Posted in संस्कृत साहित्य

मनुष्यब की भावना

मनुष्य के मन की भावना सर्वोपरि होती है। उसकी श्रद्धा और उसका विश्वास उसे कहीं-का-कहीं पहुँचा सकते हैं, इसमें कोई दोराय नहीं है।
‘द्वात्रिंशत् पुतलिकासिंहासनम्’ नामक संस्कृत की एक पुस्तक है जिसका हिन्दी में ‘सिंहासन बतीसी’ नाम से अनुवाद किया गया। इस पुस्तक में निम्न श्लोक कवि ने वर्षों पूर्व लिखा था, वह आज भी उतना ही सटीक है –
देवे तीर्थे द्विजे मन्त्रे दैवज्ञे भेषजे गुरौ।
यादृशी भावना यस्य सिद्धिर्भवति तादृशी॥
अर्थात् देवता, तीर्थ, ब्राह्मण, मन्त्र, ज्योतिषी, डाक्टर और गुरु में मनुष्य की जैसी भावना होती है, उसे वैसा ही फल प्राप्त होता है।
हम ईश्वर की उपासना जिस भी रुप में करते हैं अथवा जिस किसी भी नाम से उसे याद करते हैं, यह मायने नहीं रखता। असली मुद्दा यह है कि हमारे मन में अपने इष्ट के लिए कितनी तड़प है। हम उसकी उपासना सच्चे मन से करते हैं या केवल दिखावा करते हैं। ईश्वर के भजन का तभी फल मिलता है जब हम पूर्णरूपेण उसके प्रति समर्पित हो जाते हैं। दुनिया को दिखाने के लिए या उनसे सबसे बड़ा भक्त होने का सर्टिफिकेट पाने के लिए किया गया प्रयास, ईश्वर की नजर में शून्य होता है।
तीर्थ स्थान पर यदि हम मौज-मस्ती के लिए जाते हैं तो तीर्थ भ्रमण का हमें लाभ नहीं मिलता। न तो हमारे विचारों में कोई परिवर्तन आता है और न ही हम प्रभु के सच्चे और बड़े भक्त बन सकते हैं। तीर्थ करने की हमारे जीवन में तभी उपयोगिता होती है यदि वहाँ जाकर घर-गृहस्थी के झंझटों से मन को विरक्त करके मालिक का स्मरण करते हैं। विद्वानों की संत्संगति करते हुए ज्ञानार्जन करते हैं। साधना करते हुए अपने अन्त:करण को शुद्ध-पवित्र बनाते हैं, तभी तीर्थ करने का हमारा उद्देश्य पूर्ण होता है। अन्यथा तो पिकनिक मनाकर लौट आने वाली बात होती है।
ब्राह्मण में यदि हमारा विश्वास होता है, तभी उससे मार्गदर्शन लिया जाता है। हमें अपने संस्कारों को करवाने के लिए भी सदा योग्य ब्राह्मण की आवश्यकता होती है। यदि उसमें आस्था नहीं होगी तो हमारे धार्मिक कृत्यों को करने का उद्देश्य पूर्ण नहीं हो सकेगा।
मन्त्रों में अपार शक्ति होती है। ये आत्मोन्नति करने में हमारी सहायता करते हैं। हमें अपने इष्ट तक पहुँचने में सफल बनाते हैं। हम मन्त्र जप करके ही तो अपने प्रभु का सानिध्य प्राप्त करते हैं। यदि मन्त्र पर हमें विश्वास नहीं होगा तो हमें कोई सिद्धि भी नहीं मिलेगी। तब ये अमूल्य मन्त्र हमें अपने इष्ट से मिलाने में कदापि सफल नहीं हो पाएँगे।
तान्त्रिक इन मन्त्रों को सिद्ध करके चमत्कार करते हैं। मैं उनकी इस पद्धति पर कोई आलोचना नहीं करना चाहती। पर इतना अवश्य कहना चाहती हूँ कि इन मन्त्रो से प्राप्त सिद्धियों का समाज हित में उपयोग करना चाहिए, मारण-उच्चाटन आदि में नहीं।
ज्योतिष एक वेदांग है। ज्योतिषीय गणना की विधा अपने आप में सम्पूर्ण है। उस पर मन से विश्वास करना आवश्यक है। हाँ, फलित ज्योतिष में जहाँ लालच व स्वार्थ हावी हो जाते हैं, वहाँ पर गलती की गुँजाइश बनी रहती है। फिर भी ज्योतिषी के पास विश्वास होने पर ही मनुष्य जाता है और अपनी विकट समस्या का उपाय जानना चाहता है।
डाक्टर पर यदि विश्वास न जमे तो वह कितना ही योग्य क्यों न हो रोगी स्वस्थ नहीं हो पाता। इसलिए उस पर मन से विश्वास होना चाहिए।
गुरु पर विश्वास न हो तब उसकी शरण में जाना व्यर्थ होता है। प्राचीन काल में योग्य गुरु के पास लोग अपने बच्चों को विद्याध्ययन के लिए के लिए भेजते थे। उन्हें यही विश्वास होता था कि उनके बच्चे योग्य बनकर जीवन में यश कमाएँगे। गुरु का कार्य शिष्य की आध्यात्मिक उन्नति करना होता है। गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण भाव मनुष्य को इहलोक और परलोक के बन्धनों से मुक्त करवाता है।
मन की सच्ची भावना होने से सभी कार्य सम्पन्न होते हैं। देवता, तीर्थ, ब्राह्मण, मन्त्र, ज्योतिषी, डाक्टर और गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण भाव रखकर हम उनसे लाभ ले सकते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद
Email : cprabas59@gmail.com
Blog : http//prabhavmanthan.blogpost.com/2015/5blogpost_29html
Twitter : http//tco/86whejp

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

केवल बिंद्रा

गुप्तेश्वरनाथ महादेव मंदिर,
भगवान शिव त्रिदेवों में से एक भगवान हैं, यह हिन्दू(सनातन) धर्म के एक प्रमुख देवता हैं जिनकी हर कोई पूजा करता है। वैसे तो भगवान शिव की अनेक गुफाँए हैं पर यह गुफा बहुत रहस्यमयी है, इस गुफा के बारे में माना जाता है कि इसे इंसानो ने नहीं बल्कि खुद प्रकृति ने बनाया है। आईये जानते हैं :

बिहार के प्राचीन शिवलिंगों में शुमार रोहतास जिले के गुप्तेश्वर धाम गुफा स्थित शिवलिंग की महिमा का बखान आदिकाल से ही होता आ रहा है। मान्यता है कि इस गुफा में जलाभिषेक करने के बाद भक्तों की सभी मन्नतें पूरी हो जाती हैं।

पौराणों में वर्णित भगवान शंकर व भस्मासुर से जुड़ी कथा को जीवंत रखे हुए ऐतिहासिक गुप्तेश्वरनाथ महादेव का गुफा मंदिर आज भी रहस्यमय बना हुआ है। देवघर के बाबाधाम की तरह गुप्तेश्वरनाथ यानी गुप्ताधाम श्रद्धालुओं में काफी लोकप्रिय है।

यहां बक्सर से गंगाजल लेकर शिवलिंग पर चढ़ाने की परंपरा है। रोहतास में अवस्थित विंध्य शृंखला की कैमूर पहाड़ी के जंगलों से घिरे गुप्ताधाम गुफा की प्राचीनता के बारे में कोई प्रामाणिक साक्ष्य उपलब्ध नहीं है।

इसकी बनावट को देखकर पुरातत्वविद अब तक यही तय नहीं कर पाए हैं कि यह गुफा मानव निर्मित है या प्राकृतिक। श्याम सुंदर तिवारी जो कई इतिहास की पुस्तकों को लिख चुके हैं वे कहते हैं कि गुफा के नाचघर व घुड़दौड़ मैदान के बगल में स्थित पाताल गंगा के पास दीवार पर उत्कीर्ण शिलालेख, जिसे श्रद्धालु ब्रह्मा के लेख के नाम से जानते हैं, को पढ़ने से संभव है, इस गुफा के कई रहस्य खुल जाएं।

गुफा में गहन अंधेरा होता है, बिना कृत्रिम प्रकाश के भीतर जाना संभव नहीं है। पहाड़ी पर स्थित इस पवित्र गुफा का द्वार 18 फीट चौड़ा एवं 12 फीट ऊंचा मेहराबनुमा है। गुफा में लगभग 363 फीट अंदर जाने पर बहुत बड़ा गड्ढा है,जिसमें सालभर पानी रहता है। श्रद्धालु इसे पाताल गंगा कहते हैं।

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

पारुल

बहुत समय पहले की बात है वृन्दावन में
श्रीबांके बिहारी जी के मंदिर में रोज
पुजारी जी बड़े भाव से सेवा
करते थे। वे रोज बिहारी जी की
आरती करते , भोग
लगाते और उन्हें शयन कराते और रोज चार लड्डू
भगवान के बिस्तर के पास रख देते थे। उनका यह भाव
था कि बिहारी जी को यदि रात में भूख
लगेगी तो वे उठ
कर खा लेंगे। और जब वे सुबह मंदिर के पट खोलते थे
तो भगवान के बिस्तर पर प्रसाद बिखरा मिलता था।
इसी भाव से वे रोज ऐसा करते थे।
एक दिन बिहारी जी को शयन कराने के बाद
वे चार
लड्डू रखना भूल गए। उन्होंने पट बंद किए और चले
गए। रात में करीब एक-दो बजे , जिस दुकान से वे
बूंदी
के लड्डू आते थे , उन बाबा की दुकान
खुली थी। वे घर
जाने ही वाले थे तभी एक छोटा सा बालक
आया और
बोला बाबा मुझे बूंदी के लड्डू चाहिए।
बाबा ने कहा – लाला लड्डू तो सारे ख़त्म हो गए। अब
तो मैं दुकान बंद करने जा रहा हूँ। वह बोला आप अंदर
जाकर देखो आपके पास चार लड्डू रखे हैं। उसके हठ
करने पर बाबा ने अंदर जाकर देखा तो उन्हें चार लड्डू
मिल गए क्यों कि वे आज मंदिर नहीं गए थे। बाबा ने
कहा – पैसे दो।
बालक ने कहा – मेरे पास पैसे तो नहीं हैं और तुरंत
अपने हाथ से सोने का कंगन उतारा और बाबा को देने
लगे। तो बाबा ने कहा – लाला पैसे नहीं हैं तो रहने दो,
कल अपने बाबा से कह देना , मैं उनसे ले लूँगा। पर वह
बालक नहीं माना और कंगन दुकान में फेंक कर भाग
गया। सुबह जब पुजारी जी ने पट खोला तो
उन्होंने देखा
कि बिहारी जी के हाथ में कंगन
नहीं है। यदि चोर भी
चुराता तो केवल कंगन ही क्यों चुराता। थोड़ी
देर बाद
ये बात सारे मंदिर में फ़ैल गई।
जब उस दुकान वाले को पता चला तो उसे रात की बात
याद आई। उसने अपनी दुकान में कंगन ढूंढा और
पुजारी
जी को दिखाया और सारी बात सुनाई। तब
पुजारी जी
को याद आया कि रात में , मैं लड्डू रखना ही भूल गया
था। इसलिए बिहारी जी स्वयं लड्डू लेने
गए थे।
यदि भक्ति में भक्त कोई सेवा भूल भी जाता है तो
भगवान अपनी तरफ से पूरा कर लेते हैं।

