Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक संन्यासी सारी दुनिया की यात्रा करके भारत वापस लौटा था | एक छोटी सी रियासत में मेहमान हुआ |

उस रियासत के राजा ने जाकर संन्यासी को कहा :
स्वामी , एक प्रश्न बीस वर्षो से निरंतर पूछ रहा हूं | कोई उत्तर नहीं मिलता |
क्या आप मुझे उत्तर देंगे ?
स्वामी ने कहा : निश्चित दूंगा |
उस संन्यासी ने उस राजा से कहा : नहीं , आज तुम खाली नहीं लौटोगे | पूछो |
उस राजा ने कहा : मैं ईश्वर से मिलना चाहता हूं | ईश्वर को समझाने की कोशिश मत करना | मैं सीधा मिलना चाहता हूं |
उस संन्यासी ने कहा : अभी मिलना चाहते हैं कि थोड़ी देर ठहर कर ?
राजा ने कहा : माफ़ करिए , शायद आप समझे नहीं | मैं परम पिता परमात्मा की बात कर रहा हूं , आप यह तो नहीं समझे कि किसी ईश्वर नाम वाले आदमी की बात कर रहा हूं ; जो आप कहते हैं कि अभी मिलना है कि थोड़ी देर रुक सकते हो ?

उस संन्यासी ने कहा : महानुभाव , भूलने की कोई गुंजाइश नहीं है | मैं तो चौबीस घंटे परमात्मा से मिलाने का धंधा ही करता हूं | अभी मिलना है कि थोड़ी देर रुक सकते हैं , सीधा जवाब दें |
बीस साल से मिलने को उत्सुक हो और आज वक्त आ गया तो मिल लो |
राजा ने हिम्मत की , उसने कहा : अच्छा मैं अभी मिलना चाहता हूं मिला दीजिए |
संन्यासी ने कहा : कृपा करो , इस छोटे से कागज पर अपना नाम पता लिख दो ताकि मैं भगवान के पास पहुंचा दूं कि आप कौन हैं |
राजा ने लिखा —- अपना नाम , अपना महल , अपना परिचय , अपनी उपाधियां और उसे दीं |
वह संन्यासी बोला कि महाशय , ये सब बाते मुझे झूठ और असत्य मालूम होती हैं जो आपने कागज पर लिखीं |
उस संन्यासी ने कहा : मित्र , अगर तुम्हारा नाम बदल दें तो क्या तुम बदल जाओगे ?
तुम्हारी चेतना , तुम्हारी सत्ता , तुम्हारा व्यक्तित्व दूसरा हो जाएगा ?
उस राजा ने कहा : नहीं, नाम के बदलने से मैं क्यों बदलूंगा ? नाम नाम है , मैं मैं हूं |
तो संन्यासी ने कहा : एक बात तय हो गई कि नाम तुम्हारा परिचय नहीं है , क्योंकि तुम उसके बदलने से बदलते नहीं | आज तुम राजा हो , कल गांव के भिखारी हो जाओ तो बदल जाओगे ?
उस राजा ने कहा : नहीं , राज्य चला जाएगा , भिखारी हो जाऊंगा , लेकिन मैं क्यों बदल जाऊंगा ?
मैं तो जो हूं हूं | राजा होकर जो हूं , भिखारी होकर भी वही होऊंगा |
न होगा मकान , न होगा राज्य , न होगी धन- संपति , लेकिन मैं ? मैं तो वही रहूंगा जो मैं हूं |

तो संन्यासी ने कहा : तय हो गई दूसरी बात कि राज्य तुम्हारा परिचय नहीं है , क्योंकि राज्य छिन जाए तो भी तुम बदलते नहीं | तुम्हारी उम्र कितनी है ?
उसने कहा : चालीस वर्ष |
संन्यासी ने कहा : तो पचास वर्ष के होकर तुम दुसरे हो जाओगे ? बीस वर्ष या जब बच्चे थे तब दुसरे थे ?
उस राजा ने कहा : नही | उम्र बदलती है , शरीर बदलता है लेकिन मैं ? मैं तो जो बचपन में था , जो मेरे भीतर था , वह आज भी है |
उस संन्यासी ने कहा : फिर उम्र भी तुम्हारा परिचय न रहा , शरीर भी तुम्हारा परिचय न रहा |

फिर तुम कौन हो ? उसे लिख दो तो पहुंचा दूं भगवान के पास , नहीं तो मैं भी झूठा बनूंगा तुम्हारे साथ |
यह कोई भी परिचय तुम्हारा नहीं है|
राजा बोला : तब तो बड़ी कठिनाई हो गई | उसे तो मैं भी नहीं जनता फिर ! जो मैं हूं , उसे तो मैं नहीं जनता ! इन्हीं को मैं जनता हूं मेरा होना |
उस संन्यासी ने कहा : फिर बड़ी कठिनाई हो गई , क्योंकि जिसका मैं परिचय भी न दे सकूं , बता भी न सकूं कि कौन मिलना चाहता है , तो भगवान भी क्या कहेंगे कि किसको मिलना चाहता है ?

तो जाओ पहले इसको खोज लो कि तुम कौन हो | और मैं तुमसे कहे देता हूं कि जिस दिन तुम यह जान लोगे कि तुम कौन हो ,
उस दिन तुम आओगे नहीं भगवान को खोजने |
क्योंकि खुद को जानने में वह भी जान लिया जाता है जो परमात्मा है |

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स्नेह और सेवा भावना
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रसायनशास्त्री नागार्जुन एक राज्य के राज वैद्य थे। एक दिन उन्होंने राजा से कहा, ‘मुझे एक सहायक की जरूरत है।’
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राजा ने उनके पास दो कुशल युवकों को भेजा और कहा कि उनमें से जो ज्यादा योग्य लगे उसे रख लें।
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नागार्जुन ने दोनों की कई तरह से परीक्षा ली पर दोनों की योग्यता एक जैसी थी।
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नागार्जुन दुविधा में पड़ गए कि आखिर किसे रखें।
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अंत में उन्होंने दोनों युवकों को एक पदार्थ दिया और कहा, ‘इसे पहचान कर कोई भी एक रसायन अपनी इच्छानुसार बनाकर ले आओ।
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हां, तुम दोनों सीधे न जाकर राजमार्ग के रास्ते से जाना।’
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दोनों राजमार्ग से होकर अपने-अपने घर चले गए। दूसरे दिन दोनों युवक आए।
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उनमें से एक युवक रसायन बना कर लाया था जबकि दूसरा खाली हाथ आया था।
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आचार्य ने रसायन की जांच की। उसे बनाने वाले युवक से उसके गुण-दोष पूछे। रसायन में कोई कमी नहीं थी।
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आचार्य ने दूसरे युवक से पूछा, ‘तुम रसायन क्यों नहीं लाए ?’
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उस युवक ने कहा, ‘मैं पहचान तो गया था मगर उसका कोई रसायन मैं तैयार नहीं कर सका।
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जब मैं राजमार्ग से जा रहा था तो देखा कि एक पेड़ के नीचे एक बीमार और अशक्त आदमी दर्द से तड़प रहा है।
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मैं उसे अपने घर ले आया और उसी की सेवा में इतना उलझ गया कि रसायन तैयार करने का समय ही नहीं मिला।’
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नागार्जुन ने उसे अपना सहायक रख लिया।
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दूसरे दिन राजा ने नागार्जुन से पूछा, ‘आचार्य। जिसने रसायन नहीं बनाया उसे ही आपने रख लिया। ऐसा क्यों ?’
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नागार्जुन ने कहा, ‘महाराज दोनों एक रास्ते से गए थे। एक ने बीमार को देखा और दूसरे ने उसे अनदेखा कर दिया।
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रसायन बनाना कोई जटिल नहीं था। मुझे तो यह जानना था कि दोनों में कौन मानव सेवा करने में समर्थ है।
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बीमार व्यक्ति चिकित्सक की दवा से ज्यादा उसके स्नेह और सेवा भावना से ठीक होता है, इसलिए मेरे काम का व्यक्ति वही है जिसे मैंने चुना है।’
जय श्री हरि…

Posted in यत्र ना्यरस्तुपूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:

अरुण सुक्ला

संसार की किसी भी धर्म पुस्तक में नारी की महिमा का इतना सुंदर गुण गान नहीं मिलता जितना वेदों में मिलता हैं.कुछ उद्हारण
१. उषा के समान प्रकाशवती-
ऋग्वेद ४/१४/३
हे राष्ट्र की पूजा योग्य नारी! तुम परिवार और राष्ट्र में सत्यम, शिवम्, सुंदरम की अरुण कान्तियों को छिटकती हुई आओ , अपने विस्मयकारी सद्गुणगणों के द्वारा अविद्या ग्रस्त जनों को प्रबोध प्रदान करो. जन-जन को सुख देने के लिए अपने जगमग करते हुए रथ पर बैठ कर आओ.
२. वीरांगना-
यजुर्वेद ५/१०
हे नारी! तू स्वयं को पहचान. तू शेरनी हैं, तू शत्रु रूप मृगों का मर्दन करनेवाली हैं, देवजनों के हितार्थ अपने अन्दर सामर्थ्य उत्पन्न कर. हे नारी ! तू अविद्या आदि दोषों पर शेरनी की तरह टूटने वाली हैं, तू दिव्य गुणों के प्रचारार्थ स्वयं को शुद्ध कर! हे नारी ! तू दुष्कर्म एवं दुर्व्यसनों को शेरनी के समान विश्वंस्त करनेवाली हैं, धार्मिक जनों के हितार्थ स्वयं को दिव्य गुणों से अलंकृत कर.
३. वीर प्रसवा
ऋग्वेद १०/४७/३
राष्ट्र को नारी कैसी संतान दे
हमारे राष्ट्र को ऐसी अद्भुत एवं वर्षक संतान प्राप्त हो, जो उत्कृष्ट कोटि के हथियारों को चलाने में कुशल हो, उत्तम प्रकार से अपनी तथा दूसरों की रक्षा करने में प्रवीण हो, सम्यक नेतृत्व करने वाली हो, धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष रूप चार पुरुषार्थ- समुद्रों का अवगाहन करनेवाली हो, विविध संपदाओं की धारक हो, अतिशय क्रियाशील हो, प्रशंशनीय हो, बहुतों से वरणीय हो, आपदाओं की निवारक हो.
४. विद्या अलंकृता
यजुर्वेद २०/८४
विदुषी नारी अपने विद्या-बलों से हमारे जीवनों को पवित्र करती रहे. वह कर्मनिष्ठ बनकर अपने कर्मों से हमारे व्यवहारों को पवित्र करती रहे. अपने श्रेष्ठ ज्ञान एवं कर्मों के द्वारा संतानों एवं शिष्यों में सद्गुणों और सत्कर्मों को बसाने वाली वह देवी गृह आश्रम -यज्ञ एवं ज्ञान- यज्ञ को सुचारू रूप से संचालित करती रहे.
५. स्नेहमयी माँ
अथर्वेद ७/६८/२
हे प्रेमरसमयी माँ! तुम हमारे लिए मंगल कारिणी बनो, तुम हमारे लिए शांति बरसाने वाली बनो, तुम हमारे लिए उत्कृष्ट सुख देने वाली बनो. हम तुम्हारी कृपा- दृष्टि से कभी वंचित न हो.
६. अन्नपूर्ण
अथर्ववेद ३/२८/४
इस गृह आश्रम में पुष्टि प्राप्त हो, इस गृह आश्रम में रस प्राप्त हो. इस गिरः आश्रम में हे देवी! तू दूध-घी आदि सहस्त्रों पोषक पदार्थों का दान कर. हे यम- नियमों का पालन करने वाली गृहणी! जिन गाय आदि पशु से पोषक पदार्थ प्राप्त होते हैं उनका तू पोषण कर.
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला: क्रिया:
जिस कुल में नारियो कि पूजा, अर्थात सत्कार होता हैं, उस कुल में दिव्यगुण , दिव्य भोग और उत्तम संतान होते हैं और जिस कुल में स्त्रियो कि पूजा नहीं होती, वहां जानो उनकी सब क्रिया निष्फल हैं

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एक दिन चेन्नई में समुद्र के किनारे धोती व शाल पहने हुए एक सज्जन भगवद गीता पढ़ रहे थे, तभी वहां एक लड़का आया और बोला-
“आज साइंस का जमाना है, फिर भी आप लोग ऐसी किताबे पढ़ते हो,? देखिए जमाना चांद पर पहुंच गया है और आप लोग वही गीता व रामायण पर ही अटके हुए हो?”

