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हनुमानजी और शनि महाराज के एक प्रसंग !!!!!!

तुलसीदासजी कहते हैं- “संकट ते हनुमान छुड़ावें” शनि को हम संकट कहते हैं, एक बार हनुमानजी पहाड़ की तलहटी में बैठे थे तभी शनि महाराज हनुमानजी के सिर पर आ गये, हनुमानजी ने सिर खुजाया लगता है कोई कीड़ा आ गया, हनुमानजी ने पूछा तू है कौन? शनिदेव ने कहां- मैं शनि हूँ, मैं संकट हूँ, हनुमानजी ने कहा मेरे पास क्यो आये हो? शनि बोले मैं अब आपके सिर पर निवास करूँगा।

हनुमानजी ने कहाँ- अरे भले आदमी, मैंने ही तुझे रावण के बंधन से छुड़वाया था और मेरे ही सिर पर आ गये, बोले हाँ क्यो छुड़ाया था आपने, इसका फल तो आपको भोगना पडे़गा, अच्छा कितने दिन रहना है? शनि बोला साढ़े सात साल और अच्छी खातिरदारी हो गयी तो ढाई साल और, हनुमानजी ने कहा भले आदमी किसी और के पास जाओं।

मैं भला श्री रामजी का मजदूर आदमी, सुबह से शाम तक सेवा में लगा रहता हूँ, मुश्किल पड़ जाएगी, तुम भी दुःख भोगेगे और मुझे भी परेशान करोगे, शनिदेव ने कहा मैं तो नही जाऊंगा, हनुमानजी बोले कोई बात नही तुम ऐसे नही मानोगे, हनुमानजी ने एक बहुत बड़ा पत्थर उठाया और अपने सिर पर रखा,

पत्थर शनिदेव के ऊपर आ गया, शनि महाराज बोले यह क्या कर रहे हो? बोले माँ ने कहा था कि चटनी बनाने के लिए एक बटना ले आना वह ले जा रहा हूँ, हनुमानजी ने जैसे ही पत्थर को उठाकर मचका दिया तो शनि चीं बोलने लगा, दूसरी बार किया तो बोले क्या करते हो? बोले चिन्ता मत करों, शनिदेव बोले- छोड़ो-छोड़ो, हनुमानजी बोले नहीं अभी तो साढ़े सात मिनट भी नहीं हुये है, तुम्हें तो साढ़े सात साल रहना है।

जब दो-तीन मचके ओर दिये तो शनिदेव तिलमिला गये, शनिदेव ने कहा भैय्या मेरे ऊपर कृपा करो, बोले ऐसी कृपा नही करूँगा, बोले वरदान देकर जाओं, शनि का ही दिन था, हनुमानजी ने कहा कि तुम मेरे भक्तो को सताना बंद करोगे, तब शनि ने कहा कि हनुमानजी के जो भी भक्त शनिवार को आपका स्मरण करेगा आपके चालीसा का पाठ करेगा मैं उसके यहाँ नही, बल्कि उसके पडोसी के वहाँ भी कभी नही जाऊंगा, उसका संकट दूर हो जायेगा।

फिर शनिदेव ने कहा कि हनुमानजी एक कृपा आप भी मुझ पर कर दीजिये, हनुमानजी बोले क्या? शनिदेव बोले- आपने इतनी ज्यादा मेरी हड्डियां चरमरा दी हैं, इसलिये थोड़ी तेल मालिश हो जाये तो बड़ी कृपा हो जायें, हनुमानजी ने कहा कि ठीक है मैं अपने भक्तो को कहता हूँ कि शनिवार के दिन जो शनिदेव को तेल चढ़ायेंगा उसके संकट मैं स्वयं दूर करूँगा।

दूसरा संकट क्या है? त्रिताप ही संकट है, दैविक, दैहिक तथा भौतिक ताप यही संकट है और इसकी मुक्ति का साधन क्या है? केवल भगवान् का सुमिरन, “राम राज बैठें त्रैलोका, हरषित भये गये सब सोका” रामराज कोई शासन की व्यवस्था का नाम नही है, रामराज मानव के स्वभाव की अवस्था का नाम है, समाज की दिव्य अवस्था का नाम है।

आज कहते हैं कि हम रामराज लायेंगे, तो भाई-बहनों फिर राम कहाँ से लायेंगे? नहीं-नहीं व्यवस्था नहीं, वह अवस्था जिसको रामराज कहते हैं, रामराज्य की अवस्था क्या है? “सब नर करहिं परस्पर प्रीती, चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती” यह रामराज्य की अवस्था है, व्यवस्था कैसी भी हो अगर, व्यक्तियों की और समाज की यह अवस्था रहेगी तो शासन में कोई भी बैठो राज्य राम का ही माना जायेगा,

