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संजय गुप्ता

इंडोनेशिया की रामकथा: रामायण का कावीन
इंडोनेशिया के नब्बे प्रतिशत निवासी मुसलमान हैं, फिर भी उनकी संस्कृति पर रामायण की गहरी छाप है। फादर कामिल बुल्के १९८२ई. में लिखते हैं, ‘पैंतीस वर्ष पहले मेरे एक मित्र ने जावा के किसी गाँव में एक मुस्लिम शिक्षक को रामायण पढ़ते देखकर पूछा था कि आप रामायण क्यों पढ़ते है? उत्तर मिला, ‘मैं और अच्छा मनुष्य बनने के लिए रामायण पढ़ता हूँ।’१
रामकथा पर आधारित जावा की प्राचीनतम कृति ‘रामायण काकावीन’ है। यह नौवीं शताब्दी की रचना है। परंपरानुसार इसके रचनाकार योगीश्वर हैं। यहाँ की एक प्राचीन रचना ‘उत्तरकांड’ है जिसकी रचना गद्य में हुई है। चरित रामायण अथवा कवि जानकी में रामायण के प्रथम छह कांडों की कथा के साथ व्याकरण के उदाहरण भी दिये गये हैं।२ बाली द्वीप के संस्कृत साहित्य में अनुष्ठभ छंद में ५० श्लोकों की संक्षिप्त रामकथा है। रामकथा पर आधारित परवर्ती रचनाओं में ‘सेरतकांड’, ‘रामकेलिंग’ और ‘सेरी राम’ का नाम उल्लेखनीय है। इनके अतिरिक्त ग्यारहवीं शताब्दी की रचना ‘सुमनसांतक’ में इंदुमती का जन्म, अज का विवाह और दशरथ की जन्मकथा का वर्णन हुआ है। चौदहवीं शताब्दी की रचना अर्जुन विजय की कथावस्तु का आधार अर्जुन सहस्त्रवाहु द्वारा रावण की पराजय है।
रामायण काकावीन की रचना कावी भाषा में हुई है। यह जावा की प्राचीन शास्रीय भाषा है। काकावीन का अर्थ महाकाव्य है। कावी भाषा में कई महाकाव्यों का सृजन हुआ है।उनमें रामायण काकावीन का स्थान सर्वोपरि है। रामायण का कावीन छब्बीस अध्यायों में विभक्त एक विशाल ग्रंथ है, जिसमें महाराज दशरथ को विश्वरंजन की संज्ञा से विभूषित किया गया है और उन्हें शैव मतावलंबी कहा गया है। इस रचना का आरंभ राम जन्म से होता है। विश्वामित्र के साथ राम और लक्ष्मण के प्रस्थान के समय अष्टनेम ॠषि उनकी मंगल कामना करते हैं और दशरथ के राज प्रसाद में हिंदेशिया का वाद्य यंत्र गामलान बजने लगता है।
द्वितीय अध्याय का आरंभ बसंत वर्णन से हुआ है। यहाँ भी इंडोनेशायाई परिवेश दर्शनीय है। तुंजुंग के फूल खिले हुए हैं। सूर्य की किरणें सरोवर के जल पर बिखरी हुई हैं। उसका सिंदूरी वर्ण लाल-लाल लक्षा की तरहा सुशोभित है। लगता है मानो सूर्य की किरणे पिघल-पिघल कर स्वच्छ सरोवर के जल में परिवर्तित हो गयी है।१
विश्वामित्र के साथ राम और लक्ष्मण के यात्रा-क्रम में हिंदेशिया की प्रकृति का भव्य चित्रण हुआ है।
विश्वामित्र आश्रम में दोनों राजकुमारों को अस्र-शस्र एवं ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा दी जाती है और ताड़का वध के बाद विष्णु का अवतार मान कर उनकी वंदना की जाती है।इस महाकाव्य में मिथिला गमन, धनुभर्ंग और विवाह का वर्णन अत्यंत संक्षिप्त है। तीनों प्रसंगों का वर्णन मात्र तेरह पदों में हुआ है। इसके अनुसार देवी सीता का जिस समय जन्म हुआ था, उस समय पहले से ही उनके हाथ में एक धनुष था। वह भगवान शिव का धनुष था और उसी से त्रिपुर राक्षस का संहार हुआ था।
रामायण काकावीन में परशुराम का आगमन विवाह के बाद अयोध्या लौटने के समय वन प्रदेश में होता है। उनका शरीर ताल वृक्ष के समान लंबा है। वे धनुभर्ंग की चर्चा किये बिना उन्हें अपने धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाने के लिए ललकारते हैं, किंतु राम के प्रभाव से वे परास्त होकर लौट जाते हैं। इस महाकाव्य में श्री राम के अतिरिक्त उनके अनेय किसी भाई के विवाह की चर्चा नहीं हुई है।
अयोध्याकांड की घटनाओं की गति इस रचना में बहुत तीव्र है। राम राज्यभिषेक की तैयारी, कैकेयी कोप, राम वनवास, राजा दशरथ की मृत्यु और भरत के अयोध्या आगमन की घटनाएँ यहाँ पलक झपकते ही समाप्त हो जाती हैं। अयोध्या लौटने पर जब भरत को जानकारी मिलती है कि उनकी माता कैकेयी के कारण भीषण परिस्थिति उत्पन्न हुई, तब वे उस पर कुपित होते है। फिर, वे नागरिकों और गुरुजनों को बुलाकर चंद्रोदय के पूर्व पिता का श्राद्ध करने के उपरांत सदल-बल श्री राम की खोज में वन-प्रस्थान करते हैं।
मार्ग में गंगा-यमुना के संगम पर भारद्वाज आश्रम में उनका भव्य स्वागत होता है। दूसरे दिन एक पवित्र सरोवर मिलता है जिनका नाम मंदाकिनी है। उसी स्थल पर उन्हें एक नग्न तपस्वी से भेंट होती है जिनसे उन्हें श्रीराम के निवास स्थान की पूरी जानकारी मिलती है। यात्रा के अंतिम चरण में उनकी भेंट राम, लक्ष्मण और सीता से होती है। अयोध्याकांड की घटनाओं के बीच मंथरा और निषाद राज की अनुपस्थिति निश्चय ही बहुत खटकती है।
अयोध्या लौटने के पूर्व श्रीराम भरत को अपनी चरण पादुका देते हैं और उन्हें
शासन संचालन और लोक कल्याण से संबद्ध विधि-निषेधपूर्ण लंबा उपदेश देते हैं। वह किसी भी देश अथवा कान के लिए प्रासंगिक है। श्रीराम के उपदेश का सारांश यह है कि राजा की योग्यता और शक्ति की गरिमा प्रजा के कष्टों का निवारण कर उनका प्रेमपूर्वक पालन करने में निहित है।
भरत की अयोध्या वापसी के बाद श्रीराम कुछ समय महर्षि अत्रि के सत्संग में बिता कर दंडक वन की ओर प्रस्थान करते हैं। मार्ग में विराध वध के बाद महर्षि सरभंग से उनकी भेंट होती है। वे योगबल से अपने शरीर को भ कर मोक्ष प्राप्त करते हैं। उन्हीं के परामर्श से वे सुतीक्ष्ण के आश्रम के निकट पर्णकुटी बना कर रहने लगते हैं और तपस्वियों की रक्षा में संलग्न रहते हैं।
रामायण का कावीन में शूपंणखा प्रकरण से सीता हरण तक की घटनाओं का वर्णन वाल्मीकीय परंपरा के अनुसार हुआ है। ॠष्यसूक पर्वत की ओर जाने के क्रम में श्रीराम की भेंट तपस्विनी शबरी से होती है। उसने पेड़ की छाल से अपने शरीर को ढक रखा है। उसका रंग काला है। वह श्रीराम को मधु और फल खाने के लिए देती है। वह कहती है कि रुद्रदेव ने जब उसको शाप दिया था, उस समय वे लिंग रुप में थे। विष्णु उस समय मधुपायी की अवस्था में थे। उन्होंने बाराह रुप धारण किया हुआ था। उसके बाद उन्होंने देवी पृथ्वी से विवाह कर लिया। फिर वे बाराह रुप में प्रकट हुए और एक पर्वत पर जाकर मोतियों की माला खाने लगे। तदुपरांत उस बाराह की मृत्यु हो गयी। उसके मृत शरीर को हम लोगों ने खा लिया। इसी कारण हम सबका शरीर नीलवर्ण का हो गया।१ श्रीराम के स्पर्श से वह शाप मुक्त हो गयी। सीता की प्राप्ति हेतु वह उन्हें सुग्रीव से मित्रता करने की सलाह देकर लुप्त हो गयी।
सुग्रीव मिलन और बालिवध की घटनाओं का वर्णन वाल्मीकीय परंपरा के अनुसार हुआ है। सातवें अध्याय में वर्षा ॠतु का विषद वर्णन हुआ है जिसपर स्थानीय परिवेश का प्रभाव स्पष्ट रुप से परिलक्षित होता है। श्वेत वर्ण के कूनतूल पक्षी धान के खेतों में वापस लौट आये हैं। खद्योतों की चमक मशाल की तरह प्रकाश विखेरती नज़र आती है। चूचूर पक्षी का स्वर वेदना को जागृत करता है। यही स्थिति वेयो पक्षी की है। वर्षा वर्णन के उपरांत शरद ॠतु का चित्रण हुआ है।
सीतान्वेषण और राम-रावण युद्ध का इस महाकाव्य में बहुत विस्तृत वर्णन हुआ है। रावण वध और विभीषण के राज्याभिषेक के बाद श्रीराम ‘मेघदूत’ के यक्ष की तरह हनुमान से काले-काले बादलों को भेदकर आकाश मार्ग से अयोध्या जाने का आग्रह करते हैं। वे कहते हैं कि समुद्र पार करने पर उन्हें महेंद्र पर्वत के दर्शन होंगे। उत्तर दिशा की ओर जाते हुए वे मलयगिरि का अवलोकन करेंगे। उसका सौंदर्य मनोहारी एवं चित्ताकर्षक होगा उसके निकट ही उत्तर दिशा में विंध्याचल है। वहाँ किष्किंधा पर्वतमाला का सौंदर्य दर्शनीय है। मार्ग में सघन और भयानक दंडक वन मिलेगा जिसमें लक्ष्मण के साथ उन्होंने प्रवेश किया था। घने वृक्ष की शाखाओं में लक्ष्मण की गर्दन बार-बार उलझ जाती थी। इसी प्रकार चित्रकूट से अयोध्या तक के सारे घटना स्थलों तथा नदियों का विस्तृत वर्णन हुआ है। यक्ष की तरह वे माता कौशल्या और भरत से लंका विजय के साथ अपने आगमन का संदेश देने के लिए कहते हैं।
राम राज्योभिषेक के बाद महाकवि रामकथा के महत्त्व पर प्रकाश डालते हैं। उनकी मान्यता है कि राम चरित्र जीवन की संपूर्णता का प्रतीक है। राम के महान आदर्श का अनुकरण जनजीवन में हो, इसी उद्देश्य से इस महाकाव्य की रचना की गयी है। राम के जनानुराग की चरण धूलि के रुप में यह कथा संसार की महानतम पवित्र कथाओं में एक है।१ इस रचना के अंत में महाकवि योगीश्वर अपनी विनम्रता का परिचय देते हुए उत्तम विचार वाले सभी विद्वानों से क्षमा याचना करते हैं।