उन सज्जन ने उस लड़के से पूछा –
“आप गीता जी के विषय में क्या जानते हो?”

वह लड़का जोश में आकर बोला-
“अरे छोड़ो..! मैं विक्रम साराभाई रीसर्च संस्थान का छात्र हूँ, I’m a Scientist.. यह गीता बेकार है हमारे लिये।”

वह सज्जन हसने लगे, तभी दो बड़ी बड़ी गाड़िया वहां आयीं.l

एक गाड़ी से कुछ ब्लैक कमांडो निकले और एक गाड़ी से एक सैनिक, सैनिक ने पीछे का दरवाजा खोला तो वो सज्जन पुरुष चुपचाप गाड़ी में जाकर बैठ गये।

लड़का यह सब देखकर हक्का बक्का था, उसने दौड़कर उनसे पूंछा-
“सर.. सर आप कौन हो?”

वह सज्जन बोले-
“मैं विक्रम साराभाई हूँ।”
सुनकर लड़के को 440 वोल्टस का झटका लगा।

यह लड़का डा. अब्दुल कलाम थे।

इसी भगवद गीता को पढ़कर डॉ. अब्दुल कलाम ने आजीवन मांस न खाने की प्रतिज्ञा कर ली थी।

“नम्र रहें, सभ्य रहें! व्यक्ति के व्यक्तित्व की परीक्षा उनके वस्त्रों से नही उनके विचारों से होती है।”

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अरुण सुक्ला

औरंगजेब का बड़ा भाई दाराशिकोह उपनिषदों पर ऐसा लट्टू हुआ कि उसने उपनिषदों को पढने के लिए संस्कृत का अध्ययन किया और उपनिषदों का फ़ारसी में अनुवाद किया|
एक मुसलमान होते हुए और कुरान शरीफ़ को ईश्वरीय पुस्तक स्वीकार करते हुए शहजादा साहब ने उपनिषदों के विषय में बहुत ही उदार विचार प्रकट करते हुए उपनिषदों को समस्त ईश्वरीय पुस्तकों में प्राचीनतम बता दिया| इन्हीं विचारों के कारण औरंगजेब ने उसपर कुफ्र का फतवा लगाकर उसे क़त्ल करवा दिया|
औरंगजेब की पुत्री जेबुन्निसा ने अपने चाचा दाराशिकोह से उपनिषदों के रहस्यों को जाना| उसपर भी उपनिषदों का रंग चढ़ गया|
जेबुन्निसा के पास चीनी शीशा था, बहुत ही सुंदर, जिसे एक व्यापारी औरंगजेब को उपहार देकर गया था| एक दिन जेबुन्निसा छत पर बैठी हुई अपने केश सुखा रही थी तो उसे अपने उस शीशे की याद आई, उसने अपनी दासी को शीशा लाने की आज्ञा दी| दासी शीशा उठाकर चली पर थोड़ी दूर जाने पर ही सिष उसके हाथ से गिरकर टूट गया| दासी के पैरों तले जमीन खिसक गई, चेहरा पीला पड़ गया और ह्रदय धक-धक करने लगा| भयभीत होकर वहीं खड़ी रही| जब काफ़ी देर हो गई तो जेबुन्निसा ने आवाज दी| डरी और सहमी हुई दासी उसके समक्ष जाकर कांपती हुई वाणी में बोली- “हे शहजादी! मेरे दुर्भाग्य से वह शीशा गिरकर टुकड़े-टुकड़े हो गया”
यह सुनकर जेबुन्निसा को क्रोध नहीं आया, वह मुस्कुराकर बोली- “चलो, अच्छा हुआ वह विलासिता का सामान समाप्त हो गया| प्रतिदिन उसे देखने से अभिमान होता था| अब न उसे देखूंगी, न ही अभिमान होगा”
यह है उपनिषदों का जादू…………………..

Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

Jai shree ram hanumantaye namah Ji
*☝🏼एक ही घड़ी मुहूर्त में जन्म लेने पर भी सबके कर्म और भाग्य अलग अलग क्यों**
एक प्रेरक कथा …

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👇🏾 इस कथा से बोध अवश्य लेवे❗⬇

एक बार एक राजा ने विद्वान ज्योतिषियों की सभा बुलाकर प्रश्न किया-

मेरी जन्म पत्रिका के अनुसार मेरा राजा बनने का योग था मैं राजा बना, किन्तु उसी घड़ी मुहूर्त में अनेक जातकों ने जन्म लिया होगा जो राजा नहीं बन सके क्यों ..?

इसका क्या कारण है ?
राजा के इस प्रश्न से सब निरुत्तर हो गये ..
अचानक एक वृद्ध खड़े हुये बोले – महाराज आपको यहाँ से कुछ दूर घने जंगल में एक महात्मा मिलेंगे उनसे आपको उत्तर मिल सकता है..

☝🏼राजा ने घोर जंगल में जाकर देखा कि एक महात्मा आग के ढेर के पास बैठ कर अंगार ( गरमा गरम कोयला ) खाने में व्यस्त हैं..
राजा ने महात्मा से जैसे ही प्रश्न पूछा महात्मा ने क्रोधित होकर कहा “तेरे प्रश्न का उत्तर आगे पहाड़ियों के बीच एक और महात्मा हैं ,वे दे सकते हैं ।”

राजा की जिज्ञासा और बढ़ गयी, पहाड़ी मार्ग पार कर बड़ी कठिनाइयों से राजा दूसरे महात्मा के पास पहुंचा..

राजा हक्का बक्का रह गया ,दृश्य ही कुछ ऐसा था, वे महात्मा अपना ही माँस चिमटे से नोच नोच कर खा रहे थे..

राजा को महात्मा ने भी डांटते हुए कहा ” मैं भूख से बेचैन हूँ मेरे पास समय नहीं है…
आगे आदिवासी गाँव में एक बालक जन्म लेने वाला है ,जो कुछ ही देर तक जिन्दा रहेगा..
वह बालक तेरे प्रश्न का उत्तर दे सकता है..

राजा बड़ा बेचैन हुआ, बड़ी अजब पहेली बन गया मेरा प्रश्न..

उत्सुकता प्रबल थी..
राजा पुनः कठिन मार्ग पार कर उस गाँव में पहुंचा..
गाँव में उस दंपति के घर पहुंचकर सारी बात कही..

जैसे ही बच्चा पैदा हुआ दम्पत्ति ने नाल सहित बालक राजा के सम्मुख उपस्थित किया..

राजा को देखते ही बालक हँसते हुए बोलने लगा ..
राजन् ! मेरे पास भी समय नहीं है ,किन्तु अपना उत्तर सुन लो –
तुम,मैं और दोनों महात्मा सात जन्म पहले चारों भाई राजकुमार थे..
एक बार शिकार खेलते खेलते हम जंगल में तीन दिन तक भूखे प्यासे भटकते रहे ।
अचानक हम चारों भाइयों को आटे की एक पोटली मिली ।हमने उसकी चार बाटी सेंकी..

अपनी अपनी बाटी लेकर खाने बैठे ही थे कि भूख प्यास से तड़पते हुए एक महात्मा वहां आ गये..
अंगार खाने वाले भइया से उन्होंने कहा –
“बेटा ,मैं दस दिन से भूखा हूँ ,अपनी बाटी में से मुझे भी कुछ दे दो , मुझ पर दया करो , जिससे मेरा भी जीवन बच जाय …

इतना सुनते ही भइया गुस्से से भड़क उठे और बोले..

तुम्हें दे दूंगा तो मैं क्या खाऊंगा आग …? चलो भागो यहां से ….।

वे महात्मा फिर मांस खाने वाले भइया के निकट आये उनसे भी अपनी बात कही..

किन्तु उन भईया ने भी महात्मा से गुस्से में आकर कहा कि..
बड़ी मुश्किल से प्राप्त ये बाटी तुम्हें दे दूंगा तो क्या मैं अपना मांस नोचकर खाऊंगा ?
भूख से लाचार वे महात्मा मेरे पास भी आये..
मुझसे भी बाटी मांगी…
किन्तु मैंने भी भूख में धैर्य खोकर कह दिया कि
चलो आगे बढ़ो मैं क्या भूखा मरुँ …?