राम मर्यादा है, धर्म है, सत्य है, शील है, सेवा है, समर्पण है, राम किसी व्यक्तित्व का नाम नही है, राम वृत्ति का नाम है, स्वरूप का नाम राम नहीं है बल्कि स्वभाव का नाम राम है, इस स्वभाव के जो भी होंगे वे सब राम ही कहलायेंगे, वेद का, धर्म की मर्यादा का पालन हो, स्वधर्म का पालन हो, यही रामराज्य है।

स्वधर्म का अर्थ हिन्दू, मुसलमान, सिक्ख, ईसाई, बौद्ध धर्म का पालन नही है, स्वधर्म का अर्थ है जिस-जिस का जो-जो धर्म है, पिता का पुत्र के प्रति धर्म, पुत्र का पिता के प्रति धर्म, स्वामी का धर्म, सेवक का धर्म, राजा का धर्म, प्रजा का धर्म, पति का धर्म, पत्नी का धर्म, शिक्षक का धर्म, शिष्य का धर्म।

यानी अपने-अपने कर्तव्य का पालन, जैसे सड़क पर अपनी-अपनी लाईन में यदि वाहन चलेंगे तो किसी प्रकार की टकराहट नही होगी, संघर्ष नही होगा और जब आप लाईन तोड़ देंगे जैसे मर्यादा की रेखा जानकीजी ने तोड़ दी थी, आखिर कितने संकट में फँस गयी, कितना बड़ा युद्ध करना पड़ा जानकीजी को छुड़ाने के लियें।

जरा सी मर्यादा का उल्लंघन जीवन को कितने बड़े संकट में फँसा सकता है, जो रामराज्य में रहेगा हनुमानजी उसके पास संकट आने ही नही देंगे, क्योंकि रामराज्य के मुख्य पहरेदार तो श्रीहनुमानजी महाराज हैं, तीनों कालों का संकट हनुमानजी से दूर रहता है, संकट होता है- शोक, मोह और भय से, भूतकाल का भय ऐसा क्यों कर दिया, ऐसा कर देता तो मोह होता है।

वर्तमान में जो कुछ सुख साधन आपके पास हैं यह बना रहे, इसको पकड़कर बैठना यह मोह और भय होता है, भविष्यकाल में कोई छीन न ले कोई लूट न ले, भविष्य का भय की मेरा क्या होगा? भाई-बहनों आपको भविष्य की चिंता छोड देना, क्योंकि, हनुमानजी सब कालों में विधमान हैं, “चारों जुग प्रताप तुम्हारा, है प्रसिद्ध जगत उजियारा” हनुमानजी तो अमर हैं।

चारों युगों में हैं सम्पूर्ण संकट जहाँ छूट जाते हैं शोक, मोह, भय वह है भगवान् श्री रामजी की कथा, कथा में हनुमानजी रहते हैं, अगर वृत्तियाँ न छूटे तो हनुमानजी छुड़ा देंगे, बिल्कुल मानस के अंत में पार्वतीजी ने प्रमाणित किया है, “सुनि भुसुंडि के बचन सुहाये, हरषित खगपति पंख फुलाये” तीनों संकट अगर दूर चले जाते हैं, या छोड़ देते हैं, मनुष्य को तो वह श्रीराम की कृपा मिल जाती है, और उस कृपा से मोह का नाश होता है,

बिनु सतसंग न हरि कथा, तेहि बिनु मोह न भाग।
मोह गएँ बिनु राम पद, होय न दृढ़ अनुराग।।

भगवत कथा, सत्संग यह मोह का नाश करती है, संत-मिलन संत-दर्शन शोक को दूर करता है “तोहि दैखि वेग शीतल भई छाती” जैसे हनुमानजी मिले तो जानकीजी का ह्रदय शान्त हो गया, शीतल हो गया, हनुमानजी के प्रति श्रद्धा रखियें, श्रद्धा से भय का नाश होता है, आपके मन में यदि भगवान् के प्रति श्रद्धा है तो आप कभी किसी से भयभीत नही होंगे।

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बेहद प्रभावित करने वाला संदेश:

18 दिन के युद्ध ने, द्रोपदी की उम्र को 80 वर्ष जैसा कर दिया था… शारीरिक रूप से भी और मानसिक रूप से भी !

शहर में चारों तरफ विधवाओं का बाहुल्य था.. पुरुष इक्का-दुक्का ही दिखाई पड़ता था अनाथ बच्चे घूमते दिखाई पड़ते थे और, उन सबकी वह महारानी द्रौपदी हस्तिनापुर के महल में निश्चेष्ट बैठी हुई शून्य को ताक रही थी ।

तभी, * श्रीकृष्ण* कक्ष में दाखिल होते है !

द्रौपदी कृष्ण को देखते ही दौड़कर उनसे लिपट जाती है … कृष्ण उसके सर को सहलाते रहते हैं और रोने देते हैं !
थोड़ी देर में, उसे खुद से अलग करके समीप के पलंग पर बिठा देते हैं ।

द्रोपती : यह क्या हो गया सखा ??
ऐसा तो मैंने नहीं सोचा था ।

कृष्ण : नियति बहुत क्रूर होती है पांचाली..
वह हमारे सोचने के अनुरूप नहीं चलती !
हमारे कर्मों को परिणामों में बदल देती है..
तुम प्रतिशोध लेना चाहती थी और, तुम सफल हुई, द्रौपदी !

तुम्हारा प्रतिशोध पूरा हुआ… सिर्फ दुर्योधन और दुशासन ही नहीं, सारे कौरव समाप्त हो गए !
तुम्हें तो प्रसन्न होना चाहिए !

द्रोपती: सखा, तुम मेरे घावों को सहलाने आए हो या, उन पर नमक छिड़कने के लिए ?

कृष्ण : नहीं द्रौपदी, मैं तो तुम्हें वास्तविकता से अवगत कराने के लिए आया हूं ।
हमारे कर्मों के परिणाम को हम, दूर तक नहीं देख पाते हैं और जब वे समक्ष होते हैं.. तो, हमारे हाथ मे कुछ नहीं रहता ।

द्रोपती : तो क्या, इस युद्ध के लिए पूर्ण रूप से मैं ही उत्तरदाई हूं कृष्ण ?

कृष्ण : नहीं द्रौपदी तुम स्वयं को इतना महत्वपूर्ण मत समझो…
लेकिन, तुम अपने कर्मों में थोड़ी सी भी दूरदर्शिता रखती तो, स्वयं इतना कष्ट कभी नहीं पाती।

द्रोपती : मैं क्या कर सकती थी कृष्ण ?

कृष्ण:- 👉जब तुम्हारा स्वयंबर हुआ…
तब तुम कर्ण को अपमानित नहीं करती
और उसे प्रतियोगिता में भाग लेने का
एक अवसर देती तो, शायद परिणाम
कुछ और होते !

👉इसके बाद जब कुंती ने तुम्हें पांच पतियों की पत्नी बनने का आदेश दिया…
तब तुम उसे स्वीकार नहीं करती
तो भी, परिणाम कुछ और होते ।
और
👉उसके बाद तुमने अपने महल में दुर्योधन को अपमानित किया… वह नहीं करती तो, तुम्हारा चीर हरण नहीं होता… तब भी शायद, परिस्थितियां कुछ और होती ।

*हमारे *शब्द* भी हमारे कर्म होते हैं द्रोपदी…

और, हमें अपने हर शब्द को बोलने से पहले तोलना बहुत जरूरी होता है… अन्यथा, उसके दुष्परिणाम सिर्फ स्वयं को ही नहीं… अपने पूरे परिवेश को दुखी करते रहते हैं ।

संसार में केवल मनुष्य ही एकमात्र ऐसा प्राणी है… जिसका ” जहर ” उसके ” दांतों ” में नही, *”शब्दों ” में है…

इसलिए शब्दों का प्रयोग सोच समझकर करिये।
ऐसे शब्द का प्रयोग करिये… जिससे, किसी की भावना को ठेस ना पहुंचे।

🙏🏻🙏🙏

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यह इंडोनेशिया के दूतावास, दूतावास की कतार, वाशिंगटन, डीसी (संयुक्त राज्य अमेरिका) के दूतावास के बाहर स्थापित मां सरस्वती की एक बाहरी मूर्ति है। इस मूर्ति को कई बालिनी मूर्तिकारों द्वारा बनाया गया था और 2013 में स्थापित किया गया था। 16 फुट (4.9 मीटर) सोने और सफेद प्रतिमाओं में कमल पर खड़ी मां सरस्वती को दर्शाया गया है, जिसमें तीन युवा छात्र हैं।
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“पीपल वृक्ष नहीं अपितु साक्षात देवता है..!!”
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भारतीय संस्कृति में पीपल देववृक्ष है, इसके सात्विक प्रभाव के स्पर्श से अन्त: चेतना पुलकित और प्रफुल्लित होती है। पीपल वृक्ष प्राचीन काल से ही भारतीय जनमानस में विशेष रूप से पूजनीय रहा है। ग्रंथों में पीपल को प्रत्यक्ष देवता की संज्ञा दी गई है। स्कन्दपुराणमें वर्णित है कि अश्वत्थ(पीपल) के मूल में विष्णु, तने में केशव, शाखाओं में नारायण, पत्तों में श्रीहरि और फलों में सभी देवताओं के साथ अच्युत सदैव निवास करते हैं। पीपल भगवान विष्णु का जीवन्त और पूर्णत: मूर्तिमान स्वरूप है। यह सभी अभीष्टोंका साधक है। इसका आश्रय मानव के सभी पाप ताप का शमन करता है।

भगवान कृष्ण कहते हैं-अश्वत्थ: सर्ववृक्षाणांअर्थात् समस्त वृक्षों में मैं पीपल का वृक्ष हूं। स्वयं भगवान ने उससे अपनी उपमा देकर पीपल के देवत्व और दिव्यत्वको व्यक्त किया है…

“पीपल महत्त्व.!!”
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जो व्यक्ति पीपल का पौधा लगाता है और उसकी पूरी उम्र उसकी सेवा करता है, उस जातक की कुंडली के सभी दोष नष्ट हो जाते हैं, उसके परिवार में सुख-समृद्धि आती है और शांति का वास रहता है।
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शास्त्रों के अनुसार यदि कोई व्यक्ति पीपल के वृक्ष के नीचे शिवलिंग की स्थापना करके उसकी सेवा करता है तो वह व्यक्ति जीवन के कष्टों से मुक्त रहता है और बुरा समय भी टल जाता है।

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दिन ढलने के बाद पीपल के वृक्ष के पास दीपक जलाना भी शुभ माना जाता है।
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पीपल के वृक्ष के नीचे बैठकर हनुमान चालीसा पढ़ने से हनुमान जी प्रसन्न होते हैं और जीवन की परेशानियों को हर लेते हैं। जीवन की हर बाधा समाप्त होती है।
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पीपल वृक्ष की नित्य तीन बार परिक्रमा करने और जल चढाने पर दरिद्रता, दु:ख और दुर्भाग्य का विनाश होता है।
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पीपल के दर्शन-पूजन से दीर्घायु तथा समृद्धि प्राप्त होती है। अश्वत्थ व्रत अनुष्ठान से कन्या अखण्ड सौभाग्य पाती है।
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शनिवार की अमावस्या को पीपल वृक्ष के पूजन और सात परिक्रमा करने से तथा काले तिल से युक्त सरसो के तेल के दीपक को जलाकर छायादानसे शनि की पीडा का शमन होता है।
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अथर्ववेदके उपवेद आयुर्वेद में पीपल के औषधीय गुणों का अनेक असाध्य रोगों में उपयोग वर्णित है।
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अनुराधा नक्षत्र से युक्त शनिवार की अमावस्या में पीपल वृक्ष के पूजन से शनि से मुक्ति प्राप्त होती है।श्रावण मास में अमावस्या की समाप्ति पर पीपल वृक्ष के नीचे शनिवार के दिन हनुमान की पूजा करने से बडे से बड़े संकट से मुक्ति मिल जाती है। पीपल का वृक्ष इसीलिए ब्रह्मस्थानहै। इससे सात्विकताबढती है।
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पीपल के वृक्ष के नीचे मंत्र,जप और ध्यान उपादेय रहता है। श्रीमद्भागवत् में वर्णित है कि द्वापरयुगमें परमधाम जाने से पूर्व योगेश्वर श्रीकृष्ण इस दिव्य पीपल वृक्ष के नीचे बैठकर ध्यान में लीन हुए। इसका प्रभाव तन-मन तक ही नहीं भाव जगत तक रहता है।
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सांयकाल के समय पीपल के नीचे मिट्टी के दीपक को सरसों के तेल से प्रज्ज्वलित करने से दुःख व मानसिक कष्ट दूर होते है।
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पीपल की परिक्रमा सुबह सूर्योदय से पूर्व करने से अस्थमा रोग में राहत मिलती है।
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पीपल के नीचे बैठ कर ध्यान करने से ज्ञान की वृद्धि हो कर मन सात्विकता की ओर बड़ता है।
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यदि ग्यारह पीपल के वृक्ष नदी के किनारे लगाए जाय तो समस्त पापों का नाश होता है।
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यदि ग्यारह नवनिर्मित मंदिरों में शुभ मुहूर्त में पीपल वृक्ष लगा कर चालीस दिनों तक इनकी सेवा या देखभाल* (कहीं सूख ना जाये) करने पर उसकी अकाल मृत्यु नहीं होती और जब तक वह जीवित रहता है तब तक उसके अपने परिवार में भी अकाल मृत्यु नही होती है।
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पीपल वृक्ष 24 घंटे सिर्फ ऑक्सीजन ही छोड़ता है, अत: पीपल का वृक्ष आक्सीजन का भण्डार है यही आक्सीजन हमारे जीवन में भी आ कर हमे निरोग व सुख का मार्ग प्रशस्त करती रहती है।
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मार्ग में जहां भी पीपल वृक्ष मिले उसे देव की तरह प्रणाम करने से भी लाभ होते है….!!
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आर्यवर्त

