आज वक़्फ़ पर दिल्ली में जो सांप्रदायिक भीड़ जमा हुई, वैसा जमावड़ा इससे पहले 4 बार हुआ।
1. अलग मुस्लिम राष्ट्र बनाने के लिए, ढाका, 1906
2. तलाकशुदा शाह बानो को गुज़ारा भत्ता देने के सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को खिलाफ कई शहरों में रैली, 1985
2. कोर्ट द्वारा राम मंदिर का ताला खोलने के फ़ैसले के ख़िलाफ़, बोट क्लब, दिल्ली, 1987
3. दक्षिण एशिया के धार्मिक पीड़ितों को नागरिकता देने के क़ानून सीएए के खिलाफ, शाहीन बाग़, 2019
पहली और दूसरी कोशिश सफल रही। अब और नहीं। संसद तय करेगी कि दे़श कैसे चलेगा। ये मसले सडकों पर तय नहीं होंगे।
अभी नया वक़्फ़ बिल आया भी नहीं है। नए विधेयक में क्या होगा-क्या नहीं, पता भी नहीं। पर राजनीति के लिए विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया है।
ये निंदनीय है।
दिलीप मंडल