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संजय गुप्ता

रामायण की रोचक अनसुनी कहानियां

भगवान श्री राम जी ने नहीं सीता जी ने किया था राजा दशरथ जी का पिंडदान, ये पांच जीव बने थे साक्षी, जानिये कौन कौन से

शुरुआत श्रीराम, लक्ष्मण और सीता के 14 साल के वनवास गमन के बाद ही आरंभ होती है. जैसा कि हम सभी जानते हैं कि श्रीराम, लक्ष्मण और सीता के वनवास जाने के पश्चात राजा दशरथ ने पुत्र वियोग में प्राण त्याग दिए थे.

वाल्मिकी रामायण के अनुसार राजा दशरथ का अंतिम संस्कार भरत और शत्रुघ्न ने किया था लेकिन क्या आप जानते हैं उनका पिंडदान राम ने नहीं बल्कि देवी सीता ने किया था.

‘गया स्थल पुराण’ के अनुसार एक पौराणिक कहानी मिलती है जिसके अनुसार राजा दशरथ की मृत्यृ के बाद राम के अयोध्या में न होने के कारण भरत और शत्रुघ्न ने अंतिम संस्कार की हर विधि को पूरा किया था. लेकिन राजा दशरथ की आत्मा तो राम में बसी थी. इसलिए अंतिम संस्कार के बाद उनकी चिता की बची हुई राख उड़ती हुई गया में नदी के पास पहुंची. उस दौरान राम और लक्ष्मण स्नान कर रहे थे जबकि सीता नदी किनारे बैठकर रेत को हाथों में लिए विचारों में मग्न थी. इतने में देवी सीता ने देखा कि राजा दशरथ की छवि रेत में दिखाई दे रही है. उन्हें ये समझते हुए देर न लगी कि राजा दशरथ की आत्मा राख के माध्यम से उनसे कुछ कहना चाहती है. राजा ने सीता से अपने पास समय कम होने की बात कहते हुए अपने पिंडदान करने की विनती की. सीता ने पीछे मुड़कर देखा तो दोनों भाई जल में ध्यान मग्न थे. सीता ने समय व्यर्थ न करते हुए राजा दशरथ की इच्छा पूरी करने के लिए उस फाल्गुनी नदी के तट पर पिडंदान करने का फैसला किया.

उन्होंने राजा की राख को रेत में मिलाकर हाथों में उठा लिया. इस दौरान उन्होंने फाल्गुनी नदी, गाय, तुलसी, अक्षय वट और एक ब्राह्मण को इस पिंडदान का साक्षी बनाया. पिंडदान करने के बाद श्रीराम और लक्ष्मण जैसे ही सीता के करीब आए. देवी सीता ने सारी कथा कह सुनाई. ये बात सुनकर राम को सीता पर विश्वास नहीं हुआ. सीता ने राम को समझाने के बहुत प्रयास किए. अंत में सीता ने राजा दशरथ के पिंंडदान के साक्षी पांच जीवों को बुलाकर सत्य बताने का आग्रह किया. लेकिन श्रीराम को क्रोधित देखकर फाल्गुनी नदी, गाय, तुलसी, और ब्राह्मण ने असत्य बोलते हुए ऐसी किसी भी घटना के होने से इंकार कर दिया. जबकि अक्षय वट ने सत्य बोलते हुए सीता का साथ दिया.

अन्य सभी जीवों की बातें सुनकर सीता शोक और क्रोध से व्याकुल हो उठी. उन्होंने चारों जीवों को श्राप दे दिया. जबकि अक्षय वट को वरदान देते हुए कहा ‘तुम हमेशा पूज्नीय रहोगे और जो लोग भी पिंडदान करने के लिए गया स्थल आएंगे वो अक्षय वट के पास भी जरूर पूजन करेंगे तभी उनकी पूजा सफल होगी. असत्य बोलने वाले जीवों में सीता ने गाय को श्राप दिया था कि वो लम्बे समय तक नहीं पूजी जाएगी. वही फाल्गुनी नदी के पानी को सूख जाने का श्राप दिया. इस नदी में आज भी ज्यादा पानी नहीं रहता. वहीं तुलसी को गया में न उगने का श्राप दिया. आखिर में ब्राह्मण को श्राप देते हुए देवी सीता ने कहा कि तुम कभी भी संतुष्ट नहीं हो पाओगे. वस्तुओं को पाने की लालसा आप में हमेशा रहेगी.

