Posted in सुभाषित - Subhasit

धर्म एव हतो हन्ति धर्मों रक्षति रक्षित:।
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मों हतोડवधीत्।।
वृषो हि भगवान् धर्मस्तस्य य: कुरुते ह्यलम्।
वृषलं तं विदुर्देवास्तस्माद् धर्मं न लोपयेत् ।।

अर्थ– जो पुरूष धर्म का नाश करता है उसी का नाश धर्म कर देता है और जो धर्म की रक्षा करता है उसकी धर्म भी रक्षा करता है । इसलिए मारा हुआ धर्म कहीं हमें भी न मार  डाले,इस भय से धर्म का हनन, अर्थात त्याग
कभी नहीं करना चाहिए।।
जो सुख की वृष्टि करने वाला,सब ऐश्वर्यो का दाता धर्म है ,उसका जो लोप करता है ,उसको विद्वान लोग वृषल अर्थात नीच समझते हैं , इसलिए किसी मनुष्य को धर्म का लोप करना उचित नहीं ।।

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