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A son is a son until he gets a wife; a daughter is a daughter all her life…..

वैसे मैं इस कथन पर विश्वास नहीं करता। ऐसे असंख्य सुपुत्रों से मिला हूँ जो हरदम हर पल अपने माता पिता पर जान छिड़कते हैं।

फिर भी व्यक्तिगत रूप से मेरा मानना है के जो प्यार और सम्मान अपने पिता के लिये बेटियों के हृदय में होता है वह अतुलनीय है।
पिता की जान भी बेटियों में ऐसी बसी होती है के जिसका वर्णन शब्दों में करना कठिन है।

तस्वीर चीन की निवासी 6 वर्षिय जिया की है।
जिया के पिता टीआन एक टैक्सी ड्राइवर थे । बचपन से पिता की लाडली रही जिया का पिता से प्रेम इतना था के टीआन के वापिस आने तक जिया भोजन भी नहीं करती थी।

अचानक एक दिन ऐसा हादसा हुआ जिसने टीआन और उसके परिवार की नींव हिला कर रख दी। टैक्सी ड्राइवर टीआन का बीजिंग के समीप एक जानलेवा एक्सीडेंट हुआ। टीआन की जान तो बच गयी पर छाती से निचले हिस्से को लकवा मार गया। टीआन पैरलाइज़्ड हो गये।

वह हाथ जो किसी समय जिया को अपने हाथों में खिलाते थे अब उठने लायक भी नहीं बचे थे। शरीर एक ज़िंदा लाश बन कर रह गया।

आर्थिक स्थिति गड़बड़ाने लगी और फिर टीआन के जीवन में ऐसा दुःखद दिन आया जिसकी शायद उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी। टीआन के पत्नी ने अपंग पति के साथ रहने से इनकार कर दिया। वह बच्चों का सामान बांध कर घर से जाने लगी।

एक पत्नी ने मुश्किल के इस दौर में पति का साथ छोड़ दिया था पर इस कठिन दौर में भी पिता की लाडली ने पिता को इस हाल में छोड़ने से इनकार कर दिया।

केवल 5 वर्षीय जिया ने अपनी माँ से कहा के अगर वह घर छोड़ कर जाना चाहती है तो जाये पर वह अपने पिता को छोड़ कर नहीं जायेगी। टीआन अंतर्मन में टूट चुके थे। वह खुद की देखभाल करने लायक नहीं थे तो जिया की देखरेख कैसे करते।
ना जाने कैसे दिल पर पत्थर रख कर एक अपंग पिता ने अपनी बिटिया को अपनी मां के साथ जाने को कहा।

परन्तु प्यार हालात नहीं देखता। बिटिया का पिता से लगाव ऐसा था के उसने साफ शब्दों मे माँ के साथ जाने आए इनकार कर दिया।

अब घर में जिया के वृद्ध दादा दादी थे और अपंग पिता थे।

हालात हर इंसान को परिवर्तित कर देते हैं परन्तु एक 6 साल की बच्ची से परिवर्तन की आशा रखना उचित नहीं था। परन्तु जिया में कुछ ऐसे परिवर्तन देखने को मिले जिसने अचंभित कर दिया।

जिया नियमानुसार सुबह जल्दी उठने लगी। उठने के पश्चात वह अपने पिता को उठाती है और उनकी मालिश करती है। फिर अपनी दादी द्वारा बनाया हुआ भोजन अपने हाथों से अपने पिता को खिलाती है।

जिया स्कूल जाती है तो टीआन के माता पिता उसका ख्याल रखते हैं। स्कूल के आने के पश्चात जिया पुनः पिता के साथ रहती है।
एक 6 साल की बिटिया अब अपने दोस्तों के साथ खेलने भी नहीं जाती। हर वक्त हर दम हर ज़रुरत में वह अपने पिता के साथ है।

