Posted in भारतीय उत्सव - Bhartiya Utsav

गंगा दशहरा है कठोरता से तरलता की यात्रा का पर्व, ऐसे करें गंगा का पूजन..


गंगा दशहरा है कठोरता से तरलता की यात्रा का पर्व, ऐसे करें गंगा का पूजन..

सलिल पांडेय 

गंगा दशहरा

कर्मकांड पक्ष
गंगा दशहरा: ज्येष्ठ शुक्ल की दशमी तिथि तिथि पर हस्त नक्षत्र, चन्द्रमा कन्या राशि में, सूर्य वृष राशि में और दिन मंगलवार को मां गंगा का अवतरण पृथ्वी पर हुआ था । इस दिन को गंगा-दशहरा कहा जाता है। शस्त्रों के अनुसार इस दिन गंगा-स्नान एवं पूजन से दस प्रकार के दोषों से मुक्ति मिलती है । दस इंद्रियों वाले तन का पूर्णतः स्वस्थ रहने के भाव में ऐसा कहा गया है। क्योंकि तन स्वस्थ रहेगा तो मन भी उच्च भाव में होगा और हर कार्य में सफलता मिलेगी।

1 जून को गंगा दशहरा- दिन छोड़कर अन्य सारी स्थितियां इस दिन बन रही हैं । गंगा की महत्ता की दृष्टि से धर्मग्रन्थों के अनुसार यदि पुरुषोत्तम मास (मलमास) में गंगा दशहरा हो तो यह पर्व उसी अवधि में मनाना चाहिए ।

गंगा का पूजन- वैसे तो गंगा-दशहरा पूजन में 10 की संख्या में दीपक, फल और ताम्बूल चढ़ाने का विधान है लेकिन ऐसी कोई बाध्यता भी नहीं है । संभव नहीं हो तो एक ही घी के दिए में 10 संख्या का मॉनसिक स्मरण कर गंगा-तट पर जलाना चाहिए । इस दिन सत्तू और गुड़ के दस पिंड बनाकर गंगा में प्रवाहित करने का विधान है। किसी धातु, मिट्टी और कुछ न हो तो आटे से मां गंगा लिखकर पूजन करने से सारे फल प्राप्त हो जाते हैं । इन दिनों गंगा में मछलियों की तादाद अधिक होती है । अतः प्रकृति संरक्षण के उद्देश्य से विधि-विधान से पूजन करना चाहिए । जहां गंगा उपलब्ध नहीं हो, वहां किसी भी बहते हुए जल में गंगा का स्मरण कर पूजन करना चाहिए ।

मंत्र-जाप :- ऊँ शिवायै नारायण्यै दशहरायै गंगायै नमो नमः इस मंत्र का अधिक से अधिक जप करना चाहिए । इसके अलावा गंगास्तोत्र का पाठ 10 बार करने का विधान है ।

सेतुबंध रामेश्वरं की स्थापना श्रीराम ने इसी दिन की थी।

साहित्य पक्ष
मातृ-शक्तियों की आराधना में “जले थले निवासिनीं और वने-रणे निवासिनीं” का जब प्रसंग आता है तो अभिधा अर्थों के अलावा लक्षणा अर्थों पर चिंतन-मनन किया जाए तो मानव शरीर जल-थल से निर्मित है और मन भी किसी जंगल से कम नहीं जिसमें निरन्तर युद्ध होता रहता है । शरीर में मांस-अस्थि थल ही है और इसमें 81% जल तत्व है जिससे थल हिस्सा सिंचित होता रहता है । ऋषियों ने इसी जल-थल की शुद्धता के लिए जप-तप, योग-अनुष्ठान, समुचित आहार-विहार, व्रत-उपवास का सन्देश दिया।

