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10 सिद्ध टोटके, जो दिलाए सभी संकटों से मुक्ति
10 Useful tone totke in Hindi :

कई बार ऐसा होता है कि बहुत प्रयास करने के बाद भी कोई काम नहीं बनता और यदि बन भी जाता है तो बनते-बनते बिगड़ जाता है। सफलता आते-आते आपके हाथों से फिसल जाती है। आखिर इसके पीछे कुछ तो कारण होगा?
माना जाता है कि पितृदोष, कालसर्प दोष और ग्रह-नक्षत्रों के बुरे प्रभाव के कारण कभी कोई सुख प्राप्त नहीं होता, तो कभी देवी-देवताओं के प्रति किए गए अपराध के चलते भी दुखों और समस्याओं का सामना करना पड़ता है। यह सब ठीक होने के बावजूद कभी-कभी वास्तुदोष के कारण भी व्यक्ति समस्याओं से घिरा रहता है। उपरोक्त कारणों के चलते व्यक्ति कर्ज में डूब जाता है, संतान सुख चला जाता है, गृहकलह बढ़ जाती है, धन-समृद्धि भी साथ छोड़ देती है, दरिद्रता पीछे लग जाती है, रोग और शोक भी परेशान करते रहते हैं। इस तरह की अन्य कई समस्याओं से व्यक्ति घिर जाता है।
आपके जीवन में किसी भी प्रकार की समस्या हो और बिगड़े काम नहीं बन रहे हो तो ज्योतिषियों द्वारा बताए गए अद्भुत उपाय अपनाएं और बिगड़े काम बनाएं। विदेश यात्रा में अड़चन, उन्नति में रुकावट, धन प्राप्ति में कठिनाई, विवाह में विलंब आदि सभी तरह के कार्यों के समाधान के लिए यहां प्रस्तुत हैं ऐसे ही कुछ उपाय या टोटके जिसको करने से सभी तरह की सम्याओं से मुक्ति पाई जा सकती है।
हनुमान चालीसा :
o प्रतिदिन हनुमान चालीसा पढ़ें। मंगलवार या शनिवार के दिन हनुमानजी को चोला चढ़ाएं और उनको बनारसी पान का बीड़ा भी अर्पित करें। आपके बिगड़े काम फिर से बनने लगेंगे।
o हनुमान चालीसा पढ़ने से जहां पितृदोष, राहुदोष, मंगलदोष आदि दूर होते हैं वहीं भूत-प्रेतादि का बुरा साया भी हट जाता है। मंगल कामना और भावना से हनुमानजी से जुड़ने से वे सभी तरह के संकटों से मुक्ति दिला देते हैं।
गाय, कुत्ते, कौवे, पक्षी, चींटी को रोटी खिलाएं :
o प्रतिदिन गाय, कुत्ते, कौवे, पक्षी व चींटी को रोटी खिलाएं, आपके बिगड़े काम बनने लगेंगे। इससे सभी तरह की समस्याओं का समाधान होगा।
o गाय में सकारात्मक ऊर्जा का भंडार होता है। घर के आसपास गाय होने का मतलब है कि आप सभी तरह के संकटों से दूर रहकर सुख और समृद्धिपूर्वक जीवन जी रहे हैं। गाय को प्रतिदिन भोजन कराने से घर में धन-समृद्धि और शांति बढ़ती है। गाय को खिलाने से घर की पीड़ा दूर होगी।
o कुत्ता आपको राजा से रंक और रंक से राजा बना सकता है। कुत्ते को खिलाने से दुश्मन आपसे दूर रहेंगे। कुत्ते को प्रतिदिन भोजन देने से जहां दुश्मनों का भय मिट जाता है, वहीं व्यक्ति निडर हो जाता है। कुत्ता पालने से लक्ष्मी आती है और कुत्ता घर के रोगी सदस्य की बीमारी अपने ऊपर ले लेता है। पितृ पक्ष में कुत्तों को मीठी रोटी खिलानी चाहिए।
o कौवे को भोजन कराने से सभी तरह का पितृ और कालसर्प दोष दूर हो जाता है। कौवे को भोजन कराने से अनिष्ट व शत्रु का नाश होता है। शनि को प्रसन्न करना हो तो कौवों को भोजन कराना चाहिए।
o पक्षी को खिलाने से व्यापार-नौकरी में लाभ होता है, घर में खुशियां बढ़ती हैं और व्यक्ति समृद्धि के द्वार खोल देता है। इसके अलावा चींटी को शकर मिलाकर आटा खिलाने से कर्ज समाप्त होगा और मछली को खिलाने से समृद्धि बढ़ेगी। समाज में मान-सम्मान की प्राप्ति के लिए कबूतरों को चावल डालें, बाजरा शुक्रवार को खरीदें व शनिवार से डालना शुरू करें।
गृहकलह से बचने के लिए :
o घर के पूजा स्थान पर घी का दीपक जलाएं। कपूर और अष्टगंध की सुगंध प्रतिदिन घर में फैलाएं। गुरुवार और रविवार को गुड़ और घी मिलाकर उसे कंडे पर जलाएं, इससे भी सुगंधित वातावरण होगा।
o रात्रि में सोने से पहले घी में तर किया हुआ कपूर जला दें। इसे तनावमुक्ति होगी और गहरी नींद आएगी। शरीर को हमेशा सुगंधित और साफ-सुथरा बनाए रखें।
o महीने में 2 बार किसी भी दिन घर में उपले जलाकर लोबान या गूगल की धूनी देने से घर में ऊपरी हवा का बचाव रहता है तथा बीमारी दूर होती है, साथ ही गृहकलह भी शांत हो जाता है।
o सुगंध हमारी भावनाओं से जुड़ा हुआ और बहुत हद तक यह हमारे मस्तिष्क को प्रभावित करता है। सुगंधित वातावरण बना रहने से मस्तिष्क प्रसन्नचित्त और शांत रहता है जिसके चलते घर में गृहकलह नहीं होती है। सुगंध से वास्तुदोष का निवारण भी होता है।
खुशियां बढ़ाने के लिए :
o घर की दीवारों पर लगे चित्रों को बदलें। ऐसा कोई-सा भी चित्र न लगाएं जिससे आपकी भावनाएं विकृत होती हों। दीवार पर लगा प्रकृति का चित्र या हंसमुख परिवार का चित्र आपके जीवन में खुशियां बढ़ा सकने में सक्षम है।
o बैठक रूम, बेडरूम, किचन, स्टडी रूम, बरामदे आदि जगहों पर किसी वास्तुशास्त्री से पूछकर ही कोई चित्र या पेंटिंग लगाएं। एक चित्र आपका जीवन बदल सकता है। घर में ढेर सारे देवी और देवताओं के चित्र या मूर्तियां न रखें।
संकटों से बचने के उपाय :
o यदि आप संकटों से जूझ रहे हैं, बार-बार एक के बाद एक कोई न कोई संकट से आप घिर जाते हैं तो किसी की शवयात्रा में श्मशान से लौटते वक्त कुछ सिक्के पीछे फेंकते हुए आ जाएं।
o स्नानादि से निवृत्त होने के बाद हनुमानजी के मंदिर जाकर उनसे जाने-अनजाने किए गए पापों की क्षमा मांग लें, तुरंत ही संकटों से मुक्ति मिलना शुरू हो जाएगी।
o कांसे की कटोरी में तेल भरकर उसमें अपनी परछाई देखें और यह तेल किसी मंदिर में दान कर दें। 5 तरह के फल ले जाकर किसी मंदिर में रख आएं।
संकटों से बचने के उपाय :
o यदि आप संकटों से जूझ रहे हैं, बार-बार एक के बाद एक कोई न कोई संकट से आप घिर जाते हैं तो किसी की शवयात्रा में श्मशान से लौटते वक्त कुछ सिक्के पीछे फेंकते हुए आ जाएं।
o स्नानादि से निवृत्त होने के बाद हनुमानजी के मंदिर जाकर उनसे जाने-अनजाने किए गए पापों की क्षमा मांग लें, तुरंत ही संकटों से मुक्ति मिलना शुरू हो जाएगी।
o कांसे की कटोरी में तेल भरकर उसमें अपनी परछाई देखें और यह तेल किसी मंदिर में दान कर दें। 5 तरह के फल ले जाकर किसी मंदिर में रख आएं।
o घर से किसी भी कार्य के लिए निकलते समय पहले ‘श्री गणेशाय नम:’ बोलें फिर विपरीत दिशा में 4 पग जाएं, इसके बाद कार्य पर चले जाएं, कार्य जरूर बनेगा।
o घर से निकलते वक्त गुड़ खाकर व थोड़ा-सा पानी पीकर निकलें, तो कार्य में सफलता मिलेगी। इसके अलावा घर की देहली के बाहर कुछ काली मिर्ची के दाने बिखेर दें और उस पर से पैर रखकर निकल जाएं फिर पीछे पलटकर न देंखे। उक्त उपाय से बिगड़े कार्य बन जाएंगे।
कपड़े पहनें रंगदार और साफ-सुथरे :
o कार्य में रुकावट या सफलता में आपके घर और कपड़े के रंग का भी बहुत योगदान रहता है। कभी भी हल्के, काले, कत्थई, भूरे और मटमैले रंग के कपड़े न पहनें। अधिकतर सफेद, नीले, लाल, हरे और गुलाबी रंग के कपड़े ही पहनें।
पीपल और बरगद की पूजा करें :
o कोई काम न बन रहा हो तो 19 शनिवार तक आप पीपल के पेड़ में धागा लपेटें और तिल के तेल का ही दीया जलाएं। इस दीये में 11 दाने काली उड़द के जरूर रखें। इसके अलावा प्रतिदिन संध्या को पीपल में घी का दीया जलाकर रखें। ध्यान रखें कि पीपल को शनिवार को ही छुएं।
o ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या तिथि के दिन वटवृक्ष की पूजा का विधान है। शास्त्रों में कहा गया है कि इस दिन वटवृक्ष की पूजा से सौभाग्य एवं स्थायी धन और सुख-शांति की प्राप्ति होती है।
o बरगद के पेड़ को वट का वृक्ष कहा जाता है। शास्त्रों में वटवृक्ष को पीपल के समान ही महत्व दिया गया है। पुराणों में यह स्पष्ट लिखा गया है कि वटवृक्ष की जड़ों में ब्रह्माजी, तने में विष्णुजी और डालियों एवं पत्तों में शिव का वास है। इसके नीचे बैठकर पूजन, व्रत कथा कहने और सुनने से मनोकामना पूरी होती है।
o हिन्दू धर्मानुसार 5 वटवृक्षों का महत्व अधिक है। अक्षयवट, पंचवट, वंशीवट, गयावट और सिद्धवट के बारे में कहा जाता है कि इनकी प्राचीनता के बारे में कोई नहीं जानता। संसार में उक्त 5 वटों को पवित्र वट की श्रेणी में रखा गया है। प्रयाग में अक्षयवट, नासिक में पंचवट, वृंदावन में वंशीवट, गया में गयावट और उज्जैन में पवित्र सिद्धवट है।
o ।।तहं पुनि संभु समुझिपन आसन। बैठे वटतर, करि कमलासन।।
भावार्थ- अर्थात कई सगुण साधकों, ऋषियों यहां तक कि देवताओं ने भी वटवृक्ष में भगवान विष्णु की उपस्थिति के दर्शन किए हैं। -रामचरित मानस
बंद किस्मत खोले ताला :
o सबसे पहले आप ताले की दुकान पर किसी भी शुक्रवार को जाएं और एक स्टील या लोहे का ताला खरीद लें। लेकिन ध्यान रखें ताला बंद होना चाहिए, खुला नहीं। ताला खरीदते समय उसे न दुकानदार को खोलने दें और न आप खुद खोलें। ताला सही है या नहीं, यह जांचने के लिए भी न खोलें। बस, बंद ताले को खरीदकर ले आएं।
o उस ताले को एक डिब्बे में रखें और शुक्रवार की रात को ही अपने सोने वाले कमरे में बिस्तर के पास रख लें। शनिवार सुबह उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर ताले को बिना खोले किसी मंदिर या देवस्थान पर रख दें। ताले को रखकर बिना कुछ बोले, बिना पलटे वापस अपने घर आ जाएं।
o विश्वास और श्रद्धा रखें। जैसे ही कोई उस ताले को खोलेगा आपकी किस्मत का ताला भी खुल जाएगा। यह लाल किताब का जाना-माना प्रयोग है। अपनी किस्मत चमकाने के लिए इसे अवश्य आजमाएं…।
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अपनापन “पिता-बेटी”*
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“पापा मैंने आपके लिए हलवा बनाया है” 11साल की बेटी अपने पिता से बोली जो कि अभी office से घर मे घुसा ही था ,

पिता “वाह क्या बात है ,ला कर खिलाओ फिर पापा को,”

बेटी दौड़ती रसोई मे गई और बडा कटोरा भरकर हलवा लेकर आई ..
पिता ने खाना शुरू किया और बेटी को देखा ..
पिता की आँखों मे आँसू थे…

-क्या हुआ पापा हलवा अच्छा नही लगा

पिता- नही मेरी बेटी बहुत अच्छा बना है ,

और देखते देखते पूरा कटोरा खाली कर दिया; इतने मे माँ बाथरूम से नहाकर बाहर आई ,
और बोली- “ला मुझे भी खिला तेरा हलवा”

पिता ने बेटी को 50 रु इनाम मे दिए , बेटी खुशी से मम्मी के लिए रसोई से हलवा लेकर आई मगर ये क्या जैसे ही उसने हलवा की पहली चम्मच मुंह मे डाली तो तुरंत थूक दिया और बोली- “ये क्या बनाया है, ये कोई हलवा है, इसमें तो चीनी नही नमक भरा है , और आप इसे कैसे खा गये ये तो जहर हैं , मेरे बनाये खाने मे तो कभी नमक मिर्च कम है तेज है कहते रहते हो ओर बेटी को बजाय कुछ कहने के इनाम देते हो….”

पिता-(हंसते हुए)- “पगली तेरा मेरा तो जीवन भर का साथ है, रिश्ता है पति पत्नी का जिसमें नौकझौक रूठना मनाना सब चलता है; मगर ये तो बेटी है कल चली जाएगी, मगर आज इसे वो एहसास वो अपनापन महसूस हुआ जो मुझे इसके जन्म के समय हुआ था। आज इसने बडे प्यार से पहली बार मेरे लिए कुछ बनाया है, फिर वो जैसा भी हो मेरे लिए सबसे बेहतर और सबसे स्वादिष्ट है; ये बेटियां अपने पापा की परियां , और राजकुमारी होती है जैसे तुम अपने पापा की हो …”

वो रोते हुए पति के सीने से लग गई और सोच रही थी
इसीलिए हर लडकी अपने पति मे अपने पापा की छवि ढूंढती है..

दोस्तों यही सच है हर बेटी अपने पिता के बडे करीब होती है या यूं कहे कलेजे का टुकड़ा इसीलिए शादी मे विदाई के समय सबसे ज्यादा पिता ही रोता है ….

इसीलिए हर पिता हर समय अपनी बेटी की फिक्र करता रहता है !