एक समय था जब लकवाग्रस्त टीआन ने अपना जीवन समाप्त करने का निर्णय ले लिया था। परंतु अब टीआन में पुनः जिजीविषा जाग उठी है। वह इस बदलाव का कारण अपनी बिटिया को बताते हैं।

अपने पिता की सेवा करती इस नन्ही सी बच्ची की तस्वीर जब सोशल मीडिया में वायरल हुई तो लाखों लोगों के नेत्र अश्रुपूर्ण हो गये। एक न्यूज़ चैनल ने जब बिटिया से पूछा के उसे माँ की याद नहीं आती तो उसने जवाब दिया ” नहीं । उन्होंने मेरे डैड को छोड़ दिया था। ”

कहते हैं वक्त और हालात इंसान को बदल देते हैं। परन्तु वक्त हालात और परिस्थितियों से बढ़ कर भी एक ताकत है तो हर व्यक्ति में बदलाव का स्त्रोत बनती है।

वह “प्यार” की ताकत है।

【रचित】

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अच्छे दिन कब आयेंगे ??????????

बन्दरों का एक समूह था, जो फलो के बगिचों मे फल तोड़ कर खाया करते थे। माली की मार और डन्डे भी खाते थे, रोज पिटते थे ।

उनका एक सरदार भी था जो सभी बंदरो से ज्यादा समझदार था। एक दिन बन्दरों के कर्मठ और जुझारू सरदार ने सब बन्दरों से विचार-विमर्श कर निश्चय किया कि रोज माली के डन्डे खाने से बेहतर है कि यदि हम अपना फलों का बगीचा लगा लें तो इतने फल मिलेंगे की हर एक के हिस्से मे 15-15 फल आ सकते है, हमे फल खाने मे कोई रोक टोक भी नहीं होगी और हमारे अच्छे दिन आ जाएंगे

सभी बन्दरों को यह प्रस्ताव बहुत पसन्द आया । जोर शोर से गड्ढे खोद कर फलो के बीज बो दिये गये ।

पूरी रात बन्दरों ने बेसब्री से इन्तज़ार किया और सुबह देखा तो फलो के पौधे भी नहीं आये थे ! जिसे देखकर बंदर भड़क गए और सरदार को गरियाने लगे और नारे लगाने लगे, “कहा है हमारे 15-15 फल”, “क्या यही अच्छे दिन है?”। सरदार ने इनकी मुर्खता पर अपना सिर पिट लिया और हाथ जोड़कर प्रार्थना करते हुए बोला, “भाईयो और बहनो, अभी तो हमने बीज बोया है, मुझे थोड़ा समय और दे दो, फल आने मे थोड़ा समय लगता है।” इस बार तो बंदर मान गए।

दो चार दिन बन्दरों ने और इन्तज़ार किया, परन्तु पौधे नहीं आये, अब मुर्ख बन्दरों से नही रहा गया तो उन्होंने मिट्टी हटाई – देखा फलो के बीज जैसे के तैसे मिले ।
बन्दरों ने कहा – सरदार फेकु है, झूठ बोलते हैं । हमारे कभी अच्छे दिन नही आने वाले । हमारी किस्मत में तो माली के डन्डे ही लिखे हैं और बन्दरों ने सभी गड्ढे खोद कर फलो के बीज निकाल निकाल कर फेंक दिये । पुन: अपने भोजन के लिये माली की मार और डन्डे खाने लगे ।

  • जरा सोचना कहीं आप बन्दरों वाली हरकत तो नहीं कर रहे हो?

60 वर्ष…….4 वर्ष

एक परिपक्व समाज का उदाहरण पेश करिये बन्दरों जैसी हरकत मत करिये…
देश धीरे धीरे बदल रहा है नई नई ऊंचाइयां छू रहा है, जो भी जोखिम भरे कदम बहुत पहले ले लेने चाहिए थे, वह अब लिये जा रहे हें आवश्यकता है तो सिर्फ और सिर्फ साथ की क्योंकि बहुत बड़े बड़े काम होने अभी बांकी हैं, धीरज रखिए ।

वन्देमातरम । जय हिंद ..

