Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

💐👳🏼‍♀ कबीर जी की पगड़ी 👳🏼‍♀💐 *एक प्रसिद्ध किवंदती हैं। एक बार संत कबीर ने बड़ी कुशलता से पगड़ी बनाई। झीना- झीना कपडा बुना और उसे गोलाई में लपेटा। हो गई पगड़ी तैयार। वह पगड़ी जिसे हर कोई बड़ी शान से अपने सिर सजाता हैं। यह नई नवेली पगड़ी लेकर संत कबीर दुनिया की हाट में जा बैठे। ऊँची- ऊँची पुकार उठाई- 'शानदार पगड़ी! जानदार पगड़ी! दो टके की भाई! दो टके की भाई!'* *एक खरीददार निकट आया। उसने घुमा- घुमाकर पगड़ी का निरीक्षण किया। फिर कबीर जी से प्रश्न किया- 'क्यों महाशय एक टके में दोगे क्या?' कबीर जी ने अस्वीकार कर दिया- 'न भाई! दो टके की है। दो टके में ही सौदा होना चाहिए।' खरीददार भी नट गया। पगड़ी छोड़कर आगे बढ़ गया। यही प्रतिक्रिया हर खरीददार की रही।* *सुबह से शाम हो गई। कबीर जी अपनी पगड़ी बगल में दबाकर खाली जेब वापिस लौट आए। थके- माँदे कदमों से घर- आँगन में प्रवेश करने ही वाले थे कि तभी... एक पड़ोसी से भेंट हो गई। उसकी दृष्टि पगड़ी पर पड गई। 'क्या हुआ संत जी, इसकी बिक्री नहीं हुई?'- पड़ोसी ने जिज्ञासा की। कबीर जी ने दिन भर का क्रम कह सुनाया। पड़ोसी ने कबीर जी से पगड़ी ले ली- 'आप इसे बेचने की सेवा मुझे दे दीजिए। मैं कल प्रातः ही बाजार चला जाऊँगा।'* *अगली सुबह... कबीर जी के पड़ोसी ने ऊँची- ऊँची बोली लगाई- 'शानदार पगड़ी! जानदार पगड़ी! आठ टके की भाई! आठ टके की भाई!' पहला खरीददार निकट आया, बोला- 'बड़ी महंगी पगड़ी हैं! दिखाना जरा!'*

पडोसी- पगड़ी भी तो शानदार है। ऐसी और कही नहीं मिलेगी।

खरीददार- ठीक दाम लगा लो, भईया।

पड़ोसी- चलो, आपके लिए- सात टका लगा देते हैं।

खरीददार – ये लो छः टका। पगड़ी दे दो।*एक घंटे के भीतर- भीतर पड़ोसी पगड़ी बेचकर वापस लौट आया। कबीर जी के चरणों में छः टके अर्पित किए। पैसे देखकर कबीर जी के मुख से अनायास ही निकल पड़ा-*

सत्य गया पाताल में,
झूठ रहा जग छाए।
दो टके की पगड़ी,
छः टके में जाए।।

यही इस जगत का व्यावहारिक सत्य है। सत्य के पारखी इस जगत में बहुत कम होते हैं। संसार में अक्सर सत्य का सही मूल्य नहीं मिलता, लेकिन असत्य बहुत ज्यादा कीमत पर बिकता हैं। इसलिए कबीर जी ने कहा-

‘सच्चे का कोई ग्राहक नाही, झूठा जगत पतीजै जी।

Posted in जीवन चरित्र

नेताजी सैनिकों के बीच में ही रहते थे।
अपने बीच में सुभाष को देख सैनिक भगवान रामचंद्र का युग स्मरण करने लगे।
ऐसा पहली बार हुआ था कि भारत का सर्वोच्च नेता आजादी की जंग का नेतृत्व स्वयं कर रहा था।

उस रात नेताजी ने देर रात तक अपने अधिकारियों से विचार-विमर्श किया और फिर अपने तंबू में सोने के लिए चले गये।

उस दिन नेताजी के तंबू की सुरक्षा का दायित्व रानी लक्ष्मीबाई रेजीमेंट के उपर था।

नेताजी की सुरक्षा के लिए नीरा को भी तैनात किया गया था।
नीरा की तैनाती तंबू के पीछे की ओर थीं।
हाथ में रायफल लिए वह बड़ी ही होशियारी के साथ अपने कर्तव्य का पालन कर रही थी।