भगीरथ की तपस्या
गंगा दशहरा की आध्यात्मिक कथा सगर के श्रापित वंशजों की मुक्ति के लिए उसी कुल के राजा भगीरथ कठोर तपस्या करते हैं । उनकी तपस्या पर ज्येष्ठ शुक्ल दशमी, दिन मंगलवार को हस्त नक्षत्र में ब्रह्मा के कमण्डल से माँ गंगा प्रकट होती हैं और पृथ्वी पर चलने की उनकी प्रार्थना स्वीकार करती हैं । लेकिन इसके पीछे ऋषियों के स्वास्थ्य-विज्ञान पर नजर डालें तो 10 इन्द्रियों वाले इस शरीर में जल-तत्व के सन्तुलित प्रवाह का भी उद्देश्य प्रकट होता है । सामान्यतया शरीर में जल-तत्व की कमी से डिहाइड्रेशन हो जाता है जिससे मृत्यु भी हो जाती है । ज्येष्ठ माह की भीषण गर्मी में जलीय सन्तुलन भी आवश्यक है । भावनात्मक दृष्टि से भी देखा जाए व्यक्ति स्वार्थ-लोभ, क्रोध की ऊष्मा से जब कठोर प्रवृत्ति का हो जाता है तो उसके शरीर पर बुरा असर पड़ता है । शरीर के आंतरिक तंत्र कठोर होते हैं । ऐसी स्थिति में सर्वाधिक असर रक्त-प्रवाह में बाधा के रूप में पड़ता है और हाई एवं लो ब्लडप्रेशर, ब्लड शुगर आदि बीमारियां जन्म लेती हैं । जबकि मन-मस्तिष्क में कोमलता- तरलता का भाव शरीर-गंगा को सुचारू करता है ।

देवलोक में शिव का नृत्य और गायन
देवी-पुराण की कथा के अनुसार भगवान शंकर के विवाह में अनेक विसंगतियां आयीं । विवाह की जानकारी देने शंकर जी विष्णुजी के पास गए तो भगवान विष्णु ने वातावरण को सरस बनाने के लिए कुछ गीत-संगीत सुनाने के लिए कहा । इस पर शंकरजी ने गीत गाना शुरू किया तब विष्णुजी आनन्द में इतने द्रवीभूत हुए कि वैकुण्ठ में जलप्लावन होने लगा । जिसे ब्रह्मा ने अपने कमण्डल में एकत्र कर लिया । कथा से स्पष्ट है कि तनाव के दौर में संगीत से मन प्रसन्न होता है । शरीर के रसायन (केमिकल) एवं हार्मोन्स अनुकूल होते हैं । शरीर में तरलता आती है और यह शरीर सगर-पुत्रों की तरह अभिशप्त होने से मुक्त होता है । इसीलिए लोकमान्यता है कि गंगा-तट पर गीत-संगीत, मन्त्र-भजन करना चाहिए जिसकी ध्वनि से जल का प्रदूषण दूर होता है जबकि गंगा किनारे नकरात्मक आचरण से प्रदूषण बढ़ता है । इसी प्रदूषण को दूर करने के लिए भगवान कृष्ण यमुना में कूद कर कालिया-नाग जैसे प्रदूषण को समाप्त करते हैं ।

विष्णु के पग से निकली गंगा
वामन-पुराण की कथा के अनुसार राजा बलि से 3 पग मांगने भिक्षुक बनकर विष्णुजी जाते हैं । एक पग से पृथ्वी नाप लिया, दूसरा आकाश की तरफ बढ़ते हुए ब्रह्मलोक गया । धूल-धूसरित हुए विष्णुजी के पग को जल से प्रक्षालित कर ब्रह्मा ने कमण्डल में रख लिया । वहीं गंगा हैं । इस दृष्टि से कृषि प्रधान देश में भगवान विष्णु का धरती से अनाज के रूप में जीवन पैदा करने की व्यवस्था झलकती है । एक पग से किसान के रूप में लघु बनकर धरती को उपजाऊ बनाया और दूसरी ओर आकाश से जलवर्षा की व्यवस्था की । इस गर्मी के बाद खरीफ की फसल की तैयारी का भी भाव है । तीसरा पग बलि के सिर पर रखने का आशय ही है कि मस्तिष्क दयार्द्र रहे न कि अहंकारग्रस्त । स्पष्ट है कि गंगा-दशहरा शरीर में प्रवाहित गंगा के प्रति सजगता पैदा करना है । क्योंकि जब किसी के मन से संवेदना का पानी सूख जाता है वह परिवार और समाज के लिए कठोर हो जाता है । कठोरता से तरलता की यात्रा का पर्व है गंगा-दशहरा ।
सलिल पाण्डेय, मिर्जापुर ।