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सोलह सोमवार व्रत महात्म्य
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सोमवार का व्रत श्रावण, चैत्र, वैसाख, कार्तिक और माघ महीने के शुक्ल पक्ष के पहले सोमवार से शुरू किया जाता है।

कहते हैं इस व्रत को 16 सोमवार तक श्रद्धापूर्वक करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। आइए जानें सोलह सोमवार की व्रत कथा-

एक समय की बात है पार्वती जी के साथ भगवान शिव भ्रमण करते हुए धरती पर अमरावती नगरी में आए, वहां के राजा ने शिवजी का एक मंदिर बनवाया था। शंकर जी वहीं ठहर गए। एक दिन पार्वती जी शिवजी से बोली- नाथ!

आइए आज चौसर खेलें।खेल शुरू हुआ, उसी समय पुजारी पूजा करने को आए। पार्वती जी ने पूछा- पुजारी जी! बताइए जीत किसकी होगी?

वह बोले शंकर जी की, पर अंत में जीत पार्वती जी की हुई। पार्वती ने झूठी भविष्यवाणि के कारण पुजारी जी को कोढ़ी होने का श्राप दे दिया, और वह कोढ़ी हो गए। कुछ समय के बाद उसी मंदिर में स्वर्ग से अप्सराएं पूजा करने के लिए आईं और पुजारी को देखकर उनसे कोढ़ी होने का कारण पूछा।

उनके प्रश्नों का उत्तर देते हुए पुजारी जी ने सारी बात बताई। तब अप्सराओं ने उन्हें सोलह सोमवार के व्रत के बारे में बताते हुए और महादेव से अपने कष्ट हरने के लिए प्रार्थना करने को कहा। पुजारी जी ने उत्सुकता से व्रत की विधि पूछी।

अप्सरा बोली- बिना अन्न व जल ग्रहण किए सोमवार को व्रत करें, और शाम की पूजा करने के बाद आधा सेर गेहूं के आटे का चूरमा तथा मिट्‌टी की तीन मूर्ति बनाएं और चंदन, चावल, घी, गुड़, दीप, बेलपत्र आदि से भोले बाबा की उपासना कर।

बाद में चूरमा भगवान शंकर को चढ़ाएं और फिर इस प्रसाद को 3 हिस्सों में बांटकर एक हिस्सा लोगों में बांटे, दूसरा गाए को खिलाएं और तीसरा हिस्सा स्वयं खाकर पानी पिएं।

इस विधि से सोलह सोमवार करें और सत्रहवें सोमवार को पांच सेर गेहूं के आटे की बाटी का चूरमा बनाकर भोग लगाकर बांट दें। फिर परिवार के साथ प्रसाद ग्रहण करें। ऐसा करने से शिवजी तुम्हारे मनोरथ पूर्ण करेंगे। यह कहकर अप्सरा स्वर्ग को चली गईं।

पुजारी जी यथाविधि व्रत कर पूजन करने लगे और रोग मुक्त हुए। कुछ दिन बाद शिव-पार्वती दोबारा उस मंदिर में आए। पुजारी जी को कुशल पूर्वक देख पार्वती ने उनसे रोग मुक्त होने का कारण पूछा।

तब पुजारी ने उनसे सोलाह सोमवार की महिमा का वर्णन किया। जिसके बाद माता पार्वती ने भी यह व्रत किया और फलस्वरूप रूठे हुए कार्तिकेय जी मां के आज्ञाकारी हुए।

इस पर कार्तिकेय जी ने भी मां गौरी से पूछा कि क्या कारण है कि मेरा मन आपके चरणों में लगा? जिस पर उन्होंने अपने व्रत के बारे में बतलाया.

तब गौरीपुत्र ने भी व्रत किया, जिसके फलस्वरूप उन्हें अपना बिछड़ा हुआ मित्र मिला।

मित्र ने भी अचानक मिलने का कारण पूछा और फिर व्रत की विधि जानकर उसने भी विवाह की इच्छा से सोलाह सोमवार का व्रत किया।

व्रत के फलस्वरूप वह विदेश गया, वहां राजा की कन्या का स्वयंवर था।

उस राजा का प्रण था कि हथिनी जिसको माला पहनाएगी उसी के साथ पुत्री का विवाह होगा।

वह ब्रह्माण भी स्वयंवर देखने की इच्छा से एक ओर जा बैठा। हथिनी ने माला उस ब्रह्माण कुमार को पहनाई। धूमधाम से विवाह हुआ तत्पश्चात दोनों सुख से रहने लगे।

इसी प्रकार जो मनुष्य भक्ति से विधिपूर्वक सोलह सोमवार व्रत करता है और कथा सुनता है उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और अंत में वह शिवलोक को प्राप्त होता है।
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देवराज इंद्र और धर्मात्मा तोते की यह कथा महाभारत से है। कहानी कहती है, अगर किसी के साथ ने अच्छा वक्त दिखाया है तो बुरे वक्त में उसका साथ छोड़ देना ठीक नहीं। एक शिकारी ने शिकार पर तीर चलाया। तीर पर सबसे खतरनाक जहर लगा हुआ था। पर निशाना चूक गया। तीर हिरण की जगह एक फले-फूले पेड़ में जा लगा। पेड़ में जहर फैला। वह सूखने लगा। उस पर रहने वाले सभी पक्षी एक-एक कर उसे छोड़ गए। पेड़ के कोटर में एक धर्मात्मा तोता बहुत बरसों से रहा करता था। तोता पेड़ छोड़ कर नहीं गया, बल्कि अब तो वह ज्यादातर समय पेड़ पर ही रहता। दाना-पानी न मिलने से तोता भी सूख कर कांटा हुआ जा रहा था। बात देवराज इंद्र तक पहुंची। मरते वृक्ष के लिए अपने प्राण दे रहे तोते को देखने के लिए इंद्र स्वयं वहां आए।
धर्मात्मा तोते ने उन्हें पहली नजर में ही पहचान लिया। इंद्र ने कहा, ‘देखो भाई इस पेड़ पर न पत्ते हैं, न फूल, न फल। अब इसके दोबारा हरे होने की कौन कहे, बचने की भी कोई उम्मीद नहीं है। जंगल में कई ऐसे पेड़ हैं, जिनके बड़े-बड़े कोटर पत्तों से ढके हैं। पेड़ फल-फूल से भी लदे हैं। वहां से सरोवर भी पास है। तुम इस पेड़ पर क्या कर रहे हो, वहां क्यों नहीं चले जाते?’ तोते ने जवाब दिया, ‘देवराज, मैं इसी पर जन्मा, इसी पर बढ़ा, इसके मीठे फल खाए। इसने मुझे दुश्मनों से कई बार बचाया। इसके साथ मैंने सुख भोगे हैं। आज इस पर बुरा वक्त आया तो मैं अपने सुख के लिए इसे त्याग दूं? जिसके साथ सुख भोगे, दुख भी उसके साथ भोगूंगा, मुझे इसमें आनंद है। आप देवता होकर भी मुझे ऐसी बुरी सलाह क्यों दे रहे हैं?’ यह कह कर तोते ने तो जैसे इंद्र की बोलती ही बंद कर दी। तोते की दो-टूक सुन कर इंद्र प्रसन्न हुए, बोल, ‘मैं तुमसे प्रसन्न हूं, कोई वर मांग लो।’ तोता बोला, ‘मेरे इस प्यारे पेड़ को पहले की तरह ही हरा-भरा कर दीजिए।’ देवराज ने पेड़ को न सिर्फ अमृत से सींच दिया, बल्कि उस पर अमृत बरसाया भी। पेड़ में नई कोंपलें फूटीं। वह पहले की तरह हरा हो गया, उसमें खूब फल भी लग गए। तोता उस पर बहुत दिनों तक रहा, मरने के बाद देवलोक को चला गया। युधिष्ठिर को यह कथा सुना कर भीष्म बोले, ‘अपने आश्रयदाता के दुख को जो अपना दुख समझता है, उसके कष्ट मिटाने स्वयं ईश्वर आते हैं। बुरे वक्त में व्यक्ति भावनात्मक रूप से कमजोर हो जाता है। जो उस समय उसका साथ देता है, उसके लिए वह अपने प्राणों की बाजी लगा देता है। किसी के सुख के साथी बनो न बनो, दुख के साथी जरूर बनो। यही धर्मनीति है और कूटनीति भी।’

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समोसे वाला

ट्रेन छूटने ही वाली थी कि एक समोसे वाला अपनी ख़ाली टोकरी के साथ ट्रेन में चढ़ा और मेरी बग़ल वाली सीट पर आ कर बैठा गया।

चूँकि उस दिन भीड़ कम थी और मेरा स्टेशन अभी दूर था, तो मैंने उस समोसे वाले से बातचीत करनी शुरु की।

मैं– लग रहा है, सारे समोसे बेच आये हो!

समोसे वाला (मुस्कुरा कर)- हाँ, भगवान की कृपा है कि आज पूरे समोसे बिक गये हैं!

मैं– मुझे आप लोगों पर दया आती है। दिन भर यही काम करते हुये, कितना थक जाते होगे, आप लोग!

समोसे वाला– अब हम लोग भी क्या करें, सर? रोज़ इन्हीं समोसे को बेचकर ही तो १ रुपया प्रति समोसा कमीशन मिल पाता है।

मैं– ओह! तो ये बात है। वैसे कितने समोसे बेच लेते हो, दिन-भर में…लगभग?

समोसे वाला– शनिवार-इतवार को तो ४००० से ५००० समोसे बिक जाते हैं। वैसे औसतन ३००० समोसे प्रतिदिन ही समझो।

मेरे पास तो बोलने के लिये शब्द ही नहीं बचे थे! ये आदमी १ रुपया प्रति समोसा की दर से ३,००० हजार समोसे बेचकर रोज़ ३,००० रु यानी महीने में ९०,००० रुपये कमा रहा था! ओह माई गॉड!

मैं और भी बारीकी से बात करने लगा, अब ‘टाईम-पास’ करने वाली बात नहीं रह गई थी।

मैं– तो ये समोसे तुम खुद नहीं बनाते?

समोसे वाला– नहीं सर, वो हम लोग एक दूसरे समोसा बनाने वाले से लेकर आते हैं, वो हम लोगों को समोसा देता है, हम लोग उसे बेचकर पूरा पैसा वापस दे देते हैं, फिर वो १ रुपया प्रति समोसा की दर से हम लोगों का हिसाब कर देता है!

मेरे पास तो बोलने को एक शब्द भी नहीं बचा था, पर समोसे वाला बोले जा रहा था…

“पर एक बात है सा’ब, हम लोगों की कमाई का एक बड़ा हिस्सा हम लोगों के मुंबई में रहने पर ही ख़र्च हो जाता है! उसके बाद जो बचता है सिर्फ उसी से ही दूसरा धंधा कर पाते हैं।”

मैं– ‘दूसरा धंधा?’ अब ये कौन सा धंधा है?

समोसे वाला– ये ज़मीन का धंधा है, सा’ब! मैंने सन् २००७ में डेढ़ एकड़ ज़मीन ख़रीदी थी – १० लाख रुपयों में। इसे मैंने कुछ महीने पहले 8 करोड़ रुपयों में बेची है। उसके बाद मैंने अभी-अभी उमराली में 4 करोड़ की नई ज़मीन ख़रीदी है।

मैं– और बाकी बचे हुये पैसों का क्या किया?