जय श्री कृष्ण

Posted in ज्योतिष - Astrology

लाल किताब के सिद्ध 25 टोटके और उपाय (लाल किताब ke Totke aur Upay)
लाल किताब के सिद्ध टोटके और उपाय (लाल किताब ke Totke aur Upay)
1. आर्थिक समस्या के छुटकारे के लिए:
यदि आप हमेशा आर्थिक समस्या से परेशान हैं तो इसके लिए 21 शुक्रवार 9 वर्ष से कम आयु की 5 आप कन्यायों को खीर व मिश्री का प्रसाद बांटें!
2. घर और कार्यस्थल में धन वर्षा के लिए:
इसके लिए आप अपने घर, दुकान या शोरूम में एक अलंकारिक फव्वारा रखें! या एक मछलीघर जिसमें 8 सुनहरी व एक काली मछ्ली हो रखें! इसको उत्तर या उत्तरपूर्व की ओर रखें! यदि कोई मछ्ली मर जाय तो उसको निकाल कर नई मछ्ली लाकर उसमें डाल दें!
3. परेशानी मुक्ति के लिए से:
आज कल हर आदमी किसी न किसी कारण से परेशान है! कारण कोई भी हो आप एक तांबे के पात्र में जल भर कर उसमें थोडा सा लाल चंदन मिला दें! उस पात्र को सिरहाने रख कर रात को सो जांय! प्रातः उस जल को तुलसी के पौधे पर चढा दें! धीरे-धीरे परेशानी दूर होगी!
4. कुंवारी कन्या के विवाह हेतु:
1। यदि कन्या की शादी में कोई रूकावट आ रही हो तो पूजा वाले 5 नारियल लें! भगवान शिव की मूर्ती या फोटो के आगे रख कर “ऊं श्रीं वर प्रदाय श्री नामः” मंत्र का पांच माला जाप करें फिर वो पांचों नारियल शिव जी के मंदिर में चढा दें! विवाह की बाधायें अपने आप दूर होती जांयगी!
2। प्रत्येक सोमवार को कन्या सुबह नहा-धोकर शिवलिंग पर “ऊं सोमेश्वराय नमः” का जाप करते हुए दूध मिले जल को चढाये और वहीं मंदिर में बैठ कर रूद्राक्ष की माला से इसी मंत्र का एक माला जप करे! विवाह की सम्भावना शीघ्र बनती नज़र आयेगी
5. व्यापार बढाने के लिए:
1। शुक्ल पक्ष में किसी भी दिन अपनी फैक्ट्री या दुकान के दरवाजे के दोनों तरफ बाहर की ओर थोडा सा गेहूं का आटा रख दें! ध्यान रहे ऐसा करते हुए आपको कोई देखे नही!
2। पूजा घर में अभिमंत्रित श्र्री यंत्र रखें!
3। शुक्र्वार की रात को सवा किलो काले चने भिगो दें! दूसरे दिन शनिवार को उन्हें सरसों के तेल में बना लें! उसके तीन हिस्से कर लें! उसमें से एक हिस्सा घोडे या भैंसे को खिला दें! दूसरा हिस्सा कुष्ठ रोगी को दे दें और तीसरा हिस्सा अपने सिर से घडी की सूई से उल्टे तरफ तीन बार वार कर किसी चौराहे पर रख दें! यह प्रयोग 40 दिन तक करें! कारोबार में लाभ होगा!
6. लगातार बुखार आने पर:
1। यदि किसी को लगातार बुखार आ रहा हो और कोई भी दवा असर न कर रही हो तो आक की जड लेकर उसे किसी कपडे में कस कर बांध लें! फिर उस कपडे को रोगी के कान से बांध दें! बुखार उतर जायगा!
2। इतवार या गुरूवार को चीनी, दूध, चावल और पेठा (कद्दू-पेठा, सब्जी बनाने वाला) अपनी इच्छा अनुसार लें और उसको रोगी के सिर पर से वार कर किसी भी धार्मिक स्थान पर, जहां पर लंगर बनता हो, दान कर दें!
3। यदि किसी को टायफाईड हो गया हो तो उसे प्रतिदिन एक नारियल पानी पिलायें! कुछ ही दिनों में आराम हो जायगा!
7. नौकरी जाने का खतरा हो या ट्रांसफर रूकवाने के लिए :
पांच ग्राम डली वाला सुरमा लें! उसे किसी वीरान जगह पर गाड दें! ख्याल रहे कि जिस औजार से आपने जमीन खोदी है उस औजार को वापिस न लायें! उसे वहीं फेंक दें दूसरी बात जो ध्यान रखने वाली है वो यह है कि सुरमा डली वाला हो और एक ही डली लगभग 5 ग्राम की हो! एक से ज्यादा डलियां नहीं होनी चाहिए!
8. कारोबार में नुकसान हो रहा हो या कार्यक्षेत्र में झगडा हो रहा हो तो :
यदि उपरोक्त स्थिति का सामना हो तो आप अपने वज़न के बराबर कच्चा कोयला लेकर जल प्रवाह कर दें! अवश्य लाभ होगा!
9. मुकदमें में विजय पाने के लिए:
यदि आपका किसी के साथ मुकदमा चल रहा हो और आप उसमें विजय पाना चाहते हैं तो थोडे से चावल लेकर कोर्ट / कचहरी में जांय और उन चावलों को कचहरी में कहीं पर फेंक दें! जिस कमरे में आपका मुकदमा चल रहा हो उसके बाहर फेंकें तो ज्यादा अच्छा है! परंतु याद रहे आपको चावल ले जाते या कोर्ट में फेंकते समय कोई देखे नहीं वरना लाभ नहीं होगा! यह उपाय आपको बिना किसी को पता लगे करना होगा!
10 धन के ठहराव के लिए:
आप जो भी धन मेहनत से कमाते हैं उससे ज्यादा खर्च हो रहा हो अर्थात घर में धन का ठहराव न हो तो ध्यान रखें को आपके घर में कोई नल लीक न करता हो! अर्थात पानी टप-टप टपकता न हो! और आग पर रखा दूध या चाय उबलनी नहीं चाहिये! वरना आमदनी से ज्यादा खर्च होने की सम्भावना रह्ती है!
11. मानसिक परेशानी दूर करने के लिए:
रोज़ हनुमान जी का पूजन करे व हनुमान चालीसा का पाठ करें! प्रत्येक शनिवार को शनि को तेल चढायें! अपनी पहनी हुई एक जोडी चप्पल किसी गरीब को एक बार दान करें!
12. बच्चे के उत्तम स्वास्थ्य व दीर्घायु के लिए:
1। एक काला रेशमी डोरा लें! “ऊं नमोः भगवते वासुदेवाय नमः” का जाप करते हुए उस डोरे में थोडी थोडी दूरी पर सात गांठें लगायें! उस डोरे को बच्चे के गले या कमर में बांध दें!
2। प्रत्येक मंगलवार को बच्चे के सिर पर से कच्चा दूध 11 बार वार कर किसी जंगली कुत्ते को शाम के समय पिला दें! बच्चा दीर्घायु होगा!
13. किसी रोग से ग्रसित होने पर:
सोते समय अपना सिरहाना पूर्व की ओर रखें! अपने सोने के कमरे में एक कटोरी में सेंधा नमक के कुछ टुकडे रखें! सेहत ठीक रहेगी!
14. प्रेम विवाह में सफल होने के लिए:
यदि आपको प्रेम विवाह में अडचने आ रही हैं तो:
शुक्ल पक्ष के गुरूवार से शुरू करके विष्णु और लक्ष्मी मां की मूर्ती या फोटो के आगे “ऊं लक्ष्मी नारायणाय नमः” मंत्र का रोज़ तीन माला जाप स्फटिक माला पर करें! इसे शुक्ल पक्ष के गुरूवार से ही शुरू करें! तीन महीने तक हर गुरूवार को मंदिर में प्रशाद चढांए और विवाह की सफलता के लिए प्रार्थना करें!
15. नौकर न टिके या परेशान करे तो:
हर मंगलवार को बदाना (मीठी बूंदी) का प्रशाद लेकर मंदिर में चढा कर लडकियों में बांट दें! ऐसा आप चार मंगलवार करें!
16. बनता बिगडता हो काम, लाभ न हो रहा हो या कोई भी परेशानी हो तो :
हर मंगलवार को हनुमान जी के चरणों में बदाना (मीठी बूंदी) चढा कर उसी प्रशाद को मंदिर के बाहर गरीबों में बांट दें!
17. यदि आपको सही नौकरी मिलने में दिक्कत आ रही हो तो :
1। कुएं में दूध डालें! उस कुएं में पानी होना चहिए!
2। काला कम्बल किसी गरीब को दान दें!
3। 6 मुखी रूद्राक्ष की माला 108 मनकों वाली माला धारण करें जिसमें हर मनके के बाद चांदी के टुकडे पिरोये हों!
18. अगर आपका प्रमोशन नहीं हो रहा तो:
1। गुरूवार को किसी मंदिर में पीली वस्तुये जैसे खाद्य पदार्थ, फल, कपडे इत्यादि का दान करें!
2। हर सुबह नंगे पैर घास पर चलें!
19. पति को वश में करने के लिए:
यह प्रयोग शुक्ल पक्ष में करना चाहिए! एक पान का पत्ता लें! उस पर चंदन और केसर का पाऊडर मिला कर रखें! फिर दुर्गा माता जी की फोटो के सामने बैठ कर दुर्गा स्तुति में से चँडी स्त्रोत का पाठ 43 दिन तक करें! पाठ करने के बाद चंदन और केसर जो पान के पत्ते पर रखा था, का तिलक अपने माथे पर लगायें! और फिर तिलक लगा कर पति के सामने जांय! यदि पति वहां पर न हों तो उनकी फोटो के सामने जांय! पान का पता रोज़ नया लें जो कि साबुत हो कहीं से कटा फटा न हो! रोज़ प्रयोग किए गए पान के पत्ते को अलग किसी स्थान पर रखें! 43 दिन के बाद उन पान के पत्तों को जल प्रवाह कर दें! शीघ्र समस्या का समाधान होगा!
20. यदि आपको धन की परेशानी है, नौकरी मे दिक्कत आ रही है, प्रमोशन नहीं हो रहा है या आप अच्छे करियर की तलाश में है तो यह उपाय कीजिए :
किसी दुकान में जाकर किसी भी शुक्रवार को कोई भी एक स्टील का ताला खरीद लीजिए! लेकिन ताला खरीदते वक्त न तो उस ताले को आप खुद खोलें और न ही दुकानदार को खोलने दें ताले को जांचने के लिए भी न खोलें! उसी तरह से डिब्बी में बन्द का बन्द ताला दुकान से खरीद लें! इस ताले को आप शुक्रवार की रात अपने सोने के कमरे में रख दें! शनिवार सुबह उठकर नहा-धो कर ताले को बिना खोले किसी मन्दिर, गुरुद्वारे या किसी भी धार्मिक स्थान पर रख दें! जब भी कोई उस ताले को खोलेगा आपकी किस्मत का ताला खुल जायगा!
21. यदि आप अपना मकान, दुकान या कोई अन्य प्रापर्टी बेचना चाहते हैं और वो बिक न रही हो तो यह उपाय करें :
बाजार से 86 (छियासी) साबुत बादाम (छिलके सहित) ले आईए! सुबह नहा-धो कर, बिना कुछ खाये, दो बादाम लेकर मन्दिर जाईए! दोनो बादाम मन्दिर में शिव-लिंग या शिव जी के आगे रख दीजिए! हाथ जोड कर भगवान से प्रापर्टी को बेचने की प्रार्थना कीजिए और उन दो बादामों में से एक बादाम वापिस ले आईए! उस बादाम को लाकर घर में कहीं अलग रख दीजिए! ऐसा आपको 43 दिन तक लगातार करना है! रोज़ दो बादाम लेजाकर एक वापिस लाना है! 43 दिन के बाद जो बादाम आपने घर में इकट्ठा किए हैं उन्हें जल-प्रवाह (बहते जल, नदी आदि में) कर दें! आपका मनोरथ अवश्य पूरा होगा! यदि 43 दिन से पहले ही आपका सौदा हो जाय तो भी उपाय को अधूरा नही छोडना चाहिए! पूरा उपाय करके 43 बादाम जल-प्रवाह करने चाहिए! अन्यथा कार्य में रूकावट आ सकती है!
22. यदि आप ब्लड प्रेशर या डिप्रेशन से परेशान हैं तो :
इतवार की रात को सोते समय अपने सिरहाने की तरफ 325 ग्राम दूध रख कर सोंए! सोमवार को सुबह उठ कर सबसे पहले इस दूध को किसी कीकर या पीपल के पेड को अर्पित कर दें! यह उपाय 5 इतवार तक लगातार करें! होगा लाभ!
23. माईग्रेन या आधा सीसी का दर्द का उपाय:
सुबह सूरज उगने के समय एक गुड का डला लेकर किसी चौराहे पर जाकर दक्षिण की ओर मुंह करके खडे हो जांय! गुड को अपने दांतों से दो हिस्सों में काट दीजिए! गुड के दोनो हिस्सों को वहीं चौराहे पर फेंक दें और वापिस आ जांय! यह उपाय किसी भी मंगलवार से शुरू करें तथा 5 मंगलवार लगातार करें! लेकिन … .लेकिन ध्यान रहे यह उपाय करते समय आप किसी से भी बात न करें और न ही कोई आपको पुकारे न ही आप से कोई बात करे! अवश्य लाभ होगा!
24. फंसा हुआ धन वापिस लेने के लिए:
यदि आपकी रकम कहीं फंस गई है और पैसे वापिस नहीं मिल रहे तो आप रोज़ सुबह नहाने के पश्चात सूरज को जल अर्पण करें! उस जल में 11 बीज लाल मिर्च के डाल दें तथा सूर्य भगवान से पैसे वापिसी की प्रार्थना करें! इसके साथ ही “ओम आदित्याय नमः” का जाप करें!
🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

देव शर्मा

(((( लोभ छलता है ))))

