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संजय गुप्ता

👉 व्यवहारिक ज्ञान भी चाहिए।

🔴 एक पण्डित जी को नाव से नदी पार करनी थी। कोई और यात्री था नहीं। अकेले पण्डित जी को लेकर चलने में मल्लाह तैयार नहीं हो रहा था। पंडित जी का जाना आवश्यक था। मल्लाह ने कहा- कुछ अतिरिक्त मजदूरी मिले तो चलूँ। पंडित जी ने कहा- उतराई के पैसों के अतिरिक्त तुम्हें बड़े सुन्दर ज्ञान भरे उपदेश भी दूँगा। मल्लाह ने बैठे से बेगार भली वाली बात सोचकर नाव खोली और पंडित जी को उस पर ले चला।

🔵 रास्ते में पंडित जी उपदेश करने लगे। उन्होंने मल्लाह से पूछा- तुम कुछ पूजा पाठ जानते हो? उसने उत्तर दिया, “नहीं महाराज”। पंडित जी बोले- तब तो तुम्हारे जीवन का एक तिहाई भाग व्यर्थ चला गया। पंडित ने फिर पूछा- कुछ पढ़ना लिखना जानते हो? मल्लाह ने कहा- नहीं महाराज। पंडित जी ने कहा- तो तुम्हारे जीवन का एक तिहाई भाग और व्यर्थ चला गया। अब दो तिहाई जीवन व्यर्थ गँवा देने के बाद एक तिहाई ही शेष है, उसका सदुपयोग करो।

🔴 पंडित जी का उपदेश चल ही रहा था कि नाव एक चट्टान से टकराकर टूट गई और पंडित जी पानी में डूबने लगे। उन्हें पकड़ते हुए मल्लाह ने पूछा- महाराज तैरना जानते हो? उनने कहा- नहीं मल्लाह उन्हें पीठ पर रखकर पार लगाने लगा और बोला- महाराज! तैरना न जानने के कारण आपका तो पूरा ही जीवन व्यर्थ चला गया होता। उपदेश करना सीखने के साथ-साथ कुछ हाथ पैर चलाना भी सीखना चाहिए था।

🔵 केवल दार्शनिक ज्ञान ही पर्याप्त नहीं, मनुष्य को जीवन समस्याओं को सुलझाने की व्यवहारिक योग्यता भी प्राप्त करनी चाहिए।

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संजय गुप्ता

जय गुरुदेव।।।

दो मिनट समय निकालकर अवश्य पढें
एक बहुत ही श्रीमन्त उद्योगपति का पुत्र कॉलेज में अंतिम वर्ष की परीक्षा की तैयारी में लगा रहता है,
तो उसके पिता उसकी परीक्षा के विषयमें पूछते है तो वो जवाब में कहता है की हो सकता है कॉलेज में अव्वल आऊँ,
अगर मै अव्वल आया तो मुझे वो महंगी वाली कार ला दोगे जो मुझे बहुत पसन्द है..
तो पिता खुश होकर कहते हैं क्यों नहीं अवश्य ला दूंगा.
ये तो उनके लिए आसान था. उनके पास पैसो की कोई कमी नहीं थी।
जब पुत्र ने सुना तो वो दुगुने उत्साह से पढाई में लग गया। रोज कॉलेज आते जाते वो शो रुम में रखी कार को निहारता और मन ही मन कल्पना करता की वह अपनी मनपसंद कार चला रहा है।
दिन बीतते गए और परीक्षा खत्म हुई। परिणाम आया वो कॉलेज में अव्वल आया उसने कॉलेज से ही पिता को फोन लगाकर बताया की वे उसका इनाम कार तैयार रखे मै घर आ रहा हूं।
घर आते आते वो ख्यालो में गाडी को घर के आँगन में खड़ा देख रहा था। जैसे ही घर पंहुचा उसे वहाँ कोई कार नही दिखी.
वो बुझे मन से पिता के कमरे में दाखिल हुआ.
उसे देखते ही पिता ने गले लगाकर बधाई दी और उसके हाथ में कागज में लिपटी एक वस्तु थमाई और कहा लो ये तुम्हारा गिफ्ट।
पुत्र ने बहुत ही अनमने दिल से गिफ्ट हाथ में लिया और अपने कमरे में चला गया। मन ही मन पिता को कोसते हुए उसने कागज खोल कर देखा उसमे सोने के कवर में रामायण दिखी ये देखकर अपने पिता पर बहुत गुस्सा आया..
लेकिन उसने अपने गुस्से को संयमित कर एक चिठ्ठी अपने पिता के नाम लिखी की पिता जी आपने मेरी कार गिफ्ट न देकर ये रामायण दी शायद इसके पीछे आपका कोई अच्छा राज छिपा होगा.. लेकिन मै यह घर छोड़ कर जा रहा हु और तबतक वापस नही आऊंगा जब तक मै बहुत पैसा ना कमा लू।और चिठ्ठी रामायण के साथ पिता के कमरे में रख कर घर छोड कर चला गया।
समय बीतता गया..
पुत्र होशयार था होनहार था जल्दी ही बहुत धनवान बन गया. शादी की और शान से अपना जीवन जीने लगा कभी कभी उसे अपने पिता की याद आ जाती तो उसकी चाहत पर पिता से गिफ्ट ना पाने की खीज हावी हो जाती, वो सोचता माँ के जाने के बाद मेरे सिवा उनका कौन था इतना पैसा रहने के बाद भी मेरी छोटीसी इच्छा भी पूरी नहीं की.
यह सोचकर वो पिता से मिलने से कतराता था।
एक दिन उसे अपने पिता की बहुत याद आने लगी.
उसने सोचा क्या छोटी सी बात को लेकर अपने पिता से नाराज हुआ अच्छा नहीं हुआ.
ये सोचकर उसने पिता को फोन लगाया बहुत दिनों बाद पिता से बात कर रहा हु.
ये सोच धड़कते दिल से रिसीवर थामे खड़ा रहा.
तभी सामने से पिता के नौकर ने फ़ोन उठाया और उसे बताया की मालिक तो दस दिन पहले स्वर्ग सिधार गए और अंत तक तुम्हे याद करते रहे और रोते हुए चल बसे.
जाते जाते कह गए की मेरे बेटे का फोन आया तो उसे कहना की आकर अपना व्यवसाय सम्भाल ले.
तुम्हारा कोई पता नही होनेसे तुम्हे सूचना नहीं दे पाये।
यह जानकर पुत्र को गहरा दुःख हुआ और दुखी मन से अपने पिता के घर रवाना हुआ.
घर पहुच कर पिता के कमरे जाकर उनकी तस्वीर के सामने रोते हुए रुंधे गले से उसने पिता का दिया हुआ गिफ्ट रामायण को उठाकर माथे पर लगाया और उसे खोलकर देखा.
पहले पन्ने पर पिता द्वारा लिखे वाक्य पढ़ा जिसमे लिखा था “मेरे प्यारे पुत्र, तुम दिन दुनी रात चौगुनी तरक्की करो और साथ ही साथ मै तुम्हे कुछ अच्छे संस्कार दे पाऊं.. ये सोचकर ये रामायण दे रहा हु”,
पढ़ते वक्त उस रामायण से एक लिफाफा सरक कर नीचे गिरा जिसमे उसी गाड़ी की चाबी और नगद भुगतान वाला बिल रखा हुआ था।
ये देखकर उस पुत्र को बहुत दुख हुआ और धड़ाम से जमींन पर गिर रोने लगा।
हम हमारा मनचाहा उपहार हमारी पैकिंग में ना पाकर उसे अनजाने में खो देते है।
पिता तो ठीक है.
इश्वर भी हमे अपार गिफ्ट देते है, लेकिन हम अज्ञानी हमारे मनपसन्द पैकिंग में ना देखकर, पा कर भी खो देते है।
हमे अपने माता पिता के प्रेम से दिये ऐसेे अनगिनत उपहारों का प्रेम का सम्मान करना चाहिए और उनका धन्यवाद करना चाहिये।
मेरी बात अगर आपके हृदय को छुई हो तो इस मेसेज को आप चाहो तो अपनों को शेयर करो.
हो सकता है और कोई पुत्र ऐसे ही अपने पिता के गिफ्ट से वंचित ना रहे उनके प्रेम से वंचित ना रहे।।
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

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संजय गुप्ता

राजा दुष्यंत और शकुन्तला का प्रेम

एक बार हस्तिनापुर नरेश दुष्यंत आखेट खेलने वन में गये। जिस वन में वे शिकार के लिये गये थे उसी वन में कण्व ऋषि का आश्रम था।

कण्व ऋषि के दर्शन करने के लिये महाराज दुष्यंत उनके आश्रम पहुँच गये। पुकार लगाने पर एक अति लावण्यमयी कन्या ने आश्रम से निकल कर कहा, हे राजन्! महर्षि तो तीर्थ यात्रा पर गये हैं, किन्तु आपका इस आश्रम में स्वागत है। उस कन्या को देख कर महाराज दुष्यंत ने पूछा, बालिके! आप कौन हैं? बालिका ने कहा, मेरा नाम शकुन्तला है और मैं कण्व ऋषि की पुत्री हूँ। उस कन्या की बात सुन कर महाराज दुष्यंत आश्चर्यचकित होकर बोले, महर्षि तो आजन्म ब्रह्मचारी हैं फिर आप उनकी पुत्री कैसे हईं? उनके इस प्रश्न के उत्तर में शकुन्तला ने कहा, वास्तव में मेरे माता-पिता मेनका और विश्वामित्र हैं। मेरी माता ने मेरे जन्म होते ही मुझे वन में छोड़ दिया था जहाँ पर शकुन्त नामक पक्षी ने मेरी रक्षा की। इसी लिये मेरा नाम शकुन्तला पड़ा। उसके बाद कण्व ऋषि की दृष्टि मुझ पर पड़ी और वे मुझे अपने आश्रम में ले आये। उन्होंने ही मेरा भरन-पोषण किया। जन्म देने वाला, पोषण करने वाला तथा अन्न देने वाला – ये तीनों ही पिता कहे जाते हैं। इस प्रकार कण्व ऋषि मेरे पिता हुये।

शकुन्तला के वचनों को सुनकर महाराज दुष्यंत ने कहा, शकुन्तले! तुम क्षत्रिय कन्या हो। तुम्हारे सौन्दर्य को देख कर मैं अपना हृदय तुम्हें अर्पित कर चुका हूँ। यदि तुम्हें किसी प्रकार की आपत्ति न हो तो मैं तुमसे विवाह करना चाहता हूँ। शकुन्तला भी महाराज दुष्यंत पर मोहित हो चुकी थी, अतः उसने अपनी स्वीकृति प्रदान कर दी। दोनों नें गन्धर्व विवाह कर लिया। कुछ काल महाराज दुष्यंत ने शकुन्तला के साथ विहार करते हुये वन में ही व्यतीत किया। फिर एक दिन वे शकुन्तला से बोले, प्रियतमे! मुझे अब अपना राजकार्य देखने के लिये हस्तिनापुर प्रस्थान करना होगा। महर्षि कण्व के तीर्थ यात्रा से लौट आने पर मैं तुम्हें यहाँ से विदा करा कर अपने राजभवन में ले जाउँगा। इतना कहकर महाराज ने शकुन्तला को अपने प्रेम के प्रतीक के रूप में अपनी स्वर्ण मुद्रिका दी और हस्तिनापुर चले गये।

एक दिन उसके आश्रम में दुर्वासा ऋषि पधारे। महाराज दुष्यंत के विरह में लीन होने के कारण शकुन्तला को उनके आगमन का ज्ञान भी नहीं हुआ और उसने दुर्वासा ऋषि का यथोचित स्वागत सत्कार नहीं किया। दुर्वासा ऋषि ने इसे अपना अपमान समझा और क्रोधित हो कर बोले, बालिके! मैं तुझे शाप देता हूँ कि जिस किसी के ध्यान में लीन होकर तूने मेरा निरादर किया है, वह तुझे भूल जायेगा।

दुर्वासा ऋषि के शाप को सुन कर शकुन्तला का ध्यान टूटा और वह उनके चरणों में गिर कर क्षमा प्रार्थना करने लगी। शकुन्तला के क्षमा प्रार्थना से द्रवित हो कर दुर्वासा ऋषि ने कहा, अच्छा यदि तेरे पास उसका कोई प्रेम चिन्ह होगा तो उस चिन्ह को देख उसे तेरी स्मृति हो आयेगी।

कुछ काल पश्चात् कण्व ऋषि तीर्थ यात्रा से लौटे तब शकुन्तला ने उन्हें महाराज दुष्यंत के साथ अपने गन्धर्व विवाह के विषय में बताया। इस पर महर्षि कण्व ने कहा, पुत्री! विवाहित कन्या का पिता के घर में रहना उचित नहीं है। अब तेरे पति का घर ही तेरा घर है। इतना कह कर महर्षि ने शकुन्तला को अपने शिष्यों के साथ हस्तिनापुर भिजवा दिया। मार्ग में एक सरोवर में आचमन करते समय महाराज दुष्यंत की दी हुई शकुन्तला की अँगूठी, जो कि प्रेम चिन्ह थी, सरोवर में ही गिर गई। उस अँगूठी को एक मछली निगल गई।

महाराज दुष्यंत के पास पहुँच कर कण्व ऋषि के शिष्यों ने शकुन्तला को उनके सामने खड़ी कर के कहा, महाराज! शकुन्तला आपकी पत्नी है, आप इसे स्वीकार करें। महाराज तो दुर्वासा ऋषि के शाप के कारण शकुन्तला को विस्मृत कर चुके थे। अतः उन्होंने शकुन्तला को स्वीकार नहीं किया और उस पर कुलटा होने का लाँछन लगाने लगे। शकुन्तला का अपमान होते ही आकाश में जोरों की बिजली कड़क उठी और सब के सामने उसकी माता मेनका उसे उठा ले गई।

जिस मछली ने शकुन्तला की अँगूठी को निगल लिया था, एक दिन वह एक मछुआरे के जाल में आ फँसी। जब मछुआरे ने उसे काटा तो उसके पेट अँगूठी निकली। मछुआरे ने उस अँगूठी को महाराज दुष्यंत के पास भेंट के रूप में भेज दिया। अँगूठी को देखते ही महाराज को शकुन्तला का स्मरण हो आया और वे अपने कृत्य पर पश्चाताप करने लगे। महाराज ने शकुन्तला को बहुत ढुँढवाया किन्तु उसका पता नहीं चला।

कुछ दिनों के बाद देवराज इन्द्र के निमन्त्रण पाकर देवासुर संग्राम में उनकी सहायता करने के लिये महाराज दुष्यंत इन्द्र की नगरी अमरावती गये। संग्राम में विजय प्राप्त करने के पश्चात् जब वे आकाश मार्ग से हस्तिनापुर लौट रहे थे तो मार्ग में उन्हें कश्यप ऋषि का आश्रम दृष्टिगत हुआ। उनके दर्शनों के लिये वे वहाँ रुक गये। आश्रम में एक सुन्दर बालक एक भयंकर सिंह के साथ खेल रहा था। मेनका ने शकुन्तला को कश्यप ऋषि के पास लाकर छोड़ा था तथा वह बालक शकुन्तला का ही पुत्र था। उस बालक को देख कर महाराज के हृदय में प्रेम की भावना उमड़ पड़ी। वे उसे गोद में उठाने के लिये आगे बढ़े तो शकुन्तला की सखी चिल्ला उठी, हे भद्र पुरुष! आप इस बालक को न छुयें अन्यथा उसकी भुजा में बँधा काला डोरा साँप बन कर आपको डस लेगा।

यह सुन कर भी दुष्यंत स्वयं को न रोक सके और बालक को अपने गोद में उठा लिया। अब सखी ने आश्चर्य से देखा कि बालक के भुजा में बँधा काला गंडा पृथ्वी पर गिर गया है। सखी को ज्ञात था कि बालक को जब कभी भी उसका पिता अपने गोद में लेगा वह काला डोरा पृथ्वी पर गिर जायेगा। सखी ने प्रसन्न हो कर समस्त वृतान्त शकुन्तला को सुनाया। शकुन्तला महाराज दुष्यंत के पास आई। महाराज ने शकुन्तला को पहचान लिया। उन्होंने अपने कृत्य के लिये शकुन्तला से क्षमा प्रार्थना किया और कश्यप ऋषि की आज्ञा लेकर उसे अपने पुत्र सहित अपने साथ हस्तिनापुर ले आये। महाराज दुष्यंत और शकुन्तला के उस पुत्र का नाम भरत था। बाद में वे भरत महान प्रतापी सम्राट बने। उन्ही के नाम पर हमारे देश का नाम भारत पड़ा।

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संजय गुप्ता

भगवान कृष्ण क्यों बने थे अर्जुन के सारथी जानिए, महाभारत के बाद की बात👇

पीतांबरधारी चक्रधर भगवान कृष्ण महाभारत युद्ध में सारथी की भूमिका में थे। उन्होंने अपनी यह भूमिका स्वयं चयन की थी। अपने सुदर्शन चक्र से समस्त सृष्टि को क्षण भर में मुट्ठी भर राख बनाकर उड़ा देने वाले या फिर समस्त सृष्टि के पालनकर्ता भगवान कृष्ण महाभारत में अपने प्रिय सखा धनुर्धारी अर्जुन के सारथी बने थे। इस बात से अर्जुन को बड़ा ही अटपटा लग रहा था कि उसके प्रिय सखा कृष्ण रथ को हांकेंगे। सारथी की भूमिका ही नहीं, बल्कि महाभारत रूपी महायुद्ध की पटकथा भी उन्हीं के द्वारा लिखी गई थी और युद्ध से पूर्व ही अधर्म का अंत एवं धर्म की विजय वह सुनिश्चित कर चुके थे। उसके बाद भी उनका सारथी की भूमिका को चुनना अर्जुन को असहज कर देने वाला था।

भगवान कृष्ण सारथी के संपूर्ण कर्म कर रहे थे। एक सारथी की तरह वह सर्वप्रथम पांडुपुत्र अर्जुन को रथ में सम्मान के साथ चढ़ाने के साथ फिर आरूढ़ होते थे और अर्जुन के आदेश की प्रतीक्षा करते थे। हालांकि अर्जुन उन्हीं के आशीर्वाद एवं मार्गदर्शन के अनुरूप चलते थे, परंतु भगवान कृष्ण अपने इस अभिनय का संपूर्ण समर्पण के साथ निर्वहन करते थे।

युद्ध के अंत में वह पहले अर्जुन को उतार कर ही उतरते थे। भगवान कृष्ण अर्जुन से युद्ध के पूर्व बोले थे, ‘‘हे परंतप अर्जुन! युद्ध की विजय सुनिश्चित करने के लिए भगवती दुर्गा से आशीष लेना उपयुक्त एवं उचित रहेगा। भगवती दुर्गा के आशीर्वाद के पश्चात ही युद्ध प्रारंभ करना चाहिए।’’

सारथी के रूप में भगवान कृष्ण ने अर्जुन को एक और सलाह दी थी, ‘‘हे धनुर्धारी अर्जुन! मेरे प्रिय हनुमान का आह्वान करो। वह महावीर हैं, अजेय हैं और धर्म के प्रतीक हैं। उन्हें अपने रथ की ध्वजा पर आरूढ़ होने के लिए उनका आह्वान करो।’’

अर्जुन ने यही किया था। सारथी की भूमिका में ही भगवान कृष्ण ने कुरुक्षेत्र के मैदान में दोनों सेनाओं ने बीच परम रहस्यमयी गीता का गान किया था।’’

भगवान कृष्ण ने सारथी के रूप में अर्जुन के पराक्रम को निखारा ही नहीं, कठिन से कठिनतम क्षणों में उनको सुरक्षित एवं संरक्षित कर अपनी भूमिका को सार्थक किया था। इसलिए तो भीष्म पितामह, अर्जुन को आशीर्वाद देकर बोले, ‘‘हे प्रिय अर्जुन! जिसके सारथी स्वयं भगवान कृष्ण हों, उसे कैसी चिंता! तुम्हारी विजय सुनिश्चित है। तुम ही विजयी होगे-विजयीभव।’’

सारथी भगवान कृष्ण ने अर्जुन को धर्म का पाठ तब पढ़ाया जब महादानी सूर्यपुत्र कर्ण के रथ के पहिए धरती में धंस गए थे और तब कर्ण, अर्जुन को धर्म एवं नीति का पाठ पढ़ा रहा था। उस समय भगवान कृष्ण अर्जुन से बोले, ‘‘हे पार्थ! कर्ण किस मुंह से धर्म की बात कर रहा है। द्रौपदी के चीरहरण के समय, अभिमन्यु के वध के समय, भीम को विष देते समय, लाक्षागृह को जलाने के समय उसका धर्म कहां चला गया था? यही क्षण है कर्ण को समाप्त करने का।’’

भगवान कृष्ण के मार्गदर्शन से ही कर्ण का अंत संभव हो सका। सारथी के रूप में ही भगवान कृष्ण ने अर्जुन से जयद्रथ का वध करने के लिए व्यूह रचना की थी और अर्जुन जयद्रथ का वध कर सके थे।

भगवान कृष्ण ने सारथी की भूमिका का इस खूबी से निर्वाह किया था कि अर्जुन को लग रहा था यदि कान्हा के हाथों में घोड़ों की लगाम न होती तो पता नहीं मेरा क्या होता? यहां भगवान के दृश्य हाथों में घोड़ों की लगाम थी और अदृश्य हाथों में महाभारत के महायुद्ध की समग्र डोर। महाभारत का युद्ध समाप्त हो गया था। कुरुक्षेत्र में भगवान कृष्ण रथ पर बैठे थे। भगवान कृष्ण के अधरों पर एक निश्छल मुस्कान सदा की तरह बिखरी हुई थी जो आज कुछ और भी गहरी हो गई थी। आज उनके हाव-भाव एवं व्यवहार में कुछ परिवर्तन था।

भगवान कृष्ण सदा की तरह रथ से अर्जुन से पहले नहीं उतरे और अर्जुन से बोले, ‘‘पार्थ! आज तुम रथ से पहले उतर जाओ। तुम उतर जाओगे तब मैं उतरता हूं।’’ यह सुनकर अर्जुन को कुछ अटपटा-सा लगा। कान्हा तो बड़े आदर से अर्जुन को रथ से उतारने के बाद उतरते थे, पर आज यह क्या हुआ?

भगवान कृष्ण, अर्जुन के रथ से उतरने के पश्चात कुछ देर मौन रहे, फिर वह धीरे से उतरे और अर्जुन के कंधे पर हाथ रखकर उन्हें रथ से दूर ले गए। उसके पश्चात जो घटा वह उन सर्वज्ञ भगवान कृष्ण के लिए तो परिचित था, परंतु अर्जुन के लिए विस्मयकारी, अकल्पनीय एवं आश्चर्यजनक था। अनायास ही रथ से अग्रि की लपटें निकलने लगीं और वह एक भयंकर विस्फोट करते हुए जलकर खाक हो गया।

अर्जुन देख रहे थे जो रथ इतने अजेय महारथियों के अंत की कहानी का प्रत्यक्षदर्शी था, आज वह पल भर में नष्ट हो गया। अर्जुन देख रहे थे उस रथ से जुड़े अतीत को, इसी रथ से पूज्य पितामह की देह को अस्त्रों से बींध दिया था। इसी रथ से अनगिनत महारथियों का वध किया था। इसी रथ पर बैठकर उनके प्रिय सखा ने उन्हें गीता का उपदेश दिया था। आज वह राख की ढेरी बन चुका था।

इस घटना से हतप्रभ अर्जुन ने भगवान कृष्ण से कहा, ‘‘हे कान्हा! आपके उतरते ही यह रथ पल भर में भस्मीभूत हो गया। ऐसे कैसे हो गया? इसके पीछे क्या रहस्य है?’’

भगवान कृष्ण बोले, ‘‘हे पार्थ! यह रथ तो बहुत पहले ही नष्ट हो चुका था, इस रथ की आयु तभी समाप्त हो गई थी जब पितामह भीष्म ने इस पर अपने दिव्या का प्रहार किया था। इस रथ में इतनी क्षमता नहीं थी कि भीष्म पितामाह के अचूक दिव्यास्त्रों को झेल सके। इसके पश्चात इसकी आयु फिर क्षीण हुई, जब इस पर द्रोणाचार्य और कर्ण जैसे महारथियों के भीषण दिव्यास्त्रों का पुन:-पुन: प्रहार होता रहा। यह रथ अपनी मृत्यु का वरण तो कब का कर चुका था।’’

अर्जुन, आश्चर्यमिश्रित भाव से बोले, ‘‘हे कान्हा! यह रथ इतने पहले मृत्यु का वरण कर चुका था, तो फिर यह इतने समय तक चला कैसे? कैसे इतने दिनों तक आपके हाथों सकुशल कार्य करता रहा।’’

भगवान कृष्ण बोले, ‘‘यह सत्य है कि इस दिव्य रथ की आयु पहले ही समाप्त हो चुकी थी, परंतु यह रथ मेरे संकल्प से चल रहा था। इसकी आयु की समाप्ति के पश्चात भी इसकी जरूरत थी, इसलिए यह चला। धर्म की स्थापना में इसका महत्ती योगदान था, अत: संकल्पबल से इसे इतने समय तक खींच लिया गया।’’

भगवान कृष्ण आगे बोले, ‘‘धनंजय! भगवान का संकल्प अटूट, अटल और अखंड होता है। यह संकल्प संपूर्ण सृष्टि में जहां कहीं भी लग जाता है, वहां अपना प्रभाव दिखाता है और यह प्रभाव संदेह से परे अवश्य ही पूर्ण परिणाम देने वाला होता है जैसे ही संकल्प पूर्ण होता है, संकल्प की शक्ति वापस भगवान के पास चली जाती है और उसका समय एवं प्रभाव समाप्त हो जाता है। ठीक इसी तरह इस रथ पर मेरा संकल्प-बल कार्य कर रहा था और उसके समाप्त होते ही जो हुआ, वह तुमने देखा।’’

भगवान कृष्ण आगे बोले, ‘‘इसीलिए हे अर्जुन! हम सबको भगवान के हाथों यंत्र बनकर अपना कार्य करना चाहिए। यंत्र का कार्य होता है-यंत्री के हाथों में अपना सर्वस्व समर्पण कर देना और उसके आदेशों का पालन करना। इससे कर्तापन का अहंकार समाप्त हो जाता है और जीवन का विकास होता है जिसका जितना योगदान है, उतना ही करना चाहिए और शेष यंत्री के हाथों में छोड़ देना चाहिए। यही जीवन के विकास का रहस्य है।चलो! अपने शिविर की ओर चलें।’’ भगवान कृष्ण और अर्जुन पैदल ही शिविर की ओर बढ़ गए।

जय श्री कृष्ण

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एक संन्यासी ईश्वर की खोज में निकला हुआ था और एक आश्रम में जाकर ठहरा। पंद्रह दिन तक उस आश्रम में रहा, फिर ऊब गया। उस आश्रम का जो बूढ़ा गुरु था वह कुछ थोड़ी सी बातें जानता था, रोज उन्हीं को दोहरा देता था। फिर उस युवा संन्यासी ने सोचा, यह गुरु मेरे योग्य नहीं, मैं कहीं और जाऊं। यहां तो थोड़ी सी बातें हैं, उन्हीं का दोहराना है। कल सुबह छोड़ दूंगा इस आश्रम को, यह जगह मेरे लायक नहीं। लेकिन उसी रात एक घटना घट गई कि फिर उस युवा संन्यासी ने जीवन भर वह आश्रम नहीं छोड़ा। क्या हो गया? रात एक और संन्यासी मेहमान हुआ। रात आश्रम के सारे मित्र इकट्ठे हुए, सारे संन्यासी इकट्ठे हुए, उस नये संन्यासी से बातचीत सुनने। उस नये संन्यासी ने बड़ी ज्ञान की बातें कहीं, उपनिषद की बातें कहीं, वेदों की बातें कहीं। वह इतना जानता था, इतना सूक्ष्म उसका विश्लेषण था, ऐसा गहरा उसका ज्ञान था कि दो घंटे तक वह बोलता रहा। सबने मंत्रमुग्ध होकर सुना। फिर उस युवा संन्यासी के मन में हुआ : गुरु हो तो ऐसा हो। इससे कुछ सीखने को मिल सकता है। एक वह गुरु है, वह चुपचाप बैठा है, उसे कुछ भी पता नहीं। अभी सुन कर उस बूढ़े के मन में बड़ा दुख होता होगा, पश्चात्ताप होता होगा, ग्लानि होती होगी—कि मैंने कुछ न जाना और यह अजनबी संन्यासी बहुत कुछ जानता है। युवा संन्यासी ने यह सोचा कि आज वह बूढ़ा गुरु अपने दिल में बहुत—बहुत दुखी, हीन अनुभव करता होगा। तभी उस आए हुए संन्यासी ने बात बंद की और बूढ़े गुरु से पूछा कि आपको मेरी बातें कैसी लगीं? बूढ़ा गुरु खिलखिला कर हंसने लगा और कहने लगा, तुम्हारी बातें? मैं दो घंटे से सुनने की कोशिश कर रहा हूं तुम तो कुछ बोलते ही नहीं हो। तुम तो बिलकुल बोलते ही नहीं हो। वह संन्यासी बोला, दो घंटे से मैं बोल रहा हूं आप पागल तो नहीं हैं! और मुझसे कहते हैं कि मैं बोलता नहीं हूं। उस ने कहा, हां, तुम्हारे भीतर से गीता बोलती है, उपनिषद बोलता है, वेद बोलता है, लेकिन तुम तो जरा भी नहीं बोलते हो। तुमने इतनी देर में एक शब्द भी नहीं बोला! एक शब्द तुम नहीं बोले, सब सीखा हुआ बोले, सब याद किया हुआ बोले, जाना हुआ एक शब्द तुमने नहीं बोला। इसलिए मैं कहता हूं कि तुम कुछ भी नहीं बोलते हो, तुम्हारे भीतर से किताबें बोलती हैं। एक ज्ञान है जो उधार है, जो हम सीख लेते हैं। ऐसे ज्ञान से जीवन के सत्य को कभी नहीं जाना जा सकता। जीवन के सत्य को केवल वे जानते हैं जो उधार ज्ञान से मुक्त होते हैं। और हम सब उधार ज्ञान से भरे हुए हैं। हमें ईश्वर के संबंध में पता है। और ईश्वर के संबंध में हमें क्या पता होगा जब अपने संबंध में ही पता नहीं है? हमें मोक्ष के संबंध में पता है। हमें जीवन के सभी सत्यों के संबंध में पता है। और इस छोटे से सत्य के संबंध में पता नहीं है जो हम हैं! अपने ही संबंध में जिन्हें पता नहीं है, उनके ज्ञान का क्या मूल्य हो सकता है? लेकिन हम ऐसा ही ज्ञान इकट्ठा किए हुए हैं। और इसी ज्ञान को जान समझ कर जी लेते हैं और नष्ट हो जाते हैं। आदमी अज्ञान में पैदा होता है और मिथ्या ज्ञान में मर जाता है, ज्ञान उपलब्ध ही नहीं हो पाता। दुनिया में दो तरह के लोग हैं एक अज्ञानी और एक ऐसे अज्ञानी जिन्हें ज्ञानी होने का भ्रम है। तीसरी तरह का आदमी मुश्किल से कभी—कभी जन्मता है। लेकिन जब तक कोई तीसरी तरह का आदमी न बन जाए, तब तक उसकी जिंदगी में न सुख हो सकता है, न शांति हो सकती है। क्योंकि जहां सत्य नहीं है, वहां सुख असंभव है। सुख सत्य की छाया है। जिस जीवन में सत्य नहीं है, वहां संगीत असंभव है, क्योंकि सभी संगीत सत्य की वीणा से पैदा होता है। जिस जीवन में सत्य नहीं है, उस जीवन में सौंदर्य असंभव है; क्योंकि सौंदर्य वस्त्रों का नाम नहीं है और न शरीर का नाम है। सौंदर्य सत्य की उपलब्धि से पैदा हुई गरिमा है। और जिस जीवन में सत्य नहीं है, वह जीवन अशक्ति का जीवन होगा, क्योंकि सत्य के अतिरिक्त और कोई शक्ति दुनिया में नहीं है। -ओशो”
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एक नेता जी मरने के बाद यमपुरी पहुंचे.. वहां यमराज ने उनका भव्य स्वागत किया, और कहा – इससे पहले कि मैं आपको स्वर्ग या नरक भेजूं पहले मैं चाहता हूँ कि आप दोनों जगहों का मुआयना कर लें कि आपके लिए कौन सी जगह ज्यादा अनुकूल होगी!

यमराज ने यमदूत को बुलाकर कहा कि नेता जी को एक दिन के लिए नरक और फिर एक दिन स्वर्ग घुमा कर वापिस मेरे पास ले आना…

यमदूत नेताजी को पहले नरक में ले गया.. नेता तो नरक कि चकाचौंध देखकर हैरान रह गया चारों तरफ हरी भरी घास और बीच में गोल्फ खेलने का मैदान, नेता ने देखा उसके सभी दोस्त वहां घास के मैदानों में शांति से बैठे है और कुछ गोल्फ खेलने का आनंद ले रहे हैं, उन्होंने जब उसे देखा तो वे बहुत खुश हुए और सब उससे गले मिलने आ गए और बीते हुए दिनों कि बातें करने लगे पूरा दिन उन्होंने साथ में गोल्फ खेला, और रात में शराब और मछली का आनंद लिया!

अगले दिन यमदूत नेता को स्वर्ग लेकर गया जैसे ही वे स्वर्ग के द्वार पर पहुंचे स्वर्ग का दरवाजा खुला, नेता ने देखा रोशनी से भरा दरबार था स्वर्ग का! सभी लोगों के चेहरे पर असीम शांति कोई भी एक दूसरे से बात नहीं कर रहे थे, मधुर संगीत बज रहा था, कुछ लोग बादलों के ऊपर तैर रहे थे नेता ने देखा सभी लोग अपने अपने कार्यों में व्यस्त थे, नेता उन सब को गौर से देख रहा था नेता ने बड़ी मुश्किल से एक दिन काटा!

सुबह जब यमदूत उसे लेकर यमराज के पास पहुंचा तो यमराज ने कहा हाँ तो नेताजी अब आप अपने लिए स्थान चुनिए जहाँ आप को भेजा जाये!

नेता ने कहा वैसे तो स्वर्ग में बड़ा आनंद है, शांति है फिर भी वहां मेरे लिए समय काटना मुश्किल है, इसलिए आप मुझे नरक भेजिए वहां मेरे सभी साथी भी है, मैं वहां आनंद से रहूँगा यमराज ने उसे नरक भेज दिया!

यमदूत उसे लेकर जैसे ही नरक पहुंचा तो वहां का दृश्य देखकर स्तब्ध रह गया वो एक बिलकुल बंजर भूमि पर उतरा, जहाँ चारों ओर कूड़े करकट का ढेर लगा था, उसने देखा उसके सभी दोस्त फटे हुए गंदे कपड़ों में कबाड़ इकट्ठा कर रहे थे, वो थोड़ा परेशान हुआ और यमदूत की तरफ देखा और कहा मुझे समझ नहीं आ रहा है कि कल जब मैं यहाँ आया था तो यहाँ घास के हरे भरे मैदान थे, और मेरे सभी दोस्त गोल्फ खेल रहे थे, फिर हमने साथ बैठकर मछली खायी थी और खूब मस्तियाँ की थी! आज तो सब बिल्कुल उल्टा है…

यमदूत हल्की सी हंसी के साथ बोला – नेताजी कल हम चुनाव प्रचार पर थे.. और आज आप हमारे पक्ष में मतदान कर चुके हो..!!
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Posted in छोटी कहानिया - १००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

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कृष्णा सिलाई मशीन पर बैठी कपडे काट रही थी

साथ ही बड़बडाये जा रही थी। उफ़ ये कैची तो किसी काम की नहीं रही बित्ता भर कपडा काटने में ही उँगलियाँ दुखने लगी हैं।

पता नहीं वो सोहन ग्राइंडिंग वाला कहाँ चला गया।

हर महीने आया करता था तो कालोनी भर के लोगों के चाकू कैची पर धार चढ़ा जाता था वो भी सिर्फ चंद पैसों में।

सोहन एक ग्राइंडिंग करने वाला यही कोई 20-25 साल का एक युवक था।

बहुत ही मेहनती और मृदुभाषी

चेहरे पे उसके हमेशा पसीने की बूंदे झिलमिलाती रहती लेकिन साथ ही मुस्कुराहट भी खिली रहती।

जब कभी वो कालोनी में आता किसी पेड़ के नीचे अपनी विशेष प्रकार की साईकिल को स्टैंड पे खड़ा करता जिसमे एक पत्थर की ग्राइंडिंग व्हील लगी हुई थी और सीट पे बैठ के पैडल चला के घुमते हुए पत्थर की व्हील पर रगड़ दे के चाक़ू और कैंचियों की धार तेज कर देता।

इसी बहाने कालोनी की महिलाये वहाँ इकठ्ठा हो के आपस में बाते किया करती।

जब वो नाचती हुई ग्राइंडिंग व्हील पर कोई चाकू या कैची रखता तो उससे फुलझड़ी की तरह चिंगारिया निकलती जिसे बच्चे बड़े कौतूहल से देखा करते और आनन्दित भी होते ।

फिर वो बड़े ध्यान से उलट पुलट कर चाकू को देखता और संतुष्ट हो के कहता “लो मेंम साब इतनी अच्छी धार रखी है कि बिलकुल नए जैसा हो गया।

अगर कोई उसे 10 मांगने पर 5 रूपये ही दे देता तो भी वो बिना कोई प्रतिवाद किये चुपचाप जेब में रख लेता।

मैंने अपनी पांच साल की बेटी मिनी को आवाज लगाई “मिनी जा के पड़ोस वाली सरला आंटी से कैची तो मांग लाना जरा”। पता नहीं ये सोहन कितने दिन बाद कॉलोनी में आएगा।

थोड़ी देर बाद जब मिनी पड़ोस के घर से कैची ले के लौटी तो उसने बताया कि उसने सोहन को अभी कॉलोनी में आया हुआ देखा है।

मैंने बिना समय गवाँये जल्दी से अपने बेकार पड़े सब्जी काटने वाले चाकुओ और कैंची को इकठ्ठा किया और बाहर निकल पड़ी।

बाहर जाके मैंने जो देखा वो मुझे आश्चर्य से भर देने वाला दृश्य था।

क्या देखती हूँ की सोहन अपनी ग्राइंडिंग वाली साइकिल के बजाय एक अपाहिज भिखारी की छोटी सी लकड़ी की ठेला गाडी को धकेल के ला रहा है और उस पर बैठा हुआ भिखारी “भगवान के नाम पे कुछ दे दे बाबा” की आवाज लगाता जा रहा है।

उसके आगे पैसों से भरा हुआ कटोरा रखा हुआ है। और लोग उसमे पैसे डाल देते थे।

पास आने पर मैंने बड़ी उत्सुकता से सोहन से पुछा “सोहन ये क्या ??
और तुम्हारी वो ग्राइंडिंग वाली साईकिल ??

सोहन ने थोड़ा पास आके धीमे से फुसफुसाते हुए स्वर में कहा “मेंमसाब सारे दिन चाक़ू कैची तेज करके मुझे मुश्किल से सौ रुपये मिलते थे

जबकि ये भिखारी अपना ठेला खींचने का ही मुझे डेढ़ सौ दे देता है।

इसलिए मैंने अपना पुराना वाला काम बंद कर दिया।

मैं हैरत से सोहन को दूर तक भिखारी की ठेला गाडी ले जाते देखती रही।

और सोचती रही, एक अच्छा भला इंसान जो कल तक किसी सृजनात्मक कार्य से जुड़ा हुआ समाज को अपना योगदान दे रहा था आज हमारे ही सामाजिक व्यवस्था द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया।

एक चेतावनी भरी सीख :

हम अनायास एक भिखारी को तो उसकी आवश्यकता से अधिक पैसे दे डालते हैं,लेकिन एक मेहनतकाश इन्सान को उसके श्रम का वह यथोचित मूल्य भी देने में संकोच करने लगते हैं जिससे समाज में उसके श्रम की उपयोगिता बनी रहे तथा उसकी खुद्दारी और हमारी मानवता दोनों शर्मिंदा होने से बच जाएँ।।

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