Posted in PM Narendra Modi

चलो, एक कहानी सुनाता हूँ—उस आदमी की, जो खुद को ‘प्रधान सेवक’ कहता है।

2014 की एक सुबह…
जब उसने देश की सबसे बड़ी कुर्सी नहीं—देश की सबसे भारी जिम्मेदारी संभाली थी।

उससे पहले भी कई लोग इस पद पर बैठे थे—काबिल, पढ़े-लिखे, अनुभवी। लेकिन इस बार जनता की आंखों में उम्मीद कुछ और थी…
जैसे यह एक नेता नहीं,
बल्कि, देश की दिशा बदलने आया, कोई जिद्दी तपस्वी हो।

पहले ही भाषण में वह कह गया—”निर्णय गलत हो सकता है………लेकिन मेरी नीयत कभी गलत नहीं होगी।” यही एक पंक्ति थी जिसने करोड़ों दिलों में जगह बना ली।

फिर उसने बनाई एक टीम…
न कोई रिश्वत, न कोई रिश्तेदारी,
न कोई सौदा—बस एक संकल्प:
ना खाऊँगा, न खाने दूँगा।

उसका मंत्र साफ था – सबका साथ, सबका विकास। उसका लक्ष्य अडिग था— भारत को आत्मनिर्भर बनाना। उसका ध्येय स्पष्ट था—भारत को फिर सिर ऊँचा कर चलने लायक बनाना।

और फिर शुरू हुई एक अटूट यात्रा…

ना छुट्टी,
ना आराम,
ना त्योहार की फुर्सत,
ना मौसम की परवाह।

कभी तपती गर्मी,
कभी चुभती सर्दी,
कभी बरसात की मार—
लेकिन वह चलता रहा,
हमेशा की तरह…
24 घंटे, देश के नाम।

उसे न वेतन का लोभ,
न पदकों का लालच,
न पुरस्कारों का मोह।
अपनों को फायदा दिलाने की आदत भी न थी…
वह तो उन लोगों में से है
जो कहते हैं—“मैं अपने लिए क्या रखूँ? मैं तो देश के लिए ही बना हूँ।”

कितनी ही गालियाँ पड़ीं,
कितने ही तंज सुने गए,
कितने ही आरोप लगे।
पर हर बार वह मुस्कुराया…
और आगे बढ़ गया।

कैसा भी तूफ़ान क्यों न आया हो,
वह कभी डिगा नहीं—
क्योंकि उसकी लड़ाई राजनीति से नहीं – राष्ट्र-निर्माण के लिए थी।

आज ग्यारह साल से भी ज्यादा हो गए…एक भी छुट्टी नहीं। एक भी दिन आराम नहीं। एक भी लम्हा देश की भावना से दूर नहीं। वह अपना रिपोर्ट कार्ड लेकर 2029 में फिर जनता के सामने खड़ा होगा, सिर ऊँचा करके।

“और अगर जनता कभी उसे कहे—अब बस, आपका काम पूरा हुआ”—तो वह सचमुच उठाकर अपना झोला, किसी हिमालय के मार्ग पर चल पड़ेगा…

Ravi Bilgaiyan

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