Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक, भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

सन 1680 में औरंगजेब को समझ आ चुका था कि शिवाजी को रोकने उसे स्वयं ही दक्खन जाना होगा। पांच लाख की विशाल फौज लेकर वह दक्खन की ओर निकला और उसके वहां पहुंचने के पहले ही छत्रपति की मृत्यु हो गई।

औरंगजेब को लगा अब तो मराठों को पराजित करना अत्यंत आसान होगा।

परन्तु छत्रपति सम्भाजी ने 1689 तक उसे जीतने नहीं दिया। अपने सगे साले की दगाबाजी की वजह से छत्रपति सम्भाजी पकड़े गए और औरंगजेब ने अत्यन्त क्रूर और वीभत्स तरीके से उनकी हत्या करवा दी।

अब छत्रपति बने राजाराम मात्र 20 वर्ष के थे और औरंगजेब के अनुभव के सामने कच्चे थे। एकबार फिर उसे दक्खन अपनी मुट्ठी में नज़र आने लगा था।

यहीं से इतिहास यह बताता है कि छत्रपति शिवाजी ने किस आक्रामक संस्कृति की नींव डाली थी। हताश हो कर हथियार डालने के बजाय संताजी घोरपड़े और धनाजी जाधव के नेतृत्व में राजाराम को छत्रपति बना कर संघर्ष जारी रहा।

सन 1700 में छत्रपति राजाराम भी मारे गए।

अब उनके दो साल के पुत्र को छत्रपति मान कर उनकी विधवा ताराबाई, जो कि छत्रपति शिवाजी के सेनापति हंबीराव मोहिते की बेटी थी, आगे आई और प्रखर संघर्ष जारी रहा। समय पड़ने पर ताराबाई स्वयं भी युद्ध के मैदान में उतरी।

संताजी और धनाजी ने मुगल सम्राट की नींद हराम कर दी।

कभी सेना के पिछले हिस्से पर, कभी उनकी रसद पर तो कभी उनके साथ चलने वाले तोपखाने के गोला बारूद पर हमले कर मराठों ने मुगलों को बेजार कर दिया। सब लोग इस खौफ में ही रहते थे कि कब मराठे किस दिशा से आएंगे और कितना नुकसान कर जायेंगे।

एक बार संताजी और उनके दो हजार सैनिकों ने सर्जिकल स्ट्राइक की तर्ज पर रात में औरंगजेब की छावनी पर हमला बोल दिया और औरंगजेब के निजी तंबू की रस्सियां काट दी। तंबू के अंदर के सभी लोग मारे गए। परन्तु संयोग से उस रात औरंगजेब अपने तंबू में नहीं था इसलिए बच गया।

27 साल मुगलों का सम्राट, महाराष्ट्र के जंगलों में छावनियां लगा कर भटकता रहा। रोज यह भय लेकर सोना पड़ता था कि मराठों का आक्रमण न हो जाए।

27 साल कुछ हजार मराठे लाखों मुगलों से लोहा भी ले रहे थे और उन्हें नाकों चने भी चबवा रहे थे। 27 वर्ष सम्राट अपनी राजधानी से दूर था। लाखों रुपए सेना के इस अभियान पर खर्च हो रहे थे। मुगलिया राज दिवालिया हो रहा था। अन्तत: सन 1707 में औरंगजेब की मृत्यु हो गई। 27 वर्षों के सतत युद्ध और संघर्ष के बाद भी मराठों ने घुटने नहीं टेके। छत्रपति के दिए लक्ष्य की प्राप्ति के लिए हजारों मराठे कट गए।

यह इतिहास भी कहां पढ़ाया जाता है . ?