किसी नगर में एक बहुत ही संपन्न सेठ रहता था। उसका व्यापार दिन दूनी और रात चौगुनी उन्नति कर रहा था।
.
इतनी समृद्धि के बावजूद सेठ का लोभ बढ़ता ही जा रहा था। वह अधिक से अधिक धन कमाने में लगा रहता और कंजूस इतना कि किसी याचक को एक कौड़ी नहीं देता था।
.
एक दिन उसके द्वार पर एक फक्कड़ साधु आया और उससे कुछ देने की प्रार्थना की।
उस दिन सेठ को न जाने क्या हुआ कि उसने एक पैसा साधु की झोली में डाल दिया।
.
साधु उसे भगवान का प्रसाद देकर आशीर्वचन कहता हुआ चला गया।
.
सेठ तब आश्चर्यचकित रह गया, जब शाम को उसे प्रसाद के दोने में सोने की एक अशर्फी प्राप्त हुई।
.
अशर्फी मिलने से उसे एक ओर जहां अत्यंत प्रसन्नता हुई, वहीं अफसोस भी हुआ कि उसने साधु को एक पैसा ही क्यों दिया।
.
अगले दिन साधु फिर आया। लोभी सेठ तो उसकी प्रतीक्षा में ही बैठा था। इस बार साधु के झोली फैलाते ही सेठ ने मुट्ठीभर पैसे उसमें डाल दिए।
.
साधु पुन: उसे प्रसाद व आशीष देकर चला गया। सेठ शाम होने की प्रतीक्षा करने लगा। रात हो गई, लेकिन अशर्फी प्राप्त नहीं हुई।
.
सेठ अब सिर धुनने लगा कि मेरे पैसे भी चले गए और अशर्फी भी नहीं मिली।
.
तभी सेठ की धर्मपरायण पत्नी ने उसे समझाया- दुख मत मनाइए, यह सबक लीजिए कि त्याग फलता है, जबकि लोभ छलता है। पत्नी की इस बात ने सेठ की आंखें खोल दीं।
.
कथा का सार यह है कि नि:स्वार्थ भाव से किया गया दान हमेशा अच्छा प्रतिफल देता है, जबकि इसके विपरीत स्थिति में किया गया दान न उपलब्धि देता है, न आत्मसंतोष।

((((((( जय जय श्री राधे )))))))
Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

ज्योति अग्रवाल

एक रोज मेरी पत्नी ने मुझसे पूछा कि आप अपना ही बीमा क्यों करवाते हैं। मेरा क्यों नहीं करवाते। मैंने कहा-अगर तुम ही जिंदगी से निकल गई तो मैं उसके एवज में पैसे लेकर क्या करूंगा..?
जीवन में तुम्हारी भरपाई पैसा नहीं कर पाएगा, लेकिन खुदा न खास्ता अगर मैं पहले निकल लिया तो सिर्फ दो ही चीजें काम आएंगी, मेरे छोड़े हुए रिश्ते और मेरे छोड़े हुए पैसे।

ये बात दरअसल मूल बात का प्रसंग मात्र है।

लखनऊ में यूपी की एनकाउंटरबाज पुलिस की गोली से मारे गए विवेक तिवारी की पत्नी कल्पना तिवारी और परिवार वालों को 40 लाख रुपये का मुआवजा, नौकरी, सरकारी घर मिला तो वो शांत दिखीं। मुख्यमंत्री और सरकार पर भरोसा जताया, लेकिन उनकी ये संतुष्टि बहुतों को रास नहीं आई। जो लिखा जा रहा है उसका सीधा-सीधा सा मतलब है-कल्पना ने पति की हत्या का सौदा कर लिया है।

तो क्या करती कल्पना तिवारी..। हत्यारे कांस्टेबल प्रशांत चौधरी को चाहे फांसी चढ़ा दिया जाए, योगी सरकार गिर जाए, कुछ भी हो जाए, विवेक तिवारी को वापस नहीं लाया जा सकता था। तो क्या विवेक तिवारी के विरह में कल्पना तिवारी अपनी पूरी उम्र काट देतीं, बच्चे यतीम की जिंदगी बिता रहे होते, तब लोग संतुष्ट होते। वो कहती-मुझे मुआवजे का एक भी पैसा नहीं चाहिए, मुझे मेरे पति का इंसाफ चाहिए। इस डायलॉग पर आप शायद तालियां बजाते, लेकिन दिल पर हाथ रखकर बताइए, अगर आपसे कहा जाता कि आप कल्पना तिवारी की सिर्फ एक बेटी की साल भर की फीस भर दीजिए, तो क्या आप भरते..?

विवेक तिवारी पुलिस की गोली का शिकार हुए। उन्होंने सिर्फ अपना शरीर ही नहीं छोड़ा था। कुछ जिम्मेदारियां भी छोड़ गए हैं। बुजुर्ग मां, एक विधवा पत्नी, दो मासूम बच्चे। कौन जिम्मेदारी लेगा इनकी..? एक स्त्री के लिए पति से बढ़कर कुछ भी नहीं होता, लेकिन उसके बच्चे भी तो उस पति के ही अंश हैं। विवेक की मां की आंखों में भी तो अपने बेटे का अक्स है। एक जिम्मेदार और व्यावहारिक इंसान को ‘हे भगवान, ये क्या हो गया’, इस सवाल से ज्यादा इस सवाल पर सोचना चाहिए कि अब आगे क्या होगा..? ये परिवार कैसे चलेगा?…

विवेक तिवारी प्राइवेट नौकरी में थे। हो सकता है कि मोटा वेतन मिलता रहा हो, लेकिन उनके जाने के बाद ये घर कैसे चलता, पत्नी किससे आस रखती..। बच्चों की फीस कौन भरता, उनकी जिम्मेदारियां कौन उठाता। जब विवेक तिवारी की हत्या हुई तो कल्पना भावुकता के चरम पर थीं, उनका तो सब कुछ लुट चुका था। लेकिन भीतर एक समझदार और जिम्मेदार महिला ने आंखें खोलीं, पता चला कि नहीं, सब कुछ खत्म नहीं हुआ है, जो बचा हुआ है, उसे बचाना है।

सबकी अपनी-अपनी सोच और समझ। मैं व्यक्तिगत रूप से कल्पना तिवारी के साथ हूं। बिल्कुल व्यावहारिक सोच अपनाई है। किसी के भरोसे रहने से बेहतर, खुद अपने दम पर अपना परिवार पालने का उपाय किया है। अपने बच्चों का भविष्य सुरक्षित किया है। उनके भीतर एक भावुक पत्नी और एक जिम्मेदार मां का संघर्ष जरूर चला होगा। लेकिन मां की जीत हुई है, मां को जीतना भी चाहिए।
विवेक तिवारी ढेर सारे रिश्ते छोड़कर गए होंगे, रिश्तेदार, मित्र छोड़कर गए होंगे। आज बहुत लोग मानसिक तौर पर उनसे और उनके परिवार से जुड़े नजर आ रहे हैं, लेकिन रिश्तों का मेरा तजुर्बा है। जब सब कुछ बहुत हसीन होता है, तो रिश्ते भी बहुत हसीन होते हैं और जब हालात ऐसे हो जाएं, जो कल्पना तिवारी के सामने थे तो यकीन कीजिए, 10 फीसदी रिश्तेदार औऱ मित्र नजर नहीं आएंगे। दोस्ती की मस्ती अलग बात है, दोस्त के परिवार की जिम्मेदारी उठाना अलग।

चलता हूं, वहां, जहां से ये पोस्ट शुरू की है। कभी कह नहीं पाया, लेकिन आज मैं अपने परिवार और पत्नी से ये जरूर कहना चाहता हूं कि अगर मेरे साथ भी कभी कोई अनहोनी हो गई, तो किसी भावुकता में मत पड़ना। जितना प्यार और खुशी मेरे साथ मिली, उसे पर्याप्त समझना। धरती छोड़ने के बाद मैं वापस नहीं आ सकता, लेकिन मेरे प्यार का सबसे बड़ा उपहार ये होगा कि मेरे बाद मेरी छोड़ी जिम्मेदारियां संभालने के बारे में सोचना। मेरे साथ बीता कल कैसा था, सोचकर रोना मत, मेरे बिना अपना आज और आने वाला कल खूबसूरत बनाने की सोचना।

Posted in संस्कृत साहित्य

संजय गुप्ता

मित्रो समय समय पर हम आपको वेदों पुराणों आदि के बारे में बताते रहते हैं, उसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुये, आज हम आपको अग्नि पुराण के बारे में बतायेंगे,,,

अग्नि पुराण ज्ञान का विशाल भण्डार है। स्वयं अग्निदेव ने इसे महर्षि वसिष्ठ को सुनाते हुए कहा था-

आग्नेये हि पुराणेऽस्मिन् सर्वा विद्या: प्रदर्शिता:।

अर्थात् ‘अग्नि पुराण’ में सभी विद्याओं का वर्णन है। आकार में लघु होते हुए भी विद्याओं के प्रकाशन की दृष्टि से यह पुराण अपना विशिष्ट महत्त्व रखता है। इस पुराण में तीन सौ तिरासी (383) अध्याय हैं। ‘गीता’ , ‘रामायण’, ‘महाभारत’, ‘हरिवंश पुराण’ आदि का परिचय इस पुराण में है। परा-अपरा विद्याओं का वर्णन भी इसमें प्राप्त होता है। मत्स्य, कूर्म आदि अवतारों की कथाएं भी इसमें दी गई हैं।

