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#नेहरूजी ने #जेल में बिताए 3,259 दिनों में से ज्यादातर दिन कैसे थे?

1934 में #कॉंग्रेस की प्राथमिक सदस्यता छोड चूके #गांधीजी के कॉंग्रेस प्रांतीय कार्यकारिणीओं के निर्णय में किए हस्तक्षेप के कारण स्वाधीन भारत के प्रथम प्रधानमंत्री #जवाहरलाल नेहरूजी 15 अगस्त 1947 से पहले, स्वाधीनता आंदोलन में कुल मिलाकर 3259 दिन जेल में रहे। वैसे जेल में अनेक क्रांतिवीर भी रहे थे परंतु उन क्रांतिवीरो का जेल वास और जवाहरलाल नेहरू का जेल वास भिन्न था। क्रांतिवीरो को अनेकानेक अमानवीय यातनाओं का सामना करना पडा दुसरी तरफ नेहरू जी का जेल वास कैसा था यह देखना दिलचस्प होगा।

नेहरूजी के जेल वास को अनुभव करने के लिए स्वयं नेहरूजी के एक वक्तव्य का अंश याद रखना चाहिए। बीबीसी हिन्दी के रिपोर्ट के अनुसार नेहरूजी को प्रथम बार 1921 में गिरफ्तार किया गया और 6 महिने की जेल एवं 100 रुपये का जुर्माने की सजा सुनाई गई परंतु फैसले में ‘तकनीकि’ (विवरण नही मिला) त्रुटि के कारण 3 महीने में रिहा कर दिया।  लेकिन नेहरूजी ने फिर रैलियों में हिस्सा लिया तो 3 महीने में फिर से उन्हे गिरफ्तार कर लिए गए।  यहां नेहरूजी ने एक वक्तव्य दिया जिसमें उन्‍होंने कहा. . “दरअसल जेल हमारे लिए स्वर्ग जैसी जगह हो गई है.” जहां अनेक क्रांतिवीरो के लिए जेल नर्क से बदतर साबित हुई वहाँ नेहरुजी को जेल स्वर्ग जैसी क्यों लगती होगी?

एक और बात नेहरूजी को जेल वास कैसा लगता था उसके बारे में सर्वपल्ली गोपाल जवाहरलाल नेहरू की जीवनी में लिखते हैं, “नेहरू ने एक बार कहा था वो जेल के बाहर रह कर अपने-आप को अकेला महसूस करते हैं. उनकी दिली इच्छा है कि वो जल्द से जल्द जेल में वापस लौटें. इस बार उन्हें निराशा नहीं हुई क्योंकि उन्हें 18 महीने की सज़ा सुनाई गई.”

स्वर्ग जैसी जेल नेहरूजी को क्यों लगती होगी? तो क्रांतिवीरो और नेहरूजी के जेल वास में जो फर्क था वह अब दिखता है।  सर्वपल्ली गोपाल लिखते है, “उन्हें लखनऊ ज़िला जेल में रखा गया. जेल में उनसे मिलने वालों के साथ दुर्व्यवहार किया जाता था. इसलिए नेहरू ने बाहरी लोगों से मिलना बिल्कुल बंद कर दिया. जेल में रहने से उनका आत्मसम्मान बढ़ गया. उन्होंने जेल में अपना समय चहलक़दमी करने और दौड़ने में लगाया. वो अपना अधिकतर समय सूत कातने और पढ़ने में बिताते थे. उनके प्रिय विषय थे इतिहास, यात्रा साहित्य और रोमांटिक काव्य.”

यह था फर्क नेहरूजी के जेल वास और क्रांतिवीरो के जेल वास में, जहाँ नेहरू जी को सूत कातने के लिए चरखा और पढने के लिए उनके प्रिय विषय की पुस्तक मिलते थे और क्रांतिवीरो को अमानवीय अत्याचार सहने पडते थे। खासकर आंदामान की सेलुलर जेल में #वीर_सावरकर और अन्य क्रांतिवीर थे जिनको बैल की तरह घानी से लगकर तेल निकालना पडता था और इस दौरान पानी तक नहीं दिया जाता था।