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लष्मीकांत

एक राजा को पक्षी पालने का शौक था । पाले गए पक्षियों में चकोर उन्हें अत्यंत प्रिय था । वे उसे अपने हाथ पर बैठाये रहते और कहीं भी जाते तो साथ ही ले जाते ।

एक बार राजा वन में शिकार करने गए, उनका घोड़ा दूसरे साथियों से आगे निकल गया, वह वन में भटक गए, बहुत प्यास सताने लगी ।

पानी की खोज में भटकते हुए उन्होंने देखा कि एक चट्टान की संधि से बूंद बूंद करके पानी टपक रहा है । राजा ने एक प्याला निकाला और टपकते पानी के नीचे रख दिया । कुछ देर में प्याला भर गया । राजा ने जैसे ही पीने के लिए उठाया, कंधे पर बैठे चकोर ने उड़कर पंख मारकर प्याला लुढ़का दिया । राजा को बहुत क्रोध आया किंतु संयम रखकर प्याला पुनः रख दिया भरने के लिए । थोड़ी देर में प्याला फिर भरा इस बार भी जैसे ही पीने चले, चकोर ने फिर पंख मारकर गिरा दिया । क्रोध के मारे राजा ने चकोर को पकड़ा और गर्दन मरोड़ दी ।

चकोर को नीचे फेंक कर उन्होंने सिर ऊपर उठाया तो सहसा उनकी दृष्टि चट्टान की संधि पर पड़ी । वहां एक मरा हुआ सर्प दबा हुआ था और उसके शरीर से स्पर्श करता हुआ यह पानी टपक रहा था । राजा कांप उठा, हाय ! जल पीकर में मर जाता । बेचारे पक्षी ने दो बार जल गिराया और मैंने क्रोध में उसी को मार डाला । राजा जीवन भर पश्चाताप की अग्नि में जलते रहे पर कुछ कर न सके ।

क्रोध का परिणाम हमेशा ही बुरा होता है । कई बार ऊपर से गलती दिखती है पर अंदर गुप्त कल्याण भी समाया रहता है । सहज गीता ज्ञान हमें वह गुप्त कल्याण देख पाने का नेत्र प्रदान करता है और यदि किसी से सचमुच गलती हो, तो भी उसे क्षमा करना ही श्रेष्ठ हथियार है । क्षमा का परिणाम कभी बुरा नहीं निकलता है ।

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लष्मीकांत

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रंजना सिलाई मशीन पर बैठी कपडे काट रही थी

साथ ही बड़बडाये जा रही थी। उफ़ ये कैची तो किसी काम की नहीं रही बित्ता भर कपडा काटने में ही उँगलियाँ दुखने लगी हैं।

पता नहीं वो सोहन ग्राइंडिंग वाला कहाँ चला गया।

हर महीने आया करता था तो कालोनी भर के लोगों के चाकू कैची पर धार चढ़ा जाता था वो भी सिर्फ चंद पैसों में।

सोहन एक ग्राइंडिंग करने वाला यही कोई 20-25 साल का एक युवक था।

बहुत ही मेहनती और मृदुभाषी

चेहरे पे उसके हमेशा पसीने की बूंदे झिलमिलाती रहती लेकिन साथ ही मुस्कुराहट भी खिली रहती।

जब कभी वो कालोनी में आता किसी पेड़ के नीचे अपनी विशेष प्रकार की साईकिल को स्टैंड पे खड़ा करता जिसमे एक पत्थर की ग्राइंडिंग व्हील लगी हुई थी और सीट पे बैठ के पैडल चला के घुमते हुए पत्थर की व्हील पर रगड़ दे के चाक़ू और कैंचियों की धार तेज कर देता।

इसी बहाने कालोनी की महिलाये वहाँ इकठ्ठा हो के आपस में बाते किया करती।

जब वो नाचती हुई ग्राइंडिंग व्हील पर कोई चाकू या कैची रखता तो उससे फुलझड़ी की तरह चिंगारिया निकलती जिसे बच्चे बड़े कौतूहल से देखा करते और आनन्दित भी होते ।

फिर वो बड़े ध्यान से उलट पुलट कर चाकू को देखता और संतुष्ट हो के कहता “लो मेंम साब इतनी अच्छी धार रखी है कि बिलकुल नए जैसा हो गया।

अगर कोई उसे 10 मांगने पर 5 रूपये ही दे देता तो भी वो बिना कोई प्रतिवाद किये चुपचाप जेब में रख लेता।

मैंने अपनी पांच साल की बेटी मिनी को आवाज लगाई “मिनी जा के पड़ोस वाली सरला आंटी से कैची तो मांग लाना जरा”। पता नहीं ये सोहन कितने दिन बाद कॉलोनी में आएगा।

थोड़ी देर बाद जब मिनी पड़ोस के घर से कैची ले के लौटी तो उसने बताया कि उसने सोहन को अभी कॉलोनी में आया हुआ देखा है।

मैंने बिना समय गवाँये जल्दी से अपने बेकार पड़े सब्जी काटने वाले चाकुओ और कैंची को इकठ्ठा किया और बाहर निकल पड़ी।

बाहर जाके मैंने जो देखा वो मुझे आश्चर्य से भर देने वाला दृश्य था।

क्या देखती हूँ की सोहन अपनी ग्राइंडिंग वाली साइकिल के बजाय एक अपाहिज भिखारी की छोटी सी लकड़ी की ठेला गाडी को धकेल के ला रहा है और उस पर बैठा हुआ भिखारी “भगवान के नाम पे कुछ दे दे बाबा” की आवाज लगाता जा रहा है।

उसके आगे पैसों से भरा हुआ कटोरा रखा हुआ है। और लोग उसमे पैसे डाल देते थे।

पास आने पर मैंने बड़ी उत्सुकता से सोहन से पुछा “सोहन ये क्या ??
और तुम्हारी वो ग्राइंडिंग वाली साईकिल ??

