उज्जयिनी शहर के परम प्रतापी राजा हुए थे विक्रमादित्य। विक्रमादित्य के पिता महाराज गंधर्वसेन थे और उनकी दो पत्नियां थीं। एक पत्नी के पुत्र विक्रमादित्य और दूसरी पत्नी के पुत्र थे भर्तृहरि। गंधर्वसेन के बाद उज्जैन का राजपाठ भर्तृहरि को प्राप्त हुआ, क्योंकि भर्तृहरि विक्रमादित्य से बड़े थे। राजा भर्तृहरि धर्म और नीतिशास्त्र के ज्ञाता थे। प्रचलित कथाओं के अनुसार भरथरी की दो पत्नियां थीं, लेकिन फिर भी उन्होंने तीसरा विवाह किया पिंगला से। पिंगला बहुत सुंदर थीं और इसी वजह से भर्तृहरि तीसरी पत्नी पर अत्यधिक मोहित हो गये थे और वे उस पर अंधा विश्वास करते थे। राजा पत्नी मोह में अपने कर्तव्यों को भी भूल गए थे। पत्नी पर सब कुछ लुटा दिया था। सब कुछ त्याग दिया था। रानी पिंगला उन्हे प्राणो से प्रिय थी।
उस समय उज्जैन में एक तपस्वी गुरु गोरखनाथ का आगमन हुआ। गोरखनाथ राजा के दरबार में पहुंचे। भर्तृहरि ने गोरखनाथ का उचित आदर-सत्कार किया। इससे तपस्वी गुरु अति प्रसन्न हुए। प्रसन्न होकर गोरखनाथ ने राजा एक फल दिया और कहा कि यह खाने से वह सदैव जवान बने रहेंगे, कभी बुढ़ापा नहीं आएगा, सदैव सुंदरता बनी रहेगी।
यह चमत्कारी फल देकर गोरखनाथ वहां से चले गए। राजा ने फल लेकर सोचा कि उन्हें जवानी और सुंदरता की क्या आवश्यकता है। चूंकि राजा अपनी तीसरी पत्नी पर अत्यधिक मोहित थे, अत: उन्होंने सोचा कि यदि यह फल पिंगला खा लेगी तो वह सदैव सुंदर और जवान बनी रहेगी। यह सोचकर राजा ने पिंगला को वह फल दे दिया। रानी पिंगला भर्तृहरि पर नहीं बल्कि उसके राज्य के कोतवाल पर मोहित थी। यह बात राजा नहीं जानते थे। जब राजा ने वह चमत्कारी फल रानी को दिया तो रानी ने सोचा कि यह फल यदि कोतवाल खाएगा तो वह लंबे समय तक उसकी इच्छाओं की पूर्ति कर सकेगा। रानी ने यह सोचकर चमत्कारी फल कोतवाल को दे दिया। वह कोतवाल एक वैश्या से प्रेम करता था और उसने चमत्कारी फल उसे दे दिया। ताकि वैश्या सदैव जवान और सुंदर बनी रहे। वैश्या ने फल पाकर सोचा कि यदि वह जवान और सुंदर बनी रहेगी तो उसे यह गंदा काम हमेशा करना पड़ेगा। नर्क समान जीवन से मुक्ति नहीं मिलेगी। इस फल की सबसे ज्यादा जरूरत हमारे राजा को है। राजा हमेशा जवान रहेगा तो लंबे समय तक प्रजा को सभी सुख-सुविधाएं देता रहेगा। यह सोचकर उसने चमत्कारी फल राजा को दे दिया। राजा वह फल देखकर हतप्रभ रह गए।
राजा ने वैश्या से पूछा कि यह फल उसे कहा से प्राप्त हुआ। वैश्या ने बताया कि यह फल उसे कोतवाल ने दिया है। भरथरी ने तुरंत कोतवाल को बुलवा लिया। सख्ती से पूछने पर कोतवाल ने बताया कि यह फल उसे रानी पिंगला ने दिया है। जब भरथरी को पूरी सच्चाई मालूम हुई तो वह समझ गया कि पिंगला उसे धोखा दे रही है। पत्नी के धोखे से भरथरी के मन में वैराग्य जाग गया और वे अपना संपूर्ण राज्य विक्रमादित्य को सौंपकर उज्जैन की एक गुफा में आ गए। इसी गुफा में भरथरी ने 12 वर्षों तक तपस्या की थी।
राजा भरथरी की कठोर तपस्या से देवराज इंद्र भयभीत हो गए। इंद्र ने सोचा की भरथरी वरदान पाकर स्वर्ग पर आक्रमण करेंगे। यह सोचकर इंद्र ने भरथरी पर एक विशाल पत्थर गिरा दिया। तपस्या में बैठे भरथरी ने उस पत्थर को एक हाथ से रोक लिया और तपस्या में बैठे रहे। इसी प्रकार कई वर्षों तक तपस्या करने से उस पत्थर पर भरथरी के पंजे का निशान बन गया। यह निशान आज भी भरथरी की गुफा में राजा की प्रतिमा के ऊपर वाले पत्थर पर दिखाई देता है। यह पंजे का निशान काफी बड़ा है, जिसे देखकर सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि राजा भरथरी की कद-काठी कितनी विशालकाय रही होगी।
कहानी का ,मोरल :- जिस राजा ने पिंगला के लिए अपनी दो रानियों को त्याग दिया। अमर फल खुद न खाकर रानी को दिया। वहीं पिंगला इतना प्यार करने वाले इतने सुंदर और बलशाली भर्तृहरि की नहीं हुई और एक तुच्छ कोतवाल की हो गई। इसीलिए कहा जाता है कि नारी की सीरत ब्रह्मा जी भी नहीं समझ पाए। एक साधारण इंसान कैसे समझ सकता है।
Month: February 2026
मधुरी गुप्ता भारतीय विदेश सेवा IFS की एक वरिष्ठ अधिकारी थीं।
वो 52 वर्ष की थीं और अविवाहित थीं। उन्होंने मिस्र, मलेशिया, ज़िम्बाब्वे, इराक, लीबिया सहित कई देशों में उच्च पदों पर कार्य किया था। उनकी उर्दू भाषा पर अच्छी पकड़ थी, जिसके कारण उन्हें पाकिस्तान में नियुक्त किया गया, जहाँ उन्हें वीज़ा और मीडिया मामलों की ज़िम्मेदारी सौंपी गई। चूंकि पाकिस्तान में तैनात सभी अधिकारियों पर खुफिया एजेंसियों की कड़ी नजर रहती है, इसलिए उन पर भी विशेष निगरानी रखी गई।
एक पार्टी के दौरान, मधुरी गुप्ता की मुलाकात एक 30 वर्षीय युवक जमशेद उर्फ़ जिमी से हुई। वह अपनी चतुराई और मीठी बातों से मधुरी का दिल जीतने में सफल रहा। देखते ही देखते मधुरी गुप्ता को उससे प्रेम हो गया। इस हद तक कि उन्होंने इस्लाम कबूल कर लिया। उनकी गतिविधियों पर खुफिया एजेंसियों की निगरानी और बढ़ा दी गई।
कुछ समय बाद, उनकी ईमेल और फोन रिकॉर्ड्स की जांच की गई, जिससे यह खुलासा हुआ कि वे प्रेम में अंधी होकर जमशेद को भारत की गुप्त जानकारियाँ दे रही थीं। दरअसल, जमशेद कोई आम व्यक्ति नहीं, बल्कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI का जासूस था। ISI को जब पता चला कि मधुरी गुप्ता 52 वर्ष की उम्र में अविवाहित हैं, तो उन्होंने एक जाल बिछाया और जमशेद को उसे फंसाने के लिए प्रशिक्षित कर भेजा।
इस गंभीर देशद्रोह की जानकारी मिलते ही मधुरी गुप्ता को किसी बहाने से भारत बुलाया गया। जैसे ही वह दिल्ली एयरपोर्ट पर उतरीं, उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। जब उनके सामने सारे सबूत रखे गए, तो उन्होंने अपना गुनाह कबूल कर लिया। कोर्ट ने उन्हें तीन साल की सजा सुनाई।
कोविड महामारी के दौरान, उन्हें कुछ समय के लिए जमानत पर रिहा किया गया। इसके बाद उन्होंने अनजान जगह पर जाकर गुमनामी में जीवन बिताया। कुछ समय बाद, खबर आई कि मधुरी गुप्ता की कोविड, डायबिटीज़ और अन्य बीमारियों के कारण मृत्यु हो गई।
उनकी मौत के बाद न तो कोई उनके लिए रोने वाला था और न ही कोई अंतिम संस्कार करने वाला। स्थानीय लोगों और नगर निगम ने उनका अंतिम संस्कार कर दिया।
यह सच्ची घटना हमें यह सोचने पर मजबूर कर देती है कि अगर इतनी पढ़ी-लिखी, समझदार और उच्च पद पर कार्यरत महिला भी “लव जिहाद” का शिकार हो सकती है, तो 14-16 साल की मासूम बच्चियों के लिए इससे बचना कितना मुश्किल होगा?
