Posted in कविता - Kavita - કવિતા

खिचड़ी का अविष्कार।

कई वर्षों पहले एक बार,
दिन का नाम था रविवार।

पति-पत्नी की एक जोड़ी थी,
नोंकझोंक जिनमें थोड़ी थी।

अधिक था उनमें प्यार,
मीठी बातों का अम्बार।

सुबह पतिदेव ने ली अंगड़ाई,
पत्नी ने बढ़िया चाय पिलाई।

फिर नहाने को पानी किया गर्म,
निभाया अच्छी पत्नी का धर्म।

पति जब नहाकर निकल आए,
पत्नी ने बढ़िया पकौड़े खिलाए।

फिर पतिदेव ने समाचार-पत्र पकड़ा,
दोनों हाथों में उसे कसकर जकड़ा।

अगले तीन घंटे तक न खिसके,
रहे वो समाचार-पत्र से चिपके।

पत्नी निपटाती रही घर के काम,
मिला न एक पल भी आराम।

एक पल को जो कुर्सी पर टिकी,
पति ने तुरंत फरमाइश पटकी।

बोले अब नींद आ रही है ढेर सारी,
प्रियतमा बना दो पूड़ी और तरकारी।

पत्नी बोली मैं हूँ आपकी आज्ञाकारी,
लेकिन फ्रिज में नहीं है तरकारी।

पति बोले दोपहर तक कोहरा छाया है,
सूरज को भी बादलों ने छिपाया है।

ऐसे में तरकारी लेने तो न जाऊँगा,
छोड़ो पूड़ी, दाल-चावल ही खाऊँगा।

पत्नी बोली थोड़ी देर देखिए टीवी,
अभी खाना बनाकर लाती बीवी।

पति तुरंत ही गए कमरे के अंदर,
पत्नी ने रसोई में खोले कनस्तर।

दाल-चावल उसमें रखे थे पर्याप्त,
पर सिलेंडर होने वाला था समाप्त।

बन सकते थे चावल या फिर दाल,
क्या बनाएँ क्या न का था सवाल।

कोहरा, बादल और था थरथर जाड़ा,
सूरज निकले गुजर चुका था पखवाड़ा।

कैसे कहती पत्नी कि सिलेंडर लाना है
वरना दाल-चावल को भूल जाना है।

इतनी ठंड में पति को कैसे भेजूँ बाजार,
काँप-काँप उनका हो जाएगा बँटाधार।

इस असमंजस से पाने के लिए मुक्ति,
धर्मपत्नी ने लगायी एक सुंदर युक्ति।

कच्ची दाल में कच्चे चावल मिलाए,
धोकर उसने तुरंत कुकर में चढ़ाए।

कुछ देर में एक लम्बी सी आई सीटी,
पति के पेट में चूहे करने लगे पीटी।

पत्नी ने मेज पर खिचड़ी लगायी,
साथ में अचार और दही भी लायी।

नया व्यंजन देखकर दिमाग ठनका,
और पति के मुख से स्वर खनका।

बोले न तो है चावल न ही है दाल,
दोनों को मिलाजुला ये क्या है बवाल।

पत्नी बोली सिलेंडर हो गया खाली,
इसलिए मैंने चावल-दाल मिला डाली।

एक बार ही कुकर था चढ़ सकता,
दाल-चावल में से कोई एक पकता।

इतनी ठंड में आप जो बाहर जाते,
अगले दो घण्टे तक कँपकँपाते।

इसलिए मैंने इन दोनों को मिलाया,
आपके लिए ये नया व्यंजन बनाया।

खाने से पहले धारणा मत बनाइए,
तनिक एक चम्मच तो चबाइए।

पेट में चूहे घमासान मचा रहे थे,
चावल देख पति ललचा रहे थे।

नुक्ताचीनी और नखरे छोड़कर,
खाया एक कौर चम्मच पकड़कर।

नये व्यंजन का नया स्वाद आया,
पत्नी का नवाचार बहुत भाया।

बोले अद्भुत संगम तुमने बनाया,
और मुझे ठण्ड से भी है बचाया।

तृप्त हूँ मैं ये नया व्यंजन खाकर,
और धन्य हूँ तुम-सी पत्नी पाकर।

पर एक बात तो बताओ प्रियतमा,