सोहन ने थोड़ा पास आके धीमे से फुसफुसाते हुए स्वर में कहा “मेंमसाब सारे दिन चाक़ू कैची तेज करके मुझे मुश्किल से सौ रुपये मिलते थे

जबकि ये भिखारी अपना ठेला खींचने का ही मुझे डेढ़ सौ दे देता है।

इसलिए मैंने अपना पुराना वाला काम बंद कर दिया।

मैं हैरत से सोहन को दूर तक भिखारी की ठेला गाडी ले जाते देखती रही।

और सोचती रही, एक अच्छा भला इंसान जो कल तक किसी सृजनात्मक कार्य से जुड़ा हुआ समाज को अपना योगदान दे रहा था आज हमारे ही सामाजिक व्यवस्था द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया।

एक चेतावनी भरी सीख :

*हम अनायास एक भिखारी को तो उसकी आवश्यकता से अधिक पैसे दे डालते हैं,लेकिन एक मेहनतकाश इन्सान को उसके श्रम का वह यथोचित मूल्य भी देने में संकोच करने लगते हैं जिससे समाज में उसके श्रम की उपयोगिता बनी रहे तथा उसकी खुद्दारी और हमारी मानवता दोनों शर्मिंदा होने से बच जाएँ।

Posted in छोटी कहानिया - १००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

A father told his 3 sons
when he sent them to the
university:

“I feel it’s my duty to provide
you with the best possible
education, and you do not
owe me anything for that.
However, I want you to
appreciate it.

As a token, please each put
Rs.1,00,000 into my coffin
when I die.”

And so it happened. His sons
became a doctor, a lawyer
and a financial planner,
each very successful and
financially sound.

When their father’s time had
come and they saw their
father in the coffin, they
remembered his wish.

First, it was the doctor who
put 200 X Rs.500 notes on
the chest of the deceased.

Then, came the financial
planner, who also put
50 x Rs2,000 there.

Finally,
it was the heartbroken
lawyer’s turn. He dipped
into his pocket, took out
his cheque book, wrote a
cheque for Rs3,00,000, put
it under his father’s body,
took the Rs.2,00,000 cash
and closed the
coffin’s lid……

He is Famously known as
*Arun jaitly —

Posted in रामायण - Ramayan

ढोल,गवार,क्षुब्ध पशु,रारी”
श्रीरामचरितमानस में कहीं नहीं किया गया है शूद्रों और नारी का अपमान।
भगवान श्रीराम के चित्रों को जूतों से पीटने वाले भारत के राजनैतिक शूद्रों को पिछले 450 वर्षों में गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित हिंदू महाग्रंथ ‘श्रीरामचरितमानस’ की कुल 10902 चौपाईयों में से आज तक मात्र 1 ही चौपाई पढ़ने में आ पाई है और वह है भगवान श्री राम का मार्ग रोकने वाले समुद्र द्वारा भय वश किया गया अनुनय का अंश है जो कि सुंदर कांड में 58 वें दोहे की छठी चौपाई है “ढोल गँवार शूद्र पशु नारी, सकल ताड़ना के अधिकारी”
इस सन्दर्भ में चित्रकूट में मौजूद तुलसीदास धाम के पीठाधीश्वर और विकलांग विश्वविद्यालय के कुलाधिपति श्री राम भद्राचार्य जी जो नेत्रहीन होने के बावजूद संस्कृत, व्याकरण, सांख्य, न्याय, वेदांत, में 5 से अधिक GOLD Medal जीत चुकें हैं।
महाराज का कहना है कि बाजार में प्रचलित रामचरितमानस में 3 हजार से भी अधिक स्थानों पर अशुद्धियां हैं और इस चौपाई को भी अशुद्ध तरीके से प्रचारित किया जा रहा है।
उनका कथन है कि तुलसी दास जी महाराज खलनायक नहीं थे,आप स्वयं विचार करें यदि तुलसीदास जी की मंशा सच में शूद्रों और नारी को प्रताड़ित करने की ही होती तो क्या रामचरित्र मानस की 10902 चौपाईयों में से वो मात्र 1 चौपाई में ही शूद्रों और नारी को प्रताड़ित करने की ऐसी बात क्यों करते ?
यदि ऐसा ही होता तो भील शबरी के जूठे बेर को भगवान द्वारा खाये जाने का वह चाहते तो लेखन न करते।यदि ऐसा होता तो केवट को गले लगाने का लेखन न करते।
स्वामी जी के अनुसार ये चौपाई सही रूप में – ढोल,गवार, शूद्र,पशु,नारी नहीं है
बल्कि यह “ढोल,गवार,क्षुब्ध पशु,रारी” है।
ढोल = बेसुरा ढोलक
गवार = गवांर व्यक्ति
क्षुब्ध पशु = आवारा पशु जो लोगो को कष्ट देते हैं
रार = कलह करने वाले लोग
चौपाई का सही अर्थ है कि जिस तरह बेसुरा ढोलक, अनावश्यक ऊल जलूल बोलने वाला गवांर व्यक्ति, आवारा घूम कर लोगों की हानि पहुँचाने वाले (अर्थात क्षुब्ध, दुखी करने वाले) पशु और रार अर्थात कलह करने वाले लोग जिस तरह दण्ड के अधिकारी हैं उसी तरह मैं भी तीन दिन से आपका मार्ग अवरुद्ध करने के कारण दण्ड दिये जाने योग्य हूँ।