हर बार जब लव जिहाद से जुड़ी घटनाएँ सामने आती हैं, तो लोग यही कहते हैं कि “हमें इससे कोई सहानुभूति नहीं है,” लेकिन क्या केवल सतर्क रहने की चेतावनी पर्याप्त है? जब हर दिन हिंदू लड़कियाँ इसका शिकार हो रही हैं, तो हम कब तक केवल चेतावनी देते रहेंगे?
27 feb 2025

*દ્રષ્ટિકોણ*
એક પ્રચલિત કહેવત છે *”ગાડા નીચે કુતરું ચાલે, ને સમજે કે ગાડું હું ખેંચું છું.”*
પણ આ કહેવતને સૌ કોઈએ પોતપોતાના *દ્રષ્ટિકોણ* થી મુલવી છે. એમાં બળદ શું વિચારે છે એ વાત તો પછી કરીશું પણ જે ગાડા નીચે કુતરું ચાલે છે એ કુતરાને તો લગીરે ખબર નથી કે હું આ ગાડું ખેંચું છું. !!!!
આ તો આપણે આપણા દ્રષ્ટિકોણથી એવું અનુમાન કરી કહેવત પ્રસ્તુત કરી છે એવા લોકો માટે છે જેઓ કોઈ મોટા કાર્યમાં માત્ર સાથે જોડાયેલા હોય, પરંતુ મનમાં એવી ખોટી માન્યતા રાખતા હોય કે બધું જ કામ તેમના લીધે અથવા તેમના કારણે જ થઈ રહ્યું છે. જ્યારે કોઈ વ્યક્તિ પોતાની ક્ષમતા કે ફાળો કરતાં વધારે અહંકાર રાખે ત્યારે આ કહેવતનો ઉપયોગ થાય છે. બાકી કોઈએ એવું વિચાર્યું જ નથી કે કુતરું આ વિષે કશું વિચારતો જ નથી કેમ કે એને તો ખ્યાલ પણ નથી કે લોકો એની આ ગાડા નીચે ચાલવાની સહજતાને આ રીતે મૂલવતા હશે !…કે નથી બે બળદો વિચારતા હશે કે “મહેનત અમે કરીએ છીએ અને બધી ક્રેડીટ આ કુતરું કેમ લઇ જાય છે ?” એ તો બિચારા ગાડું ખેંચે રાખે છે અને માલિકનો હુકમ અનુસરતા રહે છે !
આ કેહવત પરથી કહેવાનો ભાવાર્થ એ છે કે બધું આપણા દ્રષ્ટિકોણ પર નિર્ભર છે. જેમ કે પાણીથી અર્ધો ભરલા ગ્લાસ માટે સૌ કોઈના દ્રષ્ટિકોણ અલગ અલગ હોઈ શકે ! મરાઠીમાં એક કહેવત પણ ખુબ પ્રચલિત છે “जस दिसत तस नसत म्हणून ज जगत फस्त” એટલે કે “જેવું દેખાય છે એવું નથી હોતું અને તેથી જ જગત અગવડોમાં ફસ્સાય છે”
આપણે આપણા દ્રષ્ટિકોણ ને પણ સકારાત્મકતાથી અનુભવવાનો પ્રયત્ન કરવો જોઈએ. તુરંત કોઈ તારણ પર આવી કોઈનું અપમાન કરી બેસવું , કોઈની અધુરી વાત ધરાવતી ચઢામણી વાતોથી વર્ષો જુના સંબંધોનો અંત લાવી દેવો , ઉતાવળમાં નિર્ણય લઇને પછી પાછળથી પસ્તાવો વ્યક્ત કરવો વગેરે વગેરે !!!
*અને છેલ્લે* : કોઈ શું કરે છે એની પંચાત કરવાને બદલે આપણે શું કરવું છે એ તરફ વધુ ધ્યાન કેન્દ્રીત કરવામાં આવે તો વિચારશક્તિ વેડફાતી બચે. ખોટા વાદ-વિવાદથી બચી શકાય અને સ્વયંની પ્રગતીમાં પૂર્ણ ધ્યાન આપી શકાય !….
જે ગાડા નીચે કુતરું ચાલતું હતું તેને ખબર જ નથી કે જગત તેના માટે શું વિચારે છે ? કે નથી એ બળદોને ખબર કે ચિતા કે મહેનત અમે કરીએ છીએ અને ખોટી ક્રેડીટ આ કુતરું લઇ જાય છે. બે બળદો અને કુતરું એ ત્રણે આ વાતથી અજાણ છે અને અજાણ જ રહેશે જ્યાં સુધી આ જગત છે પણ આપણી વિચારસરણી સતત નવા ગતકડા શોધતી જ રહેશે જ્યાં સુધી આ જગત છે.
*સાર* એ જ કે આપણે આપણો *દ્રષ્ટિકોણ* સાનુકુળ રાખવો એ જ આપણને યશ અને કીર્તિ અપાવશે. પારકી પંચાતમાં સમયનો વ્યય કરી આપણું, સમાજનું અને દેશનું નુકશાન કરવાનું આપણને ન જ પરવડે !