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संजय गुप्ता
राह के किनारे एक अंधा याचक बैठा था । एक राहगीर ने दया वस उसे ₹50 का नोट दे दिया । इससे पूर्व कभी किसी ने अंधे को इतनी बड़ी मुद्रा दान में न दी थी सो उसे लगा कि किसी ने उसको कागज देकर ठिठोली की है । वह उस नोट को फेंकने ही जा रहा था कि वहां से गुजरते सज्जन ने उसे उस कागज का मूल्य समझाया और सहेज कर रखने को कहा । सत्य का पता चलने पर याचक बड़ा प्रसन्न हुआ और ही मन ही मन उस दयालु व्यक्ति को धन्यवाद देने लगा । मनुष्य भी बिना बोध हुए उसी अंधे भिखारी की तरह व्यवहार करता है और परमात्मा के लिए अनगिनत उपहारों का मूल्य नहीं समझ पाता । यदि हमें जो मिला है, उसका हम समुचित उपयोग कर पाए तो हमें पता चलेगा कि उसकी कोई कीमत नहीं, मनुष्य जीवन ही बहुमूल्य है।
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श्राद्ध खाने नहीं आऊंगा कौआ बनकर।🌹🙏🌹

राज कुमार

आँखो में आंसू ला दिये इस कहानी ने …….
“अरे! भाई बुढापे का कोई ईलाज नहीं होता . अस्सी पार चुके हैं . अब बस सेवा कीजिये .” डाक्टर पिता जी को देखते हुए बोला .

“डाक्टर साहब ! कोई तो तरीका होगा . साइंस ने बहुत तरक्की कर ली है .”

“शंकर बाबू ! मैं अपनी तरफ से दुआ ही कर सकता हूँ . बस आप इन्हें खुश रखिये . इस से बेहतर और कोई दवा नहीं है और इन्हें लिक्विड पिलाते रहिये जो इन्हें पसंद है .” डाक्टर अपना बैग सम्हालते हुए मुस्कुराया और बाहर निकल गया .

शंकर पिता को लेकर बहुत चिंतित था . उसे लगता ही नहीं था कि पिता के बिना भी कोई जीवन हो सकता है . माँ के जाने के बाद अब एकमात्र आशीर्वाद उन्ही का बचा था . उसे अपने बचपन और जवानी के सारे दिन याद आ रहे थे . कैसे पिता हर रोज कुछ न कुछ लेकर ही घर घुसते थे . बाहर हलकी-हलकी बारिश हो रही थी . ऐसा लगता था जैसे आसमान भी रो रहा हो . शंकर ने खुद को किसी तरह समेटा और पत्नी से बोला –

“सुशीला ! आज सबके लिए मूंग दाल के पकौड़े , हरी चटनी बनाओ . मैं बाहर से जलेबी लेकर आता हूँ .”

पत्नी ने दाल पहले ही भिगो रखी थी . वह भी अपने काम में लग गई . कुछ ही देर में रसोई से खुशबू आने लगी पकौड़ों की . शंकर भी जलेबियाँ ले आया था . वह जलेबी रसोई में रख पिता के पास बैठ गया . उनका हाथ अपने हाथ में लिया और उन्हें निहारते हुए बोला –

“बाबा ! आज आपकी पसंद की चीज लाया हूँ . थोड़ी जलेबी खायेंगे .”
पिता ने आँखे झपकाईं और हल्का सा मुस्कुरा दिए . वह अस्फुट आवाज में बोले –
“पकौड़े बन रहे हैं क्या ?”

“हाँ, बाबा ! आपकी पसंद की हर चीज अब मेरी भी पसंद है . अरे! सुषमा जरा पकौड़े और जलेबी तो लाओ .” शंकर ने आवाज लगाईं .
“लीजिये बाबू जी एक और . ” उसने पकौड़ा हाथ में देते हुए कहा.

