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अतुल सोनी

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🌼वाल्मीकि । डाकू से महर्षि तक का सफर🌼
महर्षि वाल्मीकि का पूर्व नाम रत्नाकर था। रत्नाकर का काम राहगीरों को लूट कर धन कमाना था। रत्नाकर जिस किसी को भी लूटता, वह व्यक्ति उसे रोता, गिड़गिड़ाता, भयभीत होता ही दिखता। आज उसने एक अजीब साधु देखा था, जो बिल्कुल भी नहीं डरा। इस साधु ने तो एक शब्द भी अपनी प्राणरक्षा के लिए नहीं कहे बल्कि उल्टा उपदेश दे रहा है। उसके निष्ठुर हृदय को कभी भी रोने, विलापने वालों को देखकर दया नहीं आयी थी, किन्तु इस साधु की निर्भयता और स्नेहपूर्ण वाणी ने उसे अचम्भित कर दिया।
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यह नारद जी थे जो संयोगवश उस दिन उस वन क्षेत्र से निकल थे। रत्नाकर ने देखते ही उन्हें धर दबोचा। देवर्षि ने निर्भय होकर बड़े स्नेह से कहा-‘ मैं तो साधु हूँ। ईश्वर की भक्ति में लीन रहता हूँ। न किसी से मोह है न ही माया बटोरने का लोभ। मेरे पास रखा ही क्या है। परन्तु एक बात बताओ भैया! तुम प्राणियों को क्यों व्यर्थ मारते हो? जीवों को पीड़ा देने से बड़ा कोई दूसरा पाप नहीं है।’
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रत्नाकर बोला-‘मैं अपने परिवार का अकेला कमाने वाला हूँ। मुझे कोई ओर कार्य नहीं आता, यदि मैं लूटकर धन न ले जाऊँ तो परिवार का पालन-पोषण कैसे होगा। वे सब तो भूखें मर जायेंगे।’
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‘तुम जिनका भरण-पोषण करने के लिए इतने पाप करते हो, वे तुम्हारे इस पापकर्म में भागी होंगे या नहीं, जरा उनसे पूछ कर तो आओ। चिन्ता मत करो, मैं तो हूँ फक्कड़ इंसान भागकर कहीं नहीं जाऊँगा। बोलो तो तुम्हारे साथ ही चल दूँ।’-देवर्षि ने कहा
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रत्नाकर बोला-‘बिल्कुल नहीं! तुम मुझे मूर्ख समझ रहे हो। साथ ले गया तो मेरा भेद खोलोगे। अगर मैं तुम्हें यहाँ छोड़कर परिवार के पास गया तो मेरे चुंगल से तुम भाग जाओगे।’
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देवर्षि ने हंसते हुए कहा-‘भैया! विश्वास न हो तो मुझे एक पेड़ से इस तरह बांध दो कि भागने का विचार भी न कर सकूं।’
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रत्नाकर को यही उचित लगा। नारद जी को पेड़ से बांध दिया। वहाँ से वह तेजी से घर गये कि कहीं देर हो गयी तो यह साधु हाथ से निकल सकता है। उसने घर के सभी सदस्यों से अपने पाप का भागीदार बनने के विषय मे पूछा। सबने एक ही उत्तर दिया-‘हमारा पालन-पोषण करना आपका दायित्व है। अतः आपके द्वारा किये गये कार्य में हम भागीदार नहीं बन सकते।’
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रत्नाकर को तो जैसे सांप सूंघ गया। वह सोचने लगा ‘वह साधु तो सही कहता था। जिस परिवार के पोषण के लिए दिन-रात एक करके, अपना जीवन संकट में डालकर, अनगिनत प्राणियों को मारा, पाप पर पाप करते गया, उन्हें उसके पाप-पुण्य से कुछ मतलब नहीं।
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रत्नाकर अत्यन्त बिचलित हो गया था। उसके मोह के जैसे सारे बन्धन ही टूट गये। भारी कदमों से वह वन में गया। लग रहा था जैसे न जाने कितना दूर उसे जाना है।
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वहाँ पहुंचते ही वह साधु के चरणों पर गिर पड़ा। वह छटपटाता हुआ बोला-‘भैया! मेरे उद्धार का कोई मार्ग बताओ।’
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राधा सखी नारद जी ने उन्हें राम नाम की महिमा बता कर उसका जाप करने के लिए कहा।
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वे तो बचपन से ही कुसंगत में पड़े हुए थे। लुटेरे-डाकूओं के संगत से डाकू हो गये। लूट खसोट और मार-काट ही वे किया करते थे। विद्या प्राप्त करने में भी कोई रुचि न थी। अतः वे ‘राम’ भी ढंग से नहीं बोल पा रहे थे।
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नारद जी ने कुछ विचार कर उन्हें ‘मरा’ नाम जपने की सलाह दी।
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रत्नाकर वहीं बैठकर जपने लगे-मरामरा मरामरा……। जिद्द इतनी कि समय बीतता चला गया, किंतु वह नहीं उठे। उनका जाप चलता रहा। दीमकों ने एक ही जगह स्थित देखकर उन्हें पेड़ समझा और उनके शरीर पर अपना घर बना लिया। कालान्तर में उनका पूरा शरीर दमकों की बाॅबी से ढक गया।
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ब्रह्माजी उनकी तपस्या से अति प्रसन्न हुए। उन्होंने दीमाकों द्वारा खाये हुए अंगों को सुन्दर, पुष्ट बना दिया। वल्मीक (बाॅबी वल्मीक का अपभ्रंस रूप है) से निकलने के कारण उस दिन से वह वाल्मीकि हो गये। ब्रह्मा जी ने ही उन्हें सर्वप्रथम ऋषि वाल्मीकि कहकर पुकारा था।
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भगवान नाम के प्रभाव से वह परम दयालु ऋषि हो गये थे। एक बाद महर्षि वाल्मीकि क्रौंच पक्षी के प्रेमालाप करते हुए जोड़े को निहार रहे थे। उसी समय एक व्याध ने जोड़े में से एक को मारा दिया। महर्षि का दयालू हृदय द्रविड़ हो गया। दुःख में उनके मुख से व्याध को धिक्कारते हुए अनायास ही एक श्लोक निकल पड़ा। यह प्रथम छन्द था। उसी छन्द से वाल्मीकि जी आदिकवि हुए। वहीं से उन्होंने महाकाव्य रामायण की रचना प्रारम्भ की।
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अपने अवतार के अंतिम काल में जब मर्यादापुरुषोत्तम राम ने लोक लाज के कारण माता सीता का त्याग किया, उस समय माता ने महर्षि वाल्मीकि जी के ही आश्रम शरण ली। लव-कुश का जन्म और शिक्षा-दीक्षा आश्रम मे ही हुई।
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महार्षि वाल्मीकि के द्वारा रचित रामायण भवसागर से पार कराने वाला ऐसा ग्रन्थ है जिसने पुत्र का कर्तव्य, मर्यादा, सत्य, प्रेम, भातृत्व, मित्रता एवं सेवक के धर्म को उदाहरण सहित हम सबके समक्ष रखा जो कि हमारे लिए अति अनुकरणीय और प्रेरणा के स्रोत है।
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महर्षि वाल्मीकि जी का जन्म आश्विन मास की पूर्णिया को हुआ था, इस वर्ष उनका जन्मदिन 24 अक्टूबर को मनाया जाएगा। हम सब का महार्षि वाल्मीकि को सत-सत नमन।
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➡️ प्रिये मित्रो आप सभी से निवेदन है की श्री नारद को प्रेम से पुकारा कीजिये ये याद रखिये सदैव ही जिन जिन को श्री नारद जी के दर्शन हुए उन सभी को प्रभु के दर्शन हुए ! यह किसी की दाल न गले वह नारद जी की दाल गलती है ! यह सभी बातें रद्द हो जाएँ वहाँ नारद जी की बात रद्द नहीं होती उन्ही को नारद कहते हैं ! क्यों कि नारद जी भगवान का मन हैं और प्रभु मन कि सुनते हैं ! यहां मन लगा वहीं हरी दर्श हो जाते हैं फिर पल भर की देर नहीं होतीं ! इसलिए आप भी देरी किये बग़ैर प्रभु में अपना मन लगाइये और प्रभु दर्शन का लाभ प्राप्त कीजिये ! प्रेम से बोलिये ➖➖➖➖🌹🙏🌹
🌹! श्री नारद जी की जय हो ! 🌹
🌹! श्री बाल्मीकि जी की जय हो !🌹……✍️✍️
🌷जय श्री राम🌷
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संजय गुप्ता

