Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

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🕸आओ कहानी सुने🕸
🔥 संत वचन 🔥
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एक संत के पास 30 सेवक रहते थे । आगे अरदास की महाराज जी 🙏🏻 मेरी बहन की शादी है तो आज एक महीना रह गया है तो मैं दस दिन के लिए वहां जाऊंगा । कृपा करें ! आप भी साथ चले तो अच्छी बात है । गुरु जी ने कहा बेटा देखो टाइम बताएगा । नहीं तो तेरे को तो हम जानें ही देंगे उस सेवक ने बीच-बीच में इशारा गुरु जी की तरफ किया कि गुरुजी कुछ ना कुछ मेरी मदद कर दे ! आखिर वह दिन नजदीक आ गया सेवक ने कहा गुरु जी कल सुबह जाऊंगा मैं । गुरु जी ने कहा ठीक है बेटा !

सुबह हो गई जब सेवक जाने लगा तो गुरु जी ने उसे 5 किलो अनार दिए और कहा ले जा बेटा भगवान तेरी बहन की शादी खूब धूमधाम से करें दुनिया याद करें कि ऐसी शादी तो हमने कभी देखी ही नहीं और साथ में दो सेवक भेज दिये जाओ तुम शादी पूरी करके आ जाना । जब सेवक घर से निकले 100 किलोमीटर गए तो मन में आया जिसकी बहन की शादी थी वह सेवक से बोला गुरु जी को पता ही था कि मेरी बहन की शादी है और हमारे पास कुछ भी नहीं है फिर भी गुरु जी ने मेरी मदद नहीं की । दो-तीन दिन के बाद वह अपने घर पहुंच गया । उसका घर राजस्थान रेतीली इलाके में था वहां कोई फसल नहीं होती थी । वहां के राजा की लड़की बीमार हो गई तो वैद्यजी ने बताया कि इस लड़की को अनार के साथ यह दवाई दी जाएगी तो यह लड़की ठीक हो जाएगी । राजा ने मुनादी करवा रखी थी अगर किसी के पास आनार है तो राजा उसे बहुत ही इनाम देंगे । इधर मुनादी वाले ने आवाज लगाई अगर किसी के पास आनार है तो जल्दी आ जाओ, राजा को अनारों की सख्त जरूरत है । जब यह आवाज उन सेवकों के कानों में पड़ी तो वह सेवक उस मुनादी वाले के पास गए और कहा कि हमारे पास आनार है, चलो राजा जी के पास । राजाजी को अनार दिए गए अनार का जूस निकाला गया और लड़की को दवाई दी गई तो लड़की ठीक-ठाक हो गई । राजा जी ने पूछा तुम कहां से आए हो, तो उसने सारी हकीकत बता दी तो राजा ने कहा ठीक है तुम्हारी बहन की शादी मैं करूंगा । राजा जी ने हुकुम दिया ऐसी शादी होनी चाहिए कि लोग यह कहे कि यह राजा की लड़की की शादी है सब बारातियों को सोने चांदी गहने के उपहार दिए गए बरात की सेवा बहुत अच्छी हुई लड़की को बहुत सारा धन दिया गया । लड़की के मां-बाप को बहुत ही जमीन जायदाद व आलीशान मकान और बहुत सारे रुपए पैसे दिए गए । लड़की भी राजी खुशी विदा होकर चली गई । *अब सेवक सोच रहे हैं कि गुरु की महिमा गुरु ही जाने । हम ना जाने क्या-क्या सोच रहे थे गुरु जी के बारे में । गुरु जी के वचन थे जा बेटा तेरी बहन की शादी ऐसी होगी कि दुनियां देखेगी ।

संत वचन हमेशा सच होते हैं ।

शिक्षा……
संतों के वचन के अंदर ताकत होती है लेकिन हम नहीं समझते । जो भी वह वचन निकालते हैं वह सिद्ध हो जाता है । हमें संतों के वचनों के ऊपर अमल करना चाहिए और विश्वास करना चाहिए ना जाने संत मोज में आकर क्या दे दे और रंक से राजा बना दे ।
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☘असार में भी सार खोज लो तो जाने☘
☘ दुःख में भी सुख खोज लो तो जाने☘
☘यों तो धरा पर बहुत से लोग है☘
☘पर तुम स्वयं में भगवान खोज लो तो जाने।☘

👏👏👏👏👏👏!