गंगा दशहरा प्रारम्भ

AZAAD BHARAT

1मां गंगा की महिमागंगा दशहरा प्रारम्भ : 26 मई, समाप्त : 4 जूनगंगा
नदी उत्तर भारतकी केवल जीवनरेखा नहीं, अपितु हिंदू धर्मका सर्वोत्तम तीर्थ
है । ‘आर्य सनातन वैदिक संस्कृति’ गंगाके तटपर विकसित हुई, इसलिए गंगा
हिंदुस्थानकी राष्ट्ररूपी अस्मिता है एवं भारतीय संस्कृतिका मूलाधार है ।
इस कलियुगमें श्रद्धालुओंके पाप-ताप नष्ट हों, इसलिए ईश्वरने उन्हें इस
धरापर भेजा है । वे प्रकृतिका बहता जल नहीं; अपितु सुरसरिता (देवनदी) हैं ।
उनके प्रति हिंदुओंकी आस्था गौरीशंकरकी भांति सर्वोच्च है । गंगाजी
मोक्षदायिनी हैं; इसीलिए उन्हें गौरवान्वित करते हुए पद्मपुराणमें (खण्ड ५,
अध्याय ६०, श्लोक ३९) कहा गया है, ‘सहज उपलब्ध एवं मोक्षदायिनी गंगाजीके
रहते विपुल धनराशि व्यय (खर्च) करनेवाले यज्ञ एवं कठिन तपस्याका क्या लाभ
?’ नारदपुराणमें तो कहा गया है, ‘अष्टांग योग, तप एवं यज्ञ, इन सबकी
अपेक्षा गंगाजीका निवास उत्तम है । गंगाजी भारतकी पवित्रताकी सर्वश्रेष्ठ
केंद्रबिंदु हैं, उनकी महिमा अवर्णनीय है ।’