समोसे वाला– बाकी बचे पैसों में से 90 लाख रुपये तो मैंने अपनी बिटिया की शादी के लिये अलग रख दिये हैं। बचे रुपये 90लाख को मैंने बैंक, पोस्ट ऑफ़िस, म्युचुअल फ़ण्ड, सोना और कैश-बैक बीमा पॉलिसी में लगा दिया है।

मैं– कितना पढ़े हो तुम?

समोसे वाला– मैं तो सिर्फ तीसरी तक ही पढ़ा हूँ! चौथी में अपनी पढ़ाई छोड़ दी थी। पर मैं पढ़ और लिख लेता हूँ।

खार स्टेशन आते ही वो समोसे वाला खड़ा हो गया।

समोसे वाला– सर, मेरा स्टेशन आ गया है। चलता हूँ, नमस्कार!

मैं– नमस्कार, अपना ख़्याल रखना!

मेरी खोपड़ी में बहुत सारे सवाल घूम रहे थे!

– क्या समोसे बनाने वाला जी एस टी देता है? ट्रेन्स में उसके १० समोसा बेचने वाले थे।

क्या मैं बेवक़ूफ़ हूँ, जो आधार कार्ड और पैन कार्ड को बैंक के खातों से जुड़वाता फिर रहा हूँ? और अपनी तनख़्वाह से टीडीएस भी कटवा कर इंकम टैक्स भर रहा हूँ? फिर अपनी कार, मकान, बाइक के लिये लोन ले रहा हूँ? टीवी और एप्पल फ़ोन को किश्तों में ख़रीद रहा हूँ? मेरी सारी पढ़ाई-लिखाई इन समोसे बनाने और बेचने वालों के सामने तो कुछ भी नहीं है!

तो असली भारत में आपका स्वागत है! 🙃🙃👆👆🙏सोचते रहो।😇

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. 🌹||हरि ॐ||🌹

कैसे बने ध्रुव, ध्रुव तारा

स्वयंभुव मनु और शतरुपा के दो पुत्र थे – प्रियवत और उत्तानपाद। उत्तानपाद की सुनीति और सुरुचि नामक दो पत्नियां थीं। राजा उत्तानपाद को सुनीति से ध्रुव और सुरुचि से दो पुत्र उत्पन्न हुए।

यद्यपि सुनीति बड़ी रानी थी परन्तु उत्तानपाद का प्रेम सुरुचि के प्रति अधिक था। एक बार सुनीति का पुत्र ध्रुव अपने पिता की गोद में बैठा खेल रहा था। इतने में सुरुचि वहां आ पहुंची।

ध्रुव को उत्तानपाद की गोद में खेलते देख उसका पारा सातवें आसमान पर जा पहुंचा। सौतन के पुत्र को अपने पति की गोद में वह बर्दाश्त न कर सकी। उसका मन ईर्ष्या से जल उठा।

उसने झपट कर बालक ध्रुव को राजा की गोद से खींच लिया और अपने पुत्र को उनकी गोद में बिठा दिया तथा बालक ध्रुव से बोली, “अरे मूर्ख! राजा की गोद में वही बालक बैठ सकता है जो मेरी कोख से उत्पन्न हुआ हो।
तू मेरी कोख से उत्पन्न नहीं हुआ है। इसलिए तुझे इनकी गोद में या राजसिंहासन पर बैठने का कोई अधिकार नहीं है।”

पांच वर्ष के ध्रुव को अपनी सौतेली माँ के व्यवहार पर क्रोध आया।

वह भागते हुए अपनी मां सुनीति के पास आए तथा सारी बात बताई। सुनीति बोली, “बेटा! तेरी सौतेली माता सुरुचि से अधिक प्रेम के कारण तुम्हारे पिता हम लोगों से दूर हो गए हैं।
तुम भगवान को अपना सहारा बनाओ।”

