Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

“बेटा! थोड़ा खाना खाकर जा ..!! दो दिन से तुने कुछ खाया नहीं है।” लाचार माता के शब्द है अपने बेटे को समझाने के लिये।

“देख मम्मी! मैंने मेरी बारहवीं बोर्ड की परीक्षा के बाद वेकेशन में सेकेंड हैंड बाइक मांगी थी, और पापा ने प्रोमिस किया था। आज मेरे आखरी पेपर के बाद दीदी को कह देना कि जैसे ही मैं परीक्षा खंड से बाहर आऊंगा तब पैसा लेकर बाहर खडी रहे। मेरे दोस्त की पुरानी बाइक आज ही मुझे लेनी है। और हाँ, यदि दीदी वहाँ पैसे लेकर नहीं आयी तो मैं घर वापस नहीं आऊंगा।”

एक गरीब घर में बेटे मोहन की जिद्द और माता की लाचारी आमने सामने टकरा रही थी।

“बेटा! तेरे पापा तुझे बाइक लेकर देने ही वाले थे, लेकिन पिछले महीने हुए एक्सिडेंट ..

मम्मी कुछ बोले उसके पहले मोहन बोला “मैं कुछ नहीं जानता .. मुझे तो बाइक चाहिये ही चाहिये ..!!”

ऐसा बोलकर मोहन अपनी मम्मी को गरीबी एवं लाचारी की मझधार में छोड़ कर घर से बाहर निकल गया।

12वीं बोर्ड की परीक्षा के बाद भागवत ‘सर एक अनोखी परीक्षा का आयोजन करते थे।
हालांकि भागवत सर का विषय गणित था, किन्तु विद्यार्थियों को जीवन का भी गणित भी समझाते थे और उनके सभी विद्यार्थी विविधतासभर ये परीक्षा अचूक देने जाते थे।

इस साल परीक्षा का विषय था मेरी पारिवारिक भूमिका

मोहन परीक्षा खंड में आकर बैठ गया।
उसने मन में गांठ बांध ली थी कि यदि मुझे बाइक लेकर देंगे तो मैं घर नहीं जाऊंगा।

भागवत सर के क्लास में सभी को पेपर वितरित हो गया। पेपर में 10 प्रश्न थे। उत्तर देने के लिये एक घंटे का समय दिया गया था।

मोहन ने पहला प्रश्न पढा और जवाब लिखने की शुरुआत की।

प्रश्न नंबर १ :- आपके घर में आपके पिताजी, माताजी, बहन, भाई और आप कितने घंटे काम करते हो? सविस्तर बताइये?

मोहन ने त्वरा से जवाब लिखना शुरू कर दिया।

जवाबः
पापा सुबह छह बजे टिफिन के साथ अपनी ओटोरिक्षा लेकर निकल जाते हैं। और रात को नौ बजे वापस आते हैं। कभी कभार वर्धी में जाना पड़ता है। ऐसे में लगभग पंद्रह घंटे।

मम्मी सुबह चार बजे उठकर पापा का टिफिन तैयार कर, बाद में घर का सारा काम करती हैं। दोपहर को सिलाई का काम करती है। और सभी लोगों के सो
जाने के बाद वह सोती हैं। लगभग रोज के सोलह घंटे।

दीदी सुबह कालेज जाती हैं, शाम को 4 से 8 पार्ट टाइम जोब करती हैं। और रात्रि को मम्मी को काम में मदद करती हैं। लगभग बारह से तेरह घंटे।

मैं, सुबह छह बजे उठता हूँ, और दोपहर स्कूल से आकर खाना खाकर सो जाता हूँ। शाम को अपने दोस्तों के साथ टहलता हूँ। रात्रि को ग्यारह बजे तक पढता हूँ। लगभग दस घंटे।

(इससे मोहन को मन ही मन लगा, कि उनका कामकाज में औसत सबसे कम है।)

पहले सवाल के जवाब के बाद मोहन ने दूसरा प्रश्न पढा ..