જે લોકો ગાડા નીચે કુતરાને જોઈને એને ‘અહંકારી’ ગણાવે છે, તેઓ જ ખરેખર પોતાના જીવનમાં અધૂરા હોવાથી બીજામાં અહંકાર શોધે છે. એટલે કે, *આપણે જે બીજામાં જોઈએ છીએ, તે કદાચ આપણા પોતાના મનની અંદરનું પ્રતિબિંબ છે*
*નિષ્કામ કર્મ*
ખરખર તો બિચારા બળદો અને કુતરાને ખબર નથી કે ખરી મહેનત કોની છે.? તેઓ તો તેમનું ‘નિષ્કામ કર્મ’ જ કરી રહ્યા છે બળદ અને કુતરું બંને ‘કર્તવ્ય’ કરી રહ્યા છે, *માણસ જ ‘ક્રેડિટ’ કે ‘પરિણામ’ પાછળ દોડે છે* . “ગાડું તો એની મસ્તીમાં બળદો થકી ખેંચાઈ રહ્યું , એ તો આપણે જ છીએ જેઓ રસ્તા પર ઉભા રહીને ખાલી ગણતરીઓ કરીએ છીએ કે કોણ કેટલું ખેંચે છે!”
નરેન કે સોનાર ‘પંખી’
आखिर क्यों मोदी को समंदर में डुबकी लगाकर द्वारका जी के दर्शन करने जाना पड़ा?
गुजरात हाई कोर्ट ने बेट द्वारका के 2 द्वीपों पर कब्जा जमाने के सुन्नी वक्फ बोर्ड के सपने को चकनाचूर कर दिया है। इस समय गुजरात का यह विषय बहुत चर्चा में है। सोशल मीडिया के माध्यम से हम लोगों को मालूम पड़ गया वरना पता ही नहीं चलता।
कैसे पलायन होता है और कैसे कब्जा होता है। लैंड जिहाद क्या होता है वह समझने के लिए आप बस बेट द्वारिका टापू का अध्ययन कर लें तो सब प्रक्रिया समझ आ जायेगी।
कुछ साल पहले तक यहाँ कि लगभग पूरी आबादी हिन्दू थी।
यह ओखा नगरपालिका के अन्तर्गत आने वाला क्षेत्र है जहाँ जाने का एकमात्र रास्ता पानी से होकर जाता है। इसलिए बेट द्वारिका से बाहर जाने के लिए लोग नाव का प्रयोग करते हैं।।
यहाँ द्वारिकाधीश का प्राचीन मंदिर स्थित है। कहते हैं कि 5 हजार साल पहले यहाँ रुक्मिणी ने मूर्ति स्थापना करी थी।
समुद्र से घिरा यह टापू बड़ा शांत रहता था।
लोगो का मुख्य पेशा मछली पकड़ना था।
धीरे धीरे यहाँ बाहर से मछली पकड़ने वाले मुस्लिम आने लगे।_
दयालु हिन्दू आबादी ने इन्हें वहाँ रहकर मछली पकड़ने की अनुमति दे दी।
धीरे धीरे मछली पकडने के पूरे कारोबार पर मुस्लिमों का कब्जा हो गया।
बाहर से फंडिंग के चलते इन्होंने बाजार में सस्ती मछली बेची जिससे सब हिन्दू मछुआरे बेरोजगार हो गये।
अब हिन्दू आबादी ने रोजगार के लिए टापू से बाहर जाना शुरू किया।
लेकिन यहां एक और चमत्कार / प्रयोग हुआ।
बेट द्वारिका से ओखा तक जाने के लिए नाव में 8 रुपये किराया लगता था।
अब क्योंकि सब नावों पर मुस्लिमों का कब्जा हो गया था तो उन्होंने किराये का नया नियम बनाया।
जो हिन्दू नाव से ओखा जायेगा वह किराये के 100 रुपये देगा और मुस्लिम वही 8 रुपये देगा।
अब कोई दिहाड़ी हिन्दू केवल आवाजाही के 200 रुपये देगा तो वह बचायेगा क्या?
इसलिए रोजगार के लिए हिन्दुओ ने वहाँ से पलायन शुरू कर दिया।
अब वहाँ केवल 15 प्रतिशत हिन्दू आबादी रहती है।
आपने पलायन का पहला कारण यहाँ पढ़ा।
रोजगार के 2 मुख्य साधन मछली पकड़ने का काम और ट्रांसपोर्ट दोनो हिन्दुओ से छीन लिया गया।
जैसे बाकी सब जगह राज मिस्त्री, कारपेंटर, इलेक्ट्रॉनिक मिस्त्री, ड्राइवर, नाई व अन्य हाथ के काम 90% तक हिन्दुओ ने उनके हवाले कर दिये हैं।
अब बेट द्वारिका में तो 5 हजार साल पुराना मंदिर है जिसके दर्शन के लिए हिन्दू जाते थे तो इसमें वहां के जिहादियों ने नया तरीका निकाला।
क्योंकि आवाजाही के साधनों पर उनका कब्जा हो चुका था तो उन्होंने आने वाले श्रद्धालुओं से केवल 20-30 मिनट की जल यात्रा के 4 हजार से 5 हजार रुपये मांगने शुरू कर दिये।
इतना महंगा किराया आम व्यक्ति कैसे चुका पायेगा इसलिए लोगो ने वहां जाना बंद कर दिया।
अब जब वहाँ पूर्ण रूप से जिहादियों की पकड़ हो गई तो उन्होंने जगह जगह मकान बनाने शुरू किये, देखते ही देखते प्राचीन मंदिर चारों तरफ से मजारों से घेर दिया गया।
वहाँ की बची खुची हिन्दू आबादी सरकार को अपनी बात कहते कहते हार चुकी थी, फिर कुछ हिन्दू समाजसेवियों ने इसका संज्ञान लिया और सरकार को चेताया।
सरकार ने ओखा से बेट द्वारिका तक सिग्नेचर ब्रिज बनाने का काम शुरू करवाया। बाकी विषयो की जांच शुरू हुई तो जांच एजेंसी चौंक गई।
गुजरात में सुन्नी वक्फ बोर्ड ने श्रीकृष्ण की नगरी द्वारका स्थित बेट द्वारिका के दो टापू पर अपना दावा ठोका है।
वक्फ बोर्ड ने अपने आवेदन में दावा किया है कि बेट द्वारका टापू पर दो द्वीपों का स्वामित्व वक्फ बोर्ड का है।
गुजरात उच्च न्यायालय ने इस पर आश्चर्य जताते हुए पूछा कि कृष्ण नगरी पर आप कैसे दावा कर सकते हैं और इसके बाद गुजरात उच्च न्यायालय ने इस याचिका को भी खारिज कर दिया।
बेट द्वारका में करीब आठ टापू है, जिनमें से दो पर भगवान कृष्ण के मंदिर बने हुए हैं।
प्राचीन कहानियां बताती हैं कि भगवान कृष्ण की आराधना करते हुए मीरा यहीं पर उनकी मूर्ति में समा गई थी।
बेट द्वारका के इन दो टापू पर करीब 7000 परिवार रहते हैं, इनमें से करीब 6000 परिवार मुस्लिम हैं।
यह द्वारका के तट पर एक छोटा सा द्वीप है और ओखा से कुछ ही दूरी पर स्थित है।
वक्फ बोर्ड इसी के आधार पर इन दो टापू पर अपना दावा जताता है।
यहां अभी इस साजिश का शुरुआती चरण ही है कि इसका खुलासा हो गया।
सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक इस चरण में कुछ लोग, ऐसी जमीनों पर कब्जा करके अवैध निर्माण बना रहे थे, जो रणनीतिक रूप से, भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा बन सकता था।
अब जाकर सब अवैध कब्जे व मजारें तोड़ी जा रही हैं।
माननीय श्री नरेंद्र मोदी जी की कृपा से अब सी लिंक का उद्घाटन हो गया है, मुसलमानों के नौका/छोटे पानी के जहाज से यात्रा करवाने का धंधा भी चौपट होने जा रहा है, जय हो, मोदी है तो मुमकिन है।
बेट द्वारिका में आने वाला कोई भी मुसलमान वहाँ का स्थानीय नहीं है सब बाहर के हैं।
फिर भी उन्होंने धीरे धीरे कुछ ही वर्षों में वहां के हिन्दुओ से सब कुछ छीन लिया और भारत के गुजरात जैसे एक राज्य का टापू सीरिया बन गया।
सावधान व सजग रहना अत्यंत आवश्यक है। ज्यादा से ज्यादा शेयर करें।💯 #emotionalstruggle
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आखिर क्यों मोदी को समंदर में डुबकी लगाकर द्वारका जी के दर्शन करने जाना पड़ा?