माता पिता के परम भक्त श्रवण कुमार की कथा,,,,,

माता पिता की सेवा में अपना पूरा जीवन समर्पित कर देने वाले श्रवण कुमार की कहानी हम सदियों से सुनते आये हैं| सतयुग में जन्मे श्रवण कुमार ने सुख और दुःख को भूलकर अपने अंधे माता पिता की पूर्णभाव से सेवा की थी और आने वाली पीढ़ी के लिए मिशाल पेश की|

यह त्रेतायुग की एक पौराणिक कथा है| श्रवण कुमार के माता पिता अंधे थे, उनको आखों से कुछ दिखाई नहीं देता था| श्रवण की माँ ने बहुत कष्ट झेलकर अपने बेटे को पालन पोषण किया| अंधे पिता किसी तरह मेहनत मजदूरी करके अपने परिवार के लिए भोजन जुटा पाते थे|

बालक श्रवण कुमार अपने माता पिता के कष्टों को भली भांति समझते थे| थोड़े बड़े हुए तो श्रवण कुमार अपने माता पिता के कामों में हाथ बंटाने लगे|

श्रवण कुमार जब बड़े हुए तो पूरे तन-मन से माता पिता की सेवा करते थे| सुबह उठकर माता पिता को भजन कीर्तन सुनाते, फिर चूल्हा जलाकर खाना पकाते|

श्रवण कुमार की माँ उनसे कहतीं कि बेटा मैं स्वयं खाना बना लूंगी लेकिन श्रवण कुमार को डर था कहीं खाना बनाने में अंधी माँ के हाथ ना जल जायें इसलिए वह स्वयं ही खाना बनाते थे|

माता पिता को भोजन कराने के बाद ही वह बाहर मजदूरी करने जाते थे| दिनभर बाहर मेहनत करने के बाद जब श्रवण कुमार शाम को वापस आते तो सोने से पहले माता पिता के पाँव दबाते|

श्रवण के माता पिता ईश्वर का धन्यवाद देते थे और कहते थे कि हमारे कुछ अच्छे कर्मों की वजह से ही हमें श्रवण जैसा पुत्र मिला। भगवान ऐसी संतान सभी को दे|

सब कुछ सुखद चल रहा था| माता पिता को चिंता हुई कि श्रवण का विवाह कर देनी चाहिए| उचित अवसर निकालकर श्रवण का विवाह भी कर दिया गया|

दुर्भाग्यवश, श्रवण की पत्नी का व्यवहार माता पिता के प्रति बिल्कुल अच्छा नहीं था| वह श्रवण के माता पिता का ध्यान नहीं रखती थी और ना ही उनके खाने पीने का सही से ध्यान देती थी|

श्रवण ने पत्नी से इसकी शिकायत की तो भी पत्नी ने श्रवण की बात नहीं मानी और जब श्रवण ने उसका विरोध किया तो वह घर छोड़कर अपने पिता के घर चली गयी|

श्रवण अपने माता पिता को कभी कुछ दुःख नहीं होने देते थे| एक दिन श्रवण के माता पिता ने उनसे कहा – बेटा तुम्हारे जैसे पुत्र को पाकर हम तो धन्य हो गए हैं| अब एक और हमारी इच्छा है कि हम तीर्थ यात्रा करना चाहते हैं| अब उसी से हमारे हृदय को शांति मिलेगी|

माता पिता की इच्छा सुनकर श्रवण कुमार ने उन्हें तीर्थ यात्रा कराने का निश्चय कर लिया| उन दिनों रेल, बस और ट्रेन नहीं हुआ करती थीं तब श्रवण कुमार ने दो बड़ी टोकरियां लीं और उन दोनों टोकरियों को एक डंडे के दोनों ओर टांग लिया|

इस तरह श्रवण कुमार ने एक टोकरी में अपनी माता और दूसरी टोकरी में पिता को बैठाया और डंडा अपने कंधे लादकर अपने माता पिता को तीर्थ यात्रा कराने निकल पड़े|

अपनी स्वयं की परवाह किये बिना, कठिन और लम्बी यात्रा के बाद श्रवण कुमार ने अपने माता पिता को तीर्थ यात्रा कराई| श्रवण कुमार उन्हें कई तीर्थों पर लेकर गए और वहां का सम्पूर्ण नजारा अपने माता पिता को बोलकर सुनाते तो एक तरह से माता पिता श्रवण की आखों से समस्त तीर्थो के दर्शन कर रहे थे|

यात्रा के दौरान, एक बार श्रवण के माता पिता को प्यास लगी और उन्होंने श्रवण से पानी लाने को कहा| कलश लेकर श्रवण पानी लेने निकल पड़े, पास ही एक तालाब दिखा जिसमें शीतल जल था|

