वह उछल-कूद कर रहा था और किसी को चैन से नहीं बैठने दे रहा था।

मल्लाह उसकी उछल-कूद से परेशान था कि ऐसी स्थिति में यात्रियों की हड़बड़ाहट से नाव डूब जाएगी।

वह भी डूबेगा और दूसरों को भी ले डूबेगा।

परन्तु कुत्ता अपने स्वभाव के कारण उछल-कूद में लगा था।

ऐसी स्थिति देखकर बादशाह भी गुस्से में था, पर कुत्ते को सुधारने का कोई उपाय उन्हें समझ में नहीं आ रहा था।

नाव में बैठे दार्शनिक से रहा नहीं गया।

वह बादशाह के पास गया और बोला : “सरकार। अगर आप इजाजत दें तो मैं इस कुत्ते को भीगी बिल्ली बना सकता हूँ।”

बादशाह ने तत्काल अनुमति दे दी।

दार्शनिक ने दो यात्रियों का सहारा लिया और उस कुत्ते को नाव से उठाकर नदी में फेंक दिया।

कुत्ता तैरता हुआ नाव के खूंटे को पकड़ने लगा।

उसको अब अपनी जान के लाले पड़ रहे थे।

कुछ देर बाद दार्शनिक ने उसे खींचकर नाव में चढ़ा लिया।

वह कुत्ता चुपके से जाकर एक कोने में बैठ गया।

नाव के यात्रियों के साथ बादशाह को भी उस कुत्ते के बदले व्यवहार पर बड़ा आश्चर्य हुआ।

बादशाह ने दार्शनिक से पूछा : “यह पहले तो उछल-कूद और हरकतें कर रहा था। अब देखो, कैसे यह पालतू बकरी की तरह बैठा है ?”

दार्शनिक बोला : “खुद तकलीफ का स्वाद चखे बिना किसी को दूसरे की विपत्ति का अहसास नहीं होता है। इस कुत्ते को जबमैंने पानी में फेंक दिया तो इसे पानी की ताकत और नाव की उपयोगिता समझ में आ गयी।”*
जिन लोगो को भारत में डर लगता है उन्हें 6 महीने के लिए सीरिया, इराक़ या पाकिस्तान में फेंक देना चाहिए फिर भारत आने पर अपने आप भीगी बिल्ली बनकर एक कोने में पड़े रहेंगे।

‘भारत’ में रहकर ‘भारत’ को गाली देने वाले लोगो के लिए समर्पित।🐶

Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

तानाजी

ये उस रण की कहानी है जिसके रणनायक तानाजी ने बहादुरी के साथ लड़ते हुए सिंहगढ़ का क़िला तो जीत लिया था लेकिन ये करते करते उनको वीरगति प्राप्त हो गई.

जब शिवाजी को अपने योद्धा की वीरगति के बारे में पता चला तो उन्होंने कहा – ‘गढ़ आला, पन सिंह गेला’ यानी किला तो जीत लिया लेकिन अपना शेर खो दिया.

ये कहानी उस दौर से शुरू होती है जब सिंहगढ़ का नाम कोंधाना हुआ करता था. लगभग साढ़े सात सौ मीटर की ऊंचाई पर बने किले पर एक राजपूत कमांडर उदयभान का राज हुआ करता था.

शिवाजी इस क़िले को वापस जीतना चाहते थे. और इसके लिए उन्होंने तानाजी को ज़िम्मेदारी दी. और तानाजी शिवाजी का आदेश पाकर अपने सैनिकों के साथ वहां पहुंच गए. तानाजी ने इस लड़ाई के लिए रात का वक़्त चुना.

उस रात को तानाजी अपने सैनिकों के साथ क़िले के नीचे इकट्ठे हुए. क़िले की दीवारें इतनी ऊंची थीं कि उन पर आसानी से चढ़ना मुमकिन नहीं था. चढ़ाई बिलकुल सीधी थी.

जब कुछ न सूझा तो तानाजी ने अपने चार-पाँच बहादुर सैनिकों के साथ ऊपर चढ़ना शुरू किया. धीरे-धीरे ऊपर चढ़ते हुए तानाजी क़िले के पास तक पहुंच गए. इसके बाद उन्होंने अपने साथ लाई रस्सी को एक पेड़ में बांधा और नीचे डाल दिया. इसके बाद दूसरे सैनिक भी ऊपर क़िले तक पहुंच सके.

सिंहगढ़ के युद्ध नाम से मशहूर इस जंग का किस्सा महाराष्ट्र सरकार की संस्था बाल भारती द्वारा प्रकाशित कक्षा चार की किताब में प्रकाशित है.

लेकिन अब तानाजी की बहादुरी और इस जंग पर एक फ़िल्म बन रही है जिसमें अजय देवगन तानाजी की भूमिका में नज़र आएंगे.जो आज ही सिनेमाघरों में आ रही.

कितना कठिन था ये किला जीतना?

कहा जाता है कि जब शिवाजी की ओर से इस क़िले को फ़तह करने का आदेश मिला तब तानाजी अपने बेटे की शादी में व्यस्त थे. लेकिन ये आदेश पाते ही तानाजी ने कहा कि अब पहले क़िला लेंगे तब शादी की बात होगी.

दिल्ली यूनिवर्सिटी में इतिहास पढ़ाने वाले प्रोफेसर अनिरुद्ध देशपांडे इस जंग के पीछे की कहानी बताती हैं.

वे कहते हैं, “ये क़िला 1665 में मुगल साम्राज्य और शिवा जी के बीच हुई पुरंदर संधि के तहत औरंगजेब को मिल गए थे. इसके साथ ही इसके जैसे 23 दूसरे क़िले भी मुगलों को मिल गए थे.”

1665 की संधि के बाद शिवाजी औरंगजेब से मिलने आगरा गए. लेकिन जब उन्हें वहां बंदी बना लिया गया तो शिवाजी किसी तरह आगरा से भागकर महाराष्ट्र पहुंचे और उन्होंने पुंरदर संधि को अस्वीकार कर दिया और अपने सभी 23 क़िलों को वापिस हासिल करने की प्रक्रिया शुरू कर दी.”

देशपांडे बताती हैं, “रणनीतिक रूप से यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण क़िला था. उस समय उदयभान राठौड़ नाम के एक राजपूत सेनापति प्रमुख किले की रखवाली कर रहे थे. और तानाजी मालुसरे के साथ उनके भाई सूर्या मालुसरे भी थे.”

पुणे शहर से 20 किमी दक्षिण पश्चिम में हवेली तहसील में स्थित इस क़िले का क्षेत्रफल 70,000 वर्ग किलोमीटर है. क़िले का एक द्वार पुणे की ओर खुलता है तो दूसरा द्वार कल्याण की ओर खुलता है.

बालभारती द्वारा छापी गई किताब में बताया गया है कि जब तानाजी ने किले पर चढ़ाई की तो सूर्या जी अपनी सेना के साथ किले के कल्याण द्वार पर पहुंच गए. और दरवाज़ा खुलने का इंतजार करने लगे.

उदयभान को जब इस बारे में पता चला तो दोनों गुटों में भारी लड़ाई छिड़ गई.

इस बीच तानाजी के कुछ सैनिकों ने जाकर कल्यान द्वार खोल दिया. और सूर्या जी के सैनिक अंदर आ गए.

तानाजी और उदयभान के बीच घमासान युद्ध हुआ. लेकिन उदयभान ने उन पर छलांग लगा दी और उदयभान के वार से तानाजी की ढाल टूट गयी थी. लेकिन इसके बाद भी दोनों एक दूसरे से लड़ते रहे. और आख़िर में वहीं पर ताना जी को वीरगति प्राप्त हो गई व उदयभान की भी मौत हो गयी.

तानाजी को वीरगति प्राप्त होते देख मराठा सैनिक इधर-उधर भागने लगे.इस बीच सूर्या जी वहां पहुँचे और उन्होंने ज़मीन पर तानाजी को गिरा हुआ पाया. इसके बाद जब सूर्या जी ने सैनिकों को भागता हुआ देखा तो उन्होंने सैनिकों से कहा कि तुम्हारे सेनापति लड़ते-लड़ते मरे हैं और तुम भाग रहे हो. मैंने नीचे उतरने की रस्सी काट दी है, अब या तो क़िले से कूदकर जान दो या अपने शत्रुओं पर खुलकर प्रहार करो.

इस जंग को लेकर एक अफ़वाह है कि मराठा सेना ने क़िले पर चढ़ने के लिए एक विशालकाय छिपकली का सहारा लिया था. इस छिपकली से रस्सी बाँध दी गई.जब ये छिपकली किले के ऊपर पहुंच गई तो इसके बाद सैनिकों ने क़िले पर चढ़ना शुरू किया.

लेकिन अनिरुद्ध देशपांडे इससे सहमत नज़र नहीं आते हैं.एक अन्य लेखक स्टीवर्ट गॉर्डन ने भी अपनी किताब ‘द मराठाज़’ में लिखा है कि मराठा सैनिक रस्सी नीचे फेंके जाने के बाद क़िले पर चढ़े थे.

कोंधा के क़िले के बारे में कहा जाता था कि जिसके पास ये क़िला होगा, पूना भी उसी का होगा इतना खास था ये किला. ऐसे में जब तानाजी ने ये क़िला जीता तो शिवाजी ने इस क़िले का नाम बदलकर सिंहगढ़ का क़िला रख दिया.

तानाजी के ये क़िला जीतने के कुछ समय बाद औरंगजेब ने एक बार फिर ये क़िला जीत लिया. लेकिन इसके बाद नावजी बालकावडे ने तानाजी की तरह लड़ते हुए ये क़िला दोबारा हासिल किया और आख़िर में महारानी ताराबाई ने औरंगजेब से लड़कर इस क़िले पर जीत हासिल की.

साभार

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तानाजी

ये उस रण की कहानी है जिसके रणनायक तानाजी ने बहादुरी के साथ लड़ते हुए सिंहगढ़ का क़िला तो जीत लिया था लेकिन ये करते करते उनको वीरगति प्राप्त हो गई.

जब शिवाजी को अपने योद्धा की वीरगति के बारे में पता चला तो उन्होंने कहा – ‘गढ़ आला, पन सिंह गेला’ यानी किला तो जीत लिया लेकिन अपना शेर खो दिया.

ये कहानी उस दौर से शुरू होती है जब सिंहगढ़ का नाम कोंधाना हुआ करता था. लगभग साढ़े सात सौ मीटर की ऊंचाई पर बने किले पर एक राजपूत कमांडर उदयभान का राज हुआ करता था.

शिवाजी इस क़िले को वापस जीतना चाहते थे. और इसके लिए उन्होंने तानाजी को ज़िम्मेदारी दी. और तानाजी शिवाजी का आदेश पाकर अपने सैनिकों के साथ वहां पहुंच गए. तानाजी ने इस लड़ाई के लिए रात का वक़्त चुना.

उस रात को तानाजी अपने सैनिकों के साथ क़िले के नीचे इकट्ठे हुए. क़िले की दीवारें इतनी ऊंची थीं कि उन पर आसानी से चढ़ना मुमकिन नहीं था. चढ़ाई बिलकुल सीधी थी.

जब कुछ न सूझा तो तानाजी ने अपने चार-पाँच बहादुर सैनिकों के साथ ऊपर चढ़ना शुरू किया. धीरे-धीरे ऊपर चढ़ते हुए तानाजी क़िले के पास तक पहुंच गए. इसके बाद उन्होंने अपने साथ लाई रस्सी को एक पेड़ में बांधा और नीचे डाल दिया. इसके बाद दूसरे सैनिक भी ऊपर क़िले तक पहुंच सके.

सिंहगढ़ के युद्ध नाम से मशहूर इस जंग का किस्सा महाराष्ट्र सरकार की संस्था बाल भारती द्वारा प्रकाशित कक्षा चार की किताब में प्रकाशित है.

लेकिन अब तानाजी की बहादुरी और इस जंग पर एक फ़िल्म बन रही है जिसमें अजय देवगन तानाजी की भूमिका में नज़र आएंगे.जो आज ही सिनेमाघरों में आ रही.

कितना कठिन था ये किला जीतना?

कहा जाता है कि जब शिवाजी की ओर से इस क़िले को फ़तह करने का आदेश मिला तब तानाजी अपने बेटे की शादी में व्यस्त थे. लेकिन ये आदेश पाते ही तानाजी ने कहा कि अब पहले क़िला लेंगे तब शादी की बात होगी.

दिल्ली यूनिवर्सिटी में इतिहास पढ़ाने वाले प्रोफेसर अनिरुद्ध देशपांडे इस जंग के पीछे की कहानी बताती हैं.

