Posted in छोटी कहानिया - १००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक व्यापारी अकबर के समय मे बिजनेस करता था।
महाराणा प्रताप से लडाई की वजह से अकबर कंगाल हो गया और व्यापारी से कुछ सहायता मांगी।
व्यापारी ने अपना सब धन अकबर को दे दिया।
तब अकबर ने उससे पुछा कि तुमने इतना धन कैसे कमाया, सच सच बताओ नहीं तो फांसी दे दुंगा।

व्यापारी बोला-जहांपनाह मैंने यह सारा धन कर चोरी और मिलावट से कमाया है।
यह सुनकर अकबर ने बीरबल से सलाह करके व्यापारी को घोडो के अस्तबल मे लीद साफ करने की सजा सुनाई।
व्यापारी वहां काम करने लगा।

दो साल बाद फिर अकबर लडाई मे कं
गाल हो गया तो बीरबल से पूछा अब धन की व्यवस्था कौन करेगा?
बीरबल ने कहा बादशाह उस व्यापारी से बात करने से समस्या का समाधान हो सकता है। तब अकबर ने फिर व्यापारी को बुलाकर अपनी परेशानी बताई तो व्यापारी ने फिर बहुत सारा धन अकबर को दे दिया।

अकबर ने पुछा तुम तो अस्तबल मे काम करते हो फिर तुम्हारे पास इतना धन कहां से आया सच सच बताओ नहीं तो सजा मिलेगी।

व्यापारी ने कहा यह धन मैने आप के आदमी जो घोडों की देखभाल करते है उन से यह कहकर रिश्वत लिया है कि घोडे आजकल लीद कम कर रहे है। मैं इसकी शिकायत बादशाह को करुगां क्योंकि तुम घोडो को पुरी खुराक नहीं देते हौ ओर पैसा खजाने से पूरा उठाते हो।

अकबर फिर नाराज हुआ और व्यापारी से कहा कि तुम कल से अस्तबल में काम नही करोगे। कल से तुम समुन्दर् के किनारे उसकी लहरे गिनो और मुझे बताऔ।

दो साल बाद

अकबर फिर लडाई में कंगाल।
चारो तरफ धन का अभाव।
किसी के पास धन नहीं।

बीरबल और अकबर का माथा काम करना बंद। अचानक बीरबल को व्यापारी की याद आई। बादशाह को कहा आखरी उम्मीद व्यापारी दिखता है आप की इजाजत हो तो बात करू।

बादशाह का गरूर काफुर बोला किस मुंह से बात करें दो बार सजा दे चुकें हैं।

दोस्तो व्यापारी ने फिर बादशाह को इतना धन दिया कि खजाना पूरा भर दिया।
बादशाह ने डरते हुऐ धन कमाने का तरीका पूछा तो व्यापारी ने बादशाह को धन्यवाद दिया और कहा इस बार धन विदेश से आया है क्योकि मैने उन सब को जो विदेश से आतें हैं आप का फरमान दिखाया कि जो कोई मेरे लहरे गिनने के काम में अपने नाव से बाधा करेगा बादशाह उसे सजा देंगें।
सब डर से धन देकर गये और जमा हो गया।

कहानी का सार
सरकार व्यापारी से ही चलती है
चाहे अकबर के जमाने की हो या आज की

इसलिये प्लीज

व्यापारियों को तंग ना करे

😊😊

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हनुमानजीकीउड़नेकी_गती….

बचपन में जब हमारे बड़े हमें रामायण की कहानियां सुनाया करते थे तब हमें लक्ष्मण जी के बेहोश होने पर हनुमान जी का संजीवनी बूटी लेने जाना व जाने का किस्सा सुनाया जाता था जिसमे संजीवनी बूटी ना मिलने पर पूरा का पूरा पर्वत उठाकर लाने वाला किस्सा रोचक लगता था। क्या कभी आपने यह सोचा कि उनके उड़ने की गति क्या होगी ? जिस तरह से हनुमान जी एक ही रात में श्रीलंका से हिमालय के पर्वतों पर पहुंचे ? और पहाड़ उठाकर वापस भी आ गए तो निश्चित ही उनके उड़ने की क्षमता बेहद तेज रही होगी। लेकिन कितनी तेज ? इस बात का सही सही अनुमान नहीं लगाया जा सकता लेकिन फिर भी आपके मन में उठ रहे सवालों के जवाब खोजने के लिए हमने कुछ तथ्यों का सहारा लिया और गुणा भाग करके हनुमान जी की रफ्तार जानने की कोशिश की है।

अगर इसमे कोई गलती या चुक होने कि संभावना भी हो सकती है। जहां तक हमारी जानकारी है जिस वक्त लक्ष्मण और मेघनाथ का युद्ध होने वाला था उससे ठीक पहले मेघनाथ ने अपनी कुलदेवी की तपस्या शुरू की थी और वह तपस्या मेघनाथ ने पूरा दिन की थी। इस पूजा की खबर जब श्रीराम व उनकी सेना को लगी तो विभीषण ने बताया कि अगर मेघनाथ की तपस्या पूर्ण हो गई तो मेघनाथ अमर हो जाएगा उसके बाद तीनों लोकों में मेघनाथ को कोई नहीं मार सकेगा। इसीलिए मेघनाथ की तपस्या किसी तरीके से भंग कर के उसे अभी युद्ध के लिए ललकारना होगा। इसके बाद हनुमान जी सहित कई वानर मेघनाथ की तपस्या भंग करने गए। उन्होंने अपनी गदा के प्रहार से मेघनाथ की तपस्या भंग करने में सफलता प्राप्त की लेकिन तब तक रात हो चुकी थी।

लक्ष्मण जी ने रात को ही मेघनाथ को युद्ध के लिए ललकारा, रामायण के अनुसार उस समय रात्रि का दूसरा पहर शुरु हो चुका था। दोस्तों रात्रि का पहला पहर सूर्य अस्त होते ही शुरू हो जाता है और सूर्य उदय होने के साथ ही रात्रि का अंतिम यानी चौथा पहर खत्म हो जाता है। यानी चार पहर होते हैं। इसका मतलब प्रत्येक पहर 3 घंटे का हुआ अब अगर आधुनिक काल की घड़ी के हिसाब से देखें तो लक्ष्मण और मेघनाथ का युद्ध रात के करीब 9:00 बजे शुरू हुआ होगा। यह भी कहा जाता है कि लक्ष्मण जी और मेघनाथ के बीच बेहद घनघोर युद्ध हुआ था जो लगभग 1 पहर यानी 3 घंटे तक चला था उसके बाद मेघनाथ ने अपने शक्तिशाली अस्त्र का प्रयोग किया जिससे लक्ष्मण जी मूर्छित हो गए। लक्ष्मण जी के मूर्छित होने का समय लगभग 12:00 बजे के आसपास का रहा होगा।

लक्ष्मण जी के मूर्छित होने से समस्त वानर सेना में हड़कंप मच गया मेघनाथ ने मूर्छित लक्ष्मण को उठाने की जी तोड़ कोशिश की लेकिन जो शेषनाग समस्त पृथ्वी को अपने फन पर उठा सकता था उसी शेषनाग के अवतार को भला मेघनाथ कैसे व क्या उठा पाता। लक्ष्मण जी को ना उठा पाने पर मेघनाथ वापस चला गया। श्री राम अपने प्राणों से भी प्यारे भाई को मूर्छित देखकर शोक में डूब गए, उसके बाद विभीषण के कहने पर हनुमान जी लंका में से लंका के राज्य वैद्य को जबरदस्ती उठा लाए। लक्ष्मण जी अगर 12:00 बजे मूर्छित हुए तो जाहिर है उसके बाद श्री राम के शोक और विभीषण द्वारा सुषेण वैद्य लाने के लिया कहना और हनुमान जी द्वारा सुषेण वैद्य को उठा लाना इन सब में कम से कम 1 घंटा तो लग ही गया होगा। यानी रात्रि के करीब 1:00 बज चुके होंगे | इसके बाद वैद्य द्वारा लक्ष्मण की जांच करने और उनके प्राण बचाने के लिए संजीवनी बूटी लाने की सलाह देने और हनुमान जी को संजीवनी बूटी लाने के लिए प्रस्थान करने में भी कम से कम आधा घंटा जरूर लगा होगा।

तो हम ये मान सकते हैं कि बजरंगबली हनुमान आज के समय के अनुसार करीब रात्रि में 1:30 पर संजीवनी बूटी लाने के लिए रावण की नगरी से उड़े होंगे। जहां तक सवाल उनके वापस आने का है तो निश्चित ही वह सूर्य उदय होने से पहले वापस आ गए होंगे। यानि की बजरंगबली के वापस आने का समय लगभग 5:00 बजे का रहा होगा। 1:30 बजे लक्ष्मण जी की जान बचाने के लिए हनुमान जी उड़े और 5:00 बजे तक वापस आ गये इसका मतलब हनुमान जी 3:30 घंटे में द्रोणागिरी पर्वत उठाकर वापस आ गए। लेकिन मित्रों इन 3:30 घंटों में से भी हमें कुछ समय कम करना होगा क्योंकि जैसे ही लंका से निकलकर पवन पुत्र भारत आए तो रास्ते में उन्हें कालनेमि नामक राक्षस अपना रूप बदले मिला।

कालनेमि निरंतर श्री राम नाम का जप कर रहा था लेकिन वास्तव में उसकी मंशा हनुमान जी का समय खराब करने की थी। हनुमान जी ने जब जंगल से रामनाम का जाप सुना तो जिज्ञासावश नीचे उतर आए कालनेमि ने खुद को बहुत बड़ा ज्ञानी बताया और हनुमान जी से कहा कि पहले आप स्नान करके आओ उसके बाद मैं आपको रावण के साथ चल रहे युद्ध का नतीजा बताऊंगा। भोले हनुमान जी उसकी बातों में आ गए और स्नान करने चले गए | स्नान करते समय उनका सामना एक मगरमच्छ से हुआ जिसे हनुमान जी ने मार डाला।

उस मगर की आत्मा ने हनुमान को उस कपटी कालनेमि की वास्तविकता बताई तो बजरंगबली ने उसे भी अपनी पूंछ में लपेटकर परलोक भेज दिया। लेकिन इन सब में भी हनुमान जी का कम से कम आधा घंटा जरूर खराब हुआ होगा। उसके बाद बजरंगबली ने उड़ान भरी होगी और द्रोणागिरी पर्वत जा पहुंचे लेकिन हनुमान जी कोई वैद्य तो नहीं थे इसीलिए संजीवनी बूटी को पहचान नहीं सके और संजीवनी को खोजने के लिए वह काफी देर तक भटकते रहे होंगे। इसमें भी उनका कम से कम आधा घंटा जरूर खराब हुआ होगा। बूटी को ना पहचान पाने की वजह से हनुमान जी ने पूरा पर्वत ही उठा लिया और वापस लंका की ओर जाने लगे। लेकिन हनुमान जी के लिए एक और मुसीबत आ गई।

हुआ यह की जब पवन पुत्र पर्वत लिए अयोध्या के ऊपर से उड़ रहे थे तो श्री राम के भाई भरत ने सोचा कि यह कोई राक्षस अयोध्या के ऊपर से जा रहा है और उन्होंने बिना सोचे समझे महावीर बजरंगबली पर बाण चला दिया। बाण लगते ही वीर हनुमान श्री राम का नाम लेते हुए नीचे आ गिरे। हनुमान जी के मुंह से श्री राम का नाम सुनते ही भरत दंग रह गए और उन्होंने हनुमानजी से उनका परिचय पूछा तो उन्होंने (हनुमान जी) ने उन्हें राम रावण युद्ध के बारे में बताया। लक्ष्मण के मूर्छित होने का पूरा किस्सा सुनाया तब सुनकर वह भी रोने लग गए और उनसे माफी मांगी| फिर हनुमानजी का उपचार किया गया और हनुमान जी वापस लंका की ओर ओर चलें। लेकिन इन सभी घटनाओं में भी बजरंगबली के कीमती समय का आधा घंटा फिर से खराब हो गया। अब हनुमान जी के सिर्फ उड़ने के समय की बात करें तो सिर्फ दो घंटे थे और इन्हीं दो घंटों में वह लंका से द्रोणागिरी पर्वत आए और वापस गए।

अब अगर हम उनके द्वारा तय की गई दूरी को देखें तो श्रीलंका और द्रोणागिरी पर्वत तक की दूरी लगभग “ 2500 किलोमीटर” की है यानी कि यह दूरी आने जाने दोनों तरफ की मिलाकर 5000 किलोमीटर बैठती है और बजरंगबली ने यही 5000 किलोमीटर की दूरी 2 घंटे में तय की। इस हिसाब से हनुमान जी के उड़ने की रफ्तार लगभग 2500 किलोमीटर प्रति घंटा की दर से निकलती है. तो इसकी तुलना अगर ध्वनी की रफ्तार से करें तो उसकी तुलना में हनुमानजी की गति लगभग 2 गुना ज्यादा बैठती है।

आधुनिक भारत के पास मौजूद रसिया से मंगवाए गए लड़ाकू विमान मिग 29 की रफ्तार 2400 किलोमीटर प्रति घंटा है. अगर इसकी तुलना हनुमान जी की रफ्तार से करें तो यहां पर भी हनुमान जी की रफ्तार ज्यादा निकलती है यानी हनुमान जी आधुनिक भारत के पास मौजूद सबसे तेज लड़ाकू विमान से भी तेज उड़ते थे।

!!जय जय सियाराम!!
!!जय जय श्री सद्गुरु महावीर बजरंगबली!!.

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मनुष्य गौरव दिन


19 ऑक्टोबर! प. पू. पांडुरंगशास्त्रींचा तथा पू. दादाजींचा जन्मदिवस. लक्ष्मीपूजनाचा आजचा दिवस ही त्यांची पुण्यतिथी सुद्धा. पू. दादा म्हणजे वैदिक आणि औपनिषदिक तत्त्वज्ञानाचे केवळ अभ्यासकच नव्हे; तर भाष्यकार. वसिष्ठ-याज्ञवल्क्यांसह सर्व ऋषींचं जीवनतीर्थ भावपूर्ण अंतःकरणाने सेवन करणारा आधुनिक ऋषी, वेदोपनिषद, दर्शनशास्त्रं, प्रस्थानत्रयी, न्याय-व्याकरण-मीमांसा इत्यादी शास्त्रग्रंथांचे गाढे अभ्यासक, स्वप्रज्ञा असलेले तत्वचिंतक, शंकराचार्य, मध्वाचार्य यांसह सर्व आचार्य, संत तुकाराम-ज्ञानेश्वर-एकनाथ-नरसी मेहता, तुलसीदास यांच्याप्रमाणेच सेंट निकोलस-सेंट मार्टिन वगैरे जगातील अनेक संत आणि संत साहित्याचे भाष्यकार, कालिदास-शेक्सपीअरसह अनेक देशीविदेशी नाटककारांचे रसग्राहक, भारतीय तत्वज्ञांबरोबरच साॅक्रेटिस, हेगेल, मार्क्स, व्हाइटहेड, रसेल, कांट, ड्यूरंड, देकार्त यांसह जगातील अनेक तत्त्वज्ञ-विचारवंताचे गाढे अभ्यासक आणि भाष्यकार, मार्क्स, एंगल्स, लेनिन इत्यादी साम्यवादी विचारवंतांच्या साहित्याचा-विचारांचा प्रगल्भ भाष्यकार, टेनिसन, मिल्टन, खलील जिब्रान, एच. वेल्स इत्यादी जगातील अनेक कवी-विचारवंत=साहित्यिक यांच्या साहित्याचा रसास्वाद घेणारा रसग्राही, इतिहास-तत्त्वज्ञानाचे राॅयल एशियाटिक लायब्ररीतील सर्व ग्रंथ वाचलेला एकमेव शास्त्री-पंडित-अभ्यासक, जगातील सर्व धर्मग्रंथांचा भाष्यकार, व्हॅटिकन सिटी आणि मध्य आशियातील अनेक चर्च-मशिदींमधून प्रवचन केलेले महापंडित, अमेरिकेचे राष्ट्राध्यक्ष, होली पोप, मध्य आशियातील शेख, इस्रायलचे राष्ट्राध्यक्ष-धर्मगुरू, जर्मनी, जपान, इंग्लंड आदी अनेक राष्ट्रांनी गौरवलेला महापंडित, साम्यवादी-समाजवादी विचारवंतांनी स्वीकारलेला हिंदू शास्त्री, विवेकानंदांप्रमाणे जपानची तत्त्वज्ञान परिषद गाजवलेला एकमेव भारतीय तत्त्वज्ञ, मॅगॅसेसे, टेम्पल्टन, लो.टिळक, गांधी, पद्मभूषण-पद्मविभूषण इत्यादी 100वर राष्ट्रीय-आंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिळालेलं एकमेव भारतीय व्यक्तिमत्व, हाउस आॅफ लाॅर्ड्सनं खास जाहीर सन्मान केलेला एकमेव शास्त्री-पंडित… गतानुगतिक कर्मकांडात आणि ज्ञानकांडात अमूलाग्र परिवर्तन घडवून आणणारा, ऋषिप्रणित मूळ गंगोत्रीचं हजारो तासांच्या प्रवचनांमधून दर्शन घडविणारा दार्शनिक. याशिवाय सर्व धर्माच्या haves and have nots अशा दोन्ही घटकांना निरपेक्ष भावाने एकत्र आणणारा आणि त्यातून एक आचार-एक विचार-एक उपासना पद्धती देऊन सुमारे 3 कोटी स्वाध्यायींचा विशाल परिवार निर्माण करणारा आधुनिक महर्षी! भावभक्तीला कृतिभक्तीची यथार्थ जोड देऊन मूर्तिपूजेचं रहस्य पटवून देणारा महान योगी, सविकल्प आणि निर्विकल्प समाधीचा ऋषिप्रणित शास्त्रोक्त मार्ग दाखविणारे महान गुरू, शंकराचार्यांपासून शंकर अभ्यंकरांपर्यंत आणि पु.ल. देशपांडे यांच्यापासून शिरवाडकरांपर्यंत अनेक अभ्यासक आणि लेखक-विचारवंत ज्यांची आवर्जून भेट घ्यायचे असे आमचे पू. दादाजी! सुमारे दोन लाख गावांमधून स्वाध्याय क्रांती, 10000 वर योगेश्वर कृषी आणि कृतिभक्तीतून उभे राहिलेले हजारो ठिकाणचे इतर प्रयोग, brotherhood under the fatherhood of God हा विचार रुजवून शेवटच्या माणसाला ‘तत्तवमसि’ची अनुभूती देणारा सद्गुरु!

दादा, तुमच्या दैवी कार्याशी आम्ही जोडले गेलो हे आमचं महद्भाग्य! सर्व स्वाध्यायींना पू. दादाजींच्या जन्मदिनाबद्दल अर्थात मनुष्य गौरव दिनाच्या हार्दिक शुभेच्छा आणि जय योगेश्वर. – राजेन्द्र खेर/ सौ. सीमंतिनी खेर

Posted in छोटी कहानिया - १००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

भगवती कालिया

एक गरीब एक दिन एक व्यक्ति के पास अपनी जमीन बेचने गया, बोला मेरी 2 एकड़ जमीन आप रख लो.

व्यक्ति बोला, क्या कीमत है ?

गरीब बोला, 50 हजार रुपये.

व्यक्ति थोड़ी देर सोच कर बोला, वो ही खेत जिसमें ट्यूबवेल लगा है ?

गरीब: जी. आप मुझे 50 हजार से कुछ कम भी देंगे, तो जमीन आपको दे दूँगा.

व्यक्ति ने आँखें बंद कीं, 5 मिनट सोच कर बोला: नहीं, मैं उसकी कीमत 2 लाख रुपये दूँगा.

गरीब: पर मैं तो 50 हजार मांग रहा हूँ, आप 2 लाख क्यों देना चाहते हैं ?

व्यक्ति बोला, तुम जमीन क्यों बेच रहे हो ?

गरीब बोला, बेटी की शादी करना है इसीलिए मज़बूरी में बेचना है. पर आप 2 लाख क्यों दे रहे हैं ?

व्यक्ति बोला, मुझे जमीन खरीदनी है, किसी की मजबूरी नहीं. अगर आपकी जमीन की कीमत मुझे मालूम है तो मुझे आपकी मजबूरी का फायदा नहीं उठाना, मेरा वाहेगुरू कभी खुश नहीं होगा.

ऐसी जमीन या कोई भी साधन, जो किसी की मजबूरियों को देख के खरीदा जाये वो जिंदगी में सुख नहीं देता, आने वाली पीढ़ी मिट जाती है.

व्यक्ति ने कहा: मेरे मित्र, तुम खुशी खुशी, अपनी बेटी की शादी की तैयारी करो, 50 हजार की व्यवस्था हम गांव वाले मिलकर कर लेंगे, तेरी जमीन भी तेरी ही रहेगी.

मेरे भगवान ने भी अपनी बानी में यही हुक्म दिया है.

गरीब हाथ जोड़कर नीर भरी आँखों के साथ दुआयें देता चला गया।

ऐसा जीवन हम भी बना सकते हैं.

बस किसी की मजबूरी न खरीदें, किसी के दर्द, मजबूरी को समझ कर, सहयोग करना ही सच्चा तीर्थ है, एक यज्ञ है. सच्चा कर्म और बन्दगी है.

🙏🏻🙏🏻🙏🏻

Posted in भारतीय उत्सव - Bhartiya Utsav

‘दशहरा’

‘दशहरा’ एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ है “दस को हरने वाली [तिथि]”। “दश हरति इति दशहरा”। ‘दश’ कर्म उपपद होने पर ‘हृञ् हरणे’ धातु से “हरतेरनुद्यमनेऽच्” (३.२.९) सूत्र से ‘अच्’ प्रत्यय होकर ‘दश + हृ + अच्’ हुआ, अनुबन्धलोप होकर ‘दश + हृ + अ’, “सार्वधातुकार्धधातुकयोः” (७.३.८४) से गुण और ‘उरण् रपरः’ (१.१.५१) से रपरत्व होकर ‘दश + हर् + अ’ से ‘दशहर’ शब्द बना और स्त्रीत्व की विवक्षा में ‘अजाद्यतष्टाप्‌’ से ‘टाप्’ (आ) प्रत्यय होकर ‘दशहर + आ’ = ‘दशहरा’ शब्द बना।

संस्कृत में यह शब्द गङ्गादशहरा के लिये और हिन्दी और अन्य भाषाओं में विजयादशमी के लिये प्रयुक्त होता है। दोनों उत्सव दशमी तिथि पर मनाए जाते हैं।

‘स्कन्द पुराण’ की ‘गङ्गास्तुति’ के अनुसार ‘दशहरा’ का अर्थ है “दस पापों का हरण करने वाली”। पुराण के अनुसार ये दस पाप हैं
१) “अदत्तानामुपादानम्” अर्थात् जो वस्तु न दी गयी हो उसे अपने लिये ले लेना
२) “हिंसा चैवाविधानतः” अर्थात् ऐसी अनुचित हिंसा करना जिसका विधान न हो
३) “परदारोपसेवा च” अर्थात् परस्त्रीगमन (उपलक्षण से परपुरुषगमन भी)
ये तीन “कायिकं त्रिविधं स्मृतम्” अर्थात् तीन शरीर-संबन्धी पाप हैं।

४) “पारुष्यम्” अर्थात् कठोर शब्द या दुर्वचन कहना
५) “अनृतम् चैव” अर्थात् असत्य कहना
६) “पैशुन्यं चापि सर्वशः” अर्थात् सब-ओर कान भरना (किसी की चुगली करना)
७) “असम्बद्धप्रलापश्च” अर्थात् ऐसा प्रलाप करना (बहुत बोलना) जिसका विषय से कोई संबन्ध न हो
ये चार “वाङ्मयं स्याच्चतुर्विधम्” अर्थात् चार वाणी-संबन्धी पाप हैं।

८) “परद्रव्येष्वभिध्यानम्” अर्थात् दूसरे के धन का [उसे पाने की इच्छा से] एकटक चिन्तन करना
९) “मनसानिष्टचिन्तनम्” अर्थात् मन के द्वारा किसी के अनिष्ट का चिन्तन करना
१०) “वितथाभिनिवेशश्च” अर्थात् असत्य का निश्चय करना, झूठ में मन को लगाए रखना
ये तीन “मानसं त्रिविधं स्मृतम्” अर्थात् तीन मन-संबन्धी पाप हैं।

जो तिथि इन दस पापों का हरण करती है वह ‘दशहरा’ है। यद्वा ‘दश रावणशिरांसि रामबाणैः हारयति इति दशहरा’ जो तिथि रावण के दस सिरों का श्रीराम के बाणों द्वारा हरण कराती है वह दशहरा है। रावण के दस सिरों को पूर्वोक्त दस शरीर, वाणी, और मन संबन्धी पापों का प्रतीक भी समझा जा सकता है।

अस्तु, आपको दशहरा की हार्दिक शुभकामनाएँ।

#Nidhi Tiwari