मां गंगा का #ब्रह्मांड में उत्पत्ति‘वामनावतारमें
श्रीविष्णुने दानवीर बलीराजासे भिक्षाके रूपमें तीन पग भूमिका दान मांगा ।
राजा इस बातसे अनभिज्ञ था कि श्रीविष्णु ही वामनके रूपमें आए हैं, उसने
उसी क्षण वामनको तीन पग भूमि दान की । वामनने विराट रूप धारण कर पहले पगमें
संपूर्ण पृथ्वी तथा दूसरे पगमें अंतरिक्ष व्याप लिया । दूसरा पग उठाते समय
वामनके ( #श्रीविष्णुके) बाएं पैरके अंगूठेके धक्केसे ब्रह्मांडका
सूक्ष्म-जलीय कवच (टिप्पणी १) टूट गया । उस छिद्रसे गर्भोदककी भांति
‘ब्रह्मांडके बाहरके सूक्ष्म-जलनेब्रह्मांडमें प्रवेश किया । यह सूक्ष्म-जल
ही गंगा है ! गंगाजीका यह प्रवाह सर्वप्रथम सत्यलोकमें गया ।ब्रह्मदेवने
उसे अपने कमंडलु में धारण किया । तदुपरांत सत्यलोकमें ब्रह्माजीने अपने
कमंडलुके जलसे श्रीविष्णुके चरणकमल धोए । उस जलसे गंगाजीकी उत्पत्ति हुई ।
तत्पश्चात गंगाजी की यात्रा सत्यलोकसे क्रमशः #तपोलोक, #जनलोक, #महर्लोक,
इस मार्गसे #स्वर्गलोक तक हुई ।पृथ्वी पर उत्पत्ति #सूर्यवंशके राजा सगरने #अश्वमेध यज्ञ आरंभ किया । उन्होंने दिग्विजयके
लिए यज्ञीय अश्व भेजा एवं अपने ६० सहस्त्र पुत्रोंको भी उस अश्वकी रक्षा
हेतु भेजा । इस यज्ञसे भयभीत इंद्रदेवने यज्ञीय अश्वको कपिलमुनिके आश्रमके
निकट बांध दिया । जब सगरपुत्रोंको वह अश्व कपिलमुनिके आश्रमके निकट प्राप्त
हुआ, तब उन्हें लगा, ‘कपिलमुनिने ही अश्व चुराया है ।’ इसलिए सगरपुत्रोंने
ध्यानस्थ कपिलमुनिपर आक्रमण करनेकी सोची । कपिलमुनिको अंतर्ज्ञानसे यह बात
ज्ञात हो गई तथा अपने नेत्र खोले । उसी क्षण उनके नेत्रोंसे प्रक्षेपित
तेजसे सभी सगरपुत्र भस्म हो गए । कुछ समय पश्चात सगरके प्रपौत्र राजा
अंशुमनने सगरपुत्रोंकी मृत्युका कारण खोजा एवं उनके उद्धारका मार्ग पूछा ।
कपिलमुनिने अंशुमनसे कहा, ‘`गंगाजीको स्वर्गसे भूतलपर लाना होगा ।
सगरपुत्रोंकी अस्थियोंपर जब गंगाजल प्रवाहित होगा, तभी उनका उद्धार होगा
!’’ मुनिवरके बताए अनुसार गंगाको पृथ्वीपर लाने हेतु अंशुमनने तप आरंभ किया
।’  ‘अंशुमनकी मृत्युके पश्चात उसके सुपुत्र राजा दिलीपने भी गंगावतरणके
लिए तपस्या की । #अंशुमन एवं दिलीपके सहस्त्र वर्ष तप करनेपर भी गंगावतरण
नहीं हुआ; परंतु तपस्याके कारण उन दोनोंको स्वर्गलोक प्राप्त हुआ ।’
(वाल्मीकिरामायण, काण्ड १, अध्याय ४१, २०-२१)‘राजा
दिलीपकी #मृत्युके पश्चात उनके पुत्र राजा भगीरथने कठोर तपस्या की । उनकी
इस तपस्यासे प्रसन्न होकर गंगामाताने भगीरथसे कहा, ‘‘मेरे इस प्रचंड
प्रवाहको सहना पृथ्वीके लिए कठिन होगा । अतः तुम भगवान शंकरको प्रसन्न करो
।’’ आगे भगीरथकी घोर तपस्यासे भगवान शंकर प्रसन्न हुए तथा भगवान शंकरने
गंगाजीके प्रवाहको जटामें धारण कर उसे पृथ्वीपर छोडा । इस प्रकार हिमालयमें
अवतीर्ण गंगाजी भगीरथके पीछे-पीछे #हरद्वार, प्रयाग आदि स्थानोंको पवित्र
करते हुए बंगालके उपसागरमें (खाडीमें) लुप्त हुईं ।’ज्येष्ठ
मास, शुक्ल पक्ष, दशमी तिथि, भौमवार (मंगलवार) एवं हस्त नक्षत्रके शुभ
योगपर #गंगाजी स्वर्गसे धरतीपर अवतरित हुईं ।  जिस दिन #गंगा पृथ्वी पर
अवतरित हुईं वह दिन ‘गंगा दशहरा’ के नाम से जाना जाता है ।जगद्गुरु
आद्य शंकराचार्यजी, जिन्होंने कहा है : एको ब्रह्म द्वितियोनास्ति ।
द्वितियाद्वैत भयं भवति ।। उन्होंने भी ‘गंगाष्टक’ लिखा है, गंगा की महिमा
गायी है । रामानुजाचार्य, रामानंद स्वामी, चैतन्य महाप्रभु और स्वामी
रामतीर्थ ने भी गंगाजी की बड़ी महिमा गायी है । कई साधु-संतों,