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⚜⛳सनातन धर्मरक्षक समिति⛳⚜

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…………

एक गाय घास चरने के लिए एक जंगल में चली गई। शाम ढलने के करीब थी। उसने देखा कि एक बाघ उसकी तरफ दबे पांव बढ़ रहा है।
वह डर के मारे इधर-उधर भागने लगी। वह बाघ भी उसके पीछे दौड़ने लगा। दौड़ते हुए गाय को सामने एक तालाब दिखाई दिया। घबराई हुई गाय उस तालाब के अंदर घुस गई।
वह बाघ भी उसका पीछा करते हुए तालाब के अंदर घुस गया। तब उन्होंने देखा कि वह तालाब बहुत गहरा नहीं था। उसमें पानी कम था और वह कीचड़ से भरा हुआ था।
उन दोनों के बीच की दूरी काफी कम थी। लेकिन अब वह कुछ नहीं कर पा रहे थे। वह गाय उस कीचड़ के अंदर धीरे-धीरे धंसने लगी। वह बाघ भी उसके पास होते हुए भी उसे पकड़ नहीं सका। वह भी धीरे-धीरे कीचड़ के अंदर धंसने लगा। दोनों ही करीब करीब गले तक उस कीचड़ के अंदर फंस गए।
दोनों हिल भी नहीं पा रहे थे। गाय के करीब होने के बावजूद वह बाघ उसे पकड़ नहीं पा रहा था।
थोड़ी देर बाद गाय ने उस बाघ से पूछा, क्या तुम्हारा कोई गुरु या मालिक है?
बाघ ने गुर्राते हुए कहा, मैं तो जंगल का राजा हूं। मेरा कोई मालिक नहीं। मैं खुद ही जंगल का मालिक हूं।
गाय ने कहा, लेकिन तुम्हारी उस शक्ति का यहां पर क्या उपयोग है?
उस बाघ ने कहा, तुम भी तो फंस गई हो और मरने के करीब हो। तुम्हारी भी तो हालत मेरे जैसी ही है।
गाय ने मुस्कुराते हुए कहा,….
बिलकुल नहीं।
मेरा मालिक जब शाम को घर आएगा और मुझे वहां पर नहीं पाएगा तो वह ढूंढते हुए यहां जरूर आएगा और मुझे इस कीचड़ से निकाल कर अपने घर ले जाएगा। तुम्हें कौन ले जाएगा?
थोड़ी ही देर में सच में ही एक आदमी वहां पर आया और गाय को कीचड़ से निकालकर अपने घर ले गया।
जाते समय गाय और उसका मालिक दोनों एक दूसरे की तरफ कृतज्ञता पूर्वक देख रहे थे। वे चाहते हुए भी उस बाघ को कीचड़ से नहीं निकाल सकते थे, क्योंकि उनकी जान के लिए वह खतरा था।

गाय —-समर्पित ह्रदय का प्रतीक है।
बाघ —-अहंकारी मन है।
और
मालिक—- ईश्वर का प्रतीक है।
कीचड़—- यह संसार है।
और
यह संघर्ष—- अस्तित्व की लड़ाई है।
,किसी पर निर्भर नहीं होना अच्छी बात है, लेकिन मैं ही सब कुछ हूं, मुझे किसी के सहयोग की आवश्यकता नहीं है, यही अहंकार है, और यहीं से विनाश का बीजारोपण हो जाता है। ईश्वर से बड़ा इस दुनिया में सच्चा हितैषी कोई नहीं होता, क्यौंकि वही अनेक रूपों में हमारी रक्षा करता है |*

सनातन धर्मरक्षक समिति से जुड़कर कार्य करे..!!👉🏻https://api.whatsapp.com/send?phone=+918319863629&text=जयश्रीराम