कितने लोग है जिन्हें ताराबाई, संताजी और धनाजी के नाम भी मालूम है, पराक्रम तो छोड़ ही दीजिए…
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Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

साध्वी प्रज्ञा सिंह और कर्नल पुरोहित को कोर्ट ने बाइज्जत बरी किया।

“कुत्ती” , “कमीनी” , “वेश्या” , “कुलटा  ” बोल इस भगवा में किसकी रखैल है तू ?
“अब तक कितनों के बिस्तर पर गई‎ है,,,?”
“किसके इशारे पर सब कर रही है ?”
“जिंदगी प्यारी है तो जो मैं कहता हूँ कबुल कर ले बाकी जिंदगी आराम से कटेगी”
यह शब्द सुनकर आपकी त्योरियां जरुर चढ़ गई‎ होगी
मेरी भी चढ़ गई थी,,,।

ऐसे घृणित शब्दों से किसी और को नहीं,,,,
बल्कि भगवा वस्त्र धारिणी निष्कलंक साध्वी प्रज्ञा सिंह को कलंकित “कांग्रेस”‎ के इशारे पर  मुम्बई ATS चीफ  हेमंत करकरे के सामने मुम्बई पुलिस व ATS ने कहलवाया था.

जिस हेमंत  करकरे को आज शहीद मान कर सम्मान दिया जाता है एक नम्बर का नी#,ch आदमी था. उस निर्दोष हिंदू साध्वी का श्राप लगा और आज हेमंत करकरे के परिवार में कोई दीपक जलाने वाला भी जीवित नहीं बचा है ।