अवधूत-मंडलेश्वरों और जती-जोगियों ने गंगा माता की कृपा का अनुभव किया है,
कर रहे हैं तथा बाद में भी करते रहेंगे ।अब
तो विश्व के #वैज्ञानिक भी गंगाजल का परीक्षण कर दाँतों तले उँगली दबा रहे
हैं ! उन्होंने दुनिया की तमाम नदियों के जल का परीक्षण किया परंतु गंगाजल
में रोगाणुओं को नष्ट करने तथा आनंद और सात्त्विकता देने का जो अद्भुत गुण
है, उसे देखकर वे भी आश्चर्यचकित हो उठे । #हृषिकेश में स्वास्थ्य-अधिकारियों ने पुछवाया कि यहाँ से हैजे की कोई खबर
नहीं आती, क्या कारण है ? उनको बताया गया कि यहाँ यदि किसीको हैजा हो जाता
है तो उसको गंगाजल पिलाते हैं । इससे उसे दस्त होने लगते हैं तथा हैजे के
कीटाणु नष्ट हो जाते हैं और वह स्वस्थ हो जाता है । वैसे तो हैजे के समय
घोषणा कर दी जाती है कि पानी उबालकर ही पियें । किंतु गंगाजल के पान से तो
यह रोग मिट जाता है और केवल हैजे का रोग ही मिटता है ऐसी बात नहीं है, अन्य
कई रोग भी मिट जाते हैं । तीव्र व दृढ़ श्रद्धा-भक्ति हो तो गंगास्नान व
गंगाजल के पान से जन्म-मरण का रोग भी मिट सकता है ।सन्
1947 में जलतत्त्व विशेषज्ञ कोहीमान भारत आया था । उसने वाराणसी से
#गंगाजल लिया । उस पर अनेक परीक्षण करके उसने विस्तृत लेख लिखा, जिसका सार
है – ‘इस जल में कीटाणु-रोगाणुनाशक विलक्षण शक्ति है ।’दुनिया
की तमाम #नदियों के जल का विश्लेषण करनेवाले बर्लिन के डॉ. जे. ओ. लीवर ने
सन् 1924 में ही गंगाजल को विश्व का सर्वाधिक स्वच्छ और
#कीटाणु-रोगाणुनाशक जल घोषित कर दिया था ।‘आइने
अकबरी’ में लिखा है कि ‘अकबर गंगाजल मँगवाकर आदरसहित उसका पान करते थे ।
वे गंगाजल को अमृत मानते थे ।’ औरंगजेब और मुहम्मद तुगलक भी गंगाजल का पान
करते थे । शाहनवर के नवाब केवल गंगाजल ही पिया करते थे ।कलकत्ता
के हुगली जिले में पहुँचते-पहुँचते तो बहुत सारी नदियाँ, झरने और नाले
गंगाजी में मिल चुके होते हैं । अंग्रेज यह देखकर हैरान रह गये कि हुगली
जिले से भरा हुआ गंगाजल दरियाई मार्ग से यूरोप ले जाया जाता है तो भी कई-कई
दिनों तक वह बिगड़ता नहीं है । जबकि यूरोप की कई बर्फीली नदियों का पानी
हिन्दुस्तान लेकर आने तक खराब हो जाता है ।अभी रुड़की विश्वविद्यालय के #वैज्ञानिक कहते हैं कि ‘गंगाजल में जीवाणुनाशक और हैजे के कीटाणुनाशक तत्त्व विद्यमान हैं ।’फ्रांसीसी
चिकित्सक हेरल ने देखा कि गंगाजल से कई रोगाणु नष्ट हो जाते हैं । फिर
उसने गंगाजल को कीटाणुनाशक औषधि मानकर उसके इंजेक्शन बनाये और जिस रोग में
उसे समझ न आता था कि इस रोग का कारण कौन-से कीटाणु हैं, उसमें गंगाजल के वे
इंजेक्शन रोगियों को दिये तो उन्हें लाभ होने लगा !संत #तुलसीदासजी कहते हैं :गंग सकल मुद मंगल मूला । सब सुख करनि हरनि सब सूला ।।(श्रीरामचरित. अयो. कां. : 86.2)सभी
सुखों को देनेवाली और सभी शोक व दुःखों को हरनेवाली माँ गंगा के तट पर
स्थित तीर्थों में पाँच तीर्थ विशेष आनंद-उल्लास का अनुभव कराते हैं :
गंगोत्री, हर की पौड़ी (हरिद्वार),  #प्रयागराज त्रिवेणी, काशी और #गंगासागर
। #गंगादशहरे के दिन गंगा में गोता मारने से सात्त्विकता, प्रसन्नता और
विशेष पुण्यलाभ होता है ।Official Azaad Bharat Links:👇🏻🔺Youtube : https://goo.gl/XU8FPk🔺Facebook : https://www.facebook.com/AzaadBharat.Org/🔺 Twitter : https://goo.gl/he8Dib🔺 Instagram : https://goo.gl/PWhd2m🔺Google+ : https://goo.gl/Nqo5IX🔺Blogger : https://goo.gl/N4iSfr🔺 Word Press : https://goo.gl/ayGpTG🔺Pinterest : https://goo.gl/o4z4BJ



गंगा दशहरा हिन्दुओं का एक प्रमुख त्योहार है। ज्येष्ठ शुक्ला दशमी को दशहरा कहते हैं। इसमें स्नान, दान, रूपात्मक व्रत होता है। स्कन्दपुराण में लिखा हुआ है कि, ज्येष्ठ शुक्ला दशमी संवत्सरमुखी मानी गई है इसमें स्नान और दान तो विशेष करके करें। किसी भी नदी पर जाकर अर्घ्य (पू‍जादिक) एवं तिलोदक (तीर्थ प्राप्ति निमित्तक तर्पण) अवश्य करें।
ऐसा करने वाला महापातकों के बराबर के दस पापों से छूट जाता है।

पुराणों के अनुसार गंगा दशहरा के दिन गंगा स्नान का विशेष महत्व है। इस दिन स्वर्ग से गंगा का धरती पर अवतरण हुआ था, इसलिए यह महापुण्यकारी पर्व माना जाता है। गंगा दशहरा के दिन सभी गंगा मंदिरों में भगवान शिव का अभिषेक किया जाता है। वहीं इस दिन मोक्षदायिनी गंगा का पूजन-अर्चना भी किया जाता है।

गंगा दशहरे का महत्व | Importance of Ganga Dusshera
भगीरथी की तपस्या के बाद जब गंगा माता धरती पर आती हैं उस दिन ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की दशमी थी. गंगा माता के धरती पर अवतरण के दिन को ही गंगा दशहरा के नाम से पूजा जाना जाने लगा. इस दिन गंगा नदी में खड़े होकर जो गंगा स्तोत्र पढ़ता है वह अपने सभी पापों से मुक्ति पाता है. स्कंद पुराण में दशहरा नाम का गंगा स्तोत्र दिया हुआ है.
गंगा दशहरे के दिन श्रद्धालु जन जिस भी वस्तु का दान करें उनकी संख्या दस होनी चाहिए और जिस वस्तु से भी पूजन करें उनकी संख्या भी दस ही होनी चाहिए. ऎसा करने से शुभ फलों में और अधिक वृद्धि होती है.
गंगा दशहरे का फल | Results of Ganga Dusshera
ज्येष्ठ शुक्ल दशमी के दिन गंगा स्नान करने से व्यक्ति के दस प्रकार के पापों का नाश होता है. इन दस पापों में तीन पाप कायिक, चार पाप वाचिक और तीन पाप मानसिक होते हैं. इन सभी से व्यक्ति को मुक्ति मिलती है.

बागेश्वर दर्शन

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