स्वामी राम भद्राचार्य जी जो के अनुसार श्रीरामचरितमानस की मूल चौपाई इस तरह है और इसमें ‘क्षुब्ध’ के स्थान पर ‘शूद्र’ कर दिया और ‘रारी’ के स्थान पर ‘नारी’ कर दिया गया है।

भ्रमवश या भारतीय समाज को तोड़ने के लिये जानबूझ कर गलत तरह से प्रकाशित किया जा रहा है।इसी उद्देश्य के लिये उन्होंने अपने स्वयं के द्वारा शुद्ध की गई अलग रामचरित मानस प्रकाशित कर दी है।रामभद्राचार्य कहते हैं धार्मिक ग्रंथो को आधार बनाकर गलत व्याख्या करके जो लोग हिन्दू समाज को तोड़ने का काम कर रहे है उन्हें सफल नहीं होने दिया जायेगा।

आप सबसे से निवेदन है , इस लेख को अधिक से अधिक share करें।तुलसीदास जी की चौपाई का सही अर्थ लोगो तक पहुंचायें हिन्दू समाज को टूटने से बचाएं।

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एक छोटी सी कहानी से शायद मेरी बात समझ में आए।

जापान में एक राजा ने अपने युवा लड़के को एक फकीर के पास भेजा। फकीर गांव में आया था, राजधानी में और फकीर ने कहा था, जीवन में एक ही बात सीखने जैसी है और वह है जागना।

उस राजा ने कहा, यह जागना! हम रोज सुबह जागते हैं, वह जागना नहीं है ???

उस फकीर ने कहाः अगर वही जागना होता तो दुनिया सत्य को कभी का जान लेती। लेकिन सत्य का कोई पता नहीं है, यह जागरण कैसा है! यह जागना नहीं है, क्योंकि जागी हुई चेतना को फिर तत्व को जानने में कौन सा अवरोध है ???
राजा से कहा उसने कि, मैं , जागना-एक ही सूत्र जानता हूं जीवन को सीखने का।

राजा ने अपने लड़के को कहा, जा और उस फकीर के पास रह। मैंने तो जीवन खो दिया। तू कोशिश कर कि क्या इसके पास जागना सीख सकता है ???

वह राजकुमार गया। उस फकीर ने कहाः सुनो, मेरी शिक्षा किताबें पढ़ने वाली नहीं है। मेरी शिक्षा बहुत अनूठी है। कल सुबह से तुम्हारा पाठ शुरू होगा।

यह लकड़ी की तलवार देखते हो ???
कल सुबह से मैं हमला शुरू करूंगा तुम्हारे ऊपर।
तुम किताब पढ़ रहे होगे, मैं पीछे से हमला शुरू कर दूंगा। बचाने की सावधानी रखना।
तुम खाना खा रहे होगे, हमला हो जाएगा।
तुम स्नान करने कुएं पर खड़े होगे, हमला हो जाएगा।
चैबीस घंटे कहीं भी हमला हो सकता है। तो सजग रहना,
सावधान रहना,
बचाव करना, नहीं तो हड्डी-हड्डी टूट जाएगी। राजकुमार बहुत घबड़ाया कि यह कौन सी शिक्षा शुरू होगी!

लेकिन मजबूरी थी। पिता ने उसे भेजा था।
सभी बच्चे मजबूरी में पढ़ने जाते हैं। पिता भेज देते हैं, उनको जाना पड़ता है। उसको भी जाना पड़ा था, लौट सकता नहीं था।

दूसरे दिन से शिक्षा शुरू हो गई। वह पढ़ रहा है कोई किताब, पीछे से हमला हो गया। चोंक के तिलमिला उठा।

एक दिन, दो दिन, तीन दिन बीते, सब हड्डी-पसलियों पर चोट हो गई,
जगह-जगह दर्द होने लगा।
लेकिन साथ ही उसके खयाल में आने लगी एक नई चीज, जिसका उसे पता ही नहीं था।
एक सावधानी सांस-सांस के साथ रहने लगी कि हमला होने को है।
पता नहीं कब हो जाए, किस क्षण ???

वह हर वक्त जैसे सचेत,
जैसे खयाल में,
जैसे स्मृति में रहने लगा।
अब खयाल आता है,
जरा सी हवा चल जाए, पत्ते हिल जाएं तो वह जाग जाए।
जरा सी घर में खुट-पुट हो और किसी के घर में कदम पड़ें और वह सचेत हो जाए कि हमला होने को है–बचाव करना है।
सात दिन बीतते-बीतते वह बहुत हैरान हो गया।

यह गुरू अदभुत था। चोट फिर हड्डियों पर नहीं हो रही थी, भीतर चेतना पर भी हो रही थी।

वह कोई चीज नई थी,
कोई चीज उठ गई थी, जो भीतर सोई हुई थी।

तीन महिने बीत गए,
रोज-रोज यह चलता रहा।
और रोज-रोज उस युवक ने पाया कि फर्क पड़ रहा है कोई बहुत गहरा। धीरे-धीरे वह हमले से बचाव करने लगा।

हमला होता, हाथ पहुंच जाते। कोई चीज निरंतर सावधान थी, निरंतर अटेंटिव थी, हाथ पहुंच जाते, रोक लेता। तीन महिने बीत गए, हमला करना मुश्किल हो गया है। वह जो हमला करता है, वे हमले रोक लिए जाते हैं।
तीन महीने बीत जाने पर गुरु ने कहाः पहला पाठ पूरा हुआ। अब कल से दूसरा पाठ शुरू होगा। अब नींद में भी सावधान रहना। सोते में भी हमला कर सकता हूं।

उस युवक ने माथा ठोंक लिया, जागने तक गनीमत थी, किसी तरह वह बचाव कर लेता था, सोने में क्या होगा ???
और सोते में हमले कैसे रोके जा सकेंगे ???

