Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

जयद्रथ ने अभिमन्यु को एक खरोंच भी नही लगाई थी फिर भी अर्जुन ने उसको मारने की प्रतिज्ञा क्यों ली? ये बहुत रोमांचक प्रसंग है।

सबसे पहले तो यह समझे कि जयद्रथ कौन था!!

वो दुर्योधन की बहन का पति था, जब पांडव वनवास में थे तब दुर्योधन ने ऋषि दुर्वासा को पांडवों के पास भेजा ताकि वह क्रोधित होकर पांडवों को श्राप दे।

जब उसका यह पैंतरा असफल हो गया तब उसने जयद्रथ को भड़का कर पांडवों के पास भेजा। जयद्रथ ने मौका देखा जब कोई भी पांडव आस पास नहीं था तब उसने द्रौपदी का हरण कर लिया और उसको लेकर अपने राज्य की तरफ़ रथ से भाग निकला। पर अर्जुन और भीम ने उसको रास्ते में ही पकड़ लिया,भीम ने उसके सिर के बाल जगह-जगह से काट दिए और उस को जमकर पीटा। पर युधिष्ठिर ने दया दिखाते हुए जयद्रथ को जीवित छोड़ छोड़ दिया!!

कहा जाता है कि इसके बाद जयद्रथ ने महादेव की तपस्या की और यह वरदान प्राप्त किया कि एक दिन के लिए अर्जुन को छोड़कर वह सभी पांडवों पर भारी पड़ेगा।

महाभारत युद्ध के तेरहवें दिन जब गुरु द्रोणाचार्य ने चक्रव्यूह की रचना की, तो सुशर्मा नाम के राजा ने अर्जुन को बड़ी चालाकी से युद्ध भूमि के एक हिस्से में अटका लिया ताकि चक्रव्यूह से युधिस्ठिर को बन्दी बनाया जा सके।

बचे हुए पांडव दल में यह योजना बनी की अभिमन्यु चक्रव्यूह तोड़ना तो जानता है तो वह अंदर घुसते जाएगा और बाकी लोग उसके पीछे- पीछे चक्रव्यूह में घुसकर चक्रव्यूह को अंदर से तोड़ देंगे। अभिमन्यु तो अंदर चला गया पर बाकी लोगों को जयद्रथ और उसकी सेना ने किसी तरह से बाहर ही रोक दिया।

अब इसमें अभिमन्यु के चक्रव्यूह तोड़ने की क्षमता जिम्मेदार थी या बाकी लोगों को चक्रव्यूह की जानकारी नहीं होना या जयद्रथ की एक दिन की वीरता का वरदान !! यह अपनी-अपनी सोच है।

मुझे तो लगता है कि बाकी लोग चक्रव्यूह तोड़ना नहीं जानते थे इसलिए वह उसके दरवाजे पर अटक गए इसमें जयद्रथ के वरदान का कोई हाथ नहीं था। क्योंकि पाण्डवों के अलावा धृष्टधुम्न,सात्यकि जैसे योद्धा भी थे जो जयद्रथ को आसानी से हरा सकते थे वो भी असफल रहे क्योंकि चक्रव्यूह को तोड़ना नही जानते थे। ये कारनामा जयद्रथ की औकात के बाहर का था इसलिए महादेव से मिले वरदान की कहानी बन गई।

बाकी कहानी तो हम जानते ही हैं कि अभिमन्यु का वध कई लोगों ने मिलकर किया।

अब मेरे प्रश्न मेरे मन में प्रश्न यह उठता है की अर्जुन ने जयद्रथ के वध की प्रतिज्ञा क्यों की। जबकि अभिमन्यु का वध तो चक्रव्यूह के अंदर हुआ था वहां पर तो जयद्रथ उपस्थित भी नहीं था।