“बस ….अब पूरा हो गया . पेट भर गया . जरा सी जलेबी दे .” पिता बोले .
शंकर ने जलेबी का एक टुकड़ा हाथ में लेकर मुँह में डाल दिया . पिता उसे प्यार से देखते रहे .

“शंकर ! सदा खुश रहो बेटा. मेरा दाना पानी अब पूरा हुआ .” पिता बोले.

“बाबा ! आपको तो सेंचुरी लगानी है . आप मेरे तेंदुलकर हो .” आँखों में आंसू बहने लगे थे .

वह मुस्कुराए और बोले – “तेरी माँ पेवेलियन में इंतज़ार कर रही है . अगला मैच खेलना है . तेरा पोता बनकर आऊंगा , तब खूब खाऊंगा बेटा .”

पिता उसे देखते रहे . शंकर ने प्लेट उठाकर एक तरफ रख दी . मगर पिता उसे लगातार देखे जा रहे थे . आँख भी नहीं झपक रही थी . शंकर समझ गया कि यात्रा पूर्ण हुई .
तभी उसे ख्याल आया , पिता कहा करते थे –

“श्राद्ध खाने नहीं आऊंगा कौआ बनकर , जो खिलाना है अभी खिला दे .”

माँ बाप का सम्मान करें और उन्हें जीते जी खुश रखे। 🌹🙏 🙏🌹

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संजय गुप्ता

(((( नाम जप की शक्ति ))))
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संसार का भ्रमण करते हुए गुरु नानक सच्चे पातशाह ओर मरदाना किसी जंगल से जा रहे थे
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मरदाना ने कहा महाराज बहुत भूख लगी हैं नानक जी नो कहा मरदाना रोटियां सेंक ले,
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मरदाना ने कहा बहुत ठंड हैं ना तो कोई चुल्हा हैं और न ही कोई तवा हैं और पानी भी बहुत ठंडा हैं
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तालाब छोटा था जैसे ही गुरु नानक जी ने तालाब के पानी को स्पर्श किया तो पानी उबाल मारने लगा
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नानक देव जी ने कहा मरदाना अब रोटी सेंक ले मरदाने ने आटे की चक्कियां बना कर उस तालाब में डालने लगें
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रोटियां तो सिक्की नहीं आटे की चक्की डूब गई, दुसरी चक्की डाली वह भी डूब गई फिर एक ओर डाली वह भी डूब गई
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मरदाना ने आकर नानक जी से कहा कि महाराज आप कहते हो रोटियां सेंक ले, रोटियां तो कोई सिक्की नहीं बल्कि सारी चक्कियां डूब गई
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सच्चे पातशाह कहने लगे मरदाना नाम जप कर रोटियां सेंकी थी…
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मरदाना चरणों में गिर गया महाराज गलती हो गई
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नानक देव जी कहने लगे मरदाना नाम जप कर रोटियां सेंक…
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मरदाना ने नाम जप कर पानी में चक्की डाली तो चमत्कार हो गया रोटियां तो
सिक्क गई बल्कि डूबीं हुई रोटियां भी तैर कर ऊपर आ गई और सिक्क गई
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मरदाना ने सच्चे पातशाह से पूछा महाराज.. ये क्या चमत्कार हैं
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नानक देव जी ने कहा मरदाना नाम के अंदर वो शक्ति हैं कि नाम जपने वाला अपने आप तैरने (भव सागर से पार होना) लगता हैं और आसपास के माहौल को तार देता हैं
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जहां गुरु नानक देव जी ने तालाब को स्पर्श कर ठंडे पानी को गरम पानी में उबाल दिया वो आज भी वहीं हैं जिसका नाम “मणिकरण साहिब” हैं।

((((((( जय जय श्री राधे )))))))
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( 🙏🙏 मेहंदीपुर बाला जी 🙏🙏

