Posted in महाभारत - Mahabharat

ये एक गलत धारणा है कि मरते समय कर्ण नि:शस्त्र था । ये समझने वाली बात है कि अगर अर्जुन जैसा धनुर्धर सामने से आक्रमण कर रहा हो और जीवन और मृत्यु का प्रश्न हो तो ऐसे समय में कोई भी योद्धा क्या करेगा ! वो अपना बचाव करते हुए प्रतिआक्रमण करेगा या फिर अपने शस्त्र रखकर भुमि में धँसे अपने रथ के पहिये को अपने हाथों से निकालने की मूर्खता ? कर्ण पहली बार युद्ध नहीं कर रहा था । वो एक बहुत अनुभवी और कुशल योद्धा था। ऐसी मूर्खता वो कभी नहीं कर सकता था । श्रीकृष्ण ने पहले ही उसे समय देने से मना कर दिया था । ऐसी परिस्थिति में रथ का पहिया निकालना आत्महत्या करने के ही समान होता । लेकिन कर्ण इतना भोला नहीं था जो ऐसी गलती करता ।

कर्ण अंतिम समय तक बाण चला रहा था । वो कभी भी निःशस्त्र नहीं था । उसने ब्रम्हास्त्र तक चलाया था और वो कहीं से भी असहाय नहीं लग रहा था । महाभारत में एक श्लोक में तो ये भी दिया गया है कि अर्जुन ने मारकर कर्ण को रथ से नीचे गिरा दिया ( गीता प्रेस, कर्ण पर्व, अध्याय ९१, श्लोक सं.५९) । अर्थात कर्ण मरते समय रथ पर ही था । ये उचित भी लगता है क्योंकि कर्ण का रथ केवल भुमि में फँसा था, टूटा नहीं था । रथ चल नहीं सकता था लेकिन रथ के उपर से युद्ध करने में जो सुविधा या सुरक्षा मिलती है, वो तो उसे मिल ही रही थी । महाभारत में ये भी दिया गया है कि अंतिम में कर्ण पर बाण चलाने से पहले अर्जुन ने उसके ध्वज पर बाण चलाया था । कर्ण जैसे योद्धा के लिए तो सावधान होने के लिए उतना समय पर्याप्त था । कर्ण पर्व के आरंभ में भी जब संजय धृतराष्ट्र को कर्ण के मरने की सूचना दे रहा है तो वहाँ वो अर्जुन के द्वारा किसी कपट की बात नहीं करता है । इससे भी ये स्पष्ट होता है कि कर्ण मरते समय निःशस्त्र नहीं था ।

यहाँ पर ये भी विचारणीय है कि आखिर कर्ण के रथ का पहिया भुमि में धँसा ही क्यों ? महाभारत में तो भुमि के दिए श्राप की बात आती है जो कि एक प्रक्षेप ही लगता है । महाभारत में ही कर्ण का रथ भुमि में धँसने वाले प्रसंग में एक श्लोक में अर्जुन के बाणों से कर्ण के सारथी और घोड़ों के विचलित होने की बात आती है (गीता प्रेस, कर्ण पर्व, अध्याय ९०, श्लोक सं. ८७) । स्पष्ट संकेत मिलता है कि उस परिस्थिति में अनियंत्रित होकर रथ कीचड़ में जा सकता था । लेकिन अर्जुन की उपलब्धी को यहाँ भुमि का श्राप बता दिया गया ।

इस युद्ध के वर्णन को पढ़कर तो कई बार लगता है जैसे ये बोलीवुड के किसी फिल्म के क्लाइमैक्स की पटकथा हो । यहाँ कई बातें ऐसी हैं जो हैरान करती हैं । जैसे १. इस युद्ध में बहुत से श्रापों का एक साथ कर्ण के पीछे लग जाना । २. काल का अचानक वहाँ प्रकट होकर कर्ण को उसके अंतिम समय आ जाने और भुमि द्वारा उसके रथ के पहिये को निगलने की सूचना देना । ३. कर्ण जैसे बलवान व्यक्ति के द्वारा पूरी शक्ति लगाने के बाद भी रथ का पहिया न निकाल पाना। ४. भुमि पर खड़े होकर कर्ण का भुमि को ही उठा लेना (भौतिक विज्ञान के नियमों के विरूद्ध)। ५.कर्ण के मरते ही रथ का पहिया बाहर निकल जाना और उसी रथ से शल्य का वापस भी चला जाना । ६. शल्य के द्वारा दुर्योधन को कर्ण की मृत्यु की सूचना देते समय रथ भुमि में धँसने या अर्जुन द्वारा किसी छल की बात न कहना जबकि ये बहुत बड़ी बात थी । ७. संजय का धृतराष्ट्र को कर्ण की मृत्यु की सूचना देते समय भी अर्जुन के द्वारा किसी छल की बात न कहना ।

अगर किसