कलकत्ते में एक मित्र की शादी हुई। बहुत खुश था। उसने हमसबको बुलाया। उसे हमेशा बड़ा बनने दिखाने का शौक रहा। उसका घर आउटर में है तो लोकल ट्रेन से ढाई तीन घण्टे लगे। वहां गए तो देखा उसने तीन चार हज़ार लोगों को बुला लिया है।
और खाने की व्यवस्था के नाम पर 20-25 लोगों की पूरी-सब्जी बनवाई थी। आउटर में घर होने के कारण रात ट्रेनें, गाड़ियां कुछ नहीं थीं। होटल रेस्टोरेंट्स भी नहीं थे।
भूखे, पैदल लौटे हम सब।
दोस्त है तो उसे अयोग्य या बिना किसी प्लानिंग के बड़े आयोजन ठानलेने वाला अक्षम भी नहीं कह सकते। और ट्रोल भी करने लगते हैं मित्र के समर्थक।
और मज़े की बात यह है कि हमें बुलाकर, इतनी मुसीबत में डालकर वह अपनी मौज में है। कहता फिर रहा है हज़ारों लोगों को शादी में बुलाया। इतनी ग्रैंड पार्टी दी आदि आदि।
तो क्या कहूँ। यही है हाल।
(यह पोस्ट यूपी सरकार पर व्यंग्य है। मेरा कोई मित्र ऐसा नहीं है, किसी मित्र के साथ ऐसी कोई घटना नहीं घटी। मेरे सारे मित्र अच्छे हैं।)