रात के करीब दो बजे होंगे। सारे सैनिक गहरी निद्रा में सोए हुए थे।
स्वयं नेताजी भी गहरी निद्रा में देश की आजादी के सपने देख रहे थे।
संतरी भी इधर-उधर लुढ़क पड़े थे.
केवल नीरा ही ऐसी वीर सैनिक थी, जो अपने फर्ज को सही ढंग से अंजाम दे रही थी।

अमावश की काली रात।

हल्की-हल्की हवा सांय-सांय करती हुई बह रही थी। घुप्प अंधेरा।

‘‘ठहरो,’’ नीरा ने अपने से थोड़ी दूर एक परछाई को आते देखा तो उसने सावधानी के साथ कहा,
‘‘वहीं रुक जाओ और अपना कोड़ वर्ड बताओ।’’

‘‘मैं गुप्तचर हूँ,
इसी वक्त नेताजी को बहुत अहम् जानकारी देनी है।’’ उस परछाई ने कहा।

नीरा को आवाज कुछ जानी पहचानी लगी, लेकिन जब परछाई उसके और करीब आयी, तो वह चीख पड़ी, ‘‘श्रीकांत तुम?’’

‘‘हाँ मैं,’’
श्रीकांत ने कहा,
‘‘मुझे तुम्हारे नेताजी को परलोक पहुँचाना है?’’

‘‘देखो मैं कहती हूँ चले जाओ, नहीं तो…।’’
‘‘तुम कुछ नहीं कर सकती,’’ श्रीकांत ने कहा,
‘‘क्योंकि तुम भारतीय नारी हो और इसीलिए भारतीय नारी न तो अपने पति को कैद करवा सकती है और न ही पति की हत्या!’’

‘‘देखो, मैं सावधान करती हूँ, यदि एक कदम भी आगे बढ़ाया तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा।’’

‘‘और अगर मैंने नेताजी को परलोक नहीं पहुँचाया तो मेरी नौकरी तो जाएगी ही, कैद मिलेगी सो अलग।’’

‘‘तुम आजाद हिंद फौज में भर्ती हो जाओ, यह दुनिया की सबसे बड़ी नौकरी होगी।’’

‘‘दुनिया की सबसे बड़ी नौकरी,’’ श्रीकांत ने कटाक्ष किया,
‘‘अंग्रेजी बागियों का साथ देकर काले पानी जाना है क्या?’’

‘‘काला पानी भी किसी तीर्थ से कम नहीं है!’’

‘‘बकवास बंद करो और मुझे अपना काम करने दो।’’
कहकर श्रीकांत ने
जैसे ही नेताजी के तंबू में घुसने की कोशिश की तो नीरा ने उसकी बगल में रायफल की संगीन घुसेड़ते हुए कहा,
‘‘हे! ईश्वर इस पतिहंता को क्षमा करना।’’

परंतु श्रीकांत भी बड़ा ही सावधान था।
उसने अपने को संभालते हुए अपनी रिलाल्वर की दो गोलियां नीरा के माथे पर दागकर उसकी बिंदी और माथे का सिंदूर हमेशा-हमेशा के लिए मिटा दिया।’’

जयहिंद कहती हुई नीरा नश्वर शरीर छोड़कर स्वर्गधाम जा चुकी थी,
लेकिन घायल श्रीकांत नेताजी के तंबू में घुस पाता, उससे पहले ही नेताजी जाग गये थे और अन्य संतरी भी आ गये थे।

‘‘इसे गिरफ्तार कर लो’’
नेताजी ने सुरक्षाकर्मियों को आदेश दिया और फिर नीरा के मृतक शरीर के माथे पर हाथ रखते ही उनकी आँखों से अश्रुधारा बह चली,
‘‘ बहन तुमने मातृभूमि का ऋण चुका दिया है। दिल्ली पहुँचकर लालकिले पर शहीदों की स्मृति मेें जो नामपट लगाया जाएगा, उसमें सबसे पहले आपका और आपके गाँव खेकड़ा का नाम अंकित किया जाएगा… जयहिंद!’’

आज लालकिले पर न तो उस वीरांगना का नाम है और न ही उसके गांव का नाम,
लेकिन आज भारत आजाद है।