Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

कहानी – किस्से आपने खूब पढ़े होंगे मगर जो बात इस लेख में पढ़ने जा रहे हैं वह अगर आपके मर्म को छू जाए तो अपने युवा साथियों और अपने बच्चों को अवश्य बताएं : –

पढ़ाई पूरी करने के बाद एक छात्र किसी बड़ी कंपनी में नौकरी पाने की चाह में इंटरव्यू देने के लिए पहुंचा….

छात्र ने बड़ी आसानी से पहला इंटरव्यू पास कर लिया…

अब फाइनल इंटरव्यू
कंपनी के डायरेक्टर को लेना था…

और डायरेक्टर को ही तय
करना था कि उस छात्र को नौकरी पर रखा जाए या नहीं…

डायरेक्टर ने छात्र का सीवी (curricular vitae) देखा और पाया कि पढ़ाई के साथ- साथ यह छात्र ईसी (extra curricular activities) में भी हमेशा अव्वल रहा…

डायरेक्टर- “क्या तुम्हें पढ़ाई के दौरान
कभी छात्रवृत्ति (scholarship) मिली…?”

छात्र- “जी नहीं…”

डायरेक्टर- “इसका मतलब स्कूल-कॉलेज की फीस तुम्हारे पिता अदा करते थे..”

छात्र- “जी हाँ , श्रीमान ।”

डायरेक्टर- “तुम्हारे पिताजी क्या काम करते है?”

छात्र- “जी वो लोगों के कपड़े धोते हैं…”

यह सुनकर कंपनी के डायरेक्टर ने कहा- “ज़रा अपने हाथ तो दिखाना…”

छात्र के हाथ रेशम की तरह मुलायम और नाज़ुक थे…

डायरेक्टर- “क्या तुमने कभी कपड़े धोने में अपने पिताजी की मदद की…?”

छात्र- “जी नहीं, मेरे पिता हमेशा यही चाहते थे
कि मैं पढ़ाई करूं और ज़्यादा से ज़्यादा किताबें
पढ़ूं…

हां , एक बात और, मेरे पिता बड़ी तेजी से कपड़े धोते हैं…”

डायरेक्टर- “क्या मैं तुम्हें एक काम कह सकता हूं…?”

छात्र- “जी, आदेश कीजिए…”

डायरेक्टर- “आज घर वापस जाने के बाद अपने पिताजी के हाथ धोना…
फिर कल सुबह मुझसे आकर मिलना…”

छात्र यह सुनकर प्रसन्न हो गया…
उसे लगा कि अब नौकरी मिलना तो पक्का है,

तभी तो डायरेक्टर ने कल फिर बुलाया है…

छात्र ने घर आकर खुशी-खुशी अपने पिता को ये सारी बातें बताईं और अपने हाथ दिखाने को कहा…

पिता को थोड़ी हैरानी हुई…
लेकिन फिर भी उसने बेटे
की इच्छा का मान करते हुए अपने दोनों हाथ उसके
हाथों में दे दिए…

छात्र ने पिता के हाथों को धीरे-धीरे धोना शुरू किया.

साथ ही उसकी आंखों से आंसू भी झर-झर बहने लगे…

पिता के हाथ रेगमाल (emery paper) की तरह सख्त और जगह-जगह से कटे हुए थे…

यहां तक कि जब भी वह कटे के निशानों पर पानी डालता, चुभन का अहसास
पिता के चेहरे पर साफ़ झलक जाता था…।

छात्र को ज़िंदगी में पहली बार एहसास हुआ कि ये
वही हाथ हैं जो रोज़ लोगों के कपड़े धो-धोकर उसके
लिए अच्छे खाने, कपड़ों और स्कूल की फीस का इंतज़ाम करते थे…

पिता के हाथ का हर छाला सबूत था उसके एकेडैमिक कैरियर की एक-एक
कामयाबी का…

पिता के हाथ धोने के बाद छात्र को पता ही नहीं चला कि उसने उस दिन के बचे हुए सारे कपड़े भी एक-एक कर धो डाले…

