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शर्त

फांसी की सजा आदमी को एक बार में ही मार देती है ,जबकि आजीवन कारावास तो आदमी को घुला-घुला कर मारता है ,मेरी राय में तो आजीवन कारावास बड़ा दंड है >>>>> सेठजी ने अपने मित्रों के बीच अपना विचार व्यक्त किया । 
सेठजी के मित्रों में एक युवा वकील भी थे ,वे बोले >>> आजीवन- कारावास में ही क्यों न हो ,जीवन बड़ी बात है !  
बात ही बात में बात बढ़ गयी और अन्त में शर्त लगी ।युवा- वकील दो करोड़ रुपये की राशि लेकर पन्द्रह बरस कैद में रहने को तैयार हो गया । लिखा-पढी हुई ! 
सेठजी ने अपने बगीचे वाले मकान में युवा- वकील को बन्दी बना लिया । खाना-पीना ,किताबें ,संगीत आदि जो वह मांगता ,मिल जाता किन्तु बाहरी दुनियां से उसका संबंध काट दिया गया । कड़ा पहरा बैठा दिया गया । 
पहले बरस तो उसे कुछ अकेलापन महसूस हुआ ,उसके बाद वह देश-विदेश के साहित्य को मंगवाता ,पढ़ता और लिखता । 
चौदहवें बरस में उसने प्रतिदिन बाइबिल भी पढ़ी । 
पन्द्रहवे बरस में उसने कभी विज्ञान और दर्शन की पुस्तकें पढीं तो कभी शेक्सपीयर आदि का साहित्य पढा । 
समय पूरा होने को आ रहा था  
लेकिन उधर सेठजी व्यभिचार और सट्टे जैसी प्रवृत्तियों के कारण कंगाल होते जा रहे थे । 
दो करोड़ कैसे देंगे ? चिन्ता सता रही थी । 
पन्द्रह बरस बीतने में चार घंटे ही रह गये थे , सेठ का मन बदला > न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी । 
सेठ बन्दूक छिपा कर वकील के कमरे में पंहुचा , 
वकील नींद में था ,अपनी मेज पर ही एक चिट्ठी लिख कर सो रहा था । 
सेठ ने पढ़ा >> इतने एकान्त में अध्ययन तथा चिन्तन-मनन करने के बाद मुझे इस संसार के प्रति ग्लानि हुई है , 
अब मैं अवधि के पहले ही कैद से फरार हो जाऊंगा ताकि सेठ के पैसे भी बच जायेंगे । 
सेठ ने वकील का माथा चूमा और लौट गया ! उसे अपने जीवन के प्रति ही नफरत हो रही थी । 
 
सबेरे पहरेदार ने सूचना दी कि वकील शर्त तोड़ कर भाग गया । 
नगर में कोलाहल हो गया ! सेठ ने वकील की उस चिट्ठी को ले कर अपनी तिजोरी में रख लिया । 

[चेखव की एक कहानी का सारांश ]