माता के वचन सुनकर ध्रुव को कुछ ज्ञान उत्पन्न हुआ और वह भगवान की भक्ति करने के लिए पिता के घर को छोड़ कर चल पड़े। मार्ग में उनकी भेंट देवार्षि नारद से हुई। देवार्षि ने बालक ध्रुव को समझाया, किन्तु ध्रुव नहीं माने।

नारद ने उसके दृढ़ संकल्प को देखते हुए ध्रुव को मंत्र की दीक्षा दी। इसके बाद देवार्षि राजा उत्तानपाद के पास गए।

राजा उत्तानपाद को ध्रुव के चले जाने से बड़ा पछतावा हो रहा था। देवार्षि नारद को वहां पाकर उन्होंने उनका सत्कार किया।

देवार्षि ने राजा को ढाढ़स बँधाया कि भगवान उनके रक्षक हैं। भविष्य में वह अपने यश को सम्पूर्ण पृथ्वी पर फैलाएँगे।

उनके प्रभाव से आपकी कीर्ति इस संसार में फैलेगी।

नारद जी के इन शब्दों से राजा उत्तानपाद को कुछ तसल्ली हुई।

उधर बालक ध्रुव यमुना के तट पर जा पहुंचे तथा महर्षि नारद से मिले मंत्र से भगवान नारायण की तपस्या आरम्भ कर दी। तपस्या करते हुए ध्रुव को अनेक प्रकार की समस्याएँ आईं परन्तु वह अपने संकल्प पर अडिग रहे। उनका मनोबल विचलित नहीं हुआ।

उनके तप का तेज तीनों लोकों में फैलने लगा। “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” की ध्वनि वैकुंठ में भी गूँज उठी।

तब भगवान नारायण भी योग निद्रा से उठ बैठे। ध्रुव को इस अवस्था में तप करते देख नारायण प्रसन्न हो गए तथा उन्हें दर्शन देने के लिए प्रकट हुए।

नारायण बोले, “हे राजकुमार! तुम्हारी समस्त इच्छाएँ पूर्ण होंगी। तुम्हारी भक्ति से प्रसन्न होकर मैं तुम्हें वह लोक प्रदान कर रहा हूं, जिसके चारों ओर ज्योतिष चक्र घूमता है तथा जिसके आधार पर सब ग्रह नक्षत्र घूमते हैं।

प्रलयकाल में भी जिसका कभी नाश नहीं होता। सप्तऋषि भी नक्षत्रों के साथ जिस की प्रदक्षिणा करते हैं।

तुम्हारे नाम पर वह लोक ध्रुव लोक कहलाएगा।

इस लोक में छत्तीस सहस्र वर्ष तक तुम पृथ्वी पर शासन करोगे। समस्त प्रकार के सर्वोत्तम ऐश्वर्य भोग कर अंत समय में तुम मेरे लोक को प्राप्त करोगे।”

बालक ध्रुव को ऐसा वरदान देकर नारायण अपने लोक लौट गए।

नारायण के वरदान स्वरूप ध्रुव समय पाकर ध्रुव तारा बन गए।

🌹ॐ नमो भगवते वासुदेवाय🌹

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एक पढ़ने योग्य कहानी!
अवश्य पढ़ें……
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एक छोटे व्यापारी ने साहूकार से उधार में रुपए लिए किंतु निर्धारित समय पर लौटा नहीं पाया। साहूकार बूढा और बदसूरत था लेकिन उस व्यापारी की खूबसूरत, जवान बेटी पर निगाह रखता था।
साहूकार ने व्यापारी से कहा कि, अगर वो अपनी बेटी का विवाह उससे कर दे तो वह उधार की रकम ब्याज सहित भूल जाएगा।