मेहंदीपुर में यहाँ घोर जंगल था। घनी झाड़ियाँ थी, शेर-चीता, बघेरा आदि जंगल में जंगली जानवर पड़े रहते थे। चोर-डाकूऒ का इस गांव में डर था। जो बाबा महंत जी महाराज के जो पूर्वज थे, उनको स्वप्न दिखाई दिया और स्वप्न की अवस्था में वे उठ कर चल दिए उन्हें ये पता नही था कि वे कहाँ जा रहे हैं। स्वप्न की अवस्था में उन्होंने अनोखी लीला देखी

एक ऒर से हज़ारों दीपक जलते आ रहे हैं। हाथी घोड़ो की आवाजें आ रही हैं। एक बहुत बड़ी फौज चली आ रही है उस फौज ने श्री बालाजी महाराज जी, श्री भैरो बाबा, श्री प्रेतराज सरकार, को प्रणाम किया और जिस रास्ते से फौज आयी उसी रास्ते से फौज चली गई। और गोसाई महाराज वहाँ पर खड़े होकर सब कुछ देख रहे थे। उन्हें कुछ डर सा लगा और वो अपने गांव की तरफ चल दिये घर जाकर वो सोने की कोशिश करने लगे परन्तु उन्हे नींद नही आई बार-बार उसी स्वप्न के बारे में विचार करने लगे। जैसे ही उन्हें नींद आई। वो ही तीन मूर्तियाँ दिखाई दी, विशाल मंदिर दिखाई दिया और उनके कानों में वही आवाज आने लगी और कोई उनसे कह रहा बेटा उठो मेरी सेवा और पूजा का भार ग्रहण करो। मैं अपनी लीलाओं का विस्तार करूँगा। और कलयुग में अपनी शक्तियाँ दिखाऊॅंगा। यह कौन कह रहा था रात में कोई दिखाई नही दिया।

गोसाई जी महाराज इस बार भी उन्होंने इस बात का ध्यान नही दिया अंत में श्री बालाजी महाराज ने दर्शन दिए और कहा कि बेटा मेरी पूजा करो दूसरे दिन गोसाई जी महाराज उठे मूर्तियों के पास पहुंचे उन्होंने देखा कि चारों ओर से घण्टा, घडियाल और नगाड़ों की आवाज़ आ रही है किंतु कुछ दिखाई नही दिया इसके बाद गोसाई महाराज नीचे आए और अपने पास लोगों को इकट्ठा किया अपने सपने के बारे में बताया जो लोग सज्जन थे उन्होने मिल कर एक छोटी सी तिवारी बना दी लोगों ने भोग की व्यवस्था करा दी बालाजी महाराज ने उन लोगों को बहुत चमत्कार दिखाए। जो दुष्ट लोग थे उनकी समझ में कुछ नही आया। श्री बाला जी महाराज की प्रतिमा/ विग्रह जहाँ से निकली थी, लोगों ने उन्हे देखकर सोचा कि वह कोई कला है। तो वह मूर्ति फिर से लुप्त हो गई फिर लोगों ने श्री बाला जी महाराज से क्षमा मांगी तो वो मूर्तियाँ दिखाई देने लगी। श्री बाला जी महाराज की मूर्ति के चरणों में एक कुंड है। जिसका जल कभी ख़त्म नही होता है। रहस्य यह है कि श्री बालाजी महाराज के ह्रदय के पास के छिद्र से एक बारिक जलधारा लगातार बहती है। उसी जल से भक्तों को छींटे लगते हैं।