वास्तव में जिन महारथियों ने मिलकर अभिमन्यु का वध किया था ,वो कैसे भी हों पर युद्ध भूमि में वीर थे। उनमें से किसी को भी अभिमन्यु के वध पर गर्व तो नहीं ही हुआ होगा।

चूंकि वह बहुत ज्यादा उग्र हो रहा था कौरवों की सेना को मार रहा था इसलिए सबको मिलकर उसका वध करना पड़ा। इसलिए उस दिन किसी ने अपनी वीरता पर गाल नहीं बजाए होंगे। जबकि जयद्रथ सबको जा जाकर सुना रहा होगा कि किस तरह उसने कई पांडव योद्धाओं को चक्रव्यू के द्वार पर ही रोक लिया इसलिए अंदर के लोग अभिमन्यु का आखेट कर पाए। इसी तरह की बातें अर्जुन के कान में पड़ी। और पांडव अभिमन्यु की सहायता के लिए पीछे-पीछे जा रहे थे, लेकिन जयद्रथ ने उन्हें व्यूह के द्वार पर ही रोक दिया। जिससे अभिमन्यु को कोई सहायता नहीं पहुंच सकी। इसलिए उसने अगले दिन के सूर्यास्त से पहले जयद्रथ के वध की प्रतिज्ञा की ताकि अभिमन्यु वध का यश जयद्रथ को न मिले।

अगले दिन सारी कौरव सेना का एक ही लक्ष्य था कि जयद्रथ को किसी भी तरह शाम तक जिंदा रखो। जब दुर्योधन को अर्जुन की भीषण प्रतिज्ञा का पता चला, तो वह डर गया। द्रोणाचार्य ने जयद्रथ को बचाने के लिए तीन परतों वाला सैन्य चक्र बनाया।
सबसे आगे शकट व्यूह, बीच में चक्रव्यूह और अंत में पद्मव्यूह। जयद्रथ को इन तीनों व्यूहों के सबसे पिछले हिस्से में, यानी अर्जुन से मीलों दूर रखा गया, जहाँ हज़ारों योद्धा और हाथी उसकी सुरक्षा में तैनात थे।

अर्जुन के पास सूर्यास्त तक का ही समय था। उस दिन अर्जुन ने अपनी पूरी शक्ति झोंक दी। मार्ग में द्रोणाचार्य, दुर्योधन और कर्ण जैसे योद्धाओं ने उन्हें रोकने की कोशिश की, लेकिन अर्जुन किसी से उलझने के बजाय गांडीव से रास्ता बनाते हुए आगे बढ़ते रहे। श्रीकृष्ण ने रथ को इतनी कुशलता से चलाया कि वे शाम तक जयद्रथ के करीब पहुँच गए, लेकिन तब तक सूर्य अस्ताचल की ओर झुक चुका था। उस दिन अर्जुन और बाकी पाण्डवों ने मिलकर सहस्त्रों कौरव सैनिकों को मार दिया, सर्वाधिक विनाश हुआ।

जैसे-जैसे शाम हुई, जयद्रथ और कौरव सेना में उत्साह बढ़ने लगा क्योंकि अर्जुन अपनी प्रतिज्ञा के हारने के करीब थे। तभी श्रीकृष्ण ने अपनी योगमाया से सूर्य को बादलों के पीछे छिपा दिया। चारों ओर अंधेरा छा गया और ऐसा लगा मानो सूर्यास्त हो गया हो। यह देख कौरव सेना खुशी से झूम उठी। अर्जुन ने गांडीव नीचे रख दिया और अग्नि समाधि की तैयारी करने लगे।

जयद्रथ, जो अब तक डरा हुआ छिपा था, अर्जुन को जलता हुआ देखने की उत्सुकता में सबसे आगे निकल आया और अट्टहास (ज़ोर से हंसना) करने लगा।

जैसे ही जयद्रथ अर्जुन के ठीक सामने आया, श्रीकृष्ण ने बादलों को हटा दिया और सूर्य फिर से चमकने लगा। अभी सूर्यास्त नहीं हुआ था! श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा–

“पार्थ! सूर्य अभी अस्त नहीं हुआ है। वह देखो जयद्रथ तुम्हारे सामने खड़ा है। उठाओ अपना गांडीव और इसका मस्तक धड़ से अलग कर दो!” अंततः जयद्रथ भी मारा गया।

जयद्रथ को मारना इतना सरल नहीं था। उसके पिता वृद्धक्षत्र ने उसे वरदान दिया था कि “जो भी जयद्रथ का मस्तक पृथ्वी पर गिराएगा, उसके अपने सिर के भी सौ टुकड़े हो जाएंगे।”
श्रीकृष्ण ने अर्जुन को निर्देश दिया कि बाण इस प्रकार चलाओ कि जयद्रथ का सिर सीधे उसके पिता की गोद में जाकर गिरे, जो पास के ही आश्रम में तपस्या कर रहे थे। अर्जुन ने वैसा ही किया। जब वृद्धक्षत्र अपनी तपस्या से उठे, तो जयद्रथ का सिर उनकी गोद से नीचे गिर गया और उसी क्षण उनके अपने सिर के भी सौ टुकड़े हो गए।

इस तरह की प्रतिज्ञाएं हमेशा परेशानी लाती हैं, अगर सिर्फ अर्जुन और जयद्रथ का द्वंद युद्ध होता तो 15 मिनट में फैसला हो जाता पर न तो जयद्रथ इस चुनौती को स्वीकार करता न ही दुर्योधन ऐसा होने देता।

कृष्ण कभी इस तरह की प्रतिज्ञाओं के पक्ष में नही रहते थे, वो “विजिगीषु” थे मतलब विजय की इच्छा रखने वाला । अधर्मियों पर विजय सबसे बड़ा ध्येय था। मुझे तो लगता है अगर उस दिन अर्जुन जयद्रथ का वध नही कर पाता तो स्वयं श्री कृष्ण शस्त्र धारण करके युद्ध ही खत्म कर देते।

जय श्री कृष्णा 🙏🏻À

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जब जयद्रथ को मारने की प्रतिज्ञा अर्जुन कर लेते हैं कि सूर्यास्त तक नहीं मारा तो अग्नि समाधी ले लूंगा!!

तो आचार्य द्रोण कमलव्यूह के अंदर जयद्रथ को छुपा देते हैं जिसका आकर 32 कोस का था। जाहिर है वह उस तक कैसे पहुँचते ! जयद्रथ की सुरक्षा में बड़े बड़े वीर तैनात थे।

भगवान कृष्ण बोले, अर्जुन तुम रास्ता साफ करो मैं रथ ले चलता हूँ। संध्या हो आई अब भी 12 कोस रह गया ।

कृष्ण रथ से उतर गये ! अर्जुन ने पूछा, “केशव यह क्या ?”

कृष्ण ने कहा अश्व थक गये हैं। आगे बोलते हुये भगवान कृष्ण जो बोले वह ध्यान देने योग्य है…..

“अर्जुन कदाचित तुमने मेरे उपदेश पर ध्यान नहीं दिया था जो युद्ध के शुरू में मैंने दिया था ! तुम प्रतिज्ञा करने वाले होते कौन हो ? तुम तो निमित्त हो, यदि तुम प्रतिज्ञा न किये होते तो अब तक जयद्रथ को मार देते। तुम्हारा ध्यान एक तरफ सूर्य पर है दूसरी तरफ जयद्रथ पर। इसलिये तुम्हारे निशाने चूक रहें हैं। ऐसा लक्ष्य तय कर दिये कि असफल होने पर तुम्हें ही विनष्ट कर देगा…. यह डर ही तुम्हें हरा देगा।”

भगवान के वचन बड़े सारगर्भित हैं। मुझे नहीं लगता आज तक किसी ने इतनी सुंदर यथार्थ बात की हो ! कई संदर्भों में बात हो सकती है, लेकिन वर्तमान में देखिये सब प्रतिज्ञाबद्ध हो रहे हैं…

धारा 370 हटा दो तभी समर्थन करेंगे !