उसके पिता रोकते ही रह गए , लेकिन छात्र अपनी धुन में कपड़े धोता चला गया…

उस रात बाप- बेटे ने काफ़ी देर तक बातें कीं …

अगली सुबह छात्र फिर नौकरी के लिए कंपनी के डायरेक्टर के ऑफिस में था…

डायरेक्टर का सामना करते हुए छात्र की आंखें गीली थीं…

डायरेक्टर- “हूं , तो फिर कैसा रहा कल घर पर ?
क्या तुम अपना अनुभव मेरे साथ शेयर करना पसंद करोगे….?”

छात्र- ” जी हाँ , श्रीमान कल मैंने जिंदगी का एक वास्तविक अनुभव सीखा…

नंबर एक… मैंने सीखा कि सराहना क्या होती है…
मेरे पिता न होते तो मैं पढ़ाई में इतनी आगे नहीं आ सकता था…

नंबर दो… पिता की मदद करने से मुझे पता चला कि किसी काम को करना कितना सख्त और मुश्किल होता है…

नंबर तीन.. . मैंने रिश्तों की अहमियत पहली बार
इतनी शिद्दत के साथ महसूस की…”

डायरेक्टर- “यही सब है जो मैं अपने मैनेजर में देखना चाहता हूं…

मैं यह नौकरी केवल उसे देना चाहता हूं जो दूसरों की मदद की कद्र करे,
ऐसा व्यक्ति जो काम किए जाने के दौरान दूसरों की तकलीफ भी महसूस करे…

ऐसा शख्स जिसने
सिर्फ पैसे को ही जीवन का ध्येय न बना रखा हो…

मुबारक हो, तुम इस नौकरी के पूरे हक़दार हो…”

आप अपने बच्चों को बड़ा मकान दें, बढ़िया खाना दें,
बड़ा टीवी, मोबाइल, कंप्यूटर सब कुछ दें…

लेकिन साथ ही अपने बच्चों को यह अनुभव भी हासिल करने दें कि उन्हें पता चले कि घास काटते हुए कैसा लगता है ?

उन्हें भी अपने हाथों से ये काम करने दें…

खाने के बाद कभी बर्तनों को धोने का अनुभव भी अपने साथ घर के सब बच्चों को मिलकर करने दें…

ऐसा इसलिए
नहीं कि आप मेड पर पैसा खर्च नहीं कर सकते,
बल्कि इसलिए कि आप अपने बच्चों से सही प्यार करते हैं…

आप उन्हें समझाते हैं कि पिता कितने भी अमीर
क्यों न हो, एक दिन उनके बाल सफेद होने ही हैं…