मैं साध्वी प्रज्ञा जी का एक साक्षात्कार देख रहा था।
ऐसे घृणित शब्दों को इशारे में बताया।
बताते हुए उनके नेत्र सजल हो गये.
साक्षात्कार देखते हुए क्रोधाग्नि से धधक रहे मेरे आँखो से भी अश्रु की धारा फूट पड़ी।
“साध्वी प्रज्ञा” ने मर्माहत शब्दों में वृत्तान्त सुनाया कि
मेरे शरीर का कोई‎ ऐसा अंग नही जिसे चोटिल ना किया गया हो।
जब पत्रकार ने पुछा कि
मारने के कारण ही आपके रीढ़ की हट्टी टूट गई‎ थी ??
साध्वी प्रज्ञा ने कहा,
“नहीं, मारने से नहीं,
एक जन हमारा हाथ पकड़ते थे एक जन पांव और झूलाकर दीवार की तरफ फेंक देते थे,
ऐसा प्राय: रोजाना होता था दीवार से सर टकराकर सुन्न हो जाता था।
कमर में भयानक दर्द होता था। ऐसा करते करते एक दिन रीढ़ की हड्डी टूट गई तब अस्पताल में भर्ती कराया गया।”
साध्वी प्रज्ञा ने बताया,
“एक दिन तो ऐसा हुआ कि
मारते मारते एक पुलिस वाला थक गया तो
दूसरा मारने लगा।
उस दौरान मेरे फेफड़े की झिल्ली फट गई‎ फिर भी विधर्मी निर्दयता से मारता रहा.”.
साध्वी प्रज्ञा ने बताया,
“रीढ़ की हड्डी टूटने के बाद मैं बेहोश हो गई‎ थी।
जब होश आया तो देखा कि
मेरे शरीर से सारा भगवा वस्त्र उतार लिया गया गया था.
मुझे एक फ्राक पहनाया गया था।”
साध्वी दीदी ने बताया,
“मेरे साथ मेरे एक शिष्य को भी गिरफ्तार किया गया था ।
उसे मेरे सामने लाकर उसे चौड़ा वाला बेल्ट दिया और कहा मार!! अपने गुरु को इस साली को!!”
.”शिष्य, सकुचाने लगा तो मैं बोली मारो मुझे !!
शिष्य ने मजबुरी में मारा तो जरुर मुझे
लेकिन नरमी से।
तब एक पुलिस वाले ने शिष्य से बेल्ट छीन कर शिष्य को बुरी तरह पीटने लगा और बोला ऐसे मारा जाता है.
“साध्वी प्रज्ञा ने बताया कि
एक दिन कुछ पुरुष‎ कैदियों के साथ मुझे खड़ी करके अश्लील आडियो सुनाया जा रहा था.
मेरे शरीर पर इतनी मार पड़ी थी कि
मेरे लिए खड़ी रहना मुश्किल था. मैं बोली कि बैठ जाऊँ वो बोले साली शादी मे आई है क्या कि बैठ जायेगी!!
मेरी आँख बंद होने लगी मैं अचेत हो गई।
साध्वी प्रज्ञा ने बताया,
“मेरे दोनों हाथों को सामने फैलवाकर एक चौड़े बेल्ट से मारते थे,
मेरा दोनो हाथ सूज जाता था।
अँगुलियां भी काम नही करती थी,
तब गुनगुना पानी लाया जाता था। मैं अपने हाथ उसमें डालती,
कुछ आराम होता तब अंगलुियां हिलने डुलने लगती थी,
तो फिर से वही क्रिया मेरे पर मार पड़ती थी।
साध्वी प्रज्ञा जी ने बताया कि
मुझे तोड़ने के लिए मेरे चरित्र पर लांछन लगाया।
क्योंकि लोग जानते हैं कि
किसी औरत को तोड़ना है तो उसके चरित्र पर दाग लगाओ !
मेरे जेल जाने के बाद यह सदमा मेरे पिताजी बर्दास्त नहीं कर पाये और इस दुनियां से चल बसे. साध्वी जी राहत की सांस लेते हुए कहती हैं मेरे अन्दर रहते ही,
एक दुर्बुद्धि दुराचारी हेमंत करकरे को तो सजा मिल गई‎ मिल गई अभी बहुत लोग बाकी है।
साध्वी ने बताया,
“नौ साल जेल में थी,
सिर्फ एक दिन एक महिला ने एक डंडा मारा था,
बाकी हर रोज पुरुष ही निर्दयता से हमें पीटते थे.”
पत्रकार ने पूछा,
“आपको समझ में तो आ गया होगा कि क्यों आपको इतने बेरहमी से तड़पाया जा रहा था?”
साध्वी जी ने कहा,
“हां, भगवा के प्रति उनका द्वेश था।
फूटी आंख भी भगवा को नही देखना चाहते थे।
भगवा को बदनाम करने का कांग्रेस ने एक सुनियोजित षडयंत्र तैयार किया था.”
साध्वी ने बताया कि
एक बार कांग्रेस का गुलाम, स्वामी अग्निवेष मुझसे मिलने जेल में आया और बोला,
“आप सब कबुल कर लो कि
हां! यह सब RSS के कहने पर हुआ है।
इसमें यूपी के सांसद योगी आदित्य नाथ और संघ के इंद्रेश कुमार का नाम ले लो ।
सरकारी गवाह बन जाओ।
चिदम्बरम और दिग्विजय हमारे मित्र हैं।
मै आपको छुड़वा दुंगा”
साध्वी जी ने कहा,
“अगर आपकी उनसे घनिष्ठता है और सच में हमें छुड़ाना चाहते हो,
तो चिदम्बरम से जाकर बोलो की इमानदारी से जांच करवा ले, क्योंकि मैंने ऐसा कुछ किया ही नही है ।”
हिन्दुओं सबसे ख़ास बात ये कि साध्वी पर ये अत्याचार किसी इस्लामिक काल में नही हुआ है

इसके आगे आपको सोचना है कि काँग्रेसियों के मन मे हिन्दुओं के लिए कितना प्रेम है।

काँग्रेस का चुनाव घोषणा पत्र आपने पढ लिया होगा।

अब आपको निर्णय करना है कि आपको कैसा भारत चाहिये ,
और यदि अंतरात्मा ,स्वधर्म गौरव और स्वाभिमान  नाम की कोई चीज है हिंदुओं के जेहन में तो तुम हिंदुओं को कसम है अयोध्या में विराजमान तुम्हारे आराध्य राम की,  शहीद रामभक्तों और शहीदों के खून से लाल हुयी सरयू नदी की,  इस सपा+ कांग्रेस को जीवन में कभी भी वोट मत देना।

हिन्दू आतंकवाद शब्द गढ़ने का कांग्रेस ने गंदा प्रयास किया लेकिन आज कोर्ट ने इनके झूठ की पोल खोल दी है।

ऐतिहासिक फैसला,,!