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वन्दे मातरम्🚩🚩

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🙏🏻दिल को छू लेने वाली एक कथा🙏🏻
हनुमान जी के मन्दिर में सवा मन का लड्डू चढ़ा कर लौटते हुए एक भक्त से उसके बेटे ने गुब्बारे दिलवाने की जिद की।
बच्चा पिट गया।
वजह शायद बच्चे की जिद रही होगी या सवा मन लड्डू के पुण्य का दम्भ इतना बढ़ गया होगा कि भक्त सिर्फ उसी में बौराया था और उसका बच्चे की माँग से तारतम्य टूट गया हो।
गुब्बारे वाले के पास बहुत भीड थी, और भीड़ में से भी उसकी नजर पिटते बच्चे पर जा पड़ी।
बच्चा रो रहा था और भक्त पिता बच्चे को डांटे जा रहा था।
गुब्बारे वाला उस बच्चे की ओर आया और एक गुब्बारा बच्चे के हाथ में पकड़ा दिया।
भक्त ग़ुस्से में तो था ही। वह गुब्बारे वाले से उलझ पड़ा ।
“तुम मौके की ताड मे रहा करो बस, कोई बच्चा तुम्हे जिद करता दिख जाए बस। झट से पीछे लग जाते हो। नही लेना गुब्बारा।” और भक्त ने गुब्बारे वाले को बुरी तरह झिडक दिया।
गुब्बारे वाला बच्चे के हाथ में गुब्बारा पकड़ाते हुए बोला-
मैं यहाँ गुब्बारे बेचने नही आता, बांटने आता हूं। किसी दिन मुझे किसी ने बोध करवाया कि ईश्वर तो बच्चों मे है। मैं हर मंगलवार सौ रूपये के गुब्बारे लाता हूँ। इनमे खुद ही हवा भरता हूं। एक गुब्बारा मंदिर मे बाँध आता हूं बाकि सब यहाँ बच्चों मे बाँट देता हूँ। मेरा तो यही प्रसाद हैं। हनुमान जी स्वीकार करते होंगे ना।
सवा मन लड्डू का बड़ा पुण्य भक्त को एकाएक छोटा लगने लगा।
खुशियां बांटने से बढ़ती है।

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🚩🔱

भयंकर शीत की एक शाम,
अपनी ही मस्ती में मस्त, वृक्ष पर बैठे हंस ने नीचे देखा-

एक मुसलक नामक चूहे का परिवार
बुरी तरह ठिठुर रहा है।

बिलों में पानी भर गया था।

यह परिवार जैसे तैसे बाहर आया
और धरती पर पत्ते की तरह कांप रहे हैं सब।

हंस को दया आ गई।

उसने नीचे जाकर
उन पर अपने दुर्लभ, धवल, नरम, श्वेताभ्र, उष्ण पंख फैला दिए।

मूसलक परिवार बच गया।

सुबह हंस उड़ने को हुआ तो….
अरे यह क्या???

उसके तो पंख कुतरे जा चुके थे।

हंस कातर भाव से रोने लगा।

जैसे किसी नव कन्या को भीड़ के सामने वस्त्रहीन किया गया हो,,,

जैसे किसी क्षत्रिय यौद्धा को चलते रण में शस्त्रहीन किया गया हो,,,

जैसे किसी महा वृषभ को कसाई ने लौह फंदे में कस लिया हो,,,

जैसे किसी महा धनिक की सारी पूंजी डूब गई हो,,,

.. हंस चिल्लाने लगा।

आस पास के जानवर एकत्र हुए।

सारी बात सुनकर मुसलक परिवार को धिक्कारने लगे।

अभियोग चला।

चूहों ने कहा ..
“हमने कुछ भी गलत नहीं किया।
अपनी आइडेंटिटी के साथ जीना हमारा हक है।”

“कुतरना हमारी आइडेंटिटी है।

हमारी आइडेंटिटी की रक्षा होनी चाहिए।

हम हमारी आइडेंटिटी के साथ ही जीना चाहते हैं।

गलती हंस की है, तुम सबकी है,

हम वर्षों से यही कर रहे हैं,
तुम्हारी समझ में ही नहीं आ रहा, हम क्या करें।”

हंस को अन्य हंस अपने साथ ले गए।

जैसे तैसे तीन माह बिताए,
नए पंख आये और वह उड़ चला।

🙏🏻आइडेंटिटी का तो भई, ऐसा ही खेल है।

वो हजारों सालों से यही सब करते आ रहे हैं,
अपनी आइडेंटिटी के अनुरूप,
आप हंस की भाँति उड़कर कहाँ जाओगे ??
आपका तो
ठौर ठिकाना, आशियाना
घर, धर्म ,संस्कृति
सब कुछ
सिर्फ और सिर्फ यहीं हैं
आपके चार धाम
आपके मन्दिर
आपका ब्रज मंडल
माँ भवानी की सात पूरी
आपके सारे ज्योतिर्लिंग
सब यहीं हैं

भागकर जाने को जगह ही नहीं है आपके पास

ks_कुमार🚩🚩

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सौंफ

दो दिन पहले वैज्ञानिको के एक ग्रुप के साथ बैठा था। कुछ विज्ञान कुछ बियर कुछ खाने के बाद स्वीट्स का दौर चल रहा था। यूँ ही बात करते करते किसी ने बात छेड़ दी विदेश में भोजन की। एक नए लड़के ने अपना एक्सपीरियंस बताया कि किस प्रकार उसके दोस्त को कोरिया में कुछ भी खाने को नही मिला तो उसको एक इंडियन ने थोड़ा सा दही का कल्चर दिया कि जा दही जमा ले। मतलब वहां दही भी नही मिलता। खैर अपन को इहाँ तक तो वार्ता में कोई इंटरेस्ट नही आ रहा था और हम चुपचाप अपना भोजन खा रहे थे।