सबसे अहम हैं आप के बच्चे किसी काम को करने
की कोशिश की कद्र करना सीखें…

एक दूसरे का हाथ
बंटाते हुए काम करने का जज्ब़ा अपने अंदर
लाएं…

यही है सबसे बड़ी सीख…………..
सन्मार्ग_____________________

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💐👳🏼‍♀ कबीर जी की पगड़ी 👳🏼‍♀💐 *एक प्रसिद्ध किवंदती हैं। एक बार संत कबीर ने बड़ी कुशलता से पगड़ी बनाई। झीना- झीना कपडा बुना और उसे गोलाई में लपेटा। हो गई पगड़ी तैयार। वह पगड़ी जिसे हर कोई बड़ी शान से अपने सिर सजाता हैं। यह नई नवेली पगड़ी लेकर संत कबीर दुनिया की हाट में जा बैठे। ऊँची- ऊँची पुकार उठाई- 'शानदार पगड़ी! जानदार पगड़ी! दो टके की भाई! दो टके की भाई!'* *एक खरीददार निकट आया। उसने घुमा- घुमाकर पगड़ी का निरीक्षण किया। फिर कबीर जी से प्रश्न किया- 'क्यों महाशय एक टके में दोगे क्या?' कबीर जी ने अस्वीकार कर दिया- 'न भाई! दो टके की है। दो टके में ही सौदा होना चाहिए।' खरीददार भी नट गया। पगड़ी छोड़कर आगे बढ़ गया। यही प्रतिक्रिया हर खरीददार की रही।* *सुबह से शाम हो गई। कबीर जी अपनी पगड़ी बगल में दबाकर खाली जेब वापिस लौट आए। थके- माँदे कदमों से घर- आँगन में प्रवेश करने ही वाले थे कि तभी... एक पड़ोसी से भेंट हो गई। उसकी दृष्टि पगड़ी पर पड गई। 'क्या हुआ संत जी, इसकी बिक्री नहीं हुई?'- पड़ोसी ने जिज्ञासा की। कबीर जी ने दिन भर का क्रम कह सुनाया। पड़ोसी ने कबीर जी से पगड़ी ले ली- 'आप इसे बेचने की सेवा मुझे दे दीजिए। मैं कल प्रातः ही बाजार चला जाऊँगा।'* *अगली सुबह... कबीर जी के पड़ोसी ने ऊँची- ऊँची बोली लगाई- 'शानदार पगड़ी! जानदार पगड़ी! आठ टके की भाई! आठ टके की भाई!' पहला खरीददार निकट आया, बोला- 'बड़ी महंगी पगड़ी हैं! दिखाना जरा!'*

पडोसी- पगड़ी भी तो शानदार है। ऐसी और कही नहीं मिलेगी।

खरीददार- ठीक दाम लगा लो, भईया।

पड़ोसी- चलो, आपके लिए- सात टका लगा देते हैं।

खरीददार – ये लो छः टका। पगड़ी दे दो।*एक घंटे के भीतर- भीतर पड़ोसी पगड़ी बेचकर वापस लौट आया। कबीर जी के चरणों में छः टके अर्पित किए। पैसे देखकर कबीर जी के मुख से अनायास ही निकल पड़ा-*

सत्य गया पाताल में,
झूठ रहा जग छाए।
दो टके की पगड़ी,
छः टके में जाए।।

यही इस जगत का व्यावहारिक सत्य है। सत्य के पारखी इस जगत में बहुत कम होते हैं। संसार में अक्सर सत्य का सही मूल्य नहीं मिलता, लेकिन असत्य बहुत ज्यादा कीमत पर बिकता हैं। इसलिए कबीर जी ने कहा-

‘सच्चे का कोई ग्राहक नाही, झूठा जगत पतीजै जी।

Posted in जीवन चरित्र

नेताजी सैनिकों के बीच में ही रहते थे।
अपने बीच में सुभाष को देख सैनिक भगवान रामचंद्र का युग स्मरण करने लगे।
ऐसा पहली बार हुआ था कि भारत का सर्वोच्च नेता आजादी की जंग का नेतृत्व स्वयं कर रहा था।

उस रात नेताजी ने देर रात तक अपने अधिकारियों से विचार-विमर्श किया और फिर अपने तंबू में सोने के लिए चले गये।

उस दिन नेताजी के तंबू की सुरक्षा का दायित्व रानी लक्ष्मीबाई रेजीमेंट के उपर था।

नेताजी की सुरक्षा के लिए नीरा को भी तैनात किया गया था।
नीरा की तैनाती तंबू के पीछे की ओर थीं।
हाथ में रायफल लिए वह बड़ी ही होशियारी के साथ अपने कर्तव्य का पालन कर रही थी।

रात के करीब दो बजे होंगे। सारे सैनिक गहरी निद्रा में सोए हुए थे।
स्वयं नेताजी भी गहरी निद्रा में देश की आजादी के सपने देख रहे थे।
संतरी भी इधर-उधर लुढ़क पड़े थे.
केवल नीरा ही ऐसी वीर सैनिक थी, जो अपने फर्ज को सही ढंग से अंजाम दे रही थी।

