एक फकीर एक गांव में ठहरा था। वह फकीर बड़ा अदभुत फकीर रहा होगा। गांव के लोगों ने उससे कहा, शुक्रवार का दिन है, आप चलें, हमारी मस्जिद में थोड़ा ईश्वर के संबंध में समझाएं।
वह फकीर कहने लगा, ईश्वर के संबंध में कभी कुछ समझाया गया हो तो मैं भी समझाऊं।
लेकिन वे लोग नहीं माने, जितना फकीर इनकार करने लगा उतने लोग उसके पीछे पड़ गए। लोगों की बुद्धि ऐसी है, जहां दरवाजे बंद होते हैं वहां दरवाजे ठोकने लगते हैं, जहां दरवाजे खुले हैं वहां जाते भी नहीं। जिस दरवाजे पर लिखा है यहां झांकना मना है, वहीं—वहीं चक्कर लगाने लगते हैं।
वह फकीर कहने लगा कि नहीं—नहीं, मैं नहीं जाऊंगा। ईश्वर के संबंध में क्या कहा जा सकता है? कुछ भी नहीं कहा जा सकता।
लेकिन लोग नहीं माने, उसे ले गए। नहीं माने तो गया। मस्जिद में जाकर वह खड़ा हो गया मंच के ऊपर और उसने कहा, मेरे दोस्तो, इसके पहले कि मैं ईश्वर के संबंध में कुछ कहूं? मैं तुमसे कुछ पूछ लूं। पहली बात, ईश्वर के संबंध में तुम कुछ जानते हो? ईश्वर है?
उन सारे लोगों ने हाथ हिला दिए कि हम जानते हैं ईश्वर है।
वह फकीर बोला, फिर क्षमा करो, जब तुम जानते हो तो मेरे बोलने की कोई जरूरत न रही, मैं वापस जाता हूं। मैं फिजूल, मैं अपना समय, तुम्हारा समय क्यों खराब करूं! मुझे क्या पता कि तुम्हें पता है। फिर तुम मुझे किसलिए लाए हो? जब तुम्हें मालूम है, ईश्वर है, और तुम्हारे हाथ उठते हैं उसकी गवाही में, मेरी कोई जरूरत न रही, मैं जाता हूं।
लोग बड़े हैरान हुए, मन और आतुर हो गया कि इस आदमी से सुनना जरूर था। भूल हो गई। उन्होंने तय किया कि अगली बार फिर उसे बुला कर लाएं। और अब की बार जब वह पूछेगा कि जानते हो ईश्वर है, तो हम कहेंगे कि ईश्वर है ही नहीं, हम कुछ भी नहीं जानते। फिर तो बोलेगा।
दूसरा शुक्रवार आ गया। फिर उस फकीर के पास गए और कहा कि चलें, ईश्वर के संबंध में कुछ समझाएं। वह फकीर फिर टालमटोल करने लगा। लेकिन वे नहीं माने, वे उसे ले गए। वह मंच पर खड़ा हो गया। उसने फिर पूछा कि मैं ईश्वर के संबंध में कुछ कहूं उसके पहले एक बात जान लूं कि ईश्वर है? तुम्हें कुछ पता है ईश्वर के होने का?
लोगों ने कहा, ईश्वर नहीं है और हमें कुछ भी पता नहीं।
वह फकीर बोला, क्षमा करना, जब ईश्वर है ही नहीं, तो मेरी क्या जरूरत? मैं वापस जाता हूं। और तुम सबको पता है कि ईश्वर नहीं है, बात खत्म हो गई। अब और क्या जानने को शेष रह गया? जिन्हें यह तक पता हो गया कि ईश्वर नहीं है, उनको अब जानने को और क्या शेष रह गया होगा? आ गई अंतिम सीमा शान की, जब यह भी जान लिया कि ईश्वर नहीं है।
वह फकीर वापस लौट गया, लोग फिर बड़ी मुश्किल में पड़ गए। सुनना जरूर था। अब और तीव्र आकांक्षा हो गई कि पता नहीं वह आदमी क्या कहता! उन्होंने फिर तय किया, तीसरा उत्तर तैयार किया कि अब की बार फिर चलें। तीसरे शुक्रवार फिर उसके पास पहुंच गए कि चलो। उन्होंने तीसरा उत्तर तैयार कर लिया। उन्होंने कहा, अब की बार जब वह पूछे, तो आधे लोग कहेंगे कि हमको पता है कि ईश्वर है और आधे लोग कहेंगे कि हमको पता नहीं है कि ईश्वर है। अब तो कुछ बोलोगे।
फकीर आकर खड़ा हो गया और उसने कहा कि दोस्तों, फिर वही सवाल, पता है ईश्वर है या कि पता नहीं है? जानते हो कि नहीं जानते?
आधी मस्जिद के लोगों ने कहा, आधे लोगों को पता है कि ईश्वर है, और आधे लोगों ने कहा, हमें पता नहीं कि ईश्वर है।
फकीर ने कहा, जिनको पता है वे उनको समझा दें जिनको पता नहीं। मैं जाता हूं मेरी कोई जरूरत नहीं।
उस फकीर से मैंने भी पूछा कि चौथी बार वे लोग आए कि नहीं?
वह फकीर कहने लगा, चौथा उत्तर उन लोगों को नहीं मिल सका, तीन में उत्तर समाप्त हो गए। फिर वे लोग नहीं आए। मैं तो रास्ता देखता रहा कि आएं तो फिर जाऊं।
मैंने उस फकीर को कहा कि अगर उनके पास चौथा उत्तर होता तो आप जाते?
वह कहने लगा, अगर चौथा उत्तर होता तो मैं जरूर जाता और बोलता।
मैंने पूछा, वह चौथा उत्तर क्या हो सकता था?
वह फकीर कहने लगा, अगर वे चुप रह जाते और कोई भी उत्तर न देते तो मैं कुछ बोलता। क्योंकि तब वे सच्चे लोग होते। तब वे एक झूठी बात को गवाही नहीं देते। तब वे मौन रह जाते। उन्हें कुछ भी पता नहीं है— न होने का, न ना होने का। तब वे अपने अज्ञान में मौन रह जाते। अज्ञान उनका सत्य था, सच्चाई थी। शान— आस्तिक का ज्ञान, नास्तिक का शान— सब झूठ है, सीखी हुई बकवास है। अगर वे चुप रह जाते तो मैं बोलता, वह फकीर कहने लगा। और आज तक सत्य के संबंध में तभी समझाया जा सका है या जाना जा सका है, बोला जा सका है, इशारे किए जा सके है—जब दूसरी तरफ सच्चाई से भरा हुआ मौन हो। झूठ से भरे हुए उत्तर नहीं, सच्चाई से भरा हुआ प्रश्न काफी है। झूठ से भरा हुआ ज्ञान नहीं, सच्चाई से भरा हुआ अज्ञान भी परमात्मा की तरफ ले जाने वाला चरण बन जाता है।
ओशो, जीवन रहस्य(प्रवचन-12)
*_संकलन-रामजी🙏🌹🌹_*