गुजरात हाई कोर्ट ने बेट द्वारका के 2 द्वीपों पर कब्जा जमाने के सुन्नी वक्फ बोर्ड के सपने को चकनाचूर कर दिया है। इस समय गुजरात का यह विषय बहुत चर्चा में है। सोशल मीडिया के माध्यम से हम लोगों को मालूम पड़ गया वरना पता ही नहीं चलता।
कैसे पलायन होता है और कैसे कब्जा होता है। लैंड जिहाद क्या होता है वह समझने के लिए आप बस बेट द्वारिका टापू का अध्ययन कर लें तो सब प्रक्रिया समझ आ जायेगी।
कुछ साल पहले तक यहाँ कि लगभग पूरी आबादी हिन्दू थी।
यह ओखा नगरपालिका के अन्तर्गत आने वाला क्षेत्र है जहाँ जाने का एकमात्र रास्ता पानी से होकर जाता है। इसलिए बेट द्वारिका से बाहर जाने के लिए लोग नाव का प्रयोग करते हैं।।
यहाँ द्वारिकाधीश का प्राचीन मंदिर स्थित है। कहते हैं कि 5 हजार साल पहले यहाँ रुक्मिणी ने मूर्ति स्थापना करी थी।
समुद्र से घिरा यह टापू बड़ा शांत रहता था।
लोगो का मुख्य पेशा मछली पकड़ना था।
धीरे धीरे यहाँ बाहर से मछली पकड़ने वाले मुस्लिम आने लगे।_
दयालु हिन्दू आबादी ने इन्हें वहाँ रहकर मछली पकड़ने की अनुमति दे दी।
धीरे धीरे मछली पकडने के पूरे कारोबार पर मुस्लिमों का कब्जा हो गया।
बाहर से फंडिंग के चलते इन्होंने बाजार में सस्ती मछली बेची जिससे सब हिन्दू मछुआरे बेरोजगार हो गये।
अब हिन्दू आबादी ने रोजगार के लिए टापू से बाहर जाना शुरू किया।
लेकिन यहां एक और चमत्कार / प्रयोग हुआ।
बेट द्वारिका से ओखा तक जाने के लिए नाव में 8 रुपये किराया लगता था।
अब क्योंकि सब नावों पर मुस्लिमों का कब्जा हो गया था तो उन्होंने किराये का नया नियम बनाया।
जो हिन्दू नाव से ओखा जायेगा वह किराये के 100 रुपये देगा और मुस्लिम वही 8 रुपये देगा।
अब कोई दिहाड़ी हिन्दू केवल आवाजाही के 200 रुपये देगा तो वह बचायेगा क्या?
इसलिए रोजगार के लिए हिन्दुओ ने वहाँ से पलायन शुरू कर दिया।
अब वहाँ केवल 15 प्रतिशत हिन्दू आबादी रहती है।
आपने पलायन का पहला कारण यहाँ पढ़ा।
रोजगार के 2 मुख्य साधन मछली पकड़ने का काम और ट्रांसपोर्ट दोनो हिन्दुओ से छीन लिया गया।
जैसे बाकी सब जगह राज मिस्त्री, कारपेंटर, इलेक्ट्रॉनिक मिस्त्री, ड्राइवर, नाई व अन्य हाथ के काम 90% तक हिन्दुओ ने उनके हवाले कर दिये हैं।
अब बेट द्वारिका में तो 5 हजार साल पुराना मंदिर है जिसके दर्शन के लिए हिन्दू जाते थे तो इसमें वहां के जिहादियों ने नया तरीका निकाला।
क्योंकि आवाजाही के साधनों पर उनका कब्जा हो चुका था तो उन्होंने आने वाले श्रद्धालुओं से केवल 20-30 मिनट की जल यात्रा के 4 हजार से 5 हजार रुपये मांगने शुरू कर दिये।
इतना महंगा किराया आम व्यक्ति कैसे चुका पायेगा इसलिए लोगो ने वहां जाना बंद कर दिया।
अब जब वहाँ पूर्ण रूप से जिहादियों की पकड़ हो गई तो उन्होंने जगह जगह मकान बनाने शुरू किये, देखते ही देखते प्राचीन मंदिर चारों तरफ से मजारों से घेर दिया गया।
वहाँ की बची खुची हिन्दू आबादी सरकार को अपनी बात कहते कहते हार चुकी थी, फिर कुछ हिन्दू समाजसेवियों ने इसका संज्ञान लिया और सरकार को चेताया।
सरकार ने ओखा से बेट द्वारिका तक सिग्नेचर ब्रिज बनाने का काम शुरू करवाया। बाकी विषयो की जांच शुरू हुई तो जांच एजेंसी चौंक गई।
गुजरात में सुन्नी वक्फ बोर्ड ने श्रीकृष्ण की नगरी द्वारका स्थित बेट द्वारिका के दो टापू पर अपना दावा ठोका है।
वक्फ बोर्ड ने अपने आवेदन में दावा किया है कि बेट द्वारका टापू पर दो द्वीपों का स्वामित्व वक्फ बोर्ड का है।
गुजरात उच्च न्यायालय ने इस पर आश्चर्य जताते हुए पूछा कि कृष्ण नगरी पर आप कैसे दावा कर सकते हैं और इसके बाद गुजरात उच्च न्यायालय ने इस याचिका को भी खारिज कर दिया।
बेट द्वारका में करीब आठ टापू है, जिनमें से दो पर भगवान कृष्ण के मंदिर बने हुए हैं।
प्राचीन कहानियां बताती हैं कि भगवान कृष्ण की आराधना करते हुए मीरा यहीं पर उनकी मूर्ति में समा गई थी।
बेट द्वारका के इन दो टापू पर करीब 7000 परिवार रहते हैं, इनमें से करीब 6000 परिवार मुस्लिम हैं।
यह द्वारका के तट पर एक छोटा सा द्वीप है और ओखा से कुछ ही दूरी पर स्थित है।
वक्फ बोर्ड इसी के आधार पर इन दो टापू पर अपना दावा जताता है।
यहां अभी इस साजिश का शुरुआती चरण ही है कि इसका खुलासा हो गया।
सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक इस चरण में कुछ लोग, ऐसी जमीनों पर कब्जा करके अवैध निर्माण बना रहे थे, जो रणनीतिक रूप से, भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा बन सकता था।
अब जाकर सब अवैध कब्जे व मजारें तोड़ी जा रही हैं।
माननीय श्री नरेंद्र मोदी जी की कृपा से अब सी लिंक का उद्घाटन हो गया है, मुसलमानों के नौका/छोटे पानी के जहाज से यात्रा करवाने का धंधा भी चौपट होने जा रहा है, जय हो, मोदी है तो मुमकिन है।
बेट द्वारिका में आने वाला कोई भी मुसलमान वहाँ का स्थानीय नहीं है सब बाहर के हैं।