प्रश्न नंबर २ :- आपके घर की मासिक कुल आमदनी कितनी है?

जवाबः
पापा की आमदनी लगभग दस हजार हैं। मम्मी एवं दीदी मिलकर पांंच हजार
जोडते हैं। कुल आमदनी पंद्रह हजार।

प्रश्न नंबर ३ :- मोबाइल रिचार्ज प्लान, आपकी मनपसंद टीवी पर आ रही तीन सीरियल के नाम, शहर के एक सिनेमा होल का पता और अभी वहां चल रही मूवी का नाम बताइये?

सभी प्रश्नों के जवाब आसान होने से फटाफट दो मिनट में लिख दिये ..

प्रश्न नंबर ४ :- एक किलो आलू और भिन्डी के अभी हाल की कीमत क्या है? एक किलो गेहूं, चावल और तेल की कीमत बताइये? और जहाँ पर घर का गेहूं पिसाने जाते हो उस आटा चक्की का पता दीजिये।

मोहनभाई को इस सवाल का जवाब नहीं आया। उसे समझ में आया कि हमारी दैनिक आवश्यक जरुरतों की चीजों के बारे में तो उसे लेशमात्र भी ज्ञान नहीं है। मम्मी जब भी कोई काम बताती थी तो मना कर देता था। आज उसे ज्ञान हुआ कि अनावश्यक चीजें मोबाइल रिचार्ज, मुवी का ज्ञान इतना उपयोगी नहीं है। अपने घर के काम की
जवाबदेही लेने से या तो हाथ बटोर कर साथ देने से हम कतराते रहे हैं।

प्रश्न नंबर ५ :- आप अपने घर में भोजन को लेकर कभी तकरार या गुस्सा करते हो?

जवाबः हां, मुझे आलू के सिवा कोई भी सब्जी पसंद नहीं है। यदि मम्मी और कोई सब्जी बनायें तो, मेरे घर में झगड़ा होता है। कभी मैं बगैर खाना खायें उठ खडा हो जाता हूँ।
(इतना लिखते ही मोहन को याद आया कि आलू की सब्जी से मम्मी को गैस की तकलीफ होती हैं। पेट में दर्द होता है, अपनी सब्जी में एक बडी चम्मच वो अजवाइन डालकर खाती हैं। एक दिन मैंने गलती से मम्मी की सब्जी खा ली, और फिर मैंने थूक दिया था। और फिर पूछा कि मम्मी तुम ऐसा क्यों खाती हो? तब दीदी ने बताया था कि हमारे घर की स्थिति ऐसी अच्छी नहीं है कि हम दो सब्जी बनाकर खायें। तुम्हारी जिद के कारण मम्मी बेचारी क्या करें?)
मोहन ने अपनी यादों से बाहर आकर
अगले प्रश्न को पढा

प्रश्न नंबर ६ :- आपने अपने घर में की हुई आखरी जिद के बारे में लिखिये ..

मोहन ने जवाब लिखना शुरू किया। मेरी बोर्ड की परीक्षा पूर्ण होने के बाद दूसरे ही दिन बाइक के लिये जीद्द की थी। पापा ने कोई जवाब नहीं दिया था, मम्मी ने समझाया कि घर में पैसे नहीं है। लेकिन मैं नहीं माना! मैंने दो दिन से घर में खाना खाना भी छोड़ दिया है। जबतक बाइक नहीं लेकर दोगे मैं खाना नहीं खाऊंगा। और आज तो मैं वापस घर नहीं जाऊंगा कहके निकला
हूँ।
अपनी जिद का प्रामाणिकता से मोहन ने जवाब लिखा।

प्रश्न नंबर ७ :- आपको अपने घर से मिल रही पोकेट मनी का आप क्या करते हो? आपके भाई-बहन कैसे खर्च करते हैं?

जवाब: हर महीने पापा मुझे सौ रुपये देते हैं। उसमें से मैं, मनपसंद पर्फ्यूम, गोगल्स लेता हूं, या अपने दोस्तों की छोटीमोटी पार्टियों में खर्च करता हूँ।

मेरी दीदी को भी पापा सौ रुपये देते हैं। वो खुद कमाती हैं और पगार के पैसे से मम्मी को आर्थिक मदद करती हैं। हां, उसको दिये गये पोकेटमनी को वो गल्ले में डालकर बचत करती हैं। उसे कोई मौजशौख नहीं है, क्योंकि वो कंजूस भी हैं।

प्रश्न नंबर ८ :- आप अपनी खुद की पारिवारिक भूमिका को समझते हो?

प्रश्न अटपटा और जटिल होने के बाद भी मोहन ने जवाब लिखा।
परिवार के साथ जुड़े रहना, एकदूसरे के प्रति समझदारी से व्यवहार करना एवं मददरूप होना चाहिये और ऐसे अपनी जवाबदेही निभानी चाहिये।

यह लिखते लिखते ही अंतरात्मासे आवाज आयी कि अरे मोहन! तुम खुद अपनी पारिवारिक भूमिका को योग्य रूप से निभा रहे हो? और अंतरात्मा से जवाब आया कि ना बिल्कुल नहीं ..!!

प्रश्न नंबर ९ :- आपके परिणाम से
आपके माता-पिता खुश हैं? क्या वह अच्छे परिणाम के लिये आपसे जिद करते हैं? आपको डांटते रहते हैं?

(इस प्रश्न का जवाब लिखने से पहले हुए मोहन की आंखें भर आयी। अब वह परिवार के प्रति अपनी भूमिका बराबर समझ चुका था।)
लिखने की शुरुआत की ..

वैसे तो मैं कभी भी मेरे माता-पिता को आजतक संतोषजनक परिणाम नहीं दे पाया हूँ। लेकिन इसके लिये उन्होंने कभी भी जिद नहीं की है। मैंने बहुत बार अच्छे रिजल्ट के प्रोमिस तोडे हैं।
फिर भी हल्की सी डांट के बाद वही प्रेम और वात्सल्य बना रहता था।

प्रश्न नंबर १० :- पारिवारिक जीवन में असरकारक भूमिका निभाने के लिये इस वेकेशन में आप कैसे परिवार को मददरूप होंगें?

जवाब में मोहन की कलम चले इससे पहले उनकी आंखों से आंसू बहने लगे, और जवाब लिखने से पहले ही कलम रुक गई .. बेंच के निचे मुंह रखकर रोने लगा। फिर से कलम उठायी तब भी वो कुछ भी न लिख पाया। अनुत्तर दसवां प्रश्न छोड़कर पेपर सबमिट कर दिया।

स्कूल के दरवाजे पर दीदी को देखकर उसकी ओर दौड़ पडा।

“भैया! ये ले आठ हजार रुपये, मम्मी ने कहा है कि बाइक लेकर ही घर आना।”
दीदी ने मोहन के सामने पैसे धर दिये।

“कहाँ से लायी ये पैसे?” मोहन ने पूछा।

दीदी ने बताया
“मैंने मेरी ओफिस से एक महीने की सेलेरी एडवांस मांग ली। मम्मी भी जहां काम करती हैं वहीं से उधार ले लिया, और मेरी पोकेटमनी की बचत से निकाल लिये। ऐसा करके तुम्हारी बाइक के पैसे की व्यवस्था हो गई हैं।

मोहन की दृष्टि पैसे पर स्थिर हो गई।

दीदी फिर बोली ” भाई, तुम मम्मी को बोलकर निकले थे कि पैसे नहीं दोगे तो, मैं घर पर नहीं आऊंगा! अब तुम्हें समझना चाहिये कि तुम्हारी भी घर के प्रति जिम्मेदारी है। मुझे भी बहुत से शौक हैं, लेकिन अपने शौख से अपने परिवार को मैं सबसे ज्यादा महत्व देती हूं। तुम हमारे परिवार के सबसे लाडले हो, पापा को पैर की तकलीफ हैं फिर भी तेरी बाइक के लिये पैसे कमाने और तुम्हें दिये प्रोमिस को पूरा करने अपने फ्रेक्चर वाले पैर होने के बावजूद काम किये जा रहे हैं। तेरी बाइक के लिये। यदि तुम समझ सको तो अच्छा है, कल रात को अपने प्रोमिस को पूरा नहीं कर सकने के कारण बहुत दुःखी थे। और इसके पीछे उनकी मजबूरी है।
बाकी तुमने तो अनेकों बार अपने प्रोमिस तोडे ही है न?
मेरे हाथ में पैसे थमाकर दीदी घर की ओर चल निकली।

उसी समय उनका दोस्त वहां अपनी बाइक लेकर आ गया, अच्छे से चमका कर ले आया था।
“ले .. मोहन आज से ये बाइक तुम्हारी, सब बारह हजार में मांग रहे हैं, मगर ये तुम्हारे लिये आठ हजार ।”

मोहन बाइक की ओर टगर टगर देख रहा था। और थोड़ी देर के बाद बोला
“दोस्त तुम अपनी बाइक उस बारह हजार वाले को ही दे देना! मेरे पास पैसे की व्यवस्था नहीं हो पायी हैं और होने की हाल संभावना भी नहीं है।”

और वो सीधा भागवत सर की केबिन में जा पहूंचा।

“अरे मोहन! कैसा लिखा है पेपर में?
भागवत सर ने मोहन की ओर देख कर पूछा।

“सर ..!!, यह कोई पेपर नहीं था, ये तो मेरे जीवन के लिये दिशानिर्देश था। मैंने एक प्रश्न का जवाब छोड़ दिया है। किन्तु ये जवाब लिखकर नहीं अपने जीवन की जवाबदेही निभाकर दूंगा और भागवत सर को चरणस्पर्श कर अपने घर की ओर निकल पडा।

घर पहुंचते ही, मम्मी पापा दीदी सब उसकी राह देखकर खडे थे।
“बेटा! बाइक कहाँ हैं?” मम्मी ने पूछा। मोहन ने दीदी के हाथों में पैसे थमा दिये और कहा कि सोरी! मुझे बाइक नहीं चाहिये। और पापा मुझे ओटो की चाभी दो, आज से मैं पूरे वेकेशन तक ओटो चलाऊंगा और आप थोड़े दिन आराम करेंगे, और मम्मी आज मैं मेरी पहली कमाई शुरू होगी। इसलिये तुम अपनी पसंद की मैथी की भाजी और बैगन ले आना, रात को हम सब साथ मिलकर के खाना खायेंगे।

मोहन के स्वभाव में आये परिवर्तन को देखकर मम्मी उसको गले लगा लिया और कहा कि “बेटा! सुबह जो कहकर तुम गये थे वो बात मैंने तुम्हारे पापा को बतायी थी, और इसलिये वो दुःखी हो गये, काम छोड़ कर वापस घर आ गये। भले ही मुझे पेट में दर्द होता हो लेकिन आज तो मैं तेरी पसंद की ही सब्जी बनाऊंगी।” मोहन ने कहा
“नहीं मम्मी! अब मेरी समझ गया हूँ कि मेरे घरपरिवार में मेरी भूमिका क्या है? मैं रात को बैंगन मैथी की सब्जी ही खाऊंगा, परीक्षा में मैंने आखरी जवाब नहीं लिखा हैं, वह प्रेक्टिकल करके ही दिखाना है। और हाँ मम्मी हम गेहूं को पिसाने कहां जाते हैं, उस आटा चक्की का नाम और पता भी मुझे दे दो”और उसी समय भागवत सर ने घर में प्रवेश किया। और बोले “वाह! मोहन जो जवाब तुमनें लिखकर नहीं दिये वे प्रेक्टिकल जीवन जीकर कर दोगे