लेकिन एक बात का उसे खयाल आ गया था। इन तीन महिनों में उसने कोई चीज बहुत अदभुत रूप से भीतर जागती हुई पाई थी, जैसे कोई बुझा दीया जल गया हो।
एक बहुत सावधानी कदम-कदम पर आ गई थी,
श्वास-श्वांस पर आ गई थी और एक अजीब अनुभव हुआ था उसे कि जितना वह सावधान रहने लगा था उतने ही विचार कम हो गए थे। मन मौन हो गया था।

सावधानी के साथ-साथ यह जो अटेंशन उसे चैबीस घंटे देनी पड़ रही थी, उससे धीरे-धीरे विचार क्षीण हो गए थे; मन भीतर साइलेंस में, एक मौन में रहने लगा था। बड़े आनंद की खबरें भीतर से आ रही थीं, इसलिए वह तैयार हो गया कि देखें, इस दूसरे पाठ को भी देख लें।

और दूसरे दिन से दूसरा पाठ शुरू हो गया, नींद में भी हमले होने लगे। लेकिन एक महिना बीतते-बीतते नींद में भी उसे होश रहने लगा। नींद भी चलती थी, भीतर कोई तेज धारा चेतना की बहती रहती, जिससे खयाल बना रहता कि हमला हो सकता है। हैरान हुआ वह, सोया भी था, जागा भी था।
आज उसने पहली दफा जाना कि शरीर सोया हुआ है, मैं जागा हुआ हूं।

एक मां सोती है रात, बच्चा बीमार होता है, रोता है, नींद में ही हाथ पहुंच जाता बच्चे पर। शायद सुबह उससे पूछो, उसे पता भी न हो कि मैंने रात बच्चे को चुप किया था। हम सारे लोग यहां सो जाएं आज, और रात में कोई आधी रात में आकर बुलाए, राम, राम तो जिसका नाम राम हो, वह पूछेगा, क्या है, लेकिन बाकी लोगों को पता ही न चलेगा कि कोई आवाज हुई। जिंदगी भर एक नाम के प्रति अटेंशन रही है, राम, वह भीतर गहरी हो चली है। कोई रात में भी बुलाता है तो वह सावधान हो जाता है आदमी, जिसका नाम राम है।

तीन महीने बीतते-बीतते नींद में भी हमला मुश्किल हो गया। नींद में भी हमला होता और हाथ रोक लिया जाता।
गुरु ने कहा तेरे दो पाठ पूरे हो गए। अब तीसरा और अंतिम पाठ शुरू होने को है।

उस युवक ने सोचा, अब कौन सा पाठ होगा–जागना और सोना दो बातें थीं ???
उसके गुरु ने कहाः अब तक लकड़ी के तलवार से हमला करता था, कल ही से असली तलवार से हमले किए जाएंगे। यह प्राण को कंपा देने वाली बात थी, लकड़ी फिर भी लकड़ी थी, चोट ही करती थी, इसमें तो प्राण भी जा सकते हैं।

लेकिन उस युवक ने देखा था, इन तीन महिनों में रात, उसके भीतर जैसे कोई स्थंभ खड़ा हो गया था जागरुकता का।
विचार जैसे समाप्त हो गए। जीवन से जैसे सीधी पहुंच–जीवन से सीधा संपर्क होने लगा था। एक अदभुत आनंद और आलोक फैल रहा था। उसने सोचा, अंतिम पाठ छोड़ कर चला जाना ठीक नहीं। पता नहीं और क्या छिपा हो ???

वह राजी गया।
असली तलवार के हमले शुरू हो गए। हाथ में चैबीस घंटे, सोते-जागते ढाल भरी रहती थी, लेकिन पंद्रह दिन बीत गए, गुरु एक भी चोट नहीं पहुंचा पाया। हर अंधेरे कोने से इंतजाम में की गई चोट भी झेल ली गई।

बैठा था युवक एक दिन सुबह, एक अचानक खयाल उसे आया।
एक झाड़ के नीचे वह बैठा है दूर, बहुत दूर। उसका गुरु दूसरे झाड़ के नीचे बैठ कर कुछ पढ़ता है। सत्तर साल का, अस्सी साल का बूढ़ा आदमी है।

इतने में अचानक खयाल आया, यह बूढ़ा छह महीने से मुझे परेशान किए हुए है,
सावधान!
सावधान!
सावधान!
हर तरफ से हमला करता है। आज मैं भी इस पर हमला करके देख लूं कि यह खुद भी सावधान है या नहीं।
कहीं मैं ही तो परेशान नहीं किए जा रहा हूं ???