राजा दशरथ वहीँ जंगल में शिकार खेलने आये थे| राजा दशरथ शब्दभेदी बाण चलाने में निपुण थे| शब्दभेदी अर्थात केवल शब्द सुनकर ही निशाना लगा दिया करते थे|

श्रवण कुमार ने जैसे ही कलश पानी में डुबोया तो उसकी आवाज सुनकर दशरथ को लगा कि कोई जानवर पानी पीने आया होगा| यही सोचकर उन्होंने बाण चलाया और वह बाण श्रवण कुमार को जा लगा।

जब दशरथ वहां पहुंचे तो उन्हें अपनी इस बड़ी भूल का अहसास हुआ, श्रवण कुमार ने दशरथ से विनती की कि पास में ही उनके प्यासे माता पिता पानी का इन्तजार कर रहे हैं, कृपया उन्हें पानी जरूर पिला देना और वहीँ श्रवण कुमार की मृत्यु हो गयी|

राजा दशरथ अपनी इस गलती से बेहद व्याकुल हो उठे और वो पानी लेकर उनके माता पिता के पास गये| राजा की आहट पाकर माता पिता ने पूछा कि तुम कौन हो ? तुम तो श्रवण कुमार नहीं हो ? हमारा पुत्र कहाँ है ?

राजा दशरथ ने जब पूरी बात बताई तो माता पिता दुःखी होकर रोने लगे और रोते रोते ही उन्होंने प्राण त्याग दिए| मरने से पहले श्रवण के माता पिता ने दशरथ को श्राप दिया कि जिस तरह हम अपने पुत्र के वियोग में तड़प तड़प कर प्राण त्याग रहे हैं| एकदिन तू भी इसी तरह अपने पुत्र के वियोग में तड़पकर प्राण त्याग देगा|

राजा दशरथ भगवान् राम के पिता थे| श्राप के अनुसार जब राम वनवास को गए तो दशरथ ने उनके वियोग में रो रोकर प्राण त्याग दिए थे|

यह श्रवण कुमार की पौराणिक कथा है| धन्य है यह धरती जिसने श्रवण कुमार जैसे मातपितृ भक्त को जन्म दिया।

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ज्योति अग्रवाल

ससुराल में वो पहली सुबह आज भी याद है…!!

कितना हड़बड़ा के उठी थी, ये सोचते हुए कि देर हो
गयी है और सब ना जाने क्या सोचेंगे ?
एक रात ही तो नए घर में काटी है और इतना बदलाव, जैसे आकाश में उड़ती चिड़िया को, किसी ने
सोने के मोतियों का लालच देकर, पिंजरे में बंद कर दिया हो।
शुरू के कुछ दिन तो यूँ ही गुजर गए। हम घूमने बाहर चले गए।
जब वापस आए, तो सासू माँ की आंखों में खुशी तो
थी, लेकिन बस अपने बेटे के लिए ही
दिखी मुझे।
सोचा, शायद नया नया रिश्ता है, एक दूसरे को समझते देर लगेगी, लेकिन समय ने जल्दी ही एहसास करा दिया कि मैं यहाँ बहु हूँ। जैसे चाहूं वैसे नही रह सकती।

कुछ कायदा, मर्यादा हैं, जिनका पालन मुझे करना होगा। धीरे धीरे बात करना, धीरे से हँसना, सबके खाने के बाद
खाना, ये सब आदतें, जैसे अपने आप ही आ
गयीं,
घर में माँ से भी कभी कभी ही बात होती थी, धीरे धीरे पीहर की याद सताने लगी। ससुराल में पूछा, तो कहा गया -अभी नही, कुछ दिन बाद!
जिस पति ने कुछ दिन पहले ही मेरे माता पिता से, ये कहा था कि पास ही तो है, कभी भी आ जायेगी, उनके भी सुर बदले हुए थे।
अब धीरे धीरे समझ आ रहा था, कि शादी कोई खेल नही। इसमें सिर्फ़ घर नही बदलता, बल्कि आपका पूरा जीवन ही बदल जाता है।
आप कभी भी उठके, अपने मायके नही जा सकते। यहाँ तक कि कभी याद आए, तो आपके पीहर वाले भी, बिन पूछे नही आ सकते।
मायके का वो अल्हड़पन, वो बेबाक हँसना, वो जूठे मुँह रसोई में कुछ भी छू लेना, जब मन चाहे तब उठना, सोना, नहाना, सब बस अब यादें ही रह जाती हैं।

अब मुझे समझ आने लगा था, कि क्यों विदाई के समय, सब मुझे गले लगा कर रो रहे थे ? असल में मुझसे दूर होने का एहसास तो उन्हें हो ही रहा था, लेकिन एक और बात थी, जो उन्हें अन्दर ही अन्दर परेशान कर रही थी,
कि जिस सच से उन्होंने मुझे इतने साल दूर रखा, अब वो मेरे सामने आ ही जाएगा।

पापा का ये झूठ कि में उनकी बेटी नही बेटा हूँ, अब और दिन नही छुप पायेगा।
उनकी सबसे बड़ी चिंता ये थी, अब उनका ये बेटा, जिसे कभी बेटी होने का एहसास ही नही कराया था, जीवन
के इतने बड़े सच को कैसे स्वीकार करेगा ?

माँ को चिंता थी कि उनकी बेटी ने कभी एक ग्लास पानी का नही उठाया, तो इतने बड़े परिवार की जिम्मेदारी कैसे
उठाएगी?
सब इस विदाई और मेरे पराये होने का मर्म जानते थे, सिवाये मेरे। इसलिए सब ऐसे रो रहे थे, जैसे मैं डोली में नहीं, अर्थी में जा रही हूँ।

आज मुझे समझ आया, कि उनका रोना ग़लत नही था। हमारे समाज का नियम ही ये है, एक बार बेटी डोली में विदा हुयी, तो फिर वो बस मेहमान ही होती है।

फिर कोई चाहे कितना ही क्यों ना कह ले, कि ये घर आज भी उसका है ? सच तो ये है, कि अब वो कभी भी, यूँ
ही अपने उस घर, जिसे मायका कहते हैं, नही आ सकती..!!
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Posted in संस्कृत साहित्य

संजय गुप्ता

जानिए गोरखनाथ का रहस्य, इसी संप्रदाय से आते हैं योगी आदित्यनाथ!!!!!!!!!