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सुना है मैंने, वाचस्पति विवाह करके आए। पर वे तो धुनी आदमी थे और बारह वर्षों तक वे तो भूल ही गए कि पत्नी घर में है। कथा बड़ी मीठी है। वाचस्पति लिख रहे थे ब्रह्मसूत्र पर अपनी टीका। वे सुबह से सांझ और रात, आधी रात तक टीका लिखने में लगे रहते। पत्नी को घर ले आए। पिता ने कहा, शादी करनी है।
पिता बूढ़े थे। सुखी होते थे। शादी करके घर आ गए। पत्नी घर में चली गई। वाचस्पति अपनी टीका लिखने में लग गए। बारह वर्ष!
उन्हें खयाल ही न रहा, वह जो शादी हो गई, और पत्नी घर में आ गई। वह सब बात समाप्त हो गई।
लेकिन उन्होंने एक निर्णय किया था कि जिस दिन यह ब्रह्मसूत्र की टीका पूरी हो जाएगी, उस दिन मैं संन्यास ले लूंगा। बारह वर्ष बाद आधी रात टीका पूरी हो गई। अचानक वाचस्पति की आंखें पहली दफा टीका को छोड्कर इधर—उधर गईं। देखा कि एक सुंदर सा हाथ पीछे से आकर दीये की ज्योति को ऊंचा कर रहा है। सोने की चूडियां हैं हाथ पर।
लौटकर उन्होंने देखा, और कहा, कोई स्त्री इस आधी रात में मेरे पीछे! पूछा, तू कौन है? स्त्री ने कहा कि धन्य मेरे भाग्य कि आपने पूछा। बारह वर्ष पहले मुझे आप विवाह करके ले आए थे, तब से मैं प्रतीक्षा कर रही हूं कि कभी आप जरूर पूछेंगे कि तू कौन है! पर इतनी देर तू कहां थी? उसने कहा कि मैं रोज आती थी। जब दीये की लौ कम होती, तब बढ़ा जाती थी। दीया सांझ जला जाती थी, सुबह हटा लेती थी। आपके काम में बाधा न पड़े, इसलिए आपके सामने कभी नहीं आई। आपके काम में रंचमात्र बाधा न पड़े, इसलिए कभी मैंने कोशिश नहीं की कि बताऊं मैं भी हूं। मैं थी, और आप अपने काम में थे।
वाचस्पति की आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने कहा, अब तो बहुत देर हो गई। क्योंकि मैंने तो निर्णय किया है कि जिस दिन जिस क्षण टीका पूरी हो जाएगी, उसी क्षण घर छोड्कर संन्यासी हो जाऊंगा। अब मैं तेरे लिए क्या कर सकता हूं! तूने बारह वर्ष प्रतीक्षा की और आज की रात मेरे जाने का वक्त है! अब मैं उठकर बस घर के बाहर होने को हूं। अब मैं तेरे लिए क्या कर सकता हूं? वाचस्पति की आंख में आंसू..।
उनकी स्त्री का नाम भामती था। इसलिए उन्होंने अपनी ब्रह्मसूत्र की टीका का नाम भामती रखा है। भामती से कोई संबंध नहीं है। उनकी ब्रह्मसूत्र की टीका का नाम भामती से कोई लेना—देना नहीं है। लेकिन अपनी टीका का नाम उन्होंने भामती रखा है। बड़ी अदभुत टीका है।
वाचस्पति अदभुत आदमी थे। कहा कि बस, तेरी स्मृति में भामती इसका नाम रख देता हूं और घर से चला जाता हूं। लेकिन तू दुखी होगी। उनकी पत्नी ने कहा, दुखी नहीं, मुझसे ज्यादा धन्यभागी और कोई भी नहीं। इतना क्या कम है कि आपकी आंखों में मेरे लिए आंसू आ गए! मेरा जीवन कृतार्थ हो गया।
इतनी ही बात वाचस्पति की अपनी स्त्री से हुई है। लेकिन यह बारह साल के मौन के बाद ये जो थोड़े से शब्द हैं, इनको हम वाणी कह सकते हैं, वाक् कह सकते हैं। स्त्री के परम मौन से जब कुछ निकलता है! लेकिन उसका परम मौन होना बड़ा मुश्किल है।

ओशो, गीता दर्शन, भाग-5(प्रव.-126)

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संगत का असर!!

