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जब 2012 मे लीबिया मे गद्दाफी को मारा गया था तो ज्यादातर भारतीयों ने यही कहा होगा कि हमें इससे क्या? लेकिन ये ही चीजें हमें सीखनी चाहिए।
गद्दाफी निःसंदेह एक दुष्ट तानाशाह था यदि उसे इस वजह से मारा जाता तो ठीक था मगर बतौर तानाशाह उसने अमेरिकी डॉलर को चुनौती दी थी। उसके बाद अमेरिका की सूचना एजेंसियो ने गद्दाफी को घेर लिया।
लीबिया के आसपास जो गरीब देश है उनके उग्रवादियों को पैसा और हथियार देकर लीबिया मे घुसाया गया। अराजकता फैलाई गयी, गद्दाफी तो 1969 से शासन कर रहा था मगर अचानक 2010 से ही उस पर भ्रष्टाचार से जुडी खबरें अमेरिकी एजेंसी डालने लगी।
गद्दाफी थोड़ा बहुत अच्छे काम करने की कोशिश करता तो ना जाने कहाँ से कुछ लोग आकर काम बिगाड़ देते। इस तरह गद्दाफी के खिलाफ रोष व्याप्त हुआ और नतीजा सबने देखा कि जनता ने गद्दाफी को घसीट घसीट कर मार डाला।
भारत का केस अब इस दिशा मे करने का प्रयास था लेकिन डोनाल्ड ट्रम्प का हमें ऋणी होना पड़ेगा कि उन्होंने खुद ही अपने देश को एक्सपोज करके रख दिया और भारत की संसद मे NDA के सांसदों ने राहुल गाँधी को जमकर घेरा।
दरसल आप एक ट्रेंड देखोगे कि भारत अमेरिका के संबंध बिल क्लिंटन के जाने के बाद सुधरने लगे। 2015 तक अमेरिका भारत के साथ न्यूट्रल रहा, लेकिन जैसे ही मेक इन इंडिया के तहत भारत ने पहली बार स्वदेशी ड्रोन बनाये तो भारत अमेरिका के निशाने पर आया।
जेएनयू के नारे तो बहुत छोटी घटना थे 2015 मे कई बार ऐसी हिंसा हुई कि मोदी सरकार बेकफुट पर आ गयी थी। स्टूडेंट्स, महिला आयोग, आदिवासी वर्ग, खालिस्तानी, दलित पार्टियां और तो और नेपाल जैसा पिद्दी देश भारत सरकार को घेरने लगे।
उसके बाद जैसे जैसे DRDO और रक्षा कंपनिया मजबूत होती गयी अमेरिका का शिकंजा कसता रहा। जब राहुल गाँधी ने अमेरिका यात्रा पर भारत विरोधी इलहान उमर से मुलाक़ात की तो ये इस षड्यंत्र का पीक था।
यदि भारतीय जनता को इलहान उमर के बारे मे ठीक से पता होता तो शायद वो राहुल गाँधी को दिल्ली एयरपोर्ट पर ही क्या क्या करती, शब्द नही मेरे पास । राहुल गाँधी अमेरिका गया, इलहान उमर से मिला और बयान दिया कि भारत मे सिखो पर अत्याचार होते है।
उस समय अमेरिका और कनाडा ने भारत को खालिस्तान के मुद्दे पर पहले ही घेरा हुआ था, जैसे ही राहुल गाँधी ने बयान दिया वैसे ही खालिस्तानी आतंकी पन्नू ने उस बयान का स्वागत किया। मगर इस देश का दुर्भाग्य ये है कि आधी जनता के लिये ये नाम ही नए है तो षड्यंत्र कहाँ समझेंगे?
खैर कांग्रेस की हरियाणा और महाराष्ट्र मे धज्जिया उड़ा दी गयी तो अमेरिका का डीप स्टेट समझ गया कि घोड़े को हराने के लिये इन्होने गधे पर दाँव लगाया था। इसलिए अबकी बार इन्होने मोहरा बदला, दिसंबर मे ममता बनर्जी बोलने लगी कि विपक्ष की कमान मुझे दे दो।
ममता बनर्जी इतने पर ही नहीं रुकी वो बांग्लादेश से युद्ध के सुझाव देने लगी। यदि आप फ्रेंच और रुसी क्रांति पढोगे तो पता चलेगा कि जब राष्ट्र युद्ध मे उलझता है तो अंदर से तख्तापलट करना बहुत आसान होता है।
खैर ये समय वो था कि डीप स्टेट गिव अप कर चुका था क्योंकि ट्रम्प की वापसी होनी थी। हालांकि ट्रम्प तो पहले भी थे लेकिन अबकी बार ट्रम्प को जिन उद्योगपतियों ने समर्थन दिया वे उद्योगपति रक्षा उद्योग वाले नहीं थे।
उल्टे एलन मस्क और विवेक रामास्वामी जैसे लोग थे। डोनाल्ड ट्रम्प समझ चुके है कि डेमोक्रेटिक पार्टी को फंडिंग ये रक्षा क्षेत्र की कंपनीया करती है इनकी पकड़ अमेरिकी सरकार तक मे है।
ट्रम्प अमेरिका के इस इको सिस्टम को बदलना चाहते है इसलिये नहीं कि वे अच्छे है बल्कि इसलिए ताकि डेमोक्रेटिक पार्टी कमजोर हो जाए। ये अमेरिका की आंतरिक लड़ाई है और फायदा हमें हुआ।
इसी एक्सपोज़ करने की प्रक्रिया मे पता चला कि अमेरिका भारत को भी अस्थायी करना चाहता था। लेकिन भारत के लिये मोदीजी की अप्रूवल रेटिंग वरदान बनी जो कि 78% है। जनता के सामने सेना खड़ी होंगी तो तख्तापलट होगा मगर जनता के सामने ज़ब जनता ही आ जायेगी तो तख्तापलट करने वाले मारे जाएंगे।
इसलिए भारत मे गृहयुद्ध नहीं हो सका और हम लीबिया बनने से दो इंच से बच गए। मोदीजी के लिये आवश्यक है कि कांग्रेस मजबूत बनी रहे क्योंकि कांग्रेस अब अप्रासंगिक हो चुकी है। दिखाने के लिये विपक्ष भी रहेगा जो कुछ उखाड़ नहीं पायेगा।
विपक्ष मे कांग्रेस मतलब खंडहर किला जहाँ लोग दीवारों पर नाम लिखने तो जाएंगे मगर कोई उसे घर नहीं बनायेगा। इसलिए राहुल गाँधी पर कोई कार्रवाई ना हो तो ही फायदा है। लेकिन भारत की जनता को सबक लेना चाहिए कि ऐसा भी होता है।