“सर! आप और यहाँ?” मोहन भागवत सर को देख कर आश्चर्य चकित हो गया।

“मुझे मिलकर तुम चले गये, उसके बाद मैंने तुम्हारा पेपर पढा इसलिये तुम्हारे घर की ओर निकल पडा। मैं बहुत देर से तुम्हारे अंदर आये परिवर्तन को सुन रहा था। मेरी अनोखी परीक्षा सफल रही
और इस परीक्षा में तुमने पहला नंबर पाया है।”
ऐसा बोलकर भागवत सर ने मोहन के सर पर हाथ रखा।

मोहन ने तुरंत ही भागवत सर के पैर छुएँ और ऑटो रिक्शा चलाने के लिये निकल पडा….
(व्हाट्सएप पोस्ट)

Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

पेशवा_बाजीराव

80 साल की उम्र के राजपूत राजा छत्रसाल जब मुगलो से घिर गए,
और बाकी राजपूत राजाओं से कोई उम्मीद ना थी तो उम्मीद का एक मात्र सूर्य था “ब्राह्मण बाजीराव बलाड़ पेशवा”
एक राजपूत ने एक ब्राह्मण को खत लिखा:-

जोगतिग्राहगजेंद्रकी

सोगतिभईहैआज!

बाजी जात बुन्देल की बाजी राखो लाज!

(जिस प्रकार गजेंद्र हाथी मगरमच्छ के जबड़ो में फँस गया था ठीक वही स्थिति मेरी है, आज बुन्देल हार रहा है, बाजी हमारी लाज रखो) ये खत पढ़ते ही बाजीराव खाना छोड़कर उठे उनकी पत्नी ने पूछा खाना तो खा लीजिए तब बाजीराव ने कहा…

अगर मुझे पहुँचने में देर हो गई तो इतिहास लिखेगा कि एक क्षत्रिय_राजपूत ने मदद माँगी और ब्राह्मण भोजन करता रहा”-

ऐसा कहते हुए भोजन की थाली छोड़कर बाजीराव अपनी सेना के साथ राजा छत्रसाल की मदद को बिजली की गति से दौड़ पड़े। दस दिन की दूरी बाजीराव ने केवल पाँच सौ घोड़ों के साथ 48 घंटे में पूरी की, बिना रुके, बिना थके आते ही

ब्राह्मण योद्धा बाजीराव बुंदेलखंड आया और फंगस खान की गर्दन काट कर जब राजपूत राजा छत्रसाल के सामने गए तो छत्रसाल से बाजीराव बलाड़ को गले लगाते हुए कहा:-

जगउपजेदोब्राह्मणपरशुओरबाजीराव।

एकडाहिराजपुतियाएकडाहि_तुरकाव।

धरती पर 2 ही ब्राह्मण आये है एक परशुराम जिसने अहंकारी क्षत्रियों का मर्दन किया और दूसरा बाजीराव_बलाड़ जिसने म्लेच्छ लुटेरे मुगलो का सर्वनाश किया है।

अपराजेय_योद्धा

पेशवाबाजीरावकेजंयतीपरशतशत_नमन।

Posted in स्वाध्याय

पर्यावरण
समुद्र वसने देवि पर्वत स्तन मंडले
विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यम पाद स्पर्शम क्षमस्व
( सागर के नील हरित वस्त्रो से सजी हैं जो उतुंग पर्वत जिनके अमृत स्रावी स्तन हैं ऐसी जगतपिता विष्णु की वल्लभा पर हम अपने पांवो का स्पर्श कर रहे हैं इस हेतु भगवती हमको क्षमा करे )
ये प्रार्थना लगभग सभी संस्कारी परिवार के जन नित्य प्रात:काल मे बिस्तर से उठते ही करते हैं
ये कैसा सम्मान है धरती को
जगतपिता की पत्नि मंजे सर्वजगत ,चर-अचर को पालने वाली माता ,प्रकृति शक्ति
इससे मिलता जुलता सबक लगभग हम सबको अपने परिवारों से मिला है
बहुत पहले हमारी भांजियां शायद सात आठ साल की थीं तब वे भरतनाट्यम सीख रहीं थीं
छुट्टियों मे ननिहाल मे आने पर वो हमको अपना सीखा नृत्य दिखाने लगीं
लेकिन जब भी वे नाच शुरू करती तब प्रारम्भहमेशा एकसा रहता जिसमे वे हाथ जोड़ कर फिर नीचे झुक करदोनो हाथो से भूमि स्पर्श कर के माथे पर लगाती
हमारे पूछने पर उस सातसाल की भांजी ने जो कारण बताया अपने अनगढ़शब्दो में वो हमारे हृदय मे भिंद गयाथा
बच्ची ने कहा
“मामा !ये भूमि अम्बा को प्रणाम करके स्पर्श कररहे हैं और क्षमा मांगरहे हैं की हम अपने विलास और आनंद के लिये बार बार अपने पैरो से उनका ताड़न करेंगे “
शब्द कम थे पर उस बच्ची ने भाव पूरा समझा दिया था अपनी भावभंगिमा से
हम बहुत देर तक सोचते रहे प्रकृति की सम्मान की कैसी परम्परा और संस्कार पूर्वजो ने रोपित किये लोक में , कला में, धर्म में, नीती में
शम चैतन्य बापा कहते थे की जब भी किसी कुंड मे , नदी मे , तालाब मे स्नान करो तो उसके बाद उसके अंदर की मिट्टी से तीन पिंड बना कर वहां की क्षेत्रकृत्या के निमित्त पिंडदान करना चाहिये
सोचिये अगर हर स्नानार्थी यहकर दे तो कुंडो ,तालाबो की वह दुर्गत रहती जो हम आप देख रहे हैं
पिताजी हमेशा सुबह पांच साढे पांच बजे उठ जाते थे
नित्यकर्मो से निवृत्त होकर वो बगीचे मे पानी लगाने लगते
तब तक हम सब उठ कर अपने कामो मे लगते
हम सुबह दौड़ने की निकलजाते
जब आधेंघंटे बाद वापस आते तबतक मालकिन नाश्ता बना कर पिताजी को दे चुकीं होती थीं
नहाये धोये पिताजी पोर्च मे बैठ कर नाश्ता करने से पहले अपना नित्य कर्तव्य नही भूलते सेर भर चावल टुकड़ी या बाजरा अपनी गौरेंयों को डालना उनका नित्य कर्म था
और वो चिड़ियायें गिलहरियां सब इसकी प्रतीक्षामें रहती थीं
जरी सी देर होने पर चिड़ियाये और गिलहरियां उनके कंधो ,सर और गोद मे बैठ कर शोर करने लगती थीं
रोज कितनी चिड़ियायें आती उनको गिनती रहती थी
कम या ज्यादा होने पर वो हम लोगो से कहते थे
येबात 2006की बात है अगस्त का आखिरी सप्ताह था
हम ताजे ताजे कोर्ट केस से सफलता पूर्वक निपटे थे जिसमे हमारे अँदर जाने की पूरी संभावना थी
सुबह पिताजी ने हमसे कहा की बाजरा ले आना खत्म होगया है हमने हां कर दी पर कामो में भूल गये
अगलीसुबह जब दौड़ कर वापस आये तो पिताजी के मांगने पर याद आया
हम कहे की आजले आयेंगे बाजरा
इस पर पिताजी ने कहा
” इतना लापरवाह मत हो जाओ की यह भी भूल जाओ की तुम्हारे बाप ने कभी बिना इनको दाने डाले एक कौर मुंह मे नही रखा
