Posted in हिन्दू पतन

पिछले दिनों #वीर_सावरकर की पुस्तक आधी पढ़कर एक पोस्ट लिखी थी। जैसे ही आगे पढ़ता गया तो लगा कि अपने लिखे में संशोधन की आवश्यकता है। पूर्व में मैंने लिखा था-

“लिखना तो बहुत कुछ चाहता हूँ ,लेकिन एक बात तो दावे से कह सकता हूँ कि ‘विपक्ष ने वीर #सावरकर को नहीं पढ़ा है’…

इसे संशोधित करके लिखना चाहूंगा कि ‘विपक्ष ने वीर सावरकर को पढ़ा है’ और वे नहीं चाहते कि अन्य पढ़ें , इसलिए वे हर सम्भव प्रयास करते हैं वीर सावरकर को नीचा दिखाने का। अप्रासंगिक करने का।  चर्चा से दूर रखने का। 

अगर आपको विश्वास नहीं है तो नीचे कुछ पृष्ठ संलग्न कर रहा हूँ।  पढ़िए ! इतना स्पष्ट कोई राजनेता नहीं लिख बोल सकता।राजनेता तो छोड़िये साहित्यकार , समाज सुधारक, चिंतक , धर्मगुरु भी नहीं बोल पाएंगे। लिखे गए  धर्मांतरण का नग्न कटु सत्य आज भी कितना प्रासंगिक है। और इसका कारण और दुष्परिणाम भी कितना स्पष्ट बताया गया है। और विशिष्ट बात कि इसका समाधान भी दिया गया है।  और यह व्यवहारिक रूप से सफलतापूर्वक क्रियान्वित भी किया गया।  कहाँ ? सेल्युलर जेल अंडमान में , वो भी १९१०-२० में। आपको जानकार आश्चर्य होगा कि धर्मांतरण का खेल जेल में भी उन दिनों चल रहा था।

क्या कोई सेक्युलर यह कटु सत्य आपको पढ़ने देगा ?  तुष्टिकरण की राजनीति करनेवाले कभी नहीं चाहेंगे कि ऐसा हो। यह समस्या आज की नहीं है।  सौ  वर्ष पूर्व इसी समय गांधी को भारत की राजनीति में स्थापित किया जा रहा था, जब सावरकर इतना स्पष्ट लिख बोल रहे थे। भारत ने सावरकर के स्थान पर गांधी को  चुना था , समस्या ज्यों की त्यों है, जबकि बीच में १९४७ का विभाजन हो चुका है।  हे राम …

और हाँ , यह कटु सत्य पश्चिम को भी पढ़कर समझना होगा , क्योंकि वे भी इस समस्या से अब जूझने लगे हैं।

Manoj Singhji द्वारा

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