जोकि चोला चढ़ जाने पर भी जलधारा बन्द नही होती है। इस तरह तीनों देवताओं की स्थापना हुई , श्री बाला जी महाराज जी की, प्रेतराज सरकार की, भैरो बाबा की और जो समाधि वाले बाबा हैं उनकी स्थापना बाद में हुई। श्री बालाजी महाराज ने गोसाई जी महाराज को साक्षात दर्शन दिए थे। उस समय किसी राजा का राज्य चल रहा था। समाधि वाले बाबा ने ही राजा को अपने स्वपन की बात बताई। राजा को यकीन नही आया। राजा ने मूर्ति को देखकर कहा ये कोई कला है। इससे बाबा की मूर्ति अन्दर चली गयी। तो राजा ने खुदाई करवायी तब भी मूर्ति का कोई पता नही चला। तब राजा ने हार मानकर बाबा से क्षमा मांगी और कहा हे श्री बाला जी महाराज हम अज्ञानी हैं मूर्ख हैं हम आपकी शक्ति को नही पहचान पाये हमें अपना बच्चा समझ कर क्षमा कर दो। तब बालाजी महाराज की मूर्तियाँ बाहर आई। मूर्तियाँ बाहर आने के बाद राजा ने गोसाई जी महाराज की बातों पर यकीन किया, और गोसाई जी महाराज को पूजा का भार ग्रहण करने की आज्ञा दी। राजा ने श्री बाला जी महाराज जी का एक विशाल मन्दिर बनवाया। गोसाई जी महाराज ने श्री बाला जी महाराज जी की बहुत वर्ष तक पूजा की, जब गोसाई जी महाराज वृद्धा अवस्था में आये तो उन्होंने श्री बालाजी महाराज की आज्ञा से समाधि ले ली। उन्होंने श्री बाला जी महाराज से प्रार्थना की, कि श्री बाला जी महाराज मेरी एक इच्छा है कि आपकी सेवा और पूजा का भार मेरा ही वंश करे। तब से आज तक गोसाई जी महाराज का परिवार ही पूजा का भार सम्भाल रहे हैं। यहाँ पर लगभग 1000 वर्ष पहले बाला जी प्रकट हुए थे। बालाजी में अब से पहले 11 महंत जी सेवा कर चुके हैं। इस तरह से बालाजी की स्थापना हुई। ये तो कलयुग के अवतार हैं संकट मोचन हैं मेहंदीपुर के आस-पास के इलाके में संकट वाले आदमी बहुत कम हैं। क्योंकि लोगों के मन में बालाजी के प्रति बहुत आस्था है। कहते हैं- जिनके मन में विश्वास है, बालाजी महाराज उन्ही के संकट काटते हैं🙏🏻🙏🏻

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ओ पालनहारे, निर्गुण और न्यारे
तुम्हरे बिन हमरा कौनो नाहीं

हमरी उलझन, सुलझाओ भगवन
तुम्हरे बिन हमरा कौनो नाहीं

तुम ही हमका हो संभाले,
तुम ही हमरे रखवाले

तुम्हरे बिन हमरा कौनो नाहीं
तुम्हरे बिन हमरा कौनो नाहीं

चन्दा में तुम ही तो भरे हो चांदनी
सूरज में उजाला तुम ही से

यह गगन हैं मगन,
तुम ही तो दिए इसे तारे

भगवन, यह जीवन तुम ही न सवारोगे,
तो क्या कोई सवारे

ओ पालनहारे, निर्गुण और न्यारे
तुम्हरे बिन हमरा कौनो नाहीं
तुम्हरे बिन हमरा कौनो नाहीं

जो सुनो तो कहे प्रभुजी हमरी है विनती

दुखी जन को धीरज दो,
हारे नही वो कभी दुखसे

तुम निर्बल को रक्षा दो,
रहें पाए निर्बल सुख से

भक्ति को शक्ति दो
भक्ति को शक्ति दो

जग के जो स्वामी हो,
इतनी तो अरज सुनो

हैं पथ मैं अंधियारे,
दे दो वरदान में उजियारे

ओ पालनहारे, निर्गुण और न्यारे
तुम्हरे बिन हमरा कौनो नाहीं

हमरी उलझन, सुलझाओ भगवन
तुम्हरे बिन हमरा कौनो नाहीं

ओ पालनहारे, निर्गुण और न्यारे
तुम्हरे बिन हमरा कौनो नाहीं

हमरी उलझन, सुलझाओ भगवन
तुम्हरे बिन हमरा कौनो नाहीं