क्या नाम है इसका, क्या दूँ उपमा।

पत्नी बोली पहली बार इसे बनाया,
नाम इसका अभी कहाँ है रख पाया।

खिंच रही थी गैस दुविधा थी बड़ी,
इसलिए इसको बुलाएँगे खिचड़ी।

मित्रों इनके सामने जब समस्या हुई खड़ी,
न तो पति चिल्लाया न ही पत्नी लड़ी।

आपके समक्ष भी आए जब ऐसी घड़ी,
प्रेम से पकाइएगा कोई नयी खिचड़ी।

तो इस पूरी घटना का जो निकला सार,
उसे हम कह सकते हैं कुछ इस प्रकार।

कि पति-पत्नी में जब हो असीम प्यार,
तो हो जाता है खिचड़ी का अविष्कार

रामचंद्र आर्य

Posted in भारतीय उत्सव - Bhartiya Utsav

भास्करस्य यथा तेजो मकरस्थस्य वर्धते।* तथैव भवतां तेजो वर्धतामिति कामये।।

जिस प्रकार मकर राशि में प्रवेश करने से सूर्य का तेज बढ़ता है ,उसी प्रकार आपका तेज ,यश ,मान-सम्मान बढे ऐसी हमारी कामना है। 🌻

🌷🌷🌷🌷🌻 उत्तरायण का सूर्य आपके स्वप्नों को नयी ऊष्मा प्रदान करे, आपके यश एवम् कीर्ति में उत्तरोत्तर वृद्धि हो, आप परिजनों सहित स्वस्थ रहें, दीर्घायु हों, इसी प्रार्थना के साथ मकर संक्रान्ति के पावन पर्व पर हार्दिक शुभकामनाएँ ।!!

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

आत्मविश्वास और अपने कर्म पर भरोसा रखने से मिल सकती है सफलता

एक प्रसंग के अनुसार स्वामी विवेकानंद विदेश में थे। वहां उनकी पहचान एक धनी महिला से हो गई। वह स्वामीजी से बहुत प्रभावित हुई और उनकी शिष्या बन गई। एक दिन वे दोनों घोड़ा गाड़ी से घूम रहे थे। रास्ते में गाड़ी वाले ने सड़क किनारे गाड़ी रोकी, वहां एक महिला और कुछ बच्चे बैठे हुए थे। गाड़ी वाला उनके पास गया, बच्चों को प्यार किया और महिला को कुछ रुपए देकर लौट आया। स्वामीजी के साथ बैठी धनी महिला ये सब ध्यान देख रही थी। जब गाड़ी वाले ने फिर से गाड़ी चलाना शुरू की तो महिला ने उससे पूछा कि आप किससे मिलने गए थे, वो महिला और बच्चे कौन हैं?गाड़ी वाले ने कहा कि वह मेरी पत्नी और बच्चे थे। पहले मैं एक बैंक का मैनेजर था और बहुत धनी था। बैंक को नुकसान हुआ और मैं कर्ज में डूब गया, मेरा सारा धन कर्ज उतारने में चला गया।किसी तरह मेहनत करके मैंने ये घोड़ा गाड़ी खरीदी है और परिवार को उस स्थान पर छोटा सा घर ले रखा है। मैं लगातार मेहनत कर रहा हूं, जैसे ही मेरा बुरा वक्त खत्म होगा, मैं एक नया बैंक फिर से खोलूंगा। मुझे विश्वास है कि मैं जल्दी ही नए बैंक को भी विकसित कर लूंगा। गाड़ी वाले की ये बातें सुनकर विवेकानंद बहुत प्रभावित हुए।स्वामीजी ने महिला से कहा कि ये व्यक्ति एक दिन अपने लक्ष्य पर जरूर पहुंचेगा। इतने बुरे समय में भी इसका आत्मविश्वास मजबूत है और इसे अपने कर्म पर पूरा भरोसा है। जिन लोगों में ये गुण होते हैं, वे बुरी से बुरी परिस्थितियों से बाहर निकल सकते हैं और कामयाब हो सकते हैं।