ऐसा जब उसने सोचा, उधर उसका गुरु झाड़ के नीचे से चिल्लायाः ठहर-ठहर, ऐसा मत कर देना। वह बहुत घबड़ाया, उसने कहाः मैंने कुछ किया नहीं। उसके गुरु ने कहाः तू तीसरा पाठ पूरा तो कर ले, तब मुझे पता चल जाएगा। जब चित्त पूरा सावधान होता है तो दूसरे पैर की ध्वनि ही नहीं, दूसरे के विचार की ध्वनि भी सुनाई पड़ने लगती है। थोड़ा ठहर, अंतिम पाठ पूरा कर ले।

चित्त की जागरुकता का ऐसा अर्थ है–सावधानी। जैसे हम तलवार से घिरे हुए जीते हों। और हम जी रहे हैं तलवार से घिरे हुए।
मौत चारों तरफ तलवार से घेरे हुए है।
जिंदगी एक सतत असुरक्षा है, इनसिक्योरिटी है।
कोई सुरक्षा नहीं है जीवन में। इस तलवार से घिरे जी रहे हैं। भूल में हैं हम, यदि सोचते हों कि हम सब तरह से सुरक्षित हैं और कोई हमला हम पर नहीं हो रहा है। हर वक्त हमला है, पल-पल हमला है। इस हमले के प्रति बहुत सजग होकर सोचिए।

एक-एक कदम, एक-एक श्वांस, अटेंशनली, तो उसके जीवन में धीरे-धीरे सजगता का जन्म होगा। कोई सोचे–जागे। कोई कली फूल बन जाए और तब ही केवल, जो है विराट जीवन में अनंत, अमृत, उससे मिलन हो। उससे जुड़ जाना, उससे एक हो जाना।
धार्मिकता का अर्थ मेरी दृष्टि में सजगता के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।
न मंदिरों की पूजा और न प्रार्थना,
न शास्त्रों का पठन और पाठन।
यह सोया हुआ आदमी, यह सब करता रहेगा तो यह सब और सो जाने की तरकीबों से ज्यादा नहीं है।

लेकिन जागा हुआ आदमी पाता है–नहीं किसी मंदिर में जाता है पूजा करने को, बल्कि वह पाता है कि जहां वह है, वहीं ‘वह’ भी है।

नहीं फिर किसी मूर्ति में देखने की, खोजने की जरूरत पड़ती है, बल्कि पाता है जो भी है और जो भी दिखाई पड़ता है, वही भगवान है।

धार्मिक आदमी वह नहीं है, जो मंदिर जाता हो। धार्मिक आदमी वह है कि जहां होता है, वहीं मंदिर को पाता है।
धार्मिक आदमी वह नहीं है जो प्रार्थना करता हो, धार्मिक आदमी वह है, जो पाता है कि जो भी किया जाता है, वह प्रार्थना हो गई।
धार्मिक आदमी वह नहीं है कि भगवान की खोज में भटकता हो; बल्कि आंख खोले हुए वह आदमी है, जो पाता है कि जहां भी मैं जाऊं, भगवान के अतिरिक्त कोई यंत्र से तो मिलना नहीं है। लेकिन यह होगा एक जागरुक चित्त और जागरुक चित्तता ही जीवन की परिपूर्ण अनुभूति है।

मत पूछें मुझसे की जीवन क्या है और न जाएं किसी को सुनने जो समझाता हो कि जीवन क्या है ???
जीवन कोई किसी को नहीं समझा सकेगा। जीवन कोई समझाने की बात है ???
प्रेम कोई समझाने की बात है ???
सत्य कोई समझाने की बात है ???
कोई शब्दों से और विचारों से कुछ कह सकेगा उस तरफ ???

नहीं, कभी कोई कुछ नहीं कह सका।

जीवन तो खुद जानने की बात है।
जीना पड़ेगा उस मार्ग पर, जहां से जीवन जाता है और वह मार्ग है जागरुकता।
वह मार्ग है सचेतता का। उठते-बैठते, चलते, देखते, बात करते जिएं।
देखते हुए, आंख खोले हुए, होश से भरे हुए, तो रोज-रोज कोई जागने लगेगा, कोई प्राण की ऊर्जा विकसित होने लगेगी। और एक दिन–एक दिन जो महाविराट ऊर्जा है जीवन की उससे सम्मिलन हो जाएगा। जैसे कोई सरिता बहती है पहाड़ों से और भागती चली जाती है, भागती चली जाती है।

न मालूम कितने मार्गों को पार करती है, कितनी घाटियों को छलांगती है और एक दिन सागर तक पहुंच जाती है। ऐसे ही जागरूकता की धारा जो व्यक्ति जगाना शुरू कर देता है–वह सारी बाधाओं को, सारे पहाड़-पर्वतों को पार करती पहुंच जाती है,जहां प्रभु का सागर है, जहां जीवन का सागर है।
जीवन मेरे लिए परमात्मा का ही पर्यायवाची है। जीवन यानी परमात्मा।
जीवन और प्रभु भिन्न नहीं है।
लेकिन जो सोए हैं पुजारी अपने मंदिर में, उनके द्वार पर आएगा जीवन का रथ और वापस लौट जाएगा। जीवन तो रोज आता है द्वार पर उसके

ओशो
मन का दर्पण-(प्रवचन-04)