नेहरूजी को जेल वास के दौरान कैसी सुविधा चाहिए होती थी उसका विवरण स्वयं उन्होंने लिखा है जब उन्हे नाभा जेल में रखा गया था। इस घटना के बारे में जवाहरलाल नेहरू अपनी आत्मकथा में लिखते हैं, “24 घंटे बाद हमारी हथकड़ियाँ और बेड़ियाँ हटाई गईं. हमें नाभा जेल में रखा गया. इस जेल के हालात बहुत ही बुरे थे. हमें न तो पढ़ने के लिए कोई किताब और अख़बार मिला और न ही हमें दो दिन तक नहाने और कपड़े बदलने दिए गए.”
नाभा जेल और जवाहरलाल नेहरू का किस्सा बडा दिलचस्प है जिसके लिए एक अलग पोस्ट मेरी वॉल पर लिखी है।

साल 1930 मे महात्मा गाँधी के नमक सत्याग्रह के दौरान #नेहरू की एक बार फिर गिरफ़्तारी हुई। और जहाँ क्रांतिवीरो के पैरो में ऐसी भारी-भरकम बेड़ियां पहनाई जाती थी की वो ठीक से दो कदम चल भी नही पाते थे। बेड़ियों के साथ चलने से उनके पाँव छील जाते थे जिस पर मरहम लगानेलावा भी कोई नही होता था। वहाँ जवाहरलाल नेहरुजी को क्या मिलता था?
सर्वपल्ली गोपाल लिखते हैं, “जेल की नीरसता से बचने के लिए नेहरू ने कठिन दिनचर्या के साथ काम करना शुरू कर दिया. वो भोर होते ही उठते. जेल की दीवारों के साथ साथ एक मील तक दौड़ लगाते और फिर कुछ दूरी तक तेज़ गति से चलते.”

काला-पानी की जेल में बंद स्वाधीनता सेनानियों को जहां कोई सुविधा नहीं मिलती थी और कोई मांग रखने पर अमानवीय अत्याचार होते थे।  अगर भूख हड़ताल भी कर दे तो भी जबर्दस्ती करके तोड दी जाती थी वहाँ जवाहरलाल नेहरू जी के साथ जेल में कैसा व्यवहार होता था?

सर्वपल्ली गोपाल लिखते हैं, “वो अपना बाक़ी का दिन चरखे पर सूत कातने और पढ़ने में बिताते. शुरू में जब उन्हें चरखा रखने की भी अनुमति नहीं दी गई थी तो उन्होंने अपने-आप को व्यस्त रखने के लिए नेवाड़ बिनना शुरू कर दिया था जिसे उन्होंने बाद में भी जारी रखा था.”

26 दिसंबर, 1931 को जवाहरलाल नेहरू को एक बार फिर इलाहाबाद के पास इरादतगंज स्टेशन पर गिरफ़्तार कर लिया गया। यहाँ क्या हुआ?
वरिष्ठ पत्रकार फ़्रैंक मोरेस जवाहरलाल नेहरू की जीवनी में लिखते हैं, “जेल में नेहरू के खानपान की आदतें बदल गईं. सभी कश्मीरी ब्राह्मणों की तरह वो बचपन से ही मांसाहारी थे. लेकिन जेल में वो पूरी तरह से शाकाहारी हो गए. गाँधीजी की सलाह पर पहले ही उन्होंने धूम्रपान करना छोड़ दिया था.”

फ़्रैंक मोरेसने जो लिखा है उससे ऐसा मान सकते है कि जेल में नेहरूजी को मांसाहारी या शाकाहारी भोजन मिल सकता था जैसा वो चाहते हो, हम ऐसा भी मान सकते है कि उनको जेल में धूम्रपान की सुविधा भी उपलब्ध करवाती होगी।

प्रथम बार 1921 के जेल वास को अभी 2 वर्ष हुए थे। बीबीसी बताती है कि पहली बार जेल की ज़िंदगी का असर नेहरू के स्वास्थ्य पर पड़ने लगा. उनके दांतों में दर्द रहने लगा.   यहाँ नेहरुजी को केवल दो वर्ष वो भी लगातार नही ऐसे जेल वास के दौरान दांत मे दर्द होने लगा वहाँ काला-पानी जेल के कैदियों की दशा क्या होती होगी जो लगातार वर्षो से अमानवीय यातनाए झेल रहे थे?

उनको पहले नैनी जेल में रखा गया और कुछ हफ़्तों बाद बरेली जेल में भेज दिया गया. बरेली में नाभा के बाद पहली बार हुआ था कि उनकी कोठरी में रात में ताला लगाया जाता था. परिवार के लोगों से मुलाकात भी इस लिहाज़ से मुश्किल हो गई. क्योंकि मुलाक़ात के दौरान जेलर और पुलिसवाले मौजूद रहने लगे और वो बातचीत को लिखने लगे.

