Posted in काश्मीर - Kashmir

उसका जन्म कश्मीर की उन खूबसूरत वादियों में हुआ था।

वो कश्मीर घाटी जो कई पीढ़ियों से उसके पुरखों की जन्मभूमि थी। कश्मीर की नर्म-गुनगुनी धूप में पली वो गोरी-चिट्टी नवयुवती, जिस पर यदि अचानक दृष्टि पड़ जाए, तो दिप-दिप दमकता हुआ उसका रूप स्वर्ग लोक की कोई अप्सरा भटक कर धरती के इस स्वर्ग पर धोखे से उतर आई हो, ऐसा आभास देता था।

गिरिजा नाम था उसका.. !! सार्थक.. मानो गिरी-कंदराओं में कहीं दूर बसी कश्मीर की कुल देवी ने स्वयं उसका नामकरण किया हो..

कश्मीर की किसी आम लड़की की तरह वो कोमलांगिनी भी कुछ बड़ी हुई, उसने घाटी के ही एक छोटे से विद्यालय में पढ़ाना शुरू कर दिया।
सरस्वती का सा रूप एवं कोमल भावधारिणी उस देवी हेतु इससे अच्छा और होना भी क्या था..

फिर, न जाने क्या हुआ कि घाटी की ठण्डी हवाओं में जाने कहाँ से आ कर गर्म हवाएँ घुलने लगीं। 90 का दशक अपनी उम्र पूरी करने को बस चंद महीने और बीत जाने की राह देख रहा था।
उन्हीं दिनों, गर्म हवाओं की तासीर से अपने भी वज़ूद को झुलसता पा कर गिरिजा ने घाटी छोड़ जम्मू जा बसने का फैसला कर किया।
मां से बिछुड़ना तो सदा दुखदायी होता आया है, हर बेटी के लिए, उसकी मां के लिए।
भरे मन, रुंधे गले से घाटी की धरती को, अपनी जननी मां को अलविदा कह गिरिजा भी निकल पड़ी, हजारों पलायन करने वालों के साथ।

जोड़-तोड़ के जैसे-कैसे दिन बीत रहे थे।
अर्थ की कमी हर वक़्त मुंह बाएं चिढ़ाती रहती थी।

ऐसे में एक दिन फ़िरदौस डार गिरिजा से मिलने आया। पांचवीं, या छटी कक्षा में गिरिजा से पढ़ चुके उस किशोर की भीगती मसें उसके बचपन छोड़ जवानी की और चल पड़ने की चुगली कर रही थीं।

सामान्य बातचीत के बाद फ़िरदौस ने गिरिजा को बताया कि बांदीपुरा के उस विद्यालय की बहुत सी शिक्षिकाओं को आज भी आधा वेतन मिल रहा है, हालात के सामान्य होने पर जो पहले जैसा हो जाना था। यदि वह चाहे तो उसके साथ चले, कि वो अपने किसी जानकार के माध्यम से उसे भी हर माह वेतन की सुविधा दिलवा सकता है।

दंगों में अपनी सारी धन-दौलत-घर लुटा चुकी,
आर्थिक दुश्चक्रों में घिरी गिरिजा के पास एक समय उसका शिष्य रह चुके फ़िरदौस पर अविश्वास का कोई कारण न था।
सो…..
विश्वास की डोर में बंधी गिरिजा चल पड़ी घाटी की ओर, फ़िरदौस के साथ।
जम्मू से उत्तरी कश्मीर, बांदीपुरा की ओर।

25 जून 1990, आज से ठीक 27 वर्ष और 4 दिन पहले का वो दिन..

28 वर्षीय एक युवती का शरीर बांदीपुरा की एक सड़क के किनारे पड़ा मिलता है.. ठीक पेट के नीचे से कटा हुआ, दो टुकड़ों में बंटा हुआ..
जिनमें एक भी टुकड़े पर कपड़े की एक छोटी सी चिन्दी भी न थी.. पूरी नंगी कर, काटी गई थी वो..

शव-समीक्षा से पता चला..
मृत्यु से पहले बेहद भयानक, दुर्दान्त तरीके से नोचा था गिरिजा टिक्कू को..
एक नहीं.. कई-कई कुत्तों ने..
एक नहीं, कई-कई बार..

ये भी कि.. जिस वक़्त उसके बदन को दो जोड़ी हाथों में फँसी लोहे की आरी से चीरा जा रहा था.. उस वक़्त तक उसकी क्लांत देह में प्राण शेष था.. यहाँ तक कि कट कर अलग होने के बाद भी.. चंद पलों तक तड़पी थी.. वो अर्ध-मृत.. नुची-लूटी देह.. जिसे उसकी मृत्यु के कुछ दिन पूर्व तक भी.. सूर्य-देव की किरणों तक ने भी स्पर्श करने का साहस नहीं किया था..

गिरिजा फिर कभी वापस जम्मू न आई,
और वो  फ़िरदौस….. वो शायद आज भी कहीं जिन्दा होगा….. 😢

और न्याय… कभी हुआ ही नहीं

:Ablazing India पर प्रकाशित जून 2017 की पोस्ट

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