व्यापारी और उसकी बेटी, साहूकार के इस सौदे से परेशान हो उठे।

साहूकार, व्यापारी से बोला, ” मैं एक खाली थैली में एक सफ़ेद और एक काला कंकड़ रखता हूँ। तुम्हारी बेटी बिना देखे थैली से एक कंकड़ बाहर निकालेगी। अगर उसने काला कंकड़ निकाला तो उसे मुझसे विवाह करना होगा और तुम्हारा सारा कर्ज माफ कर दिया जाएगा।
अगर उसने सफ़ेद कंकड़ निकाला तो, उसे मुझसे शादी नहीं करनी पड़ेगी और तुम्हारा कर्ज भी माफ़ कर दिया जाएगा।
लेकिन अगर तुम्हारी बेटी थैली से कंकड़ निकालने से इन्कार करेगी तो मैं तुम्हें जेल भिजवा दूँगा। “

इस समय साहूकार, व्यापारी और उसकी बेटी, व्यापारी के बगीचे के उस रास्ते पर खड़े थे जिसपर सफ़ेद और काली मिक्स बजरी बिछी हुई थी।
फिर सौदे के अनुसार साहूकार ने झुककर उस बिछी हुई बजरी में से दो कंकड़ उठाए और अपने हाँथ में पकड़ी हुई खाली थैली में उन्हें डाल दिया।
साहूकार जब कंकड़ उठा रहा था तब, बेटी ने अपनी तीखी नजरों से ये देख लिया कि, बेईमान साहूकार ने बजरी में से दोनों कंकड़ काले रंग के ही उठाए और थैली में डाले हैं।
फिर साहूकार ने लड़की से कहा कि, वो थैली में से एक कंकड़ निकाले।

तो, अगर आप उस लड़की की जगह होते तो, आप क्या करते ???
या अगर आप से कहा जाता कि, आप उस लड़की को सही सलाह दीजिए तो आप क्या सलाह देते ??

ध्यान से देखा जाए तो तीन संभावनाएँ हैं :
1. लड़की कंकड़ निकालने से इन्कार कर देगी।
2. लड़की बोल देगी कि, साहूकार ने बेईमानी की है और दोनों काले कंकड़ ही थैली में डाले हैं।
3. लड़की एक काला कंकड़ निकाल कर अपनी जिंदगी से समझौता कर लेगी और अपने पिता को कर्ज और जेल से बचाएगी।

इस कहानी में अच्छा-बुरा, दिल-दिमाग, होनी-अनहोनी की अजीबोगरीब जंग है।

फाइनली, लड़की ने थैली में अपना हाँथ डाला और एक कंकड़ निकाला।फिर बिना देखे उसे नीचे पड़ी हुई बजरी में फेंक दिया। थैली से निकला कंकड़ काली सफ़ेद बजरी में मिलकर खो गया, यानी पहचानना असंभव कि, लड़की ने कौनसा कंकड़ फेंका।
फिर लड़की बोली— ” ओह, सॉरी! मैं भी कितनी बेवकूफ हूँ , बिना देखे ही कंकड़ फेंक दिया। चलो कोई बात नहीं, अभी एक कंकड़ तो थैली में है ना। उसे देखकर आप बता सकते हैं कि, मैंने किस रंग का कंकड़ थैली से निकाला था। अगर उसमे काला कंकड़ शेष है तो इसका मतलब मैंने सफ़ेद कंकड़ थैली में से निकाला था। “

साहूकार अपनी चीटिंग के कारण जानता था कि, थैली में तो काला कंकड़ ही है, लेकिन अपनी बेईमानी वो कबूल कर नहीं सकता था। इस हिसाब से लड़की ने सफ़ेद कंकड़ ही थैली से निकाला, यह स्पष्ट था।
साहूकार निराश हो गया और उसका चेहरा लटक गया। लड़की ने अपनी बुद्धिमानी से एक असम्भव सी विपरीत परिस्थिति को अपने हक़ में बदल डाला।

MORAL OF THE STORY:

समस्याओं का समाधान संभव है, बस आवश्यकता है, उनके बारे में अलग नजरिए से, अलग दृष्टि से, अलग प्रकार से, सोचने की।🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