महान चमत्कारिक और रहस्यमयी गुरु गोरखनाथ को गोरक्षनाथ भी कहा जाता है। इनके नाम पर एक नगर का नाम गोरखपुर और एक जाति का नाम गोरखा है। गोरखपुर में ही गुरु गोरखनाथ समाधि स्थल है। यहां दुनियाभर के नाथ संप्रदाय और गोरखनाथजी के भक्त उनकी समाधि पर माथा टेकने आते हैं। इस समाधि मंदिर के ही महंत अर्थात प्रमुख साधु है महंत आदित्यनाथ योगी।

गोरखनाथजी ने नेपाल और भारत की सीमा पर प्रसिद्ध शक्तिपीठ देवीपातन में तपस्या की थी। उसी स्थल पर पाटेश्वरी शक्तिपीठ की स्थापना हुई। भारत के गोरखपुर में गोरखनाथ का एकमात्र प्रसिद्ध मंदिर है। इस मंदिर को यवनों और मुगलों ने कई बार ध्वस्त किया लेकिन इसका हर बार पु‍नर्निर्माण कराया गया। 9वीं शताब्दी में इसका जीर्णोद्धार किया गया था लेकिन इसे 13वीं सदी में फिर मुस्लिम आक्रांताओं ने ढहा दिया था। बाद में फिर इस मंदिर को पुन: स्थापित कर साधुओं का एक सैन्यबल बनाकर इसकी रक्षा करने का कार्य किया गया। इस मंदिर के उपपीठ बांग्लादेश और नेपाल में भी स्थित है। संपूर्ण भारतभर के नाथ संप्रदाय के साधुओं के प्रमुख महंत हैं योगी आदित्यनाथ। कोई यह अंदाजा नहीं लगा सकता है कि आदित्यनाथ के पीछे कितना भारी जन समर्थन है। सभी दसनामी और नाथ संप्रदाय के लोगों के लिए गोरखनाथ का यह मंदिर बहुत महत्व रखता है।

गोरखनाथ का जन्म : – गोरक्षनाथ के जन्मकाल पर विद्वानों में मतभेद हैं। राहुल सांकृत्यायन इनका जन्मकाल 845 ई. की 13वीं सदी का मानते हैं। गुरु गोरखनाथ के जन्म के विषय में प्रचलित है कि एक बार भिक्षाटन के क्रम में गुरु मत्स्येन्द्रनाथ किसी गांव में गए। किसी एक घर में भिक्षा के लिए आवाज लगाने पर गृह स्वामिनी ने भिक्षा देकर आशीर्वाद स्वरूप पुत्र की याचना की। गुरु मत्स्येन्द्रनाथ सिद्ध तो थे ही। अतः गृह स्वामिनी की याचना स्वीकार करते हुए उन्होंने एक चुटकी भर भभूत देते हुए कहा कि इसका सेवन करने के बाद यथासमय वे माता बनेंगी। उनके एक महा तेजस्वी पुत्र होगा जिसकी ख्याति चारों और फैलेगी।

आशीर्वाद देकर गुरु मत्स्येन्द्रनाथ अपने भ्रमण क्रम में आगे बढ़ गए। बारह वर्ष बीतने के बाद गुरु मत्स्येन्द्रनाथ उसी ग्राम में पुनः आए। कुछ भी नहीं बदला था। गांव वैसा ही था। गुरु का भिक्षाटन का क्रम अब भी जारी था। जिस गृह स्वामिनी को अपनी पिछली यात्रा में गुरु ने आशीर्वाद दिया था, उसके घर के पास आने पर गुरु को बालक का स्मरण हो आया। उन्होंने घर में आवाज लगाई। वही गृह स्वामिनी पुनः भिक्षा देने के लिए प्रस्तुत हुई। गुरु ने बालक के विषय में पूछा।

गृहस्वामिनी कुछ देर तो चुप रही, परंतु सच बताने के अलावा उपाय न था। उसने तनिक लज्जा, थोड़े संकोच के साथ सब कुछ सच सच बतला दिया। उसने कहा कि आप से भभूत लेने के बाद पास-पड़ोस की स्त्रियों ने राह चलते ऐसे किसी साधु पर विश्वास करने के लिए उसकी खूब खिल्ली उड़ाई। उनकी बातों में आकर मैंने वह भभूत को पास के गोबर से भरे गड्डे में फेंक दिया था।

गुरु मत्स्येन्द्रनाथ तो सिद्ध महात्मा थे। उन्होंने अपने ध्यानबल देखा और वे तुरंत ही गोबर के गड्डे के पास गए और उन्होंने बालक को पुकारा। उनके बुलावे पर एक बारह वर्ष का तीखे नाक नक्श, उच्च ललाट एवं आकर्षण की प्रतिमूर्ति स्वस्थ बच्चा गुरु के सामने आ खड़ा हुआ। गुरु मत्स्येन्द्रनाथ बच्चे को लेकर चले गए। यही बच्चा आगे चलकर गुरु गोरखनाथ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। गोरखनाथ के गुरु मत्स्येन्द्रनाथ (मछंदरनाथ) थे।

कौन थे मत्स्येन्द्र नाथ : – नाथ संप्रदाय में आदिनाथ और दत्तात्रेय के बाद सबसे महत्वपूर्ण नाम आचार्य मत्स्येंद्र नाथ का है, जो मीननाथ और मछन्दरनाथ के नाम से लोकप्रिय हुए। कौल ज्ञान निर्णय के अनुसार मत्स्येंद्रनाथ ही कौलमार्ग के प्रथम प्रवर्तक थे। कुल का अर्थ है शक्ति और अकुल का अर्थ शिव। मत्स्येन्द्र के गुरु दत्तात्रेय थे। मत्स्येन्द्रनाथ हठयोग के परम गुरु माने गए हैं जिन्हें मच्छरनाथ भी कहते हैं। इनकी समाधि उज्जैन के गढ़कालिका के पास स्थित है। हालांकि कुछ लोग मानते हैं कि मछिंद्रनाथ की समाधि मछीन्द्रगढ़ में है, जो महाराष्ट्र के जिला सावरगाव के ग्राम मायंबा गांव के निकट है। इतिहासवेत्ता मत्स्येन्द्र का समय विक्रम की आठवीं शताब्दी मानते हैं।

मत्स्येन्द्रनाथ का एक नाम ‘मीननाथ’ है। ब्रजयनी सिद्धों में एक मीनपा हैं, जो मत्स्येन्द्रनाथ के पिता बताए गए हैं। मीनपा राजा देवपाल के राजत्वकाल में हुए थे। देवपाल का राज्यकाल 809 से 849 ई. तक है। इससे सिद्ध होता है कि मत्स्येन्द्र ई. सन् की नौवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में विद्यमान थे। तिब्बती परंपरा के अनुसार कानपा राजा देवपाल के राज्यकाल में आविर्भाव हुए थे। इस प्रकार मत्स्येन्द्रनाथ आदि सिद्धों का समय ई. सन् के नौवीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध और दसवीं शताब्दी का पूर्वार्द्ध समझना चाहिए। शंकर दिग्विजय नामक ग्रंथ के अनुसार 200 ईसा पूर्व मत्स्येन्द्रनाथ हुए थे।