वैष्णवों की पूजा-पद्धति और प्रतिमा आदि के लक्षणों का सांगोपांग वर्णन इस पुराण में वर्णित है। शिव और शक्ति की पूजा का पूरा विधान इसमें बताया गया है। वेदान्त के सभी विषयों को उत्तम रिति से इसमें समझा गया है। इसके अलावा जीवन के लिए उपयोगी सभी विधाओं की जानकारी इस पुराण में मिल जाती है।

अग्निदेव के मुख से कहे जाने के कारण ही इस पुराण का नाम ‘अग्नि पुराण’ पड़ा है। यह एक प्राचीन पुराण है। इसमें शिव, विष्णु और सूर्य की उपासना का वर्णन निष्पक्ष भाव से किया गया है। यही इसकी प्राचीनता को दर्शाता है।

क्योंकि बाद में शैव और वैष्णव मतावलम्बियों में काफ़ी विरोध उत्पन्न हो गया था, जिसके कारण उनकी पूजा-अर्चना में उनका वर्चस्व बहुत-चढ़ाकर दिखाया जाने लगा था। एक-दूसरे के मतों की निन्दा की जाने लगी थी जबकि ‘अग्नि पुराण’ में इस प्रकार की कोई निन्दा उपलब्ध नहीं होती।

तीर्थों के वर्णन में शंकराचार्य द्वारा स्थापित चारों मठों- बद्रीनाथ, जगन्नाथ, द्वारकापुरी और रामेश्वरम का उल्लेख इसमें नहीं है। इसके अलावा काशी के वर्णन में विश्वनाथ तथा दशाश्वमेघ घाट का वर्णन भी इसमें नहीं हैं यही बात इसकी प्राचीनता को दर्शाती है।

अग्नि पुराण’ को भारतीय जीवन का विश्वकोश कहा जा सकता है पुराणों के पांचों लक्षणों- सर्ग, प्रतिसर्ग, राजवंश, मन्वन्तर और वंशानुचरित आदि का वर्णन भी इस पुराण में प्राप्त होता है। किन्तु इसे यहाँ संक्षेप रूप में दिया गया है। इस पुराण का शेष कलेवर दैनिक जीवन की उपयोगी शिक्षाओं से ओतप्रोत है।

‘अग्नि पुराण’ में शरीर और आत्मा के स्वरूप को अलग-अलग समझाया गया है। इन्द्रियों को यंत्र मात्र माना गया है और देह के अंगों को ‘आत्मा’ नहीं माना गया है। पुराणकार’ आत्मा’ को हृदय में स्थित मानता है। ब्रह्म से आकाश, आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल और जल से पृथ्वी होती है। इसके बाद सूक्ष्म शरीर और फिर स्थूल शरीर होता है।

‘अग्नि पुराण’ ज्ञान मार्ग को ही सत्य स्वीकार करता है। उसका कहना है कि ज्ञान से ही ‘ब्रह्म की प्राप्ति सम्भव है, कर्मकाण्ड से नहीं। ब्रह्म की परम ज्योति है जो मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार से भिन्न है। जरा, मरण, शोक, मोह, भूख-प्यास तथा स्वप्न-सुषुप्ति आदि से रहित है।

इस पुराण में ‘भगवान’ का प्रयोग विष्णु के लिए किया गया है। क्योंकि उसमें ‘भ’ से भर्त्ता के गुण विद्यमान हैं और ‘ग’ से गमन अर्थात् प्रगति अथवा सृजनकर्त्ता का बोध होता है। विष्णु को सृष्टि का पालनकर्त्ता और श्रीवृद्धि का देवता माना गया है।

‘भग’ का पूरा अर्थ ऐश्वर्य, श्री, वीर्य, शक्ति, ज्ञान, वैराग्य और यश होता है जो कि विष्णु में निहित है। ‘वान’ का प्रयोग प्रत्यय के रूप में हुआ है, जिसका अर्थ धारण करने वाला अथवा चलाने वाला होता है। अर्थात् जो सृजनकर्ता पालन करता हो, श्रीवृद्धि करने वाला हो, यश और ऐश्वर्य देने वाला हो; वह ‘भगवान’ है। विष्णु में ये सभी गुण विद्यमान हैं।

‘अग्नि पुराण’ ने मन की गति को ब्रह्म में लीन होना ही ‘योग’ माना है। जीवन का अन्तिम लक्ष्य आत्मा और परमात्मा का संयोग ही होना चाहिए। इसी प्रकार वर्णाश्रम धर्म की व्याख्या भी इस पुराण में बहुत अच्छी तरह की गई है।

ब्रह्मचारी को हिंसा और निन्दा से दूर रहना चाहिए। गृहस्थाश्रम के सहारे ही अन्य तीन आश्रम अपना जीवन-निर्वाह करते हैं। इसलिए गृहस्थाश्रम सभी आश्रमों में श्रेष्ठ है। वर्ण की दृष्टि से किसी के साथ भेदभाव नहीं करना चाहिए। वर्ण कर्म से बने हैं, जन्म से नहीं।

इस पुराण में देव पूजा में समता की भावना धारण करने पर बल दिया गया है और अपराध का प्रायश्चित्त सच्चे मन से करने पर ज़ोर दिया गया है। स्त्रियों के प्रति उदार दृष्टिकोण अपनाते हुए पुराणकार कहता है-
नष्टे मृते प्रव्रजिते क्लीवे च पतिते पतौ।
पंचत्स्वापस्तु नारीणां पतिरन्यों विधीयते ॥

अर्थात् पति के नष्ट हो जाने पर, मर जाने पर, सन्न्यास ग्रहण कर लेने पर, नपुंसक होने पर अथवा पतित होने पर इन पांच अवस्थाओं में स्त्री को दूसरा पति कर लेना चाहिए।

इसी प्रकार यदि किसी स्त्री के साथ कोई व्यक्ति बलात्कार कर बैठता है तो उस स्त्री को अगले रजोदर्शन तक त्याज्य मानना चाहिए। रजस्वला हो जाने के उपरान्त वह पुन: शुद्ध हो जाती है।

ऐसा मानकर उसे स्वीकार कर लेना चाहिए।
राजधर्म की व्याख्या करते हुए पुराणकार कहता है कि राजा को प्रजा की रक्षा उसी प्रकार करनी चाहिए, जिस प्रकार कोई गर्भिणी-स्त्री अपने गर्भ में पल रहे बच्चे की करती है।

चिकित्सा शास्त्र की व्याख्या में पुराण कहता है कि समस्त रोग अत्यधिक भोजन ग्रहण करने से होते हैं या बिलकुल भी भोजन न करने से। इसलिए सदैव सन्तुलित आहार लेना चाहिए। अधिकांशत: जड़ी-बूटियों द्वारा ही इसमें रोगों के शमन का उपचार बताया गया है।

‘अग्नि पुराण’ में भूगोल सम्बन्धी ज्ञान, व्रत-उपवास-तीर्थों का ज्ञान, दान-दक्षिणा आदि का महत्त्व, वास्तु-शास्त्र और ज्योतिष आदि का वर्णन अन्य पुराणों की ही भांति है। वस्तुत: तत्कालीन समाज की आवश्यकताओं के अनुसार ही इसमें नित्य जीवन की उपयोगी जानकारी दी गई है।

इस पुराण में व्रतों का काफ़ी विस्तृत वर्णन प्राप्त होता है। व्रतों की सूची तिथि, वार, मास, ऋतु आदि के अनुसार अलग-अलग बनाई गई है। पुराणकार ने व्रतों को जीवन के विकास का पथ माना है।

अन्य पुराणों में व्रतों को दान-दक्षिणा का साधना-मात्र मानकर मोह द्वारा उत्पन्न आकांक्षाओं की पूर्ति का माध्यम बताया गया है। लेकिन ‘अग्नि पुराण’ में व्रतों को जीवन के उत्थान के लिए संकल्प का स्परूप माना गया है। साथ ही व्रत-उपवास के समय जीवन में अत्यन्त सादगी और धार्मिक आचार-विचार का पालन करने पर भी बल दिया गया है।

‘अग्नि पुराण’ में स्वप्न विचार और शकुन-अपशकुन पर भी विचार किया गया है। पुरुष और स्त्री के लक्षणों की चर्चा इस पुराण का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अंश है।

सर्पों के बारे में भी विस्तृत जानकारी इस पुराण में उपलब्ध होती है। मन्त्र शक्ति का महत्त्व भी इसमें स्वीकार किया गया है।