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अपनों से अपनी बाते
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दोस्तों , कभी कभी हम बिना वजह किसी को भी परेशान करते हैं और उसमे अपनी ख़ुशी देखते हैं । क्या आप जानते हो की किसी को दुःख , तकलीफ या परेशान करने पर उसको जो पीड़ा होती या दिल दुखता हैं उसकी आह या तडफ हमारे लिए घातक सिद्ध होती हैं । एक पल की ख़ुशी और लम्बे समय का दुःख क्या आपको मंजूर हैं । आइये कुछ इस तरह समझे

एक बार तैलंगस्वामी को तंग करने के इरादे से एक व्यक्ति ने दूध के बदले चूना घोलकर एक पात्र में रख दिया। स्वामीजी ने पात्र की ओर देखा और घोल को चुपचाप पी लिया। वह व्यक्ति सोचने लगा कि शीग्र ही चूना असर करेगा।

मगर यह देख वह हैरान हो गया कि उन पर तो कोई असर ही नहीं हुआ, बल्कि उसका ही जी घबराने लगा और वह दर्द से तड़पने लगा। वह समझ गया कि यह स्वामीजी को तंग करने का ही परिणाम है। वह उनके चरणों में गिरकर माफी मांगने लगा।

स्वामीजी ने पास ही रखी स्लेट पर चूने की खड़िया से लिखा, चूने का पानी मैंने पिया और इसका परिणाम तुझे भोगना पड़ा। इसका एक ही कारण है वह यह कि हम दोनों के शरीर में आत्मा का वास है। यदि दूसरे की आत्मा को कष्ट दिया जाए तो वह कष्ट स्वयं को भी भोगना पड़ता है। इसलिए दूसरों को कष्ट देने की कोशिश भी नहीं करनी चाहिए।

इस तरह स्वामीजी ने उस व्यक्ति के सिर पर हाथ रखा और उसका दर्द चला गया। उस व्यक्ति ने स्वामीजी से मांफी मांगी और कहा कि अब वह किसी को भी तंग नहीं करेगा।

संक्षेप में

हमें बेवजह किसी भी व्यक्ति को तंग नहीं करना चाहिए, क्योंकि जितना आप किसी को परेशान करते हैं उससे दुगना दर्द प्रकृति आपको देती है। इस लिए जिंदगी में खुशियां बांटनी चाहिए दर्द नहीं।

अब आज मकर संक्रान्ति का पर्व मनाकर जिनके दिल आपने दुखाये उनके पास जाकर माफ़ी मांगे । क्योंकि आज का दिन कुछ विशेष हैं आज दो शत्रु याने सूर्य अपने शत्रु यानी शनि के घर जा रहे हैं । हम इस त्यौहार को मकर संक्रान्ति कहते हैं और ख़ुशी मनाते हैं । जब ये कर सकते हैं तो क्या हम अपनों से रूठो या बिछुडो के पास जाकर क्षमाँ नही मांग सकते या कुछ मीठा खिलाकर अपना नही बना सकते । भूल जाए की भूल किसकी थी , भूल जाए की गलती किसकी थी । सिर्फ और सिर्फ याद रखे की मिलन कैसे किया जाए। कम
सम्बन्ध बनाये पर उन सम्बन्धो को निभाये यह प्रयास करे । तभी आज की मकर संक्रांति का त्यौहार सफल कहलायेगा । यदि आप मेरे विचार से सहमत हो तो अवश्य लिखे । आपसे मिली प्रेरणा मुझे बल प्रदान करती हैं । आप सभी को मकर संक्रांति की हार्दिक शुभकामनाये ।

हंस जैन 98272 14427 😃😃😃😃😃😃😃