महायोगी गोरखनाथ : – माना जाता है कि जितने भी देवी-देवताओं के साबर मंत्र है उन सभी के जन्मदाता श्री गोरखनाथ ही है। नाथ और दसनामी संप्रदाय के लोग जब आपस में मिलते हैं तो एक दूसरे से मिलते वक्त कहते हैं- आदेश और नमो नारायण।

नवनाथ की परंपरा की शुरुआत गुरु गोरखनाथ के कारण ही शुरु हुई थी। शंकराचार्य के बाद गुरु गोरखनाथ को भारत का सबसे बड़ा संत माना जाता है। गोरखनाथ की परंपरा में ही आगे चलकर कबीर, गजानन महाराज, रामदेवरा, तेजाजी महाराज, शिरडी के साई आदि संत हुए। माता ज्वालादेवी के स्थान पर तपस्या करने उन्होंने माता को प्रसंन्न कर लिया था।

गोरखनाथ शरीर और मन के साथ नए-नए प्रयोग करते थे। उन्होंने योग के कई नए आसन विकसित किए थे। जनश्रुति अनुसार उन्होंने कई कठिन (आड़े-तिरछे) आसनों का आविष्कार भी किया। उनके अजूबे आसनों को देख लोग अ‍चम्भित हो जाते थे। आगे चलकर कई कहावतें प्रचलन में आईं। जब भी कोई उल्टे-सीधे कार्य करता है तो कहा जाता है कि ‘यह क्या गोरखधंधा लगा रखा है।’

गोरखनाथ का मानना था कि सिद्धियों के पार जाकर शून्य समाधि में स्थित होना ही योगी का परम लक्ष्य होना चाहिए। शून्य समाधि अर्थात समाधि से मुक्त हो जाना और उस परम शिव के समान स्वयं को स्थापित कर ब्रह्मलीन हो जाना, जहाँ पर परम शक्ति का अनुभव होता है। हठयोगी कुदरत को चुनौती देकर कुदरत के सारे नियमों से मुक्त हो जाता है और जो अदृश्य कुदरत है, उसे भी लाँघकर परम शुद्ध प्रकाश हो जाता है।

नवनाथ परंपरा : गोरखनाथ के हठयोग की परम्परा को आगे बढ़ाने वाले सिद्ध योगियों में प्रमुख हैं:- चौरंगीनाथ, गोपीनाथ, चुणकरनाथ, भर्तृहरि, जालन्ध्रीपाव ( जालंधर या जालिंदरनाथ) आदि। 13वीं सदी में इन्होंने गोरख वाणी का प्रचार-प्रसार किया था। यह एकेश्वरवाद पर बल देते थे, ब्रह्मवादी थे तथा ईश्वर के साकार रूप के सिवाय शिव के अतिरिक्त कुछ भी सत्य नहीं मानते थे। कुछ लोग नौ नाथ का क्रम ये बताते हैं:- मत्स्येन्द्र, गोरखनाथ, गहिनीनाथ, जालंधर, कृष्णपाद, भर्तृहरि नाथ, रेवणनाथ, नागनाथ और चर्पट नाथ।

।।मच्छिंद्र गोरक्ष जालीन्दराच्छ।। कनीफ श्री चर्पट नागनाथ:।।
श्री भर्तरी रेवण गैनिनामान।। नमामि सर्वात नवनाथ सिद्धान।।

गोरखनाथ की परंपरा : – नाथ शब्द का अर्थ होता है स्वामी। कुछ लोग मानते हैं कि नाग शब्द ही बिगड़कर नाथ हो गया। भारत में नाथ योगियों की परंपरा बहुत ही प्राचीन रही है। नाथ समाज हिन्दू धर्म का एक अभिन्न अंग है। भगवान शंकर को आदिनाथ और दत्तात्रेय को आदिगुरु माना जाता है। इन्हीं से आगे चलकर नौ नाथ और 84 नाथ सिद्धों की परंपरा शुरू हुई। आपने अमरनाथ, केदारनाथ, बद्रीनाथ आदि कई तीर्थस्थलों के नाम सुने होंगे। आपने भोलेनाथ, भैरवनाथ आदि नाम भी सुने ही होंगे। साईनाथ बाबा (शिरडी) भी नाथ योगियों की परंपरा से थे। गोगादेव, बाबा रामदेव आदि संत भी इसी परंपरा से थे। तिब्बत के सिद्ध भी नाथ परंपरा से ही थे।

नौ नाथों की परंपरा से 84 नाथ हुए। नौ नाथों के संबंध में विद्वानों में मतभेद हैं। सभी नाथ साधुओं का मुख्‍य स्थान हिमालय की गुफाओं में है। नागा बाबा, नाथ बाबा और सभी कमंडल, चिमटा धारण किए हुए जटाधारी बाबा शैव और शाक्त संप्रदाय के अनुयायी हैं, लेकिन गुरु दत्तात्रेय के काल में वैष्णव, शैव और शाक्त संप्रदाओं का समन्वय किया गया था। नाथ संप्रदाय की एक शाखा जैन धर्म में है तो दूसरी शाखा बौद्ध धर्म में भी मिल जाएगी। यदि गौर से देखा जाए तो इन्हीं के कारण इस्लाम में सूफीवाद की शुरुआत हुई।

सिद्धों की भोग-प्रधान योग-साधना की प्रतिक्रिया के रूप में आदिकाल में नाथपंथियों की हठयोग साधना आरम्भ हुई। इस पंथ को चलाने वाले मत्स्येन्द्रनाथ (मछंदरनाथ) तथा गोरखनाथ (गोरक्षनाथ) माने जाते हैं। इस पंथ के साधक लोगों को योगी, अवधूत, सिद्ध, औघड़ कहा जाता है। कहा यह भी जाता है कि सिद्धमत और नाथमत एक ही हैं। गुरु और शिष्य दोनों ही को 84 सिद्धों में प्रमुख माना जाता है। दोनों गुरु और शिष्य को तिब्बती बौद्ध धर्म में महासिद्धों के रुप में जाना जाता है।

नाथ परम्परा की शुरुआत बहुत प्राचीन रही है, किंतु गोरखनाथ से इस परम्परा को सुव्यवस्थित विस्तार मिला। गोरखनाथ ने इस सम्प्रदाय के बिखराव और इस सम्प्रदाय की योग विद्याओं का एकत्रीकरण किया। पूर्व में इस समप्रदाय का विस्तार असम और उसके आसपास के इलाकों में ही ज्यादा रहा, बाद में समूचे प्राचीन भारत में इनके योग मठ स्थापित हुए। आगे चलकर यह सम्प्रदाय भी कई भागों में विभक्त होता चला गया। गोरखनाथ से पहले अनेक सम्प्रदाय थे, जिनका नाथ सम्प्रदाय में विलय हो गया। शैव एवं शाक्तों के अतिरिक्त बौद्ध, जैन तथा वैष्णव योग मार्गी भी उनके सम्प्रदाय में आ मिले थे।

भारत के 84 सिद्धों की परंपरा में से एक थे गुरु गोरखनाथ जिनका नेपाल से घनिष्ठ संबंध रहा है। नेपाल नरेश महेन्द्रदेव उनके शिष्य हो गए थे। उस काल में नेपाल के एक समूचे क्षेत्र को ‘गोरखा राज्य’ इसलिए कहा जाता था कि गोरखनाथ वहां डेरा डाले हुए थे। वहीं की जनता आगे चलकर ‘गोरखा जाति’ की कहलाई। यहीं से गोरखनाथ के हजारों शिष्यों ने विश्वभर में घूम-घूमकर धूना स्थान निर्मित किए। इन्हीं शिष्यों से नाथों की अनेकानेक शाखाएं हो गईं।

नाथ संप्रदाय के प्रवर्तक गोरक्षनाथजी के बारे में लिखित उल्लेख हमारे पुराणों में भी मिलते हैं। विभिन्न पुराणों में इससे संबंधित कथाएं मिलती हैं। इसके साथ ही साथ बहुत-सी पारंपरिक कथाएं और किंवदंतियां भी समाज में प्रसारित हैं। उत्तरप्रदेश, उत्तरांचल, बंगाल, पश्चिमी भारत, सिन्ध तथा पंजाब में और भारत के बाहर नेपाल में भी ये कथाएं प्रचलित हैं। काबुल, गांधार, सिन्ध, बलोचिस्तान, कच्छ और अन्य देशों तथा प्रांतों में यहां तक कि मक्का-मदीना तक श्री गोरक्षनाथ ने दीक्षा दी थी और नाथ परंपरा को विस्तार दिया था।

गोरखनाथ का साहित्य : – गोरखनाथ नाथ साहित्य के आरम्भकर्ता माने जाते हैं।

गोरखपंथी साहित्य के अनुसार आदिनाथ स्वयं भगवान शिव को माना जाता है। शिव की परम्परा को सही रूप में आगे बढ़ाने वाले गुरु मत्स्येन्द्रनाथ हुए। ऐसा नाथ सम्प्रदाय में माना जाता है। गोरखनाथ ने अपनी रचनाओं तथा साधना में योग के अंग क्रिया-योग अर्थात तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणीधान को अधिक महत्व दिया है। इनके माध्‍यम से ही उन्होंने हठयोग का उपदेश दिया।

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बहुत सुन्दर कथा

एक महिला रोज मंदिर जाती थी ! एक दिन उस महिला ने पुजारी से कहा अब मैं मंदिर नही आया करूँगी !

इस पर पुजारी ने पूछा — क्यों ?

तब महिला बोली — मैं देखती हूँ लोग मंदिर परिसर में अपने फोन से अपने व्यापार की बात करते हैं ! कुछ ने तो मंदिर को ही गपशप करने का स्थान चुन रखा है ! कुछ पूजा कम पाखंड,दिखावा ज्यादा करते हैं !

इस पर पुजारी कुछ देर तक चुप रहे फिर कहा — सही है ! परंतु अपना अंतिम निर्णय लेने से पहले क्या आप मेरे कहने से कुछ कर सकती हैं !

महिला बोली आप बताइए क्या करना है ?

पुजारी ने कहा एक गिलास पानी भर लीजिए और 2 बार मंदिर परिसर के अंदर परिक्रमा लगाइए । शर्त ये है कि गिलास का पानी गिरना नहीं चाहिये !

महिला बोली – मैं ऐसा कर सकती हूँ !

फिर थोड़ी ही देर में उस महिला ने ऐसा ही कर दिखाया ! उसके बाद मंदिर के पुजारी ने महिला से 3 सवाल पूछे

1.क्या आपने किसी को फोन पर बात करते देखा?

2.क्या आपने किसी को मंदिर में गपशप करते देखा?

3.क्या किसी को पाखंड करते देखा?

महिला बोली – नहीं मैंने कुछ भी नहीं देखा !

फिर पुजारी बोले — जब आप परिक्रमा लगा रही थीं तो आपका पूरा ध्यान गिलास पर था कि इसमें से पानी न गिर जाए इसलिए आपको कुछ दिखाई नहीं दिया|

अब जब भी आप मंदिर आयें तो अपना ध्यान सिर्फ़ परम पिता परमात्मा में ही लगाना फिर आपको कुछ दिखाई नहीं देगा| सिर्फ भगवान ही सर्वत्र दिखाई देगें|

  '' जाकी रही भावना जैसी ..
    प्रभु मूरत देखी तिन तैसी|''

जीवन मे दुःखो के लिए कौन जिम्मेदार है ?

👉🏻ना भगवान,
👉🏻ना गृह-नक्षत्र,
👉🏻ना भाग्य,
👉🏻ना रिश्तेदार,
👉🏻ना पडोसी,
👉🏻ना सरकार,

जिम्मेदार आप स्वयं है|

1) आपका सरदर्द, फालतू विचार का परिणाम|

2) पेट दर्द, गलत खाने का परिणाम|

3) आपका कर्ज, जरूरत से ज्यादा खर्चे का परिणाम|

4) आपका दुर्बल /मोटा /बीमार शरीर, गलत जीवन शैली का परिणाम|

5) आपके कोर्ट केस, आप के अहंकार का परिणाम|

6) आपके फालतू विवाद, ज्यादा व् व्यर्थ बोलने का परिणाम|

        उपरोक्त कारणों के अलावा सैकड़ों कारण है और बेवजह दोषारोपण दूसरों पर करते रहते हैं | इसमें ईश्वर दोषी नहीं है|

अगर हम इन कष्टों के कारणों पर बारिकी से विचार करें तो पाएंगे की कहीं न कहीं हमारी मूर्खताएं ही इनके पीछे है

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द्रौपदी के स्वयंवर में जाते वक्त “श्री कृष्ण” ने अर्जुन को समझाते हुए कहते हैं कि,

हे पार्थ तराजू पर पैर संभलकर रखना,
संतुलन बराबर रखना, लक्ष्य मछली की आंख पर ही केंद्रित हो उसका खास खयाल रखना,

तो अर्जुन ने कहा, “हे प्रभु ” सबकुछ अगर मुझे ही करना है, तो फिर आप क्या करोगे, ???
वासुदेव हंसते हुए बोले, हे पार्थ जो आप से नहीं होगा वह में करुंगा,

पार्थ ने कहा प्रभु ऐसा क्या है जो मैं नहीं कर सकता, ???
वासुदेव फिर हंसे और बोले, जिस अस्थिर, विचलित, हिलते हुए पानी में तुम मछली का निशाना साधोगे , उस विचलित “पानी” को स्थिर “मैं” रखुंगा !!