वे कहते हैं, “ये क़िला 1665 में मुगल साम्राज्य और शिवा जी के बीच हुई पुरंदर संधि के तहत औरंगजेब को मिल गए थे. इसके साथ ही इसके जैसे 23 दूसरे क़िले भी मुगलों को मिल गए थे.”

1665 की संधि के बाद शिवाजी औरंगजेब से मिलने आगरा गए. लेकिन जब उन्हें वहां बंदी बना लिया गया तो शिवाजी किसी तरह आगरा से भागकर महाराष्ट्र पहुंचे और उन्होंने पुंरदर संधि को अस्वीकार कर दिया और अपने सभी 23 क़िलों को वापिस हासिल करने की प्रक्रिया शुरू कर दी.”

देशपांडे बताती हैं, “रणनीतिक रूप से यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण क़िला था. उस समय उदयभान राठौड़ नाम के एक राजपूत सेनापति प्रमुख किले की रखवाली कर रहे थे. और तानाजी मालुसरे के साथ उनके भाई सूर्या मालुसरे भी थे.”

पुणे शहर से 20 किमी दक्षिण पश्चिम में हवेली तहसील में स्थित इस क़िले का क्षेत्रफल 70,000 वर्ग किलोमीटर है. क़िले का एक द्वार पुणे की ओर खुलता है तो दूसरा द्वार कल्याण की ओर खुलता है.

बालभारती द्वारा छापी गई किताब में बताया गया है कि जब तानाजी ने किले पर चढ़ाई की तो सूर्या जी अपनी सेना के साथ किले के कल्याण द्वार पर पहुंच गए. और दरवाज़ा खुलने का इंतजार करने लगे.

उदयभान को जब इस बारे में पता चला तो दोनों गुटों में भारी लड़ाई छिड़ गई.

इस बीच तानाजी के कुछ सैनिकों ने जाकर कल्यान द्वार खोल दिया. और सूर्या जी के सैनिक अंदर आ गए.

तानाजी और उदयभान के बीच घमासान युद्ध हुआ. लेकिन उदयभान ने उन पर छलांग लगा दी और उदयभान के वार से तानाजी की ढाल टूट गयी थी. लेकिन इसके बाद भी दोनों एक दूसरे से लड़ते रहे. और आख़िर में वहीं पर ताना जी को वीरगति प्राप्त हो गई व उदयभान की भी मौत हो गयी.

तानाजी को वीरगति प्राप्त होते देख मराठा सैनिक इधर-उधर भागने लगे.इस बीच सूर्या जी वहां पहुँचे और उन्होंने ज़मीन पर तानाजी को गिरा हुआ पाया. इसके बाद जब सूर्या जी ने सैनिकों को भागता हुआ देखा तो उन्होंने सैनिकों से कहा कि तुम्हारे सेनापति लड़ते-लड़ते मरे हैं और तुम भाग रहे हो. मैंने नीचे उतरने की रस्सी काट दी है, अब या तो क़िले से कूदकर जान दो या अपने शत्रुओं पर खुलकर प्रहार करो.

इस जंग को लेकर एक अफ़वाह है कि मराठा सेना ने क़िले पर चढ़ने के लिए एक विशालकाय छिपकली का सहारा लिया था. इस छिपकली से रस्सी बाँध दी गई.जब ये छिपकली किले के ऊपर पहुंच गई तो इसके बाद सैनिकों ने क़िले पर चढ़ना शुरू किया.

लेकिन अनिरुद्ध देशपांडे इससे सहमत नज़र नहीं आते हैं.एक अन्य लेखक स्टीवर्ट गॉर्डन ने भी अपनी किताब ‘द मराठाज़’ में लिखा है कि मराठा सैनिक रस्सी नीचे फेंके जाने के बाद क़िले पर चढ़े थे.

कोंधा के क़िले के बारे में कहा जाता था कि जिसके पास ये क़िला होगा, पूना भी उसी का होगा इतना खास था ये किला. ऐसे में जब तानाजी ने ये क़िला जीता तो शिवाजी ने इस क़िले का नाम बदलकर सिंहगढ़ का क़िला रख दिया.

तानाजी के ये क़िला जीतने के कुछ समय बाद औरंगजेब ने एक बार फिर ये क़िला जीत लिया. लेकिन इसके बाद नावजी बालकावडे ने तानाजी की तरह लड़ते हुए ये क़िला दोबारा हासिल किया और आख़िर में महारानी ताराबाई ने औरंगजेब से लड़कर इस क़िले पर जीत हासिल की.