पाकिस्तान पर हमला कर दो… तभी समर्थन करेंगे !

राममंदिर बना दो… तभी समर्थन करेंगे !

नेतृत्व सक्षम है किसी प्रतिज्ञा की आवश्यकता क्या है ? निश्चित ही दंडात्मक कार्य होगा और हो रहा है। यह ठीक है कि इस समय भावना प्रबल है परंतु इसी समय सुनियोजित तरीके से काम करने की आवश्यकता है। जो विरोधी हैं वह भी यही ढाल बना रहे हैं। फिलहाल उनसे न 370 से मतलब है न राम मंदिर से।

स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि।
धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते॥2- 31॥

अपने खुद के धर्म से तुम्हें हिलना नहीं चाहिये क्योंकि न्याय के लिये किये गये युद्ध से बढ़कर एक क्षत्रिय के लिये कुछ नहीं है||

सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि॥2- 38॥

सुख दुख को, लाभ हानि को, जय और हार को एक सा देखते हुए ही युद्ध करो। एसा करते हुए तुम्हें पाप नहीं मिलेगा||

अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि।
ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि॥2- 33॥

लेकिन यदि तुम यह न्याय युद्ध नहीं करोगे, तो अपने धर्म और यश की हानि करोगे और पाप प्राप्त करोगे||

इसलिए बाकी सब चिंतन छोङकर, निस्संकोच योग्य एवं सक्षम नेतृत्व को ही चुनें, यही इस धर्मयुद्ध में आप सभी का आसन्न धर्म है , तथा इसी में राष्ट्र हित एवं धर्म हित सन्निहित है।

साभार

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जय हो योगेश्वर श्री कृष्ण महाराज आपकी लीला अपरंपार है
अभिमन्यु को मारा तो साथ महारथियों ने था लेकिन जब वह जमीन पर गिर गए तो जय रथ ने उसका अपमान करते हुए सर पर पीछे से वार किया यही वह बात थी की अर्जुन ने प्रतिज्ञा की राधे राधे

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बहुत ज्ञान वर्धक सनातन इतिहास का वर्णन किया है धन्यवाद। लेकिन मुझे लगता है कि जयद्रथ को शिव जी के वरदान का भी पूरा लाभ मिला होगा। माना कि अर्जुन के सिवा दूसरे पांडवों को भी चक्रव्यूह का ज्ञान नहीं था, लेकिन दूसरी और द्रोणाचार्य के अलावा कौरवों में जरासंध आदि को भी चक्रव्यूह का ज्ञान नहीं था। पांडवों में केवल बीर अभिमन्यु ही चक्रव्यूह को भेद कर अंदर जा पाया, लेकिन बाकी पांडव महारथियों को पता था कि अभिमन्यु अभी बालक है और इस स्थिति में खास करके भीम चाहे चक्रव्यूह में अंदर नहीं जा सका लेकिन यदि सीधे तौर पर जयद्रथ से मुकाबला हुआ तो भीम उसे मार सकते थे, क्योंकि द्रोणाचार्य दुर्योधन, कर्ण,  आदि तो सब योद्धा चक्रव्यूह के आठवें द्वार के केंद्र में थे, कृपाचार्य, शल्य, अश्वत्थामा आदी भी भीतर थे, तो इस स्थिति में भीम ने अपना सारा बल मुख्य द्वार पर खड़े महारथियों पर लगाना था, लेकिन किसी भी कौरव का वध नहीं हो सका इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि शायद महादेव के वरदान से ही जयद्रथ उस दिन जीवित रहा होगा।
जय श्री राधे कृष्ण।

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