Posted in संस्कृत साहित्य

देव शर्मा

ज्योतिषनुसार सूर्य अर्घ्य के आर्थिक एवं शारीरिक लाभ
〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️
भारतीय शास्त्रों के अनुसाए सूर्य देव को जल चढ़ाना बहुत शुभ माना जाता है. जी हां अक्सर आप अपनी समस्या लेकर जब किसी पंडित के पास जाते है, तो वो सबसे पहले सूर्य को अर्घ देने का उपाय ही सुझाते है. वही अगर किसी व्यक्ति की कुंडली मे सूर्य ग्रह मजबूत हो तो यह माना जाता है, कि वह व्यक्ति काफी गुणवान होता है. साथ ही समाज मे उसका बहुत मान सम्मान भी होता है. इसके इलावा वह बहुत प्रतिष्ठित भी होता है. ऐसे मे कुंडली मे सूर्य ग्रह को मजबूत रखना बेहद जरुरी है।

वैसे महाभारत काल से ऐसा माना जाता है, कि कर्ण नियमित रूप से सूर्य देव की पूजा करते थे और सूर्य को जल का अर्घ भी देते थे. इसके इलावा सूर्य देव की पूजा के बारे मे भगवान् राम की कथा मे भी यह लिखा गया है, कि भगवान् राम हर रोज सूर्य देव की पूजा करते थे और अर्घ देते थे. वैसे कलयुग मे भी ऐसे बहुत से लोग है जो सूर्य देव को जल अर्पित करते है और उनकी पूजा करते है. गौरतलब है, कि सूर्य देव को अगर पूरी विधि के साथ जल चढ़ाया जाये तो इसके परिणाम और भी अच्छे होते है।

यदि हम सूर्य देव को चढाने वाले जल मे कुछ वस्तुए डाल कर उसे अर्पित करे तो इससे सही फल प्राप्त होता है. वैसे सूर्य देव को भी अलग अलग चीजों के लिए जल दिया जाता है. गौरतलब है, कि ज्योतिषशास्त्र मे सूर्य को आत्मा का कारक माना गया है. इसलिए नियमित रूप से सूर्य को जल देने से यह माना जाता है, कि इससे आत्मा की शुद्धि होती है और इससे हमारा आत्म विश्वास भी बढ़ता है. इससे न केवल हमारा मनोबल बढ़ता है, बल्कि यह हमें कई बीमारियों से भी निजात दिलाता है।

इसके इलावा यदि आप शरीर मे कमजोरी महसूस करते है तो सूर्य को नियमित रूप से जल देने से इसका प्रभाव आपके शरीर पर पड़ता है, जिससे आपका शरीर ऊर्जावान बनता है. इससे आपको नौकरी के क्षेत्र मे भी काफी लाभ मिलता है. जैसे यदि किसी को नौकरी की परेशानी हो, तो वो यदि सूर्य को नियमित रूप से जल प्रदान करे तो उसकी यह समस्या समाप्त हो सकती है. साथ ही व्यावसाय मे भी लाभ होता है. इसके इलावा अगर प्रमोशन मे कोई समस्या हो तो उच्च अधिकारियो से सहयोग भी मिल सकता है. इससे आपकी सारी समस्याएं समाप्त हो जाती है. इसलिए सूर्य को हर रोज जल देना काफी फायदेमंद माना जाता है।

मगर सूर्य को जल देते समय इस बात का ध्यान रखे कि स्नान करने के बाद ही सूर्य को जल दे. वैसे सूर्य की उपासना करना कोई नई बात नहीं है. यह परम्परा तो वैदिक काल से चल रही है. इसमें कोई शक नहीं कि सूर्य देव के उदय होने के बाद ही दुनिया से अंधकार खत्म होता है. इससे चारो तरफ रोशनी का प्रकाश हो जाता है. वास्तव मे सूर्य देव के उदय होने के बाद ही मानव, पशु पक्षी सभी अपने अपने कार्यो मे लग जाते है. फिर जैसे ही सूर्य अस्त होता है, हर कोई अपने अपने घर को लौट जाता है. गौरतलब है, कि सूर्य देव को जल अर्पित करते समय कुछ खास बातों का ध्यान रखे. जैसे कि सूर्य को, किसी ताम्बे के लौटे मे जल डाल कर दोनों हाथो से अर्पित करे।

आपको बता दे कि सूर्य देव सभी ग्रहो के राजा कहलाते है. जिस प्रकार ज्योतिष मे माता और मन के कारक चन्द्रमा है, उसी प्रकार पिता और आत्मा के कारक सूर्य है. यहाँ तक कि सभी हिन्दू धार्मिक ग्रंथो में सूर्य देव की महिमा का वर्णन मिलता है. इसके इलावा बहुत कम लोग ये बात जानते है, कि छठ व्रत में सूर्य को दिन में दो बार अर्घ दिया जाता है. सबसे पहले जब सूर्य उदय होता है और फिर जब वह अस्त होता है, तो उसे जल चढ़ाया जाता है. ऐसे में यदि आपकी कुंडली में सूर्य नीच राशि यानि तुला में है. तो इसके अशुभ फल से बचने के लिए आपको हर रोज सूर्य देव को अर्घ देना चाहिए. इसके साथ ही यदि सूर्य किसी अशुभ भाव का स्वामी होकर अशुभ स्थान पर बैठा है. तो उन्हें सूर्य की उपासना करनी चाहिए।

इसके इलावा जिनकी कुंडली में सूर्य देव अशुभ ग्रहो और शनि के राहु केतु के प्रभावों में है. तो ऐसे व्यक्ति को हर रोज नियमानुसार सूर्य देव को जल अर्पित करना चाहिए. यहाँ तक कि बीमारियों को दूर रखने के लिए भी हमें सूर्य की उपासना करनी चाहिए. वही अगर स्किन संबंधी कोई समस्या हो तो आदित्य स्तोत्र का पाठ करना चाहिए. इससे लाभ आवश्य मिलता है. बता दे कि सूर्य देव को जल देने से हमारे जीवन में सभी इच्छाओ की पूर्ति होती है. वैसे सूर्य देव को अर्घ देते समय कुछ ख़ास बातों का ध्यान रखना भी जरुरी है. जैसे सूर्य की पहली किरण को अर्घ देना सबसे ज्यादा फलदायक और उत्तम माना जाता है।

इसके लिए सबसे पहले आप प्रात काल सूर्य उदय होने से पहले उठ जाए और स्नान कर ले. फिर उगते सूर्य के सामने आसन लगा ले. फिर आसन पर खड़े होकर ताम्बे के लौटे में जल डाल कर जल अर्पित करे. इसके बाद रक्त चंदन आदि से युक्त लाल रंग के पुष्प ले. आप लाल रंग का कोई भी पुष्प ग्रहण कर सकते है. इसके इलावा रक्त चन्दन का मतलब है, लाल रंग का चंदन जो इस जल में डाल ले. इसके साथ ही आपको थोड़े से चावल डालने है. इसमें आप भले ही चावल न डाले मगर रक्त चंदन और लाल रंग के पुष्प तो जल में जरूर डालने है और फिर अर्घ देना है. इसमें आप हाथ की मुट्ठी बना कर सूर्य को तीन बार जल अर्पित कर सकते है या सीधा ताम्बे के लौटे में जल डाल कर भी अर्पण कर सकते है।

हमेशा मंत्र को पढ़ते हुए ही जल अर्पित करना चाहिए और जैसे ही पूर्व दिशा में सूर्य उदय दिखाई दे तो दोनों हाथो से ताम्बे के लौटे में जल डाल कर सूर्य को ऐसे जल दे जैसे कि सूर्य की किरणे पानी की धार से आपको साफ़ दिखाई दे। इसके साथ ही इस बात का ध्यान रखे कि जो जल आप सूर्य देव को अर्पण कर रहे है, वो आपके पैरो में नहीं आना चाहिए. ऐसे में अगर सम्भव हो सके तो एक बर्तन जरूर रख ले, ताकि जो जल आप अर्पण कर रहे है, वो आपके पैरो को न छू सके. इसके बाद उस बर्तन में एकत्रित हुआ जल आप किसी भी पौधे में डाल सकते है।

इसके इलावा यदि आपको सूर्य भगवान् के दर्शन न हो तो रोज की तरह पूर्व दिशा में मुँह करके किसी शुद्ध स्थान पर आप जल अर्पित कर सकते है. मगर जिस रास्ते से लोगों का आना जाना हो, वहां भूल कर भी जल अर्पित न करे. गौरतलब है, कि जल अर्पण करने के बाद दोनों हाथो से उस भूमि को स्पर्श करे और गला. आंख, कान को छूकर भगवान् सूर्य देव को झुक कर प्रणाम करे. इसके साथ ही अर्घ देते समय आपको किसी एक सूर्य मंत्र का मन ही मन में उच्चारण जरूर करना चाहिए. फिर सीधे हाथ में जल लेकर उसे चारो तरफ छिड़कना चाहिए।