अंतिम आशा लिये वो महात्मा , हे राजन !..
आपके पास भी आये,दया की याचना की..
दया करते हुये ख़ुशी से आपने अपनी बाटी में से आधी बाटी आदर सहित उन महात्मा को दे दी ।
बाटी पाकर महात्मा बड़े खुश हुए और बोले..
तुम्हारा भविष्य तुम्हारे कर्म और व्यवहार से फलेगा ।
बालक ने कहा “इस प्रकार उस घटना के आधार पर हम अपना अपना भोग, भोग रहे हैं…
और वो बालक मर गया

धरती पर एक समय में अनेकों फल-फूल खिलते हैं,किन्तु सबके रूप, गुण,आकार-प्रकार,स्वाद भिन्न होते हैं ..।

राजा ने माना कि शास्त्र भी तीन प्रकार के हॆ–
ज्योतिष शास्त्र, कर्तव्य शास्त्र और व्यवहार शास्त्र

जातक सब अपना
किया, दिया, लिया

ही पाते हैं..
यही है जीवन…
“गलत पासवर्ड से एक छोटा सा मोबाइल नही खुलता..

तो सोचिये ..

गलत कर्मो से जन्नत के दरवाजे कैसे खुलेंगे
Jai shree ram hanumantaye namah Ji

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

जाग मछंदर गोरख आया !
गुरु गोरखनाथ।

गुरु गोरक्षनाथ जी का प्रादुर्भाव उस समय हुआ जब इस्लामिक अत्याचार और जोर- जबरदस्ती धर्मान्तरण का बलात्कारी दौर चल रहा था, एक तरफ बुत के नाम पर मंदिरों, मूर्तियों का भंजन करना ही अपना कर्तब्य समझना, दूसरी तरफ एक हाथ में तलवार दुसरे हाथ में कुरान लेकर भारत भूमि को रौदा जाना, तो वही कुछ चालाक सूफी संत जो अन्य धर्मो के प्रति समादर का भाव दिखाते थे।

वे भगवा कपडा भी पहन लेते थे जिससे हिन्दुओ को ठगा जा सके, पूरे भारत और हिन्दू समाज को निगल जाने का प्रयत्न कर रहे थे भगवान शंकर ने स्वयं गुरु गोरक्षनाथ के रूप में अवतार लेकर इस धरा के कष्ट को दूर करने का कार्य किया।

योगी मछंदरनाथ भ्रमण करते हुए अलख जगाते हुए जा रहे थे एक गाव में उनका डेरा पड़ा हुआ था वे प्रवचन कर रहे थे वहा उनका बड़ा ही स्वागत हुआ प्रातः काल एक ब्राह्मणी जिसके कोई संतान नहीं थी बड़ी ही दुखियारी दिख रही थी, योगी मछंदर नाथ बड़े ही ख्याति प्राप्त दयालु संत थे उस ब्राह्मणी ने अपना दुःख योगी से कहा अपना आचल फैलाकर उनके चरणों पर गिर पड़ी।

योगी ने एक भभूति की पुडिया उस महिला को दिया उसकी बिधि बताया की आज ही रात्रि में उसे वह खा लेगी उसे बड़ा ही तेजस्वी पुत्र प्राप्त होगा, योगी जी तो चले गए रात्रि में उसने बड़ी ही प्रसन्नता से अपने पति से सब घटना क्रम को बताया उसके पति ने योगी को गाली देते हुए उस भभूति को पास के एक गोबर के घूर पर फेक दिया आई -गयी बात समाप्त हो गयी।

बहुत दिन बीत गये मछंदरनाथ एक बार पुनः उसी रास्ते से जा रहे थे उसी गाव में रुके और उस ब्राह्मणी को बुलाया की वह मेरा आशिर्बाद कहा गया उसने पूरी घटना योगी जी से सुनाया योगी बड़े ही दुखी हुए क्यों की उनके गए हुए कोई दस वर्ष बीत गए थे उन्होंने पूछा की वह राखी कहा फेका था बताये हुए उस गोबर के घूर पर जाकर उन्होंने अपने शिष्य को आवाज लगायी तो एक सुन्दर बालक गुरु की जय -जय कार करता हुआ बाहर निकला और गुरु के पीछे -पीछे चल दिया।

गोबर के घूर से उत्पत्ति होने के कारन उनका नाम गोरक्षनाथ पड़ा वे गुरु के बड़े अनन्य ही भक्त और अनुरागी थे उन्होंने इस नाथ परंपरा को आगे ही नहीं बढाया बल्कि योगियों की एक ऐसी श्रृखला पूरे देश में खड़ी कर दी जिससे मुसलमानों के सूफियो द्वारा जो धर्मान्तरण हो रहा था उस पर केवल रोक ही नहीं लगी बल्कि गुरु गोरक्षनाथ ने धर्मान्तरित लोगो की घर वापसी भी की।

उन्होंने योगियों की एक अद्भुत टोली का निर्माण किया जिसने गावं -गावं में जागरण का अद्भुत काम किया जगद्गुरु शंकराचार्य के पश्चात् धर्म रक्षा हेतु शायद ही किसी ने इतनी बड़ी संख्या में धर्म प्रचारकों की श्रृखला खड़ी की हो वे सूफियो के इस षणयंत्र को समझते थे सूफियो का आन्दोलन ही था हिन्दुओ का धर्मान्तरण करना और भारत भूमि का इस्लामीकरण करना।

कहते है की एक बार योगी मछंदरनाथ एक स्त्री राज्य में चले गए और वह के रानी के षणयंत्र में फंस गए, दरबार में पहुचने के पश्चात् उन्होंने कहा की मै किसी महिला के हाथ का भिक्षा नहीं लेता रानी ने कहा की आप को अपने ऊपर विस्वास नहीं है क्या ?

योगी उसके चाल में फंस चुके थे रानी के दरबार में कोई पुरुष का प्रवेश नहीं था भजन करते-करते योगी का मन लग गया और वही रहने लगे बहुत दिन बीतने के पश्चात् सभी योगियों को बड़ी चिंता हुई कुछ योगी तो शिष्य गोरक्षनाथ को चिढाते की जिस गुरु के प्रति इतनी श्रद्धा रखते हो वह गुरु कैसा निकला वह तो एक रानी के चक्कर में फंस गया है, वे अपने गुरु के प्रति श्रद्धा भक्ति से समर्पित थे अपने गुरु की खोज में चल दिए।

और उस राज्य में पहुच गए लेकिन क्या था वह तो पुरुष प्रवेश ही बर्जित था वे गुरु भक्त थे हार नहीं माने और अपनी धुन बजाना शुरू किया उसमे जो सुर -तान निकला ”जाग मछंदर गोरख आया ” उस समय वे रानी के साथ झुला झूल रहे थे उन्हें ध्यान में आया की अरे ये तो मेरा प्रिय शिष्य गोरख है यो मछंदरनाथ जैसे थे वैसे ही अपने प्रिय शिष्य के पास चल दिए इस प्रकार वे केवल हिन्दू समाज की रक्षा ही नहीं की बल्कि अपने गुरु को भी सदमार्ग पर वापस लाये.।

दिखाई पड़ता है की जिस प्रकार देश -धर्म की रक्षा हेतु शंकराचार्य का प्रादुर्भाव हुआ उसी प्रकार गोरक्षनाथ इस भारत भूमि पर अवतरित हुए, जैसे शंकराचार्य अपने गुरु गोविंदपाद के बड़े ही प्रिय और भक्त थे उसी प्रकार गोरक्षनाथ भी योगी मछंदरनाथ के प्रिय और भक्त थे।

जिस प्रकार बौद्ध धर्म से वैदिक धर्म की रक्षा शंकराचार्य ने की उसी प्रकार गुरु गोरक्षनाथ ने इस्लाम से हिन्दू धर्म की रक्षा की इन दोनों में इतनी ही समानता नहीं पायी जाती बल्कि दोनों को ही हिन्दू समाज भगवान शंकर का अवतार मानता है समय-समय पर इस भारत भूमि और हिन्दू धर्म को बचाने के लिए महापुरुषों की जो श्रृंखला आयी उसमे गुरु गोरक्षनाथ का महत्व पूर्ण स्थान है।