जिस भयानक संकट से बचे हो
बहुत संभावना तो यही है की इन नन्हे पखेरुओँ और बेजुबान गिलहरियों की प्रार्थना हो की इनके पुत्र को बचाये रखना नही तो इन बुड्डे बुढियाकी देखभाल कौन करेगा
और ये बुड्ढा हमको फिर कैसे खाने देगा “
हम पर घड़ो पानी पड़ गया
हम वापस लौट कर दुकान खुलवाये और बाजरा लाकर पिताजी कोसौंप दिया
थोड़ी देर बाद देखा तो सर्दी की धूप मे अपनी आराम कुर्सी पर बैठ कर पोहे खा रहे थे और उनके आसपास गौरेयोॆ और गिलहरियों का के कारण उनकी
चीं चीं चीं चीं से पोर्च गुलजार हो गयाथा
पिताजी के जाने के बाद यह जिम्मेदारी मालकिन ने ले ली
इसी तरह दो साल पहले नर्मदा किनारे अदलपुरा मे मैं और उन्मेष गये थे स्नान वगैरह करके हम अपने नित्य जप को बैठ गये उन्मेष दाल बाफले की रंगत जमाने लगा किनारे के मॆदिर मे
हम जप करते मे सोच रहे थे की शायद हम से दस पांच ही लोग इस घने जगंल के तट पर नर्मदा के दर्शन को चले आते हों अन्यथा यहां कौन आरहा है
तभी देखा कीबांयी ओर दूर से एक ग्रामीण जोड़ा चला आरहा है तट पर पहुंच कर उन दोनो ने माई को तट पर से ही दंडवत कर ढोक दी और अपना लोक बोली मे माई की जयजयकार करी
बहुत संभलते हुये वो पानी मे उतरे पर स्नान करने की जगह वे नर्मदा के प्रवाह मे किनारे पर जमे सड़े घास , पेड़पत्ते ,काई ,सिवार को हटाने लगे
जबकरीब आठ दस बार उन दोनो ने प्रवाह से बाहर आकर कचरा फेंक दिया तब उनने स्नान करना शुरू किया
फिर स्नान करकेजब बाहर आये तो उनकी नजर जप करते हम पर पड़ी
सरल विश्वासी उन गांव के पुण्यमूर्ति युगल ने हमको ढोक लगायी हम जोयह सब दृश्य मंत्रमुग्ध होकर देख रहे थे फिर से आपे मे आये और हम जिस चट्टान पर बैठे थे उसको वे दोनो बुहारने लगे
पत्नि बुहार रही थी और पति जाकर हमारे खाली पड़े पानी के पात्र को मांजकर माई का अमृत भर लाया
और इसके बाद वो जैसे घने पेड़ो के ओर से आये थे वहीं चले गये
हमारा जप पूरा हुआ तो हमने उठ कर पहला प्रणाम रेवा माई को करा और दूसरा उन पुण्यमयि युगल के पदचिन्हो पर
(शायद माई हमको निजी तौर पर समझाना चाहरही थी कहम और हमारे सरीखे शहरीमूढ़ो की उसे कोई जरूरत नही
उसके पास सदा ऐसे रत्न हैं जो तपस्वीयो के भी प्रणम्य हैं )
ये सब उन वन्य क्षेत्र के ग्रामीणो को किसने सिखाया था की प्रकृति से जो कुछ लिया जाये उसका मूल्य किसी भी तरह चुकाना ही उसके कर्ज से मुक्ति का उपाय है
ये सब हमारे मन मे सैकड़ो भावनाओँ का ज्वार लाने मे सक्षम था
अब जब अर्थ डे पर दर्जनो व्यर्थ के शगूफे देखते हैं तो ये सब बाते बहुत याद आतीं है
अर्थ डे को गये बहुत दिन होगये हैं पर आज इसपर लिखने का कारण यहरहा की हम पर एक वचन का कर्ज था और कर्ज कैसा भी हो उसे समय रहते चुका देना चाहिये
(नीचे के चित्र मे समुद्र लहरो के समक्ष हाथ जोड़ कर वंदना करती सरल ग्रामीण महिला दिख रही हैजो तीर्थ राज स्वरूप रत्नाकर को भावार्घ्य देरही है कौन सा पर्यावरण विद या हम आप इनकी सरल विश्वास और प्रकृति से समीपता की होड़कर सकते हैं
या कुछ खास लोग इस चित्र को हमारे कर्ज से मुक्ति की रसीद मान सकते हैं 😊 )
लेखक अज्ञात है शायद गंगा महतो जी पोस्ट है..