सूर्य देव के 12 नाम
〰️🌼〰️〰️🌼〰️
1. ऊँ मित्राय: नमः
2. ऊँ रवये नमः
3. ऊँ सूर्यायः नमः
4. ऊँ भानवे नमः
5. ऊँ खगय नमः
6. ऊँ पुष्णे नमः
7. ऊँ हिरण्यगर्भाय नमः
8. ऊँ मारिचाये नमः
9. ऊँ आदित्याय नमः
10. ऊँ सावित्रे नमः
11. ऊँ आर्काय नमः
12. ऊँ भास्कराय नमः

इसके बाद जहाँ आप खड़े होकर जल अर्पित कर रहे है, उसी स्थान पर तीन बार घूम कर परिक्रमा कर ले और जहाँ आपने खड़े होकर सूर्य देव की पूजा की है वहां प्रणाम भी करे. वैसे आपको बता दे कि सूर्य देव का एक मंत्र तो यह है. ॐ सूर्याय नम:. इसके इलावा सूर्य को जल चढाने का उद्देश्य केवल सूर्य देव को प्रसन्न करना या यश की प्राप्ति करना नहीं है. इससे हमारे स्वास्थ्य को भी लाभ मिलता है. जब सुबह उठ कर ताज़ी हवा और सूर्य की किरणे हमारे शरीर में प्रवेश करती है, तो हमारा स्वास्थ्य भी हमेशा सही रहता है. इसके इलावा जब पानी की धारा में से सूर्य को किरणों को देखते है, तो इससे हमारी आँखों की रौशनी भी तेज होती है.

बता दे कि सूर्य की किरणों में विटामिन दी भरपूर मात्रा में होता है. इसलिए जो व्यक्ति सुबह उठ कर सूर्य को जल देता है, वह तेजस्वी बनता है. साथ ही इससे त्वचा में आकषर्ण और चमक आ जाती है. एक तरफ जहाँ पेड़ पौधों को भोजन की प्राप्ति भी सूर्य की किरणों से होती है, वही दूसरी तरफ ऋषि मुनियो का कहना है, कि सूर्य हमारे शरीर से हानिकारक तत्वों को नष्ट कर देता है. बस सूर्य को जल अर्पित करते समय इस बात का ध्यान रखे कि इसे कभी भी सीधे न देखे बल्कि जल के बीच में से देखे.

इसके इलावा सूर्य को 7 या 8 बजे तक जल चढ़ा दे. वो इसलिए क्यूकि देर से चढ़ाया गया जल हानिकारक भी हो सकता है. इसके साथ ही हमेशा ध्यान रखे कि जल में रक्त चंदन और लाल पुष्प हमेशा डाले. यदि यह न हो तो आप लाल मिर्च के कुछ बीज भी डाल सकते है. यह तंत्र विद्या के काम आते है. तो अब आगे से आप जब भी सूर्य देव को अर्घ दे तो इन बातों का खास ध्यान रखे।
〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

मदालसा की कथा


भारद्वाज

मदालसा की कथा
〰️〰️🔸〰️〰️
आज विश्व में जिस तरह की संतान का निर्माण हो रहा है, यह तो सर्वविदित ही है । आज संसार भौतिकता के चरम उत्कर्ष की ओर अँधा होकर बिना सोच विचार कर दोड़ता ही जा रहा है । मानव को सुख पहुँचाने के लिए नित्य नये आविष्कार हो रहे हैं ।

यह सत्य है की भौतिक उन्नति कर मानव ने आज अपने लिए सब प्रकार के अत्याधुनिक सुख साधनों का संग्रह कर लिया है । आज धरती तो क्या चन्द्र और मंगल तक की दूरी को कुछ घंटों में ही तय कर लिया गया है । जिन साधनों की व सुख सुविधओं की कल्पना हम पहले केवल स्वपनों में ही करते थे, वो सब सुख सुविधाएँ व साधन और उससे भी अधिक बहुत कुछ हमारे लिए सुगमता से उपलब्ध है ।

परन्तु यह भी सत्य है की इतनी सुख सुविधाओं के होते हुए भी आज मानव जाति सर्वत्र दुखी और अशांत ही नजर आती है । आज जिसके पास जो नहीं है उसी को पाने के लिए मानव जूझ रहा है । किसी के पास तो सुख सुविधाओं के सभी साधन उपलब्ध हैं , किसी के पास कुछ सीमित मात्रा में हैं और कोई तो आभाव ग्रस्त जीवन ही व्यतीत कर रहा है ।

आज मानव आधुनिकता और भौतिकता के इस युग में, समाज को सुचारू रूप से चलाने के लिए जिन मानवीय मूल्यों की आवश्यकता होती है, उन मूल्यों को, नैतिकता को, मानवता को, बंधुत्व को सर्वथा भूल ही गया है। जिसके फलस्वरूप संसार में समानता के स्थान पर असमानता के युग का आरम्भ हो गया है और संसार में फैली इन असमानताओं के कारण ही समाज में अत्याचार, लूट-खसोट, चोरी-जारी, अपहरण , भ्रष्टाचार व बलात्कार की घटनाएँ दिन प्रतिदिन बढती ही जा रही है और यह सब भौतिकता के अन्धानुकरण के कारण ही हो रहा है।

मानव जीवन का एक अटूट सत्य यह भी है कि किसी भी राष्ट्र का, समाज का और स्वयं मानव का भी निर्माण एक माता के गर्भ में ही होता है, और यह भी एक माता पर ही निर्भर करता है कि उसे किस तरह की संतान को उत्पन्न करके उसे समाज के अर्पित करना है । परन्तु आज जिस तरह के मानव का निर्माण समाज में हो रहा है, उसको देख कर तो लगता है कि आज की माताओं को उनके कर्तव्य का ही बोध नहीं रहा । वह अनजाने में ही अपनी संतानों को एक अनिश्चित अंधकारपूर्ण भविष्य की ओर धकेलती जा रही है, जो आज प्रत्यक्ष ही दृष्टिगोचर हो रहा है ।

माँ तो कभी ऐसी नहीं होती, जो जान बूझ कर अपनी संतानों को अन्धकार में धकेल दे, वह तो ममता की मूर्त होती है । माँ तो वह होती है जो एक क्या हजारों जन्म भी अपनी संतानों पर न्योछावर कर दे । आज जो कुछ भी अनहोनी समाज में हो रही है उसका कारण एक मात्र अज्ञान और अज्ञान ही है। आज आप के सामने एक माँ की सच्ची कहानी प्रस्तुत कर रहा हूँ, जो भारतीय इतिहास में कहीं दबी पड़ी लुप्त प्राय ही थी ।

जिसे शायद हम कभी देख ना पाये, कभी सुन ना पाये, कभी समझ ना पाये । एक ऐसी माँ की कहानी जिसने अपनी संतानों को अपनी मीठीं – मीठीं लोरियां सुना सुना कर ब्रह्मज्ञानी बना दिया। उसने ब्रह्मज्ञान का उपदेश लोरियों के रूप में अपनी संतानों को दिया और जैसा चाहा अपनी संतान को बना दिया। वह माँ थी माँ मदालसा। आयें मर्गदर्शन हेतु इस कहानी पर दृष्टिपात कर विचार करें और एक उन्नत, सुसंस्कारी , सुखी , शांत व आनंदित संसार के निर्माण के सूत्रधार बनें ।

” हे पुत्र, तू शुद्ध आत्मा है। तेरा कोई नाम नहीं है। इस शरीर के लिए कल्पित नाम तो तुझे अभी इसी जीवन में मिला है। यह शरीर पांच तत्वों से मिलकर बना हुआ है। कोई जीव पिता के रूप में प्रसिद्ध है तो कोई पुत्र कहलाता है। कोई स्त्री माता है तो कोई प्राणप्रिया पत्नी।” कोई “यह मेरा है” ऎसा कहकर अपनाया जाता है तो कोई “यह मेरा नहीं है” ऎसा कहकर ठुकराया जाता है। सांसारिक पदार्थ नाना रूपों को धारण करते हैं, जिन्हें तुम पहचान लो। ”

यह प्रवचन किसी गुरू का अपने शिष्य को नहीं बल्कि बेटे के लिए उसकी माता का है। ऎसी सच्ची माता थी मदालसा। मदालसा महाराज ऋतुध्वज की पटरानी थी। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार मदालसा गंधर्वराज विश्वावसु की पुत्री थी।

माता मदालसा के तीन पुत्र हुए। ऋतुध्वज ने उनके नाम विक्रांत, सुबाहु और अरिमर्दन रखे। मदालसा इन नामों को सुनकर हंसती थी और ऋतुध्वज से कहती थी कि आवश्यक नहीं कि नाम के गुण व्यक्ति में आए ही। भला इस तरह के नाम रखकर आप इन्हें सांसारिक क्यों बनाना चाहते हैं ? मदालसा ने तीनों पुत्रों को ज्ञान-वैराग्य-भक्ति का प्रवचन कर संन्यासी बना दिया। वे तीनों भाई राज्य छोड़कर कठोर साधना करने लगे।