फिर भी उन्होंने धीरे धीरे कुछ ही वर्षों में वहां के हिन्दुओ से सब कुछ छीन लिया और भारत के गुजरात जैसे एक राज्य का टापू सीरिया बन गया।
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देवी अहिल्या हिन्दू धर्म की सर्वाधिक सम्मानित महिलाओं में से एक है जिन्हे पञ्चसतियों में स्थान दिया गया है। अन्य चार हैं – मंदोदरी, तारा, कुंती एवं द्रौपदी। अहिल्या महर्षि गौतम की पत्नी थी और देवराज इंद्र के छल के कारण उन्होंने सदियों तक पाषाण बने रहने का दुःख भोगा। बहुत काल के बाद जब श्रीराम महर्षि विश्वामित्र के साथ गौतम ऋषि के आश्रम मे पधारे तब उन्होंने पाषाण रूपी अहिल्या का उद्धार किया।
अहिल्या का महत्त्व इसलिए भी अधिक है क्यूंकि उनकी रचना स्वयं परमपिता ब्रह्मा ने की थी और वो उन्ही की पुत्री मानी गयी। यही कारण है कि उन्हें “अयोनिजा” भी कहा जाता है। कथा के अनुसार एक बार परमपिता ब्रह्मा के मन में एक ऐसी स्त्री के रचना का विचार आया जिसमें किसी प्रकार का कोई दोष ना हो। तब उन्होंने अहिल्या की रचना की जो त्रिलोक में सर्वाधिक सुन्दर स्त्री थी। वो इतनी सुन्दर थी कि स्वयं स्वर्ग की अप्सराओं को भी उससे ईर्ष्या होने लगी। परमपिता ब्रह्मा ने उसका नाम अहिल्या (अ + हल्या), अर्थात जिसमें कोई दोष ना हो, रखा।
अब ब्रह्माजी को उसके विवाह की चिंता हुई। देवताओं, दैत्यों, मानव, नाग, गन्धर्व ऐसा कोई नहीं था जो अहिल्या से विवाह नहीं करना चाहता था। उन सबसे अधिक अहिल्या को प्राप्त करने की उत्कंठा देवराज इंद्र में थी। उसके विवाह के लिए ब्रह्मदेव ने एक प्रतियोगिता रखी जिसके अनुसार जो कोई भी संसार की परिक्रमा कर सबसे पहले आएगा उसे ही अहिल्या प्राप्त होगी। सभी लोगों पृथ्वी की परिक्रमा को निकल पड़े किन्तु महर्षि गौतम ने बुद्धि से काम लिया। उन्होंने कामधेनु गाय की परिक्रमा की और ब्रह्मदेव के पास अहिल्या का हाथ मांगने पहुंचे। उधर सबको परास्त करते हुए देवराज इंद्र भी सबसे पहले पृथ्वी की परिक्रमा कर ब्रह्माजी के पास पहुंचे। दोनों अहिल्या का विवाह उनके साथ करने के लिए ब्रह्मदेव से प्रार्थना करने लगे।
तब ब्रह्मदेव ने ये निर्णय लिया कि कामधेनु गाय में समस्त विश्व का वास है और उसकी परिक्रमा कर महर्षि गौतम ने सबसे पहले इस प्रतियोगिता को जीता है इसी कारण अहिल्या का विवाह उनसे ही होगा। ये सुनकर इंद्र को अपार दुःख हुआ किन्तु ब्रह्माजी की आज्ञा के आगे वे क्या कर सकते थे? अहिल्या का विवाह महर्षि गौतम के साथ हो गया किन्तु इंद्र अहिल्या को भुला नहीं पाए और उन्होंने निश्चय किया कि छल से या बल से, वो अहिल्या को प्राप्त कर के ही रहेंगे।
बहुत काल बीत गया। गौतम और अहिल्या प्रेमपूर्वक जीवन व्यतीत करने लगे। उन दोनों के कई पुत्र हुए जिनमें से शतानन्द ज्येष्ठ थे। बहुत समय बीत चुका था किन्तु इंद्र अभी भी इसी ताक में थे कि किस प्रकार वे अहिल्या को प्राप्त कर सकें। महर्षि गौतम प्रतिदिन मुर्गे की बांग सुनकर उठते थे और नदी तट पर जा कर स्नान कर वापस लौटते थे। उनकी ये दिनचर्या देख कर एक दिन इंद्र ने मध्यरात्रि को ही गौतम ऋषि के आश्रम के बाहर मुर्गे की बांग दी। महर्षि गौतम को लगा कि सूर्योदय हो गया है और वे उठकर स्नान करने चले गए।
इंद्र को मौका मिला और वो महर्षि गौतम का वेश धारण कर कुटिया में चले गए और अहिल्या के साथ समागम किया। अहिल्या को इस बात का जरा भी भान नहीं था कि महर्षि गौतम के वेश में वो इंद्र है। उधर नदी पर पहुँच कर महर्षि गौतम को नदी पर पहुँच कर आकाश के तारों को देख कर ये भान हुआ कि अभी रात्रि ही है। तब वे किसी आशंका के बारे में सोचते हुए तत्काल अपने आश्रम की ओर चल पड़े। उधर जब इंद्र आश्रम से निकल रहे थे तभी महर्षि गौतम वहाँ पहुँचे। अहिल्या ने जब दो-दो महर्षि गौतम को देखा तो वे समझ गयी कि उनके साथ छल हुआ है। इंद्र तत्काल वहाँ से पलायन कर गए किन्तु महर्षि गौतम ने अपनी दिव्य दृष्टि से जान लिया कि वो इंद्र ही थे।
तब क्रोध में आकर महर्षि गौतम ने इंद्र को नपुंसक हो जाने का श्राप दे दिया जिससे इंद्र के अंडकोष फूट गए। जब वे इंद्रलोक पहुँचे तो इसके बारे में अन्य देवताओं को बताया। तब सभी देवताओं ने उन्हें मेष (भेड़ा) का अंडकोष प्रदान किया और इसी कारण इंद्र “मेषवृण” कहलाये।
इंद्र को श्राप देने के बाद भी गौतम ऋषि का क्रोध कम नहीं हुआ। अहिल्या ने बार-बार उनसे क्षमा याचना की किन्तु फिर भी गौतम ऋषि ने उन्हें श्राप दिया – “जिस स्त्री को अपने पति के स्पर्श का ज्ञान भी ना हो वो एक पाषाण की भांति है। इसीलिए तुम तत्काल पाषाण की हो जाओगी।” तब अहिल्या ने कहा – “स्वामी! आप त्रिकालदर्शी होते हुए भी इंद्र के छल को समझ नहीं पाए फिर मैं तो एक साधारण स्त्री हूँ। यदि मैं इंद्र के छल को समझ ना पायी तो इसमें मेरा क्या दोष?”
