Posted in छोटी कहानिया - १००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक बाप के दो बेटे थे। बडा तो बड़ा योग्य था,
कुशल था, साधुचरित्र था, आचरणवान था,
पिता का बड़ा आदर करता था,

छोटा एकदम लंपट था, जुआरी था, शराबी था,
पिता के प्रति कोई आदर का भाव भी नहीं था,
सुनता भी नहीं था, किसीकी मानता भी नहीं था,
बगावती था, उपद्रवी भी था। अंतत:

एक दिन छोटे बेटे ने कहा कि हमें अलग—अलग
कर दें क्योंकि मैं यह बकवास रोज—रोज नहीं
सुनना चाहता कि तुम क्या करो और क्या न करो!

मुझे जो करना है वही मैं करूँगा।
मुझे जो होना है वही मैं होऊँगा।
हमारा बँटवारा कर दें।

बाप ने भी सोचा कि झगड़ा होगा मेरे जाने के बाद,
इन दोनों बेटों में बहुत उपद्रव मचेगा,
क्योंकि दोनों बिल्कुल दो अलग दिशाओं की
तरफ यात्रा कर रहे हैं, उसने बँटवारा कर दिया।

छोटा बेटा तो धन लेकर शहर चला गया।
क्योंकि धन गाँव में अगर हो भी तो क्या करो?
छोटे—मोटे गाँव में धन का करोगे क्या?
गाँव का धनी और गाँव के गरीब में
कोई बहुत फर्क नहीं होता। हो ही नहीं सकता,
क्योंकि वहाँ उपाय नहीं है।
धन का फर्क तो शहर में होता है, वहाँ उपाय है।

जैसे ही उसे धन हाथ लगा,
वह तो शहर की तरफ चला गया,
दस साल फिर लौटा ही नहीं।
खबरें आती रहीं कि सब बरबाद
कर दिया उसने जुए में, शराब में,
वेश्यालयों में। फिर खबरें आने लगीं
कि अब तो वह भीख माँगने लगा।

फिर खबरें आने लगीं कि अब तो रुग्ण हो गया है,
देह जर्जर हो गयी है, अब मरा तब मरा की हालत है।
बाप बड़ा चिंतित है। रात उसे नींद नहीं आती।
सोचता ही रहता है।

एक दिन खबर आयी कि बेटा वापिस आ रहा है।
बेटे ने सोचा एक दिन—भीख माँगने खड़ा था
एक द्वार पर और इन्कार कर दिया गया;

बड़ा महल था, महल देख कर उसे
अपने घर की याद आयी,
उसके पास भी बड़ा महल था,
ऐसे ही नौकर—चाकर उसके पास भी थे,
और आज यह दशा हो गयी उसकी
कि भीख माँगने खड़ा है और
नौकर—चाकर भगा दिये हैं—

उसने सोचा लौट जाऊँ।
क्षमा माँग लूंगा और पिता से कहूँगा,
तुम्हारा बेटा होने के तो मैं योग्य नहीं हूँ,
इसलिए बेटे की तरह वापिस नहीं आया हूँ,
एक नौकर की तरह मुझे भी रख लो;
इतने नौकर हैं तुम्हारे घर में,
एक मैं भी नौकर की तरह पड़ा रहूँगा।
ऐसा सोच घर की तरफ वापिस चला।

बाप को पता चला तो बाप ने
बड़े सुस्वादु भोजन बनवाए
और सारे गाँव को भोज पर
आमंत्रित किया—बेटा वापिस लौट रहा है।
बैडंबाजे बजवाए, संगीत का आयोजन किया,

जो भी श्रेष्ठतम संभव हो सकता था—
गाँव में दीये जलवा दिये, फूलों से द्वार सजाया।
बड़ा बेटा तो खेत पर काम करने गया है,
वह जब साँझ को लौट रहा था उसे
गाँव में बड़ा शोरगुल और बड़ा उत्सव मालूम पड़ा,

उसने लोगों से पूछा—बात क्या है?
किसी ने कहा—बात क्या है, अन्याय है,
बात क्या है!

तुम्हें जिंदगी हो गयी इस बूढ़े का
पैर दबाते—दबाते, इसकी ही सेवा में रत रहे,
तुम्हारा कभी स्वागत नहीं किया गया—
न बंदनवार बाँधे गये, न बाजे बजे,
न तुम्हारे लिए भोजन बनाये गये,
न तुम्हारे लिए भोज दिये गये,
आज सुपुत्र घर आ रहा है!
तुम्हारे छोटे भाई वापिस लौट रहे हैं।
राजकुमार वापिस लौट रहे हैं! —
सब बर्बाद करके। और यह अन्याय है।
यह उसके स्‍वागत में इंतजाम किया जा रहा है।

बडे भाई को भी चोट लगी।
बात सीधी—साफ थी, गणित की थी
कि यह अन्याय है। गुस्से में आया घर,
बाप से जाकर कहा कि मैं कभी
आपसे मुँह उठा कर नहीं बोला,
लेकिन आज सीमा के बाहर बात हो गयी,
आज मुझे कहना ही होगा,
आज मेरी शिकायत सुननी ही होगी,
यह मेरे साथ अन्याय हो रहा है।

बाप ने कहा— तू नाहक गरम हो रहा है।
तू तो मेरा है, तू तो मेरे साथ एक है।
तेरी मैने कभी चिंता नहीं की।
चिंता का कोई कारण तूने नहीं दिया।
इसलिए तेरा कभी स्वागत भी नहीं किया—
स्वागत की कोई जरूरत न थी।
तेरा तो स्वागत है ही।

लेकिन जो भटक गया था,
वह वापिस लौट रहा है। तू अन्याय मत समझ।
जो भटक गया था उसका वापिस
लौटना स्वागत के योग्य है।
वह इस घर में ऐसा आए भिखमंगे की तरह,
तो शुभ न होगा। अपना सारा मान,
अपनी सारी मर्यादा खोकर लौट रहा है,
उसे मान वापिस देना है, मर्यादा वापिस देनी है।
उसका सम्मान उसे वापिस देना है,
उसका आत्मगौरव उसे वापिस देना है।
अन्यथा वह इस घर में गौरवहीन होकर आएगा।

सब बर्बाद कर के आ रहा है,
मुझे मालूम है। उचित तू जो कहता है वही था,
गाँव भी यही कह रहा है कि उचित यही था
कि उसके साथ यह सद्व्यवहार न किया जाए,
लेकिन मैं कुछ और देखता हूँ।

यह सद्व्यवहार उसकी आत्म—प्रतिष्ठा बन जाएगा,
वह फिर अपने गौरव को पा लेगा।
वह फिर अपने पैरों पर खड़ा हो सकेगा।
और एक बात का उसे भरोसा आ जाएगा
कि बुरे हो कि भले, इसका बाप को फर्क नहीं पड़ता।

प्रेम बुरे और भले का फर्क नहीं करता। प्रेम बेशर्त है।

ओशो : संतो मगन भया मन मेरा–(प्रवचन–17)