सीतला दुबे
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एक बार एक भंवरे की मित्रता एक गोबरी कीड़े के साथ हो गई,
कीड़े ने भंवरे से कहा कि भाई तुम मेरे सबसे अच्छे मित्र हो,
इस लिये मेरे यहाँ भोजन पर आओ 😊अब अगले दिन भंवरा सुबह सुबह तैयार हो गया और अपने बच्चो के साथ
गोबरी कीड़े के यहाँ भोजन के लिये पहुँचा
कीड़ा भी उन को देखकर बहुत खुश हुआ और सब का आदर करके भोजन परोसा।
भोजन में गोबर की गोलियां परोसी गई और कीड़े ने कहा कि खाओ भाई रुक क्यों गए।
भंवरा सोच में पड़ गया
कि मैने बुरे का संग किया
इस लिये मुझे तो
गोबर खाना ही पड़ेगा।
भंवरा ने सोचा की ये मुझे इस का संग करने से
मिला और फल भी पाया।
अब इस को भी मेरे संग का फल मिलना चाहिये..
भंवरा बोला भाई
आज तो में आप के यहाँ
भोजन के लिये आया
अब तुम कल मेरे यहाँ आओगे..
अगले दिन कीड़ा तैयार होकर भंवरे के यहाँ पहुँचा,
भंवरे ने कीड़े को उठा कर
गुलाब के फूल में बिठा दिया और रस पिलाया,
कीड़े ने खूब फूलों का रस पिया और मजे किये, अपने मित्र का धन्यवाद किया और कहा, मित्र तुम तो बहुत अच्छी जगह रहते हो
और अच्छा खाते हो..
इस के बाद कीड़े ने सोचा क्यों न अब में यहीं रहूँ और ये सोच कर यहीं फूल में बैठा रहा।
इतने में ही पास के मंदिर
का पुजारी आया और फूल तोड़ कर ले गया
और चढ़ा दिया इस को प्रभु चरणों में..
कीड़े को भगवान के दर्शन भी हुये और उनके चरणों में बैठा। इस के बाद संध्या में पुजारी ने सारे फूल इक्कठा किये और गंगा जी में छोड़ दिए, कीड़ा गंगा की लहरों पर
लहर रहा था और अपनी किस्मत पर हैरान था
कि कितना पूण्य हो गया। इतने में ही भंवरा उड़ता हुआ
कीड़े के पास आया और बोला, मित्र अब बताओ क्या हाल है?
कीड़ा बोला भाई अब जन्म जन्म के पापों से मुक्ति हो चुकी है। जहाँ गंगा जी में मरने के बाद अस्थियों को छोड़ा जाता है, वहाँ में जिन्दा ही आ गया हूँ।
ये सब मुझे तेरी मित्रता और अच्छी संगत का ही फल मिला है और ख़ुशी से निहाल हूँ।
तेरा बहुत बहुत धन्यवाद !! जिस को मैं अपनी जन्नत समझता था वो गन्दगी थी और जो तेरी वजह से मिला यही ही स्वर्ग है!

“”””””किसी महात्मा ने सही कहा है…..

जैसे संग करोगे वैसे बन जाओगे!
शराबी का संग करोगे शराबी बन जाओगे!
जुआरी का संग करोगे जुआरी बन जाओगे!
स्वार्थी या संग करोगे स्वार्थी बन जाओगे!
दानी का संग करोगे दानी बन जाओगे!
संतो,भक्तो का संग करोगे!
तो प्रभु नाम मीठा!
लगने लग जायेगा!
प्रभु से प्रेम हो जायेगा!

जैसी संगत वैसी रंगत।
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A king was travelling in a boat with his dog.

There was also a philosopher with other passengers in that boat.

The dog had never travelled in a boat before, so it was not feeling comfortable.

It was jumping up and down, not letting anyone sit in peace.

The boatman was troubled by this jumping and was concerned that the boat would sink due to the panic of the passengers.

If the dog doesn’t calm down it will drown and drown others too, but the dog was jumpy due to his nature.

The king was upset about the situation, but could not find any way to calm the dog.

The philosopher watched all this and decided to help.

He went to the emperor and said: “Sarkar. If you allow, I can make this dog as quiet as a housecat.”

The king immediately gave permission.

The philosopher, with the help of two passengers, picked up the dog and threw it into the river.

The dog started to swim desperately to stay afloat.

It was now dying and struggled for its life.

After some time, the philosopher dragged the dog back into the boat.

The dog went quietly and sat in a corner.

The king and all passengers were surprised at the changed behaviour of the dog.

The king asked the philosopher: “At first it was jumping up and down. Now it is sitting like a pet goat. Why?”

Philosopher said: “No one realises the misfortune of another without tasting trouble. When I threw this dog into the water, it understood the power of the water and the usefulness of the boat.”

Dogs that are jumping up and down in India should be thrown in Syria, Iraq or Pakistan for 6 months, then on coming to India, they will automatically become calm as a pet cat and will lie in a corner.

Dedicated to all who are abusing ‘India’

Jaihind 🇮🇳