जीबोनेर झारा पाता
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सरला : गुरुदेव! यह वही #मंदराचल पर्वत है जिसने पृथ्वी को श्रीहीन होने से बचा लिया? फिर तो, इस भारत की दुर्दशाओं को भी इसने देखा होगा न?
ठाकुर बिजॉय कृष्ण : हाँ, निर्विवाद रूप से।
सरला : मंदराचल, अपनी तरह क्यों नहीं बना लेते मुझे तुम। मैं विलीन होना चाहती हूं तुममें। मुझे मुक्ति दे दो, मेरे गुरु के सामने। गुरु मुझे क्षमा करें।
#बैद्यनाथजी को साक्षी मानकर उनके प्रांगण में मैंने 7 फेरे लिए थे। #जोड़ासांको में जन्म लेकर अग्नि स्वभाव पाई थी। कलकत्ते ने मुझे पाला, पढ़ाया और दिव्य विचारों से अग्निभाव किया। सम्पूर्ण भारत घूमकर तुम्हारी शरण में आई हूं। बंगाल से लाहौर, पंजाब, हैदराबाद तक मुझे लोग जानते हैं किंतु मैं स्वयं को नहीं जानती हूं।
पहले #ब्रह्म_समाजी हुई। #काली भक्त हुई। अब अपने गुरुदेव #क्रियायोगी_बिजॉय_कृष्ण के शरणागत हूँ। इनकी कृपा से ही यह संभव हुआ है कि मैं तुम्हारी गोदी में बैठकर मुक्ति मांगती हूँ।
सरला कहे जा रही थी। जमे आंसू बरक रहे थे। वो अंदर से व्यक्त हो रही थी। हाँ, वही सरला जिन्हें #गांधीजी ने कहा था कि मेरा स्वदेशी तुम्हारे स्वदेशी आंदोलन से पुराना नहीं है। तुम महिलाओं की प्रेरणा बनोगी। हाँ, हाँ… वही सरला जो कविगुरु #रवींद्रनाथ_टैगोर की सगी बहन की बेटी थी। जो भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के बंगाल के प्रथम सचिव #जानकीनाथ_घोषाल की पुत्री थी। जो अपने समय की चर्चित लेखिका स्वर्णकुमारी देवी की बेटी थी। ‘भारती’ पत्र का संपादक/मालिक थी। नामी वकील और पत्रकार एवं राष्ट्रवादी नेता #रामभुजदत्त_चौधरी की पत्नी थी। जिनकी प्रोपर्टी #देवघर में भी काफी थी। हाँ, वही सरला जो गांधीजी की पौत्री राधा की सास थी।
मंदार पर्वत के ऊपर एक बड़े पत्थर पर बैठकर यह सब कहे जा रही थी। मौन होकर मंदराचल उसकी पीड़ा सुन रहा था। यह शरद ऋतु काल था। शाम होने से पहले ओस गहरा रहा था।
ठाकुर ने कहा : उठो सरला। पुरोधा मंदराचल कह रहे हैं कि तुम अभी कूर्म की पीठ पर हो। जाओ और मन की पीड़ा को ‘जीबोनेर झारा पाता’ लिखो। लेकिन यह सब किसी से कहना मत। अब चलो, मेरे गुरुभाई सान्याल महाशय प्रतीक्षा कर रहे होंगे।
सरला वहां से लौटी और फिर से अपनी लेखनी को तीव्र कर अपने जीवनवृत्त के रूप में लिखती गई। उसमें विभाजन की त्रासदी, कुत्सित राजनीति, शत्रु बनते मित्रों का हिडन एजेंडा जैसा सबकुछ था। उसका नाम ‘जीबनेर झारा पाता’ यानी जीवन के झड़े हुए पत्ते रखा।
सरला अपने समय की उच्चशिक्षा प्राप्त महिला थी। बेथ्यूने कॉलेज से उन्होंने इंग्लिश में मास्टर की डिग्री ली थी। यहीं से प्रथम भारतीय डिग्री वाली महिला डॉक्टर कादम्बिनी गांगुली ने पढ़ाई की थी।
इलाहाबाद में इन्होंने ‘भारत स्त्री महामंडल’ की स्थापना की थी। स्वामी #विवेकानंद की आलोचना के लिए भी यह बहुचर्चित हुई थीं। इनका प्रभाव अपने समय में ऐसा था कि #लाला_लाजपत_राय इनसे मिलने कलकत्ता पहुंच गए थे।
इनके प्रेम प्रसंगों के चर्चे कभी जापान के ओकाकुरा से तो कभी महात्मा गांधी से भी उड़े।
इन्हीं सरला ने एक बार विवेकानंद से पूछा था कि एक अशिक्षित ब्राह्मण को गुरु मानकर पूजा करना क्या आपको शोभा देता है? जबकि यह वही सरला थी जिसने बंगाली महिलाओं को अपनी संस्कृति बचाने के लिए, स्वदेशी को महत्व देने के लिए माथे पर लाल टीका लगाने, पांव में आलता लगाने व सरस्वती पूजा में हिंदुत्व का परिचायक भगवा कपड़े पहनकर आने का आह्वान किया था। बाद में पत्र लिखकर इनको विवेकानंद ने बुलाया और सिस्टर निवेदिता से भी मिलाया।
सरला ने सम्पूर्ण भारत में पहली बार #भारती पत्रिका में प्रकाशित सामग्रियों के लेखकों को पारिश्रमिक देना आरंभ किया था। उन्होंने #शरतचंद्र (चट्टोपाध्याय) की रचना ‘बोरोदीदी’ को छापने से इनकार करते हुए लौटा दिया था। बाद में शरत बाबू के मामाजी ने सरला से समय निकालकर उसे पढ़ने का निवेदन करते हुए पांडुलिपि छोड़कर गए। पठनोपरांत उन्होंने इसे धारावाहिक के रूप में छापा था। बाद में पता चला कि यह वही रचना थी जिसे वापस किया गया था।
अपने समय की फायरब्रांड लेडी थी सरला। बड़ी विद्रोही लेकिन अंग्रेजों के खिलाफ। उसकी परंपरा के खिलाफ। उन्हें पसंद था विजयादशमी को तलवार का पूजन। वे मातृशक्ति की आराधक बन गई थी। पति के साथ मिलकर उर्दू पत्रकारिता भी जमकर किया उन्होंने। ‘हिंदुस्थान’ नाम से उर्दू पत्र पंजाब से निकाला था। सन 1945 में देहावसान से पूर्व वो मन से टूट चुकी थी।
देवघर में उनका ब्याह बाबा वैद्यनाथजी के मन्दिर में 1905 में हुआ था। यह विवाह भी अप्रत्याशित था। वे यहां अपनी बीमार माँ से मिलने आई थी लेकिन ट्रेन से उतरते ही उन्हें दुल्हन की डोली और ढोल-बाजा के साथ लाया गया था। विवाह की कोई सूचना उन्हें नहीं थी। मंदार पर्वत पर वे गुरुदेव बिजॉय कृष्ण चट्टोपाध्याय के साथ गई थी। वहां, भूपेंद्र नाथ सान्याल की कुटिया में ठहरी थी। बाद में सान्याल जी ने अपने गुरुदेव श्यामाचरण लाहिड़ी की स्मृति में आश्रम की स्थापना की।
– Uday Shankar©