वहीं एक बक्टेरियोलॉजिस्ट भी बैठा था। इसी बात पर उसने यूँ ही कमेंट कर दिया कि हाँ जब पहली बार कभी दही का कल्चर बनाया गया होगा तो सौंफ से बनाया था।

हमारे कान खड़े हो गए। सौंफ? सौंफ से?? वही सौंफ जो हम हजारों सालों से खाने के बाद यूँ ही चबा लेते हैं या पान में डाल कर खाते आये हैं सदियों से।

खड़े कान लिए हमने उस वैज्ञानिक का रूबरू किया और फिर पूछा सौंफ से दही का कल्चर? वो कैसे??

तो वैज्ञानिक महोदय ने बड़े कूल कूल बताया कि हां, सौंफ के सरफेस पर बहुत सारा लैक्टोबैसिलस होता है ना।

वो कहाँ से आता है सौंफ पर? हमने पूछा ।

वो बोले बस होता है प्राकृतिक। सौंफ के सरफेस पर खुद की प्रकृति में होता है। वो वैज्ञानिक अपने क्षेत्र के बड़े वैज्ञानिक। उनकी बात पर शक का तो सवाल ही नही।

वो चर्चा तो खत्म हो गई। हमारे दीमाग़ में ढोल नगाड़े बाजे गाजे सब बजने लगे। हिंदुस्तान जिंदाबाद गूंजने लगा। जय हिंद जय सनातन जय पुरातन के नारे लगने लगे।

हजारों साल पहले की भारतीय प्रथा का वैज्ञानिक कारण सामने था।

लैक्टोबैसिलस एक बहुत ही स्ट्रांग प्रोबियोटिक्स होती है। पेट में स्वास्थ्यवर्धक जीवाणुओं का बैलेंस बनाये रखने के लिए इस बैक्टीरिया का आंत में होना बहुत जरूरी है।

यह नही होगा तो हजार बीमारियां आती हैं। डायबिटीज से लेकर थायराइड अल्सर कैंसर न जाने क्या क्या।

Sporlac नाम की एलोपथिक गोलियां तो लंबी बीमारी से उठने के बाद सिर्फ इसलिए दी जाती हैं ताकि शरीर में लैक्टोबैसिलस की जनसंख्या पुनः बढ़ जाये। इम्युनिटी और ताकत आ जाये। पर आजकल डॉक्टर लोग भी चलता काम करते हैं sporlac नही देते किसी को भी। उनको किसी की इम्युनिटी से क्या मतलब।

अब आते हैं सौंफ पर।

हजारों साल पहले से भोजन के तुरंत बाद हम जो सौंफ खाते थे न, वो सौंफ नही अपने स्वास्थ्य की गारंटी पर दस्तखत करते थे। सौंफ के साथ लांखो लैक्टोबसिलस पेट मे रोज चले जाते थे।

यह था उस प्रथा का वैज्ञानिक कारण।

अब तो हम इस प्रथा को लगभग भूल गए।

तो गणतंत्र दिवस पर आइए दुबारा अपनी प्राचीन प्रथाओं को बिना सवाल पूछे दुबारा शुरू करने का प्रण लें ।

वो ग्रेट थी, ग्रेट हैं। वैज्ञानिक कारण जब मिलेगा, मिल जाएगा।

तो कल से खाने के बाद सौंफ फिर शुरू। ओके। और भुनी हुई नही। धुली हुई नही। फैंसी सुगर कोटेड नही। बिल्कुल ताजी सौंफ हरी हरी।

और देखिए, मुझे उड़ते उड़ते भी कोई वैज्ञानिक तथ्य सुनाई देता है तो मैं उसमें सनातन खोजता हूँ। आपका स्वास्थ्य खोजता हूँ। और आप तक पहुंचाता भी हूँ।

चलो फिर बोलो इसी बात पर जय हिंद जय सनातन। 🚩

✍️ डॉ.सुनील वर्मा (ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी)

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अपनों से अपनी बाते ,
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हंस जैन 98272 14427

दोस्तों, हम जिन्दगी में कुछ अच्छो और कुछ बुरो व्यक्तित्व वालो के बीच रहते हैं । अच्छो से सीख तो ले लेते हैं किन्तु

बुरो की बुराइयां छुडा पाना बहुत मुशिकल हो जाता हैं । जैसे हर सिगरेट और शराब पीने वाला जानता हैं की ये जहर हैं पर उसको उसी में मस्ती आती हैं। फिर आप चाहे उसे बार बार अच्छी राय या उपदेश क्यों ना दे । गंदगी भी कभी कभी नही अक्सर गंदगी को अपनी और खींचती हैं । आइये एक छोटी सी कथा यदि आपको मार्गदर्शित करे तो ये मेरा सौभाग्य होगा ।

एक समय की बात है | नारद जी बड़े नाराज – नाराज से भगवान विष्णु के पास गए और उनसे कहा – प्रभु आप इतने न्यायप्रिय हैं किन्तु आज मैंने धरती पर देखा की आप एक जीव के साथ न्याय नहीं कर पा रहे हैं, और मै इससे बड़ा दुखी हूँ | विष्णुजी ने बड़े आश्चर्य और दुःख से कहा की हे नारद ऐसा हो नहीं सकता | किन्तु आप कह रहे हैं तो हो सकता है की भूलवश ऐसा हो गया हो | आप मुझे बताए की ऐसी भूल कहाँ और किसके साथ हो रही है | मै उसे तुरंत ठीक करूँगा और आपकी नाराजगी दूर करूँगा | नारद जी ने कहा – प्रभु आपने धरती पर प्रत्येक प्राणी को एक समय उपरान्त – लगभग ८४ लाख योनियों से गुजरने के बाद – स्वत: स्वर्ग जाने का रास्ता दिया है | किन्तु धरती पर एक प्राणी है जिसे आपने इस सुविधा से वंचित रखा हुआ है और वह प्राणी आज भी स्वर्ग नहीं आ पाया है | विष्णुजी ने आश्चर्य से पूछा हे नारद कौन है वो जीव ? मुझे बताओ मै आज ही उसे स्वर्ग प्रदान करूँगा |

नारदजी ने कहा – प्रभु वह जीव है सूअर |

विष्णुजी ने नाम सुनते ही कहा – नारद जी सूअर को मैंने स्वर्ग आने के बहुत प्रलोभन दिए, बहुत प्रयास किये किन्तु वो स्वयं ही स्वर्ग नहीं आना चाहता इसलिए आज भी वो धरती पर ही है |

नारद जी ने कहा प्रभु ऐसा हो ही नहीं सकता की कोइ जीव स्वर्ग पाना न चाहे | आपने अपना प्लान या ऑफर उसे ठीक से समझाया नहीं होगा | आप मुझे मौक़ा दे मै उसे फिर से प्लान सुनाता हूँ की वो कैसे धरती से स्वर्ग जा सकता है | मुझे उम्मीद है मै उसे समझा लूंगा |

विष्णुजी ने कहा – ठीक है नारद जी यदि आप स्वयं प्लान सुनाना चाहते हैं तो मै आपको रोकूंगा नहीं आप जाए और अपने स्तर पर प्रयास करे |

नारद जी विष्णुजी से आज्ञा प्राप्त कर धरती पर सूअर के पास गए और उन्हें स्वर्ग जाने का प्लान सुनाया और उसे हासिल करने का रास्ता बताने लगे | उन्होंने सूअर को हर रास्ते से अवगत कराया और उसे ये भी बताया की स्वर्ग पा लेने के बाद उसके जीवन में क्या क्या बदलाव आ सकता है |

किन्तु सूअर ने पूरा प्लान सुनाने के बाद नारद जी से कहा, की नारद जी आपका प्लान बड़ीया लगा किन्तु आप मुझे सोचने के लिए २ दिन का समय दीजिए | मै आपको २ दिन बाद सोच कर जवाब दे दूंगा |

नारद जी ने कहा ठीक है आप सबकुछ समझ ही चुके है | मै आपसे २ दिन बाद आकार मिलता हूँ और आपसे आपका निर्णय जान लूंगा | २ दिन बाद नारद जी सूअर के पास गए और पूछा – सूअर महाराज आपने क्या निर्णय लिया ?
सूअर ने कहा – नारद जी आपका प्लान मुझे बडीया लगा और मै स्वर्ग जाने के लिए तैयार हूँ | किन्तु मेरी २ शर्ते हैं, यदि आप मान ले |

नारद जी ने कहा – अवश्य आप बताए मै आपकी हर संभव सहायता करूँगा की आप स्वर्ग जा पाए |
सूअर ने कहा – नारद जी यदि मुझे स्वर्ग में नहाने के लिए कीचड़ और खाने के लिए गु मिले तो मै आपके साथ स्वर्ग चलने के लिए तैयार हूँ |

नारद जी इसके बाद क्या करते ——————- आपका क्या कहना है ?

अब आप समझ ही चुके होंगे की हम किसी बुरे व्यक्ति से उसकी बुराई से हटाने के कितने भी प्रयास कर ले पर वो जाएगा उसी गंदगी की और ।।।क्या आप मेरे विचार से सहमत हो?

हंस जैन 98272 14427 👌👌👌👌😜👌