ऋतुध्वज ने मदालसा से कहा कि एक पुत्र राज्य को संभालने के लिए होना चाहिए। मदालसा ने कहा कि उसका नाम मैं रखूंगी। मदालसा के चौथा पुत्र हुआ। उसने इस पुत्र का नाम “अलर्क” रखा। ऋतुध्वज ने इसका अर्थ मदालसा से पूछा तो मदालसा ने कहा कि अलर्क नाम का अर्थ मदोन्मत्त व्यक्ति और पागल कुत्ता होता है। यह राज्य करेगा इसलिए यह राज के मद में उन्मत्त होगा व प्रजाजनों के कर से प्राप्त होने वाले संसाधनों को भोगेगा इससे पागल कुत्ते की तरह भोगी होगा।

मदालसा का यही पुत्र अलर्क ने एक भोगी व अत्याचारी राजा के रूप में वर्षों अपनी प्रजा का शोषण करके राज्य की और परिणाम स्वरूप अंत में एक शत्रु राजा से पराजित हो दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हुआ। इस तरह माता मदालसा अपने पुत्रों को वैराग्य मार्ग पर ले जाने वाली अनुपम माता हुई।

उसी महान माता मदालसा का महान उपदेश ज्यो का त्यों नीचे लिखी पंक्तियों में दिया जा रहा है । हम सभी को इससे शिक्षा ले कर एक ऐसी संतान का निर्माण करना चाहिए ।

मदालसा का अपने पुत्रों को ब्रह्मज्ञान का उपदेश !!!!!

पुत्र यह संसार परिवर्तनशील और स्वप्न के सामान है इसलिये मॊहनिद्रा का त्याग कर क्योकि तू शुद्ध ,बुद्ध और निरंजन है।

हे तात! तू तो शुद्ध आत्मा है, तेरा कोई नाम नहीं है। यह कल्पित नाम तो तुझे अभी मिला है। वह शरीर भी पाँच भूतों का बना हुआ है। न यह तेरा है, न तू इसका है। फिर किसलिये रो रहा है?

अथवा तू नहीं रोता है, यह शब्द तो राजकुमार के पास पहुँचकर अपने आप ही प्रकट होता है। तेरी संपूर्ण इन्द्रियों में जो भाँति भाँति के गुण-अवगुणों की कल्पना होती है, वे भी पाञ्चभौतिक ही है?

जैसे इस जगत में अत्यंत दुर्बल भूत, अन्य भूतों के सहयोग से वृद्धि को प्राप्त होते है, उसी प्रकार अन्न और जल आदि भौतिक पदार्थों को देने से पुरुष के पाञ्चभौतिक शरीर की ही पुष्टि होती है । इससे तुझ शुद्ध आत्मा को न तो वृद्धि होती है और न हानि ही होती है।

तू अपने उस चोले तथा इस देहरुपि चोले के जीर्ण शीर्ण होने पर मोह न करना। शुभाशुभ कर्मो के अनुसार यह देह प्राप्त हुआ है। तेरा यह चोला मद आदि से बंधा हुआ है, तू तो सर्वथा इससे मुक्त है ।

कोई जीव पिता के रूप में प्रसिद्ध है, कोई पुत्र कहलाता है, किसी को माता और किसी को प्यारी स्त्री कहते है, कोई “यह मेरा है” कहकर अपनाया जाता है और कोई “मेरा नहीं है”, इस भाव से पराया माना जाता है। इस प्रकार ये भूतसमुदाय के ही नाना रूप है, ऐसा तुझे मानना चाहिये ।

यद्यपि समस्त भोग दु:खरूप है तथापि मूढ़चित्तमानव उन्हे दु:ख दूर करने वाला तथा सुख की प्राप्ति करानेवाला समझता है, किन्तु जो विद्वान है, जिनका चित्त मोह से आच्छन्न नहीं हुआ है, वे उन भोगजनित सुखों को भी दु:ख ही मानते है।

स्त्रियों की हँसी क्या है, हड्डियों का प्रदर्शन । जिसे हम अत्यंत सुंदर नेत्र कहते है, वह मज्जा की कलुषता है और मोटे मोटे कुच आदि घने मांस की ग्रंथियाँ है, अतः पुरुष जिस पर अनुराग करता है, वह युवती स्त्री क्या नरक की जीती जागती मूर्ति नहीं है?

पृथ्वी पर सवारी चलती है, सवारी पर यह शरीर रहता है और इस शरीर में भी एक दूसरा पुरुष बैठा रहता है, किन्तु पृथ्वी और सवारी में वैसी अधिक ममता नहीं देखी जाती, जैसी कि अपने देह में दृष्टिगोचर होती है। यही मूर्खता है ।

बेटा ! तू धन्य है, जो शत्रुरहित होकर अकेला ही चिरकाल तक इस पृथ्वी का पालन करता रहेगा। पृथ्वी के पालन से तुझे सुखभोगकी प्राप्ति हो और धर्म के फलस्वरूप तुझे अमरत्व मिले। पर्वों के दिन ब्राह्मणों को भोजन द्वारा तृप्त करना, बंधु-बांधवों की इच्छा पूर्ण करना, अपने हृदय में दूसरों की भलाई का ध्यान रखना और परायी स्त्रियों की ओर कभी मन को न जाने देना ।

अपने मन में सदा भगवान का चिंतन करना, उनके ध्यान से अंतःकरण के काम-क्रोध आदि छहों शत्रुओं को जीतना, ज्ञान के द्वारा माया का निवारण करना और जगत की अनित्यता का विचार करते रहना । धन की आय के लिए राजाओं पर विजय प्राप्त करना, यश के लिए धन का सद्व्यय करना, परायी निंदा सुनने से डरते रहना तथा विपत्ति के समुद्र में पड़े हुए लोगों का उद्धार करना।
〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

संजय गुप्ता

शुभ रात्रि
बहुत ही सुंदर कहानी=======

===बुरी आदत – प्रेरक प्रसंग====

एक अमीर आदमी अपने बेटे की किसी बुरी आदत से बहुत परेशान था. वह जब भी बेटे से आदत छोड़ने को कहते तो एक ही जवाब मिलता , ” अभी मैं इतना छोटा हूँ..धीरे-धीरे ये आदत छोड़ दूंगा !” पर वह कभी भी आदत छोड़ने का प्रयास नहीं करता.
उन्ही दिनों एक महात्मा गाँव में पधारे हुए थे, जब आदमी को उनकी ख्याति के बारे में पता चला तो वह तुरंत उनके पास पहुँचा और अपनी समस्या बताने लगा. महात्मा जी ने उसकी बात सुनी और कहा , ” ठीक है , आप अपने बेटे को कल सुबह बागीचे में लेकर आइये, वहीँ मैं आपको उपाय बताऊंगा. “
अगले दिन सुबह पिता-पुत्र बागीचे में पहुंचे.
महात्मा जी बेटे से बोले , ” आइये हम दोनों बागीचे की सैर करते हैं.” , और वो धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगे .
चलते-चलते ही महात्मा जी अचानक रुके और बेटे से कहा, ” क्या तुम इस छोटे से पौधे को उखाड़ सकते हो ?”
” जी हाँ, इसमें कौन सी बड़ी बात है .”, और ऐसा कहते हुए बेटे ने आसानी से पौधे को उखाड़ दिया.
फिर वे आगे बढ़ गए और थोड़ी देर बाद महात्मा जी ने थोड़े बड़े पौधे की तरफ इशारा करते हुए कहा, ” क्या तुम इसे भी उखाड़ सकते हो?”
बेटे को तो मानो इन सब में कितना मजा आ रहा हो, वह तुरंत पौधा उखाड़ने में लग गया. इस बार उसे थोड़ी मेहनत लगी पर काफी प्रयत्न के बाद उसने इसे भी उखाड़ दिया .
वे फिर आगे बढ़ गए और कुछ देर बाद पुनः महात्मा जी ने एक गुडहल के पेड़ की तरफ इशारा करते हुए बेटे से इसे उखाड़ने के लिए कहा.
बेटे ने पेड़ का ताना पकड़ा और उसे जोर-जोर से खींचने लगा. पर पेड़ तो हिलने का भी नाम नहीं ले रहा था. जब बहुत प्रयास करने के बाद भी पेड़ टस से मस नहीं हुआ तो बेटा बोला , ” अरे ! ये तो बहुत मजबूत है इसे उखाड़ना असंभव है .”
महात्मा जी ने उसे प्यार से समझाते हुए कहा , ” बेटा, ठीक ऐसा ही बुरी आदतों के साथ होता है , जब वे नयी होती हैं तो उन्हें छोड़ना आसान होता है, पर वे जैसे जैसे पुरानी होती जाती हैं इन्हें छोड़ना मुशिकल होता जाता है .”