अमावश की काली रात।

हल्की-हल्की हवा सांय-सांय करती हुई बह रही थी। घुप्प अंधेरा।

‘‘ठहरो,’’ नीरा ने अपने से थोड़ी दूर एक परछाई को आते देखा तो उसने सावधानी के साथ कहा,
‘‘वहीं रुक जाओ और अपना कोड़ वर्ड बताओ।’’

‘‘मैं गुप्तचर हूँ,
इसी वक्त नेताजी को बहुत अहम् जानकारी देनी है।’’ उस परछाई ने कहा।

नीरा को आवाज कुछ जानी पहचानी लगी, लेकिन जब परछाई उसके और करीब आयी, तो वह चीख पड़ी, ‘‘श्रीकांत तुम?’’

‘‘हाँ मैं,’’
श्रीकांत ने कहा,
‘‘मुझे तुम्हारे नेताजी को परलोक पहुँचाना है?’’

‘‘देखो मैं कहती हूँ चले जाओ, नहीं तो…।’’
‘‘तुम कुछ नहीं कर सकती,’’ श्रीकांत ने कहा,
‘‘क्योंकि तुम भारतीय नारी हो और इसीलिए भारतीय नारी न तो अपने पति को कैद करवा सकती है और न ही पति की हत्या!’’

‘‘देखो, मैं सावधान करती हूँ, यदि एक कदम भी आगे बढ़ाया तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा।’’

‘‘और अगर मैंने नेताजी को परलोक नहीं पहुँचाया तो मेरी नौकरी तो जाएगी ही, कैद मिलेगी सो अलग।’’

‘‘तुम आजाद हिंद फौज में भर्ती हो जाओ, यह दुनिया की सबसे बड़ी नौकरी होगी।’’

‘‘दुनिया की सबसे बड़ी नौकरी,’’ श्रीकांत ने कटाक्ष किया,
‘‘अंग्रेजी बागियों का साथ देकर काले पानी जाना है क्या?’’

‘‘काला पानी भी किसी तीर्थ से कम नहीं है!’’

‘‘बकवास बंद करो और मुझे अपना काम करने दो।’’
कहकर श्रीकांत ने
जैसे ही नेताजी के तंबू में घुसने की कोशिश की तो नीरा ने उसकी बगल में रायफल की संगीन घुसेड़ते हुए कहा,
‘‘हे! ईश्वर इस पतिहंता को क्षमा करना।’’

परंतु श्रीकांत भी बड़ा ही सावधान था।
उसने अपने को संभालते हुए अपनी रिलाल्वर की दो गोलियां नीरा के माथे पर दागकर उसकी बिंदी और माथे का सिंदूर हमेशा-हमेशा के लिए मिटा दिया।’’

जयहिंद कहती हुई नीरा नश्वर शरीर छोड़कर स्वर्गधाम जा चुकी थी,
लेकिन घायल श्रीकांत नेताजी के तंबू में घुस पाता, उससे पहले ही नेताजी जाग गये थे और अन्य संतरी भी आ गये थे।

‘‘इसे गिरफ्तार कर लो’’
नेताजी ने सुरक्षाकर्मियों को आदेश दिया और फिर नीरा के मृतक शरीर के माथे पर हाथ रखते ही उनकी आँखों से अश्रुधारा बह चली,
‘‘ बहन तुमने मातृभूमि का ऋण चुका दिया है। दिल्ली पहुँचकर लालकिले पर शहीदों की स्मृति मेें जो नामपट लगाया जाएगा, उसमें सबसे पहले आपका और आपके गाँव खेकड़ा का नाम अंकित किया जाएगा… जयहिंद!’’

आज लालकिले पर न तो उस वीरांगना का नाम है और न ही उसके गांव का नाम,
लेकिन आज भारत आजाद है।