16 साल बाद, #NIA कोर्ट ने 2008 के मालेगांव मामले में साध्वी प्रज्ञा, लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित और अन्य को क्लीन चिट दे दी है।

सभी कांग्रेस  के द्वारा बनाए गए कथित आरोपीयो को बरी किया गया।

तथाकथित “भगवा आतंकवाद” का मिथक ध्वस्त हो गया है।

कांग्रेस की राजनीतिक प्रतिशोध की भावना उजागर हुई है। यह सिर्फ़ एक फैसला नहीं है, बल्कि वोट बैंक की राजनीति के लिए संतों और सैनिकों को बदनाम करने वालों के मुँह पर तमाचा है।

सत्यमेव जयते,,,,
दोस्तों  जानकारी अच्छी लगे तो कृपया पेज को फॉलो और पोस्ट को शेयर जरूर करें,,,,,
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Posted in खान्ग्रेस, हिन्दू पतन

वह मस्जिद से बाहर निकला था और सरदार पटेल पर हमला किया था।

हमें सिखाया गया कि महात्मा गांधी की हत्या नाथूराम गोडसे ने की थी,

लेकिन हमें कभी नहीं सिखाया गया कि 14 मई 1939 को भावनगर में सरदार वल्लभभाई पटेल पर किसने हमला किया,

किसने उनकी हत्या करने की कोशिश की, और अदालत ने कितने आरोपियों को फांसी या आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई।

भावनगर में 14 और 15 मई 1939 को भावनगर राज्य प्रजा परिषद का पाँचवाँ अधिवेशन आयोजित होना था, जिसकी अध्यक्षता सरदार वल्लभभाई पटेल करने वाले थे।

जब सरदार पटेल भावनगर पहुँचे, तो रेलवे स्टेशन से एक भव्य शोभायात्रा निकाली गई।

सरदार पटेल एक खुली जीप में बैठे हुए थे, दोनों ओर खड़ी जनता का अभिवादन स्वीकार कर रहे थे।

जब जुलूस खार गेट चौक पहुँचा, तो नगीना मस्जिद में छिपे हुए 57 तथाकथित शांतिप्रिय लोग तलवारें, चाकू और भाले लेकर जीप की ओर दौड़ पड़े।

दो युवकों — बच्छुभाई पटेल और जाधवभाई मोदी — ने यह दृश्य देखा।

उन्होंने तुरंत सरदार पटेल को चारों ओर से घेर लिया ताकि उन्हें बचा सकें, और अपनी जान की परवाह किए बिना, वे उन वारों को अपने ऊपर ले लिए जो सरदार पटेल के लिए किए गए थे।

उन्होंने सरदार पटेल की ढाल बनकर अपने प्राणों की आहुति दे दी।

हमलावरों ने दोनों युवकों पर तलवार से कई वार किए — बच्छुभाई पटेल वहीं शहीद हो गए, जबकि जाधवभाई मोदी ने अस्पताल में दम तोड़ दिया।

आज भी उन वीर युवकों की प्रतिमाएँ उसी स्थान पर स्थापित हैं जहाँ उन्होंने अपने प्राण न्योछावर किए थे।

तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने इस घटना की गहन जांच की और एक विशेष न्यायालय गठित किया।

57 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया, जिनमें से:

• आजाद अली

• रुस्तम अली सिपाही — को फांसी की सज़ा सुनाई गई।

निम्नलिखित 15 अपराधियों को आजीवन कारावास की सज़ा दी गई:

• कासिम दोसा घांची

• लतीफ मियां काज़ी

• मोहम्मद करीम सैनिक

• सैयद हुसैन

• चंद्र गुलाब सैनिक

• हाशिम सुमरा ताह

• लुहार मूसा अब्दुल्ला

• अली मियां अहमद मियां सैयद

• अली मामद सुलेमान

• मोहम्मद सुलेमान कुम्भार

• अबू बकर अब्दुल्ला

• लुहार अहमदिया

• मोहम्मद मियां काज़ी

उन्होंने अदालत में कहा कि सरदार वल्लभभाई पटेल ने कोलकाता में मुस्लिम लीग के खिलाफ भाषण दिया था,

जिसके कारण उनकी हत्या की साजिश रची गई।

यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि सरदार पटेल की मृत्यु के बाद, नेहरू सरकार ने इस ऐतिहासिक घटना को इतिहास की पुस्तकों से मिटा दिया,

ताकि आने वाली पीढ़ियाँ यह न जान सकें कि सरदार पटेल पर भी एक घातक हमला और हत्या का षड्यंत्र हुआ था।
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Posted in खान्ग्रेस

नेहरु का ये मानना था की देश की सेना को सँभालने के लिए भारतीयों के पास काबिलियत और अनुभव नहीं है इसलिए भारतीय सेना का अध्यक्ष कोई विदेशी होना चाहिए क्योकि अंग्रेजो की सेना में भारतीय निचले तबके पर ही रहे और उन्होंने आजाद भारत की सेना का पहला अध्यक्ष बनाया एक अंग्रेज जनरल रॉब लॉकहार्ट को ।

1948 के अंत में रॉब लोकहार्ट ने इस्तीफा दे दिया क्योकि वो इंग्लैंड में ही रहना चाहते थे और सेना अध्यक्ष का पद खाली हो गया एक नए अंग्रेज सेना अध्यक्ष को नियुक्त करने के लिए नेहरु ने मंत्रिमंडल की मीटिंग बुलाई , उस मीटिंग में कुछ भारतीय लेफ्टिनेंट रैंक के ऑफिसर भी थे ।

नेहरु ने बोलना शुरू किया , क्योकि भारतीयों के पास सेना सँभालने का अनुभव नहीं है इसलिए इन नामो में से आपको कौन सा विदेशी जनरल ठीक लगता है पर अपनी राय दे ।

इस पर कर्नल नाथू सिंह राठोर खड़े हुए और नेहरु से बोले … “किसी भारतीयों को प्रधानमंत्री होने का भी अनुभव नहीं है,तो आप यहाँ क्यों बैठे है इस पद पर भी किसी अंग्रज को बिठाइये, दुनिया में एसा कौन सा देश है जो अपनी सेना का अध्यक्ष विदेशी को बनाता है” ।

ये सुनते ही नेहरु तिलमिला गए और उनको बाहर कर दिया । रक्षा मंत्री बलदेव सिंह, नाथू सिंह के इस साहस से खुश हुए और उन्होंने उनके पुरे रिकॉर्ड मंगवाए , तो पता चला नाथू सिंह बर्मा में और विश्व युद्ध में सेना की टुकड़ी का सफल नेतृत्व कर चुके थे और उन्होंने नेहरु को नाथू सिंह को ही सेना अध्यक्ष बनाने की शिफारिश कर दी ।
पर क्योकि नेहरु नाराज थे उन्हें नहीं बनाया गया लेकिन दुसरे भारतीय सीएम्_करिअप्पा को सेना अध्यक्ष बनाया ।

ये नाथू सिंह राठोर उन्ही महाराणा प्रताप की धरती से थे, जिन्हें मुग़ल कभी हरा नहीं पाए ।

जय हिन्द,,जय भारत,,,..
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