अब सोचकर देखिए यहाँ नेहरूजी की कोठरी को ताला नही लगता था और वहाँ काला-पानी जेल वासी की कोठरी का तो ताला ही कभी-कभार कई दिनों तक नहीं खोला जाता था। दैनिक क्रियाएं भी वहीं कोठरी में ही करनी पडती थी उनके स्वास्थ्य का क्या हाल होगा?

नेहरुजी की अपने परिवार से मुलाकात मुश्किल हो गई और वहाँ काला-पानी की जेल में बंद क्रांतिवीरो को परिवार को पत्र लिखने पर भी पाबंदी हुआ करती थी। परिवार से मुलाकात तो होना संभव ही नही था उनके पत्रो को भी सेन्सर किया जाता था।

जेल में नेहरूजी योग भी करते थे। बीबीसी हिन्दी की रिपोर्ट के अनुसार, उनका का प्रिय योगासन शीर्षासन हुआ करता था. शीर्षासन से उन्हें न सिर्फ़ शारीरिक स्फूर्ति मिलती थी बल्कि वो मनोवैज्ञानिक प्रेरणा का काम भी करता था.

फ़्रैंक मोरेस लिखते हैं, “जेल में नेहरू का मुख्य शग़ल होता था गिलहरियों की अठखेलियों को देखना. देहरादून जेल में नेहरू ने दो कुत्तों को अपना लिया था. बाद में कुत्तों के बच्चे भी हुए. नेहरू ने उनका भी ध्यान रखना शुरू कर दिया. उनकी जेल की कोठरी में साँपों, बिच्छुओं और कनखजूरों का भी आना जाना लगा रहता था.”

गिलहरियों की अठखेलियाँ देखना और कुत्तो को अपनाना ऐसी सुविधा क्रांतिवीर कैदियों को नहीं मिलती थी।

काला-पानी जेल में वीर #सावरकर और उनके भाई दोनों बंद थे परंतु दोनो के मिल नही सकते थे तब अगर परिवार का कोई सदस्य बिमार हो तो मिल सकते है ऐसा विचार करना भी संभव नही था वहाँ  नेहरूजी को क्या सुविधा मिलती थी?
अगस्त में जब बीमार कमला नेहरू (जवाहरलाल नेहरू की पत्नी) की हालत बिगड़ गई तो यूपी सरकार ने कुछ दिनों के लिए नेहरू को रिहा किया.

जब नेहरू अलीगंज जेल में बंद थे, उनके चचेरे भाई बीके नेहरू ने एक हंगेरियन महिला फ़ोरी से शादी की. फ़ोरी को नेहरू से मिलवाने कलकत्ता की अलीगंज जेल ले जाया गया और नेहरूजी से मुलाकात भी हुई।

नेहरू आख़िरी बार अहमदनगर जेल में रहे. एक बार में इतनी लंबी अवधि उन्होंने इससे पहले किसी जेल में नहीं बिताई थी. 9 अगस्त 1942 से लेकर 15 जून, 1945 तक यानी कुल मिलाकर 1040 दिन. यहाँ पर ही उन्होंने ‘द डिस्कवरी ऑफ इन्डिया’ पुस्तक लिखी।

अहमदनगर जेल में इतने लंबे प्रवास की वजह से कांग्रेस नेताओं में रोज़ तीखी बहस होती. नतीजा ये हुआ कि कुछ नेताओं की आपस में बोलचाल ही बंद हो गई. इस तनाव से बचने के लिए नेहरू खुद काफ़ी मेहनत करते. वो खाना बनाते, बीमारों की तीमारदारी करते, बैडमिंटन और वॉलीबॉल मैच खेलते और बागवानी भी करते.

जवाहरलाल नेहरु को जेल मे ज्यादातर समय राजनीतिक कैदी की तरह रखा गया और आज स्वाधीन भारत में भी जब किसी कैदी को राजनीतिक कैदी बनाया जाता है तो अनेक सुविधाएं उपलब्ध करवाई जाती है ऐसी ही या उससे कम परंतु सुविधाए नेहरू जी को जेल में मिलती थी। नेहरूजी के योगदान को यहाँ न नकारने का प्रयास है और न ही उनका चरित्र हनन करने का प्रयास है, यह प्रयास केवल इस लिए है कि सत्य उजागर हो। साथ साथ नेहरूजी के महिमामंडन करते समय वीर सावरकर समेत अन्य क्रांतिवीरों को दी गई यातनाए न केवल  भुला दी जाती है बल्कि उनको अपमानित किया जाता है उनकी यातनाओं को उजागर करने का नम्र प्रयास मात्र है।

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