ये सुनकर महर्षि गौतम का क्रोध कुछ कम हुआ और उन्हें लगा कि उन्होंने अकारण ही अहिल्या को श्राप दे दिया है। तब उन्होंने कहा कि “त्रेतायुग के अंतिम चरण में श्रीराम द्वारा तुम्हारा उद्धार होगा और तुम पुनः मुझे प्राप्त करोगी।” ये कहकर महर्षि गौतम अपना आश्रम छोड़ दूर तप करने चले गए और अहिल्या श्राप के प्रभाव से एक पाषाण में परिणत हो गयी।
जब श्रीराम महर्षि विश्वामित्र के साथ ताड़का वध को निकले तो भ्रमण करते हुए वे महर्षि गौतम के उजाड़ आश्रम में पहुँचे। वहाँ महर्षि विश्वामित्र ने श्रीराम को अहिल्या की कथा सुनाई और तब श्रीराम ने पाषाण रूपी अहिल्या के चरण स्पर्श कर उनका उद्धार किया। रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है कि श्रीराम ने अपने पैरों के स्पर्श से अहिल्या का उद्धार किया। अपने पूर्ववत रूप में आने के बाद अहिल्या ने श्रीराम के कोटिशः धन्यवाद कहा और अंततः अपने शरीर को त्याग कर महर्षि गौतम के लोक चली गयी।
बाद में जब विश्वामित्र श्रीराम और लक्ष्मण को लेकर जनकपुरी पहुँचे तो सबसे पहले उन्होंने अहिल्या के पुत्र शतानन्द ऋषि को, जो उस समय महाराज जनक के कुलगुरु थे, उनके माता के उद्धार के बारे में सूचित किया जिसे सुनकर उन्हें असीम शांति हुई।
बिहार के दरभंगा जिले के एक गाँव अहियारी “अहिल्या स्थान” के नाम से प्रसिद्ध है। ऐसी मान्यता है कि महर्षि विश्वामित्र की आज्ञा से इसी स्थान पर श्रीराम ने अहिल्या का उद्धार किया था। ये माता सीता की जन्मस्थली सीतामढ़ी से लगभग ४० किलोमीटर दूर है। कई इतिहासकारों ने भी इस बात की पुष्टि की है कि भौगोलिक दृष्टि से यही स्थान कभी महर्षि गौतम का निवास स्थान रहा होगा।
पिछले साल मुझे गर्मियों की छुट्टियों के समय कुछ बेहद पुरानी किताबें पढ़ने का समय मिला। उसी में एक पिछले सदी के महान दार्शनिक जे कृष्णमूर्ति की बुक थी।
बताते चलें जे कृष्णमूर्ति पिछले सदी के एक महान अज्ञेयवादी दार्शनिक थे, अज्ञेयवादी बहुत सारे विषय पर निश्चित निष्कर्ष नहीं निकालते क्योंकि उन्हें निश्चित रूप से सिद्ध करना कठिन होता होता है, ईश्वर भी उनके लिए एक ऐसा ही विषय है।
खैर मूल विषय पर आते हैं तो उनके बुक में एक चैप्टर था – (नास्तिक और विक्षिप्त मनोरोगी में अंतर)
कृष्णमूर्ति ने अपनी किताब में बताया कि एक बार दक्षिण भारत के कुछ लोग जो एक राजनीतिक मूवमेंट से जुड़े हुए थे संभवतः वह पेरियारवादियों की ओर ही इशारा कर रहे थे।
उन्होंने कहा कि एक बार उसी पॉलीटिकल मूवमेंट से जुड़े एक व्यक्ति उनके पास आया और जे कृष्णमूर्ति से पूछा कि आप ईश्वर पर विश्वास करते हैं तो जे कृष्णमूर्ति ने कहा नहीं।
जे कृष्णमूर्ति का जवाब सुनते ही वह व्यक्ति उग्र होकर देवी देवताओं को गाली देने लगा।
अब जे कृष्णमूर्ति ने उस व्यक्ति से कहा कि वास्तव में आप नास्तिक नहीं एक विक्षिप्त मनोरोगी हैं, क्योंकि अगर आप ईश्वर को मान ही नहीं रहे हैं, आप राम कृष्ण के अस्तित्व को मानते ही नहीं हैं तो आप राम और कृष्ण से नफरत कैसे कर सकते हैं।
मतलब कि क्या कोई व्यक्ति काल्पनिक चरित्रों से नफरत कर सकता है।
फिर इसके बाद जे कृष्णमूर्ति ने कहा कि एक तरफ तो आपको धर्म ग्रंथों पर विश्वास ही नहीं है… लेकिन अपनी मन की भड़ास निकालने के लिए उन्ही धर्म ग्रंथों का संदर्भ विशेष में प्रयोग भी करते हैं!
फिर इतना समझने के बाद मुझे वास्तव में नास्तिक और मनोरोगी के बीच में अंतर समझ में आने लगा कि कौन व्यक्ति वास्तव में नास्तिक है और कौन बस हिंदू विरोधी कुंठा का शिकार है!
संपूर्ण बातों का यह सार था कि पेरियार जैसे लोग वास्तव में नास्तिक नहीं – यह विक्षिप्त मनोरोगी हैं!… क्योंकि अगर राम, कृष्ण का अस्तित्व ही नहीं मानते तो राम और कृष्ण से इन्हें नफरत कैसे हो सकती है!… क्योंकि काल्पनिक चरित्र से किसी को नफरत तो हो ही नहीं सकती!
किताब में आगे जे कृष्णमूर्ति ने यह भी कहा कि आप लोग जब धर्म ग्रंथों पर विश्वास ही नहीं करते तो उन्हें धर्म ग्रंथों के कुछ प्रसंगों का प्रयोग अपने मन की भड़ास निकालने के लिए कैसे कर सकते हैं!