कहने का तात्पर्य यह है कि आप चाहे कितने ही निपुण क्यूँ ना हो , कितने ही बुद्धिवान क्यूँ ना हो , कितने ही महान एवं विवेकपूर्ण क्यूँ ना हो , लेकिन आप स्वंय हरेक परिस्थिति के उपर पूर्ण नियंत्रण नहीँ रख सकते .. आप सिर्फ अपना प्रयास कर सकते हो , लेकिन उसकी भी एक सीमा है
और जो उस सीमा से आगे की बागडोर संभलता है उसी का नाम “विधाता” है … और उसी विधाता ने आपकी सारी जिम्मेदारियां ले रखी हैं , लेकिन आप हो कि सारी जिम्मेवारी खुद ही लिए फिरते हो ..

सारी दुनिया का बोझ आप अपने सर पे लिए फिरते हो तो इसमे किसी का क्या दोष ??

हमे सिर्फ अपना कार्य करते रहना चाहिए, भगवान क्या कर सकते हैं या क्या करेंगे, ये गहरा विषय है !

उस विधाता ने इतनी बड़ी दुनियाँ बनाई , विशाल समुद्र बनाया , उसमे रहने वाले विशालकाय जीवों के जीवन की डोर बनाई , उनके दाना पानी की व्यवस्था की , हजारों लाखों टन पानी को समुद्र से उठाकर हजारों मील दूर आवश्कता के स्थान पर बिना किसी साधन के बारिश के रूप में पहुँचाना , एक छोटे से बीज में वृक्ष का विस्तार भर देना , औऱ उसमे किस मौसम में पत्ते गिरेंगे किस मौसम में नये फल फूल आयेंगे ये सब कुछ उस नन्हे से बीज में प्रोग्रामिंग भर देना , उस विधाता ने चींटी से लेकर विशालकाय हाथी जैसे जीवों का दाना पानी उसके व्यवस्था के हिसाब से निर्माण किया है ,
उसमे विश्वास रखकर कर्म कर !

जो तुझे नहीँ दिख रहा है वो उसे दिख रहा है
जो कुछ तुझे मिल रहा है वो तेरे “भूतकाल” का फल है
औऱ भविष्य तेरे वर्तमान के कर्म के “बीज” पर टिका है !!
इसलिए परेशान हैरान मत हो , जो कुछ मिल रहा है वो तेरे द्वारा ही किया हुआ कर्म का फल है , औऱ उस विधि के विधान में सब नियत है !

यहाँ राजा औऱ रंक सब तेरे कर्मों का फल है , उसे किसी को राजा औऱ किसी को रंक बनाके कुछ नहीँ मिलेगा !!
वो सब तेरे द्वारा बोए गये बीजों का ही प्रत्यक्ष फल है !!
वो सदा परम है !!

वो तेरे साथ अन्याय नहीँ होने देगा विश्वास रख !!
वो शुभ कर्मों में तेरे साथ है , बल्कि वो चाहता है कि तू शुभ कर्म कर तो मैं तेरी हर दुविधा हर लूँ !!

समस्याएँ ना आये ऐसा तो नहीँ होगा लेकिन वो अदिर्ष्या रूप में शूली को काँटे के रूप में औऱ काँटे को रूई के रूप में बदल रहा है , वो नहीँ चाहता कि तुझे दुख दे , आखिर उसको क्या मिलेगा इससे ??

मन को थोड़ा स्थिर करके उसमे श्रध्दा रख …इधर उधर मत भटक .. इंसान औऱ उस विधाता में फर्क पहचान औऱ उसमे हेत लगा !!

अत उसमे पूर्ण विश्वास रख औऱ आगे क़दम बढ़ा….
!! एक संत ऐसा भी…, !

।। जय श्री कृष्णा ।।

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संजय गुप्ता

मित्रोआज मंगलवार है, पवनपुत्र हनुमानजी महाराज का दिन,आइये राम भक्त ‘हनुमान’ जी से सीखें जीवन प्रबंधन के ये 10 सूत्र!!!!!!

हनुमान जी को कलियुग में सबसे प्रमुख ‘देवता’ माना जाता है। रामायण के सुन्दर कांड और तुलसीदास की हनुमान चालीसा में बजरंगबली के चरित्र पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है। इसके अनुसार हनुमान जी का किरदार हर रूप में युवाओं के लिए प्रेरणादायक है।

हनुमान जी को कलियुग में सबसे असरदार भगवान माना गया है। हनुमान जी के बारे में तुलसीदास लिखते हैं ‘संकट कटे मिटे सब पीरा,जो सुमिरै हनुमत बल बीरा’। हमेशा अपने भक्तों को संकट से निवृत्त करने वाले हनुमान जी ‘स्किल्ड इंडिया’ के जमाने में युवाओं के परमप्रिय देवता होने के साथ ही उनके जीवन प्रबंधन गुरु की भी भूमिका निभाते हैं।

आज हम आपको ‘बजरंगबली’ के उन 10 गुणों के बारे में बताएंगे, जो न केवल आपको ‘उद्दात’ बनाएंगे, बल्कि आपके प्रोफ्रेशनल जीवन के लिए भी काफी प्रेरक साबित होंगे।

  1. संवाद कौशल : – सीता जी से हनुमान पहली बार रावण की ‘अशोक वाटिका’ में मिले, इस कारण सीता उन्हें नहीं पहचानती थीं। एक वानर से श्रीराम का समाचार सुन वे आशंकित भी हुईं, परन्तु हनुमान जी ने अपने ‘संवाद कौशल’ से उन्हें यह भरोसा दिला ही दिया की वे राम के ही दूत हैं। सुंदरकांड में इस प्रसंग को इस तरह व्यक्त किया गया हैः

