मिलट्री के कमांडर से कुछ जवानो ने शिकायत की आप सिक्खो के ग्रंथ को हमारे ग्रंथ से ज्यादा आदर देते हैं जबकि सारे ग्रंथो का सार एक ही है;
कमांडर ने कहा ऐसा नही है, आप लोग ऐसा कीजिए कल अपने-अपने ग्रंथ ले आईए मै इसका जवाब भी आपको कल दूंगा। दूसरे दिन सुबह सब से पहले पंडित जी अपनी गीता को झोले मे डाले बगल मे दबाये पहुंचे; फिर एक मुल्ला जी कुरान-शरीफ को कपड़े मे लपेट कर लाये ; उसी तरह से पादरी भी बाईबल लेकर पहुंचा। कमांडर उन तीनो को इज्जत के साथ बैठाया और इंतजार करने लगे सिक्खों के पहुचने का…
तभी सभी ने देखा कि ढोलक व छैने के साथ वाहेगुरू का जाप करते कुछ सिख अपने सिर के ऊपर गुरू ग्रंथ साहिब जी स्वरूप उठाये आगे-आगे जल छिड़कते चले आ रहे हैं, यह देख कमांडर सहित वे तीनो भी आदर मे खड़े होकर नतमस्तक हुए, कमांडर मुस्कुराते हुए उन तीनो की तरफ देखा और कहा आप तीनो अपने -अपने ग्रंथो को यू ही कपड़े मे लपेटे बगल मे दबाये चले आये । आप लोगो ने देखा सिक्ख कैसे आदर सत्कार के साथ अपने गुरू ग्रंथ साहिब जी को लेकर आये; आप लोग भी इनसे सीखिए।
सार; अपने अपने धर्म ग्रंथों का आदर कीजिए🙏