साभार

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

“गाय का झूठा गुड़”

एक शादी के निमंत्रण पर जाना था, पर मैं जाना नहीं चाहता था।

एक व्यस्त होने का बहाना और दूसरा गांव की शादी में शामिल होने से बचना..लेक‌िन घर परिवार का दबाव था सो जाना पड़ा।

उस दिन शादी की सुबह में काम से बचने के लिए सैर करने के बहाने दो- तीन किलोमीटर दूर जा कर मैं गांव को जाने बाली रोड़ पर बैठा हुआ था, हल्की हवा और सुबह का सुहाना मौसम बहुत ही अच्छा लग रहा था , पास के खेतों में कुछ गाय चारा खा रही थी कि तभी वहाँ एक लग्जरी गाड़ी आकर रूकी,

और उसमें से एक वृद्ध उतरे,अमीरी उसके लिबास और व्यक्तित्व दोनों बयां कर रहे थे।

वे एक पॉलीथिन बैग ले कर मुझसे कुछ दूर पर ही एक सीमेंट के चबूतरे पर बैठ गये, पॉलीथिन चबूतरे पर उंडेल दी, उसमे गुड़ भरा हुआ था, अब उन्होने आओ आओ करके पास में ही खड़ी ओर बैठी गायो को बुलाया, सभी गाय पलक झपकते ही उन बुजुर्ग के इर्द गिर्द ठीक ऐसे ही आ गई जैसे कई महीनो बाद बच्चे अपने मांबाप को घेर लेते हैं, कुछ गाय को गुड़ उठाकर खिला रहे थे तो कुछ स्वयम् खा रही थी, वे बड़े प्रेम से उनके सिर पर गले पर हाथ फेर रहे थे।

कुछ ही देर में गाय अधिकांश गुड़ खाकर चली गई,इसके बाद जो हुआ वो वाक्या हैं जिसे मैं ज़िन्दगी भर नहीं भुला सकता,

हुआ यूँ कि गायो के गुड़ खाने के बाद जो गुड़ बच गया था वो बुजुर्ग उन टुकड़ो को उठा उठा कर खाने लगे,मैं उनकी इस क्रिया से अचंभित हुआ पर उन्होंने बिना किसी परवाह के कई टुकड़े खाये और अपनी गाडी की और चल पड़े।

मैं दौड़कर उनके नज़दीक पहुँचा और बोला श्रीमानजी क्षमा चाहता हूँ पर अभी जो हुआ उससे मेरा दिमाग घूम गया, क्या आप मेरी इस जिज्ञासा को शांत करेंगे कि आप इतने अमीर होकर भी गाय का झूठा गुड क्यों खाया ??

उनके चेहरे पर अब हल्की सी मुस्कान उभरी उन्होंने कार का गेट वापस बंद करा और मेरे कंधे पर हाथ रख वापस सीमेंट के चबूतरे पर आ बैठे, और बोले ये जो तुम गुड़ के झूठे टुकड़े देख रहे हो ना बेटे मुझे इनसे स्वादिष्ट आज तक कुछ नहीं लगता।

जब भी मुझे वक़्त मिलता हैं मैं अक्सर इसी जगह आकर अपनी आत्मा में इस गुड की मिठास घोलता हूँ।

मैं अब भी नहीं समझा श्री मान जी आखिर ऐसा क्या हैं इस गुड में ???

वे बोले ये बात आज से कोई 40 साल पहले की हैं उस वक़्त मैं 22 साल का था घर में जबरदस्त आंतरिक कलह के कारण मैं घर से भाग आया था, परन्तू दुर्भाग्य वश ट्रेन में कोई मेरा सारा सामान और पैसे चुरा ले गया। इस अजनबी से छोटे शहर में मेरा कोई नहीं था, भीषण गर्मी में खाली जेब के दो दिन भूखे रहकर इधर से उधर भटकता रहा, और शाम को भूख मुझे निगलने को आतुर थी।

तब इसी जगह ऐसी ही एक गाय को एक महानुभाव गुड़ डालकर चले गए ,यहाँ एक पीपल का पेड़ हुआ करता था तब चबूतरा नहीं था,मैं उसी पेड़ की जड़ो पर बैठा भूख से बेहाल हो रहा था, मैंने देखा कि गाय ने गुड़ छुआ तक नहीं और उठ कर वहां से चली गई, मैं कुछ देर किंकर्तव्यविमूढ़ सोचता रहा और फिर मैंने वो सारा गुड़ उठा लिया और खा लिया। मेरी मृतप्रायः आत्मा में प्राण से आ गये।