कपि के वचन सप्रेम सुनि, उपजा मन बिस्वास।जाना मन क्रम बचन यह ,कृपासिंधु कर दास।

  1. विनम्रता : – समुद्र लांघते वक्त देवताओं ने ‘सुरसा’ को उनकी परीक्षा लेने के लिए भेजा। सुरसा ने मार्ग अवरुद्ध करने के लिए अपने शरीर का विस्तार करना शुरू कर दिया। प्रत्युत्तर में श्री हनुमान ने भी अपने आकार को उनका दोगुना कर दिया। “जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा, तासु दून कपि रूप देखावा।” इसके बाद उन्होंने स्वयं को लघु रूप में कर लिया, जिससे सुरसा प्रसन्न और संतुष्ट हो गईं। अर्थात केवल सामर्थ्य से ही जीत नहीं मिलती है, “विनम्रता” से समस्त कार्य सुगमतापूर्वक पूर्ण किए जा सकते हैं।
  2. आदर्शों से कोई समझौता नहीं : – लंका में रावण के उपवन में हनुमान जी और मेघनाथ के मध्य हुए युद्ध में मेघनाथ ने ‘ब्रह्मास्त्र’ का प्रयोग किया। हनुमान जी चाहते, तो वे इसका तोड़ निकाल सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया, क्योंकि वह उसका महत्व कम नहीं करना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने ब्रह्मास्त्र का तीव्र आघात सह लिया। हालांकि, यह प्राणघातक भी हो सकता था। यहां गुरु हनुमान हमें सिखाते हैं कि अपने उसूलों से कभी समझौता नहीं करना चाहिए । तुलसीदास जी ने हनुमानजी की मानसिकता का सूक्ष्म चित्रण इस पर किया हैः

ब्रह्मा अस्त्र तेंहि साँधा, कपि मन कीन्ह विचार।जौ न ब्रहासर मानऊँ, महिमा मिटाई अपार।

  1. बहुमुखी भूमिका में हनुमान : – हम अक्सर अपनी शक्ति और ज्ञान का प्रदर्शन करते रहते हैं, कई बार तो वहां भी जहां उसकी आवश्यकता भी नहीं होती। तुलसीदास जी हनुमान चालीसा में लिखते हैंः “सूक्ष्म रूप धरी सियंहि दिखावा, विकट रूप धरी लंक जरावा।

सीता के सामने उन्होंने खुद को लघु रूप में रखा, क्योंकि यहां वह पुत्र की भूमिका में थे, परन्तु संहारक के रूप में वे राक्षसों के लिए काल बन गए। एक ही स्थान पर अपनी शक्ति का दो अलग-अलग तरीके से प्रयोग करना हनुमान जी से सीखा जा सकता है।

  1. समस्या नहीं समाधान स्वरूप : – जिस वक़्त लक्ष्मण रण भूमि में मूर्छित हो गए, उनके प्राणों की रक्षा के लिए वे पूरे पहाड़ उठा लाए, क्योंकि वे संजीवनी बूटी नहीं पहचानते थे। हनुमान जी यहां हमें सिखाते हैं कि मनुष्य को शंका स्वरूप नहीं, वरन समाधान स्वरूप होना चाहिए।
  • भावनाओं का संतुलन : – लंका के दहन के पश्चात् जब वह दोबारा सीता जी का आशीष लेने पहुंचे, तो उन्होंने सीता जी से कहा कि वह चाहें तो उन्हें अभी ले चल सकते हैं, पर “मै रावण की तरह चोरी से नहीं ले जाऊंगा। रावण का वध करने के पश्चात ही यहां से प्रभु श्रीराम आदर सहित आपको ले जाएंगे।” रामभक्त हनुमान अपनी भावनाओं का संतुलन करना जानते थे, इसलिए उन्होंने सीता माता को उचित समय (एक महीने के भीतर) पर आकर ससम्मान वापिस ले जाने को आश्वस्त किया।

  • आत्ममुग्धता से कोसों दूर : – सीता जी का समाचार लेकर सकुशल वापस पहुंचे श्री हनुमान की हर तरफ प्रशंसा हुई, लेकिन उन्होंने अपने पराक्रम का कोई किस्सा प्रभु राम को नहीं सुनाया। यह हनुमान जी का बड़प्पन था,जिसमे वह अपने बल का सारा श्रेय प्रभु राम के आशीर्वाद को दे रहे थे। प्रभू श्रीराम के लंका यात्रा वृत्तांत पूछने पर हनुमान जी जो कहा उससे भगवान राम भी हनुमान जी के आत्ममुग्धताविहीन व्यक्तित्व के कायल हो गए।

  • “ता कहूं प्रभु कछु अगम नहीं, जा पर तुम्ह अनुकूल । तव प्रभाव बड़वानलहि ,जारि सकइ खलु तूल ।।

    1. नेतृत्व क्षमता : – समुद्र में पुल बनाते वक़्त अपेक्षित कमजोर और उच्चश्रृंखल वानर सेना से भी कार्य निकलवाना उनकी विशिष्ठ संगठनात्मक योग्यता का परिचायक है। राम-रावण युद्ध के समय उन्होंने पूरी वानरसेना का नेतृत्व संचालन प्रखरता से किया।
  • बौद्धिक कुशलता और वफादारी : – सुग्रीव और बाली के परस्पर संघर्ष के वक़्त प्रभु राम को बाली के वध के लिए राजी करना, क्योंकि एक सुग्रीव ही प्रभु राम की मदद कर सकते थे। इस तरह हनुमान जी ने सुग्रीव और प्रभू श्रीराम दोनों के कार्यों को अपने बुद्धि कौशल और चतुराई से सुगम बना दिया। यहां हनुमान जी की मित्र के प्रति ‘वफादारी’ और ‘आदर्श स्वामीभक्ति’ तारीफ के काबिल है।

  • समर्पण : – हनुमान जी एक आदर्श ब्रह्चारी थे। उनके ब्रह्मचर्य के समक्ष कामदेव भी नतमस्तक थे। यह सत्य है कि श्री हनुमान विवाहित थे, परन्तु उन्होंने यह विवाह एक विद्या की अनिवार्य शर्त को पूरा करने के लिए अपने गुरु भगवान् सूर्यदेव के आदेश पर किया था। श्री हनुमान के व्यक्तित्व का यह आयाम हमें ज्ञान के प्रति ‘समर्पण’ की शिक्षा देता है। इसी के बलबूते हनुमान जी ने अष्ट सिद्धियों और सभी नौ निधियों की प्राप्ति की।

  • बड़ी विडंबना है कि दुनिया की सबसे बड़ी युवा शक्ति भारत के पास होने के बावजूद उचित जीवन प्रबंधन न होने के कारण हम युवाओं की क्षमता का समुचित दोहन नहीं कर पा रहे हैं। युवाओं के बीच खासे लोकप्रिय श्री हनुमान निश्चित रूप से युवाओं के लिए सबसे बड़े आदर्श हैं, क्योंकि हनुमान जी का चरित्र अतुलित पराक्रम, ज्ञान और शक्ति के बाद भी अहंकार से विहीन था।

    आज हमें हनुमान जी की पूजा से अधिक उनके चरित्र को पूजकर उसे आत्मसात करने की आवश्यकता है, जिससे हम भारत को राष्ट्रवाद सरीखे उच्चतम नैतिक मूल्यों के साथ ‘कौशल युक्त’ भी बना सकें।