पेरियार ने जो रामायण के नाम पर एक किताब लिखी थी उसमें भी उसने वही किया था। एक तरफ वह कहता था कि हिंदू धर्म ग्रंथ पाखंड है, मनगढ़ंत है लेकिन अपने मन की भड़ास निकालने के लिए उनके संदर्भ विशेष के प्रसंगों का प्रयोग जरूर किया!
कुल मिलाकर जे कृष्णमूर्ति की किताब पढ़ने के बाद मुझे समझ में आया कि वास्तव में हम जिन्हें कई बार नास्तिक समझते हैं वह वास्तव में मनोरोगी लोगों का समूह है!… जो अपनी कुंठा को शांत करने के लिए बस अपने को नास्तिक दिखाता है! लेकिन वह एक मनोरोगी है जिनका स्थान केवल पागलखाना है।
क्योंकि कृष्णमूर्ति के तर्क अकाट्य थे कि कोई व्यक्ति कभी काल्पनिक चरित्रों से नफरत कर ही नहीं सकता! अगर नफरत कर रहा है तो वह कोई नास्तिक नहीं बल्कि कुंठित और मनोरोगी है!
फोटो विक्षिप्त मनोरोगी पेरियार की जिसमें वह भगवान गणेश की प्रतिमा तोड़ रहा है…
वैसे इस धरती पर कई मनोरोगी आए और चले गए , अभी भी मौजूद है और आगे भी आते रहेंगे लेकिन इनके पागलपन से करोड़ आस्थावान समाज की आस्था क्षणिक भी विचलित नहीं होती है।
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#We_support_hindutava_unity
स्वीडन की एक न्यूज़ मैगज़ीन ने लिखा है —
F16 के जमीदोज होते ही अमेरिका को पता चल गया था। भारत पर इसके इस्तेमाल से अमेरिका गुस्से में था।
पर उस समय ये भी जरुरी था कि पाक को भारत के गुस्से से बचाना। क्योकि भारत का एक पायलट पाक कब्जे में जाते ही भारत ने बड़ी कार्यवाई के लिये ब्रम्होस मिसाइलें तैयार कर ली थी।
प्लान यही था कि पाकिस्तान एयर फोर्स को रात में ही तहस नहस कर दिया जाये। जिसकी भनक अमेरिका को लग गयी।
अमेरिका ने तुरन्त पाकिस्तान को चेता दिया कि कब्जे में रखे भारत के पायलट को कोई नुक्सान नहीं होना चाहिये, नहीं तो भारत को रोकना नामुमकिन होगा, और चेताया कि युद्घ की स्थिति में वो F16 के इंजन को लॉक कर देगा।
भारत की सम्भावित कठोर कार्यवाई से घबराये खुद बाजवा ने UAE से बात की ,और उधर अमेरिका ने अरब और रूस से बात की।
अरब ने भारत से एक रात रुकने की सलाह दी।
अरब ने करीब दोपहर में ही पीएमओ नयी दिल्ली से सम्पर्क साध लिया था और पाक को फटकार लगायी।
रूस, अमेरिका ने पाक को समझा दिया की कल सुबह तक हर हाल में इंडियन पायलट को छोड़ने की घोषणा करे, वो भी बिना शर्त।
यही नहीं, पाक ने चीन से भारत के आसमान पर निगरानी कर रहे उपग्रह से डायरेक्ट लिंक मांगा, जिसे चीन ने मना कर दिया।
अन्त में पाक ने टर्की से मदद मांगी।
उसने फ़ौरन ही मना कर दियमांगायलट को छोडने को कहा। इधर भारत क्या कर सकता है, इसकी जानकारी के लिये पूरे विश्व के बड़े देशो के उपग्रह भारत पर नजर रख रहे थे।
24 फरवरी से लेकर 28 फरवरी तक रात में, पाक के बड़े फौजी अधिकारी घर में बने बन्करों में रहते थे।
पाक बिलकुल असहाय था,
ऐसा इसलिए था क्योंकि देश का बागडोर किसी जेलेंस्की जैसे पप्पू के हाथों में नहीं बल्कि एक मजबूत हाथ में था।
अभिनंदन…

મિત્રતાની મિસાલ:
“સમ્રાટ પૃથ્વીરાજ ચૌહાણ અને કવિ ચંદબરદાઈ”
આજકાલની દોસ્તી તો સ્વાર્થ અને મતલબની હોય છે, પરંતુ આજે હું તમને ઇતિહાસની એવી મહાન જોડીની વાર્તા સંભળાવીશ જેને સાંભળીને તમે તમારા આંસુ રોકી નહીં શકો. આ વાર્તા છે ભારતના વીર સમ્રાટ પૃથ્વીરાજ ચૌહાણ અને તેમના જીગરી દોસ્ત ચંદબરદાઈની!
આ બંને માત્ર રાજા અને દરબારી કવિ ન હતા, તેઓ એક જ જીવ હતા. કહેવાય છે કે આ બંનેનો જન્મ એક જ દિવસે થયો હતો અને નિયતિએ તેમના અંતનું પાનું પણ એક સાથે જ લખ્યું હતું.
જ્યારે મોહમ્મદ ઘોરીએ પૃથ્વીરાજ ચૌહાણને દગાથી બંદી બનાવ્યા, ત્યારે તેમને બેડીઓમાં જકડીને ગઝની લઈ જવામાં આવ્યા. ત્યાં સમ્રાટ પર જે જુલમ થયા, તે સાંભળીને રૂંવાડા ઉભા થઈ જાય છે. ઘોરીએ સમ્રાટની બંને આંખોમાં ગરમ સળિયા નંખાવી દીધા. વિચારો, જે રાજાની એક ત્રાડથી દુશ્મન થરથર કાંપતા હતા, આજે તે અંધારી કોટડીમાં લોહીલુહાણ પડ્યા હતા.
જ્યારે ચંદબરદાઈને ખબર પડી કે ગઝનીમાં તેમના ‘સખા’ (મિત્ર) ની આંખો ફોડી નાખવામાં આવી છે, ત્યારે તેમનાથી રહેવાયું નહીં. તેઓ પોતાના જીવની પરવા કર્યા વિના, ફકીરનો વેશ ધારણ કરીને ગઝની પહોંચી ગયા. જ્યારે તેમણે પોતાના સમ્રાટને આ હાલતમાં જોયા, ત્યારે બંને ગળે લાગીને ધ્રુસકે ને ધ્રુસકે રડ્યા. પણ ચંદબરદાઈએ હાર ન માની, તેમણે સમ્રાટના કાનમાં ધીમેથી કહ્યું— “સખા, તારી આંખો નથી તો શું થયું, મારા શબ્દ તો છે ને!”
ચંદબરદાઈએ ઘોરીને એક ખેલ (રમત) માટે મનાવ્યો અને કહ્યું કે મારો રાજા અંધ હોવા છતાં માત્ર અવાજ સાંભળીને નિશાન તાકી શકે છે. ઘોરી હસવા લાગ્યો અને તેણે પડકાર સ્વીકારી લીધો.
ઊંચા મંચ પર ઘોરી બેઠો હતો. સમ્રાટના હાથમાં ધનુષ આપવામાં આવ્યું. ત્યારે જ ચંદબરદાઈએ પોતાની એ અમર પંક્તિઓ ગાઈ, જે આજે પણ દરેક ભારતીયની નસોમાં દોડે છે:
“ચાર બાંસ ચોવીસ ગજ, અંગુલ અષ્ટ પ્રમાણ,
તા ઉપર સુલતાન હૈ, મત ચૂકો ચૌહાણ!”
ચંદબરદાઈએ સમ્રાટને ઘોરીની ઊંચાઈ અને અંતરનું સચોટ ગણિત જણાવી દીધું. સમ્રાટે બાણ છોડ્યું અને ઘોરીનું ગળું ચીરીને આરપાર નીકળી ગયું. ઘોરીનો ત્યાં જ અંત આવ્યો.
ઘોરીને માર્યા પછી બંને મિત્રો જાણતા હતા કે હવે દુશ્મનની ફોજ તેમને ઘેરી લેશે. તેઓ ઈચ્છતા ન હતા કે કોઈ વિદેશી દુશ્મન તેમના શરીરને હાથ પણ લગાડે. ત્યારે તે બંને બાળપણના મિત્રોએ પોતાની કટાર કાઢી અને એકબીજાની છાતીમાં ભોંકી દીધી.
“એક સાથે જન્મ્યા, એક સાથે જીવ્યા અને એક સાથે જ પોતાની માટી માટે કુર્બાન થઈ ગયા.” આજે પણ અફઘાનિસ્તાનના ગઝનીમાં આ બંનેની સમાધિઓ પાસે-પાસે બનેલી છે. આ કહાણી સાક્ષી છે કે જો મિત્ર સાચો હોય, તો તે મોતના અંધકારમાં પણ રસ્તો બતાવી દે છે.

“આઝાદી મફતમાં નથી મળી, તેની કિંમત આઝાદ જેવા ક્રાંતિકારીઓના પરિવારોએ વર્ષો સુધી ભોગવી છે. નમન છે વીર માતા જગરાની દેવીને!
“
ચંદ્રશેખર આઝાદના માતા જગરાની દેવીના સંઘર્ષની વાત વાંચીને હૃદય દ્રવી ઊઠે છે. ભારતની આઝાદી માટે સર્વસ્વ ન્યોછાવર કરનારા ક્રાંતિકારીઓના પરિવારોએ આઝાદી પછી કેવું અસહ્ય જીવન જીવવું પડ્યું, તેનું આ એક જીવંત અને કરુણ ઉદાહરણ છે.
આઝાદની જનનીની અશ્રુભીની ગાથા: વિસ્મરાયેલું બલિદાન
દેશ માટે પ્રાણોની આહુતિ આપનારા અનેક ક્રાંતિકારીઓના પરિવારોની આ એક કડવી અને કરુણ વાસ્તવિકતા છે.
“અરે ડોસી, તું અહીં ન આવતી! તારો છોકરો તો ચોર-લૂંટારો હતો, એટલે જ અંગ્રેજોએ તેને મારી નાખ્યો…”
જંગલમાં લાકડાં વીણી રહેલી, મેલાં-ઘેલાં કપડાંમાં સજ્જ એક વૃદ્ધ મહિલાને ત્યાં ઉભેલા કેટલાક લોકોએ અપમાનિત કરતાં આ શબ્દો કહ્યા. પણ એ માતાની આંખોમાં ડર નહીં, ગર્વ હતો. તેમણે મક્કમ અવાજે જવાબ આપ્યો:
“ના, મારો ચંદુ ચોર નહોતો. તેણે તો દેશની આઝાદી માટે કુરબાની આપી છે!”
કોણ હતા આ વૃદ્ધા?
આ બુઝુર્ગ મહિલા એટલે જગરાની દેવી. તેમણે પાંચ પુત્રોને જન્મ આપ્યો હતો, જેમાં સૌથી નાનો અને લાડકવાયો પુત્ર ‘ચંદુ’ દેશ માટે શહીદ થઈ ગયો હતો. જગરાની દેવી જેને પ્રેમથી ‘ચંદુ’ કહેતા, આખું વિશ્વ તેને ચંદ્રશેખર આઝાદના નામે ઓળખે છે.
આઝાદી પછીની કારમી ગરીબી
ભારત આઝાદ તો થઈ ગયું, પણ આઝાદીના નાયકના પરિવારની હાલત અત્યંત દયનીય હતી. આઝાદના પિતા અને ભાઈનું અવસાન પહેલેથી જ થઈ ચૂક્યું હતું. વૃદ્ધાવસ્થામાં પણ જગરાની દેવીએ કોઈની પાસે હાથ ફેલાવવાને બદલે જંગલમાંથી લાકડાં અને છાણાં વીણીને પોતાનું પેટ ભરવાનું નક્કી કર્યું. ઘણીવાર તો શારીરિક અશક્તિને કારણે તેઓ એટલું પણ કમાઈ શકતા નહીં કે બે ટંકનું ભોજન નસીબ થાય.
શાસકોની ઉદાસીનતા અને મિત્રની નિષ્ઠા
સૌથી શરમજનક બાબત એ હતી કે આઝાદી મળ્યાના બે વર્ષ પછી પણ આઝાદની માતાની સ્થિતિમાં કોઈ સુધારો આવ્યો નહોતો. જ્યારે આઝાદના મિત્ર સદાશિવ રાવ તેમને શોધતા ગામમાં પહોંચ્યા, ત્યારે આ દ્રશ્ય જોઈ તેમની આંખો ભરાઈ આવી.
સદાશિવ રાવ પોતે આર્થિક સંકડામણમાં હોવા છતાં, આઝાદને આપેલું વચન પાળવા માટે જગરાની દેવીને ઝાંસી લઈ આવ્યા. આખરે, આઝાદના અન્ય એક મિત્ર ભગવાનદાસ માહૌરના ઘરે તેમના રહેવાની વ્યવસ્થા કરવામાં આવી. સદાશિવ રાવે જ પુત્ર બનીને તેમની સેવા કરી અને મૃત્યુ પશ્ચાત તેમના અંતિમ સંસ્કાર પણ કર્યા.
આ માત્ર જગરાની દેવીની વાર્તા નથી, પણ સેંકડો ક્રાંતિકારીઓના પરિવારોની વ્યથા છે. આઝાદી પછી સત્તાના સિંહાસન પર બેસનારાઓએ જેમના લોહીથી આ દેશ સિંચાયો હતો, તેમના જ પરિવારો પ્રત્યે ઘોર ઉપેક્ષા સેવી.
શું આપણે એ શહીદોના પરિવારોને યોગ્ય સન્માન આપી શક્યા છીએ? આ પ્રશ્ન આજે પણ દરેક ભારતીયના અંતરાત્માને ઢંઢોળે છે.