मैं उसी पेड़ की जड़ो में रात भर पड़ा रहा, सुबह जब मेरी आँख खुली तो काफ़ी रौशनी हो चुकी थी, मैं नित्यकर्मो से फारिक हो किसी काम की तलाश में फिर सारा दिन भटकता रहा पर दुर्भाग्य मेरा पीछा नहीं छोड़ रहा था, एक और थकान भरे दिन ने मुझे वापस उसी जगह निराश भूखा खाली हाथ लौटा दिया।

शाम ढल रही थी, कल और आज में कुछ भी तो नहीं बदला था, वही पीपल, वही भूखा मैं और वही गाय।

कुछ ही देर में वहाँ वही कल वाले सज्जन आये और कुछ गुड़ की डलिया गाय को डालकर चलते बने, गाय उठी और बिना गुड़ खाये चली गई, मुझे अज़ीब लगा परन्तू मैं बेबस था सो आज फिर गुड खा लिया। *और वही सो गया, सुबह काम तलासने निकल गया, आज शायद दुर्भाग्य की चादर मेरे सर पे नहीं थी सो एक ढ़ाबे पर मुझे काम मिल गया। कुछ दिन बाद जब मालिक ने मुझे पहली पगार दी तो मैंने 1 किलो गुड़ ख़रीदा और किसी दिव्य शक्ति के वशीभूत 7 km पैदल पैदल चलकर उसी पीपल के पेड़ के नीचे आया।*

इधर उधर नज़र दौड़ाई तो गाय भी दिख गई,मैंने सारा गुड़ उस गाय को डाल दिया, इस बार मैं अपने जीवन में सबसे ज्यादा चौंका क्योकि गाय सारा गुड़ खा गई, जिसका मतलब साफ़ था की गाय ने 2 दिन जानबूझ कर मेरे लिये गुड़ छोड़ा था,

मेरा हृदय भर उठा उस ममतामई स्वरुप की ममता देखकर, मैं रोता हुआ बापस ढ़ाबे पे पहुँचा,और बहुत सोचता रहा, फिर एक दिन मुझे एक फर्म में नौकरी भी मिल गई, दिन पर दिन मैं उन्नति और तरक्की के शिखर चढ़ता गया,

शादी हुई बच्चे हुये आज मैं खुद की पाँच फर्म का मालिक हूँ, जीवन की इस लंबी यात्रा में मैंने कभी भी उस गाय माता को नहीं भुलाया , मैं अक्सर यहाँ आता हूँ और इन गायो को गुड़ डालकर इनका झूँठा गुड़ खाता हूँ,

मैं लाखो रूपए गौ शालाओं में चंदा भी देता हूँ , परन्तू मेरी मृग तृष्णा मन की शांति यही आकर मिटती हैं बेटे।

मैं देख रहा था वे बहुत भावुक हो चले थे, समझ गये अब तो तुम,

मैंने सिर हाँ में हिलाया, वे चल पड़े,गाडी स्टार्ट हुई और निकल गई ,मैं उठा उन्ही टुकड़ो में से एक टुकड़ा उठाया मुँह में डाला वापस शादी में शिरकत करने सच्चे मन से शामिल हुआ।

सचमुच वो कोई साधारण गुड़ नहीं था।

उसमे कोई दिव्य मिठास थी जो जीभ के साथ आत्मा को भी मीठा कर गई थी।

घर आकर गाय के बारे जानने के लिए कुछ किताबें पढ़ने के बाद जाना कि…..,

गाय गोलोक की एक अमूल्य निधि है, जिसकी रचना भगवान ने मनुष्यों के कल्याणार्थ आशीर्वाद रूप से की है।

ऋग्वेद में गौ को‘अदिति’ कहा गया है। ‘दिति’ नाम नाश का प्रतीक है और ‘अदिति’ अविनाशी अमृतत्व का नाम है। अत: गौ को ‘अदिति’ कहकर वेद ने अमृतत्व का प्रतीक बतलाया है। *_स्नेह वंदन_* 🙏 *_प्रणाम_*