Posted in गौ माता - Gau maata

कुत्ता पालो तो पशु प्रेमी, भैंस पालो तो गंवार… यह कैसा समाज बना लिया हमने?🤔

यह चित्र सिर्फ हास्य नहीं, बल्कि “समाज की मानसिकता पर गहरा प्रहार” है।

यह दिखाता है कि कैसे एक ही काम  “जानवर पालने” को दो अलग-अलग वर्गों में बाँट दिया गया है:
एक “क्लासी” कहलाता है, दूसरा “गंवार”।

हमने समाज को इतना दिखावे का बना दिया है कि सच्चाई और मेहनत अब स्टेटस’ से मापी जाने लगी है।

कुत्ता-बिल्ली पालना “आधुनिकता का पर्योय” हो गया,

लेकिन जो किसान भैंस-बकरी पालता है, वही हमें “गंवार” दिखने लगता है।
सोचिए  क्या यह सभ्यता है या मानसिक गुलामी?🥹

गाँव का वह आदमी, जो रोज़ सुबह उठकर भैंस का चारा काटता है,

उसके हाथों में मिट्टी लगी होती है, लेकिन वही मिट्टी इस देश का अन्न देती है।

वह ‘गंवार’ नहीं है  वह हमारे जीवन का आधार है।
पर अफसोस! शहर की चमक ने हमें इतना अंधा कर दिया है कि

हमने मेहनत को ही नीचा समझना शुरू कर दिया।

कुत्ता पालने वाला अगर कह दे
“मैं अपने पेट को परिवार समझता हूँ”
तो सब ताली बजाते हैं,

“क्या संवेदनशील व्यक्ति है!”

पर भैंस पालने वाला अगर कह दे
“ये मेरी लाडो है, मेरे परिवार जैसी है,”
तो हम हँस पड़ते हैं…

क्यों? क्योंकि उसका प्यार ‘ब्रांडेड नस्ल’ से नहीं जुड़ा।

असल में यह फर्क जानवरों में नहीं,
हमारी सोच की जात में है।

शहर में जानवर पालना “शौक” कहलाता है,

गाँव में जानवर पालना “ज़रूरत” कहलाता है।

और हमें “ज़रूरत वाले लोग” छोटे लगते हैं,

क्योंकि हमने मेहनत से ज़्यादा दिखावे को मूल्य बना दिया है।

कुत्ता पालने वाले की फोटो इन्स्टाग्राम पर जाती है,
#PetLove #DogMom’ के साथ।
भैंस पालने वाला वही फोटो डाल दे,
तो लोग कहेंगे  “अरे भाई ये क्या डाल दिया!”
अरे भाव एक ही है ना  प्रेम का, जीवन का, सेवा का।
फर्क सिर्फ फ्रेम में है।

हम ऐसे समाज में पहुँच चुके हैं जहाँ
‘Milk in Starbucks cup’ classy लगता है,
पर वही दूध निकालने वाली गाय भैंस ‘dirty’ लगती है।
हमने ‘Source’ को नीचा और ‘Result’ को ऊँचा मान लिया है।
यही आधुनिकता की सबसे बड़ी बीमारी है।

भैंस पालने वाला जो घाम-धूप में खड़ा रहता है,
उसका हर दिन परिश्रम का उत्सव है।
वह Animal Lover नहीं, Animal Servant है
क्योंकि वह उस जानवर से अपने परिवार का पेट भरता है,
उसकी सेवा करता है,
और बदले में समाज उसे ‘गंवार’ कह देता है।🥹

हमारी शिक्षा ने हमें डिग्री दी है, पर दृष्टि नहीं।
हमने यह तो सीख लिया कि कौन-सा कुत्ता किस नस्ल का है,

पर यह नहीं सीखा कि “भैंस की आँखों में भी वही भाव हैं”
जो तुम्हारे पालतू कुत्ते की आँखों में हैं
विश्वास, ममता और जुड़ाव।😍

ये सिर्फ भैंस-बकरी का मुद्दा नहीं है,
ये मानसिकता का दर्पण है।

हमने “शहर का दिखावा” और “गाँव की सच्चाई” के बीच

एक अदृश्य दीवार खड़ी कर दी है।
और दुख की बात ये है
अब वो दीवार हमारे अंदर भी बस गई है।

कभी गाँव जाओ,
देखना कोई किसान अपनी गाय के सिर पर हाथ फेरता है,

तो उसमें एक माँ जैसी ममता होती है।
वो दूध सिर्फ बेचने के लिए नहीं निकालता,
वो उसे “प्रसाद” मानता है।
पर हम शहर वाले उस प्रसाद को भी
“प्रोडक्ट” समझने लगे हैं।

Animal Lover” बनने के लिए नस्ल या कपड़ा नहीं चाहिए,
चाहिए तो बस दयाभाव।
चाहे वो कुत्ते के लिए हो या भैंस के लिए
प्रेम की भावना वही है।
जिसे हम गंवार कहते हैं,
वो धरती के सबसे बड़े Animal Lover होते हैं,
बस अंग्रेज़ी नहीं जानते।

याद रखो 👇
जो भैंस-बकरी पालता है,
वही तुम्हारे घर की दूध की मिठास है।
जिसे तुम गंवार कहते हो,
वो तुम्हारे बच्चों की सेहत का रक्षक है।
और जिसे तुम Animal Lover कहते हो,
वो सिर्फ फोटो खिंचवाने के लिए प्रेम दिखाता है।

कभी खुद से पूछो
हम जानवरों से प्रेम करते हैं, या उनके साथ अपने image से?
कुत्ता पालने से पहले,
एक बार उस किसान की आँखों में झाँको जिसने तुम्हारे घर का दूध भेजा है।
वो सच्चा Animal Lover है,
क्योंकि उसके प्रेम में “फैशन” नहीं, “सेवा” है।

💭 सोचिए — अगर समाज सच्चे कर्मयोगियों को  को गंवार कहेगा,
तो हमारी आधुनिकता किस दिशा में जा रही है?

क्या सच में “Animal Lover” होना सिर्फ एक पालतू कुत्ते तक सीमित है?
या फिर भैंस पालने वाला भी उसी श्रेणी में आता है
बस उसका Instagram अकाउंट नहीं है?

अगर यह बात दिल को लगी हो,
तो बस एक बार दिल से सोचिए 🤔
गंवार कौन है? वो जो मेहनत करता है,
या वो जो मेहनत करने वालों का मज़ाक
गंवार कौन है? वो जो मेहनत करता है,
या वो जो मेहनत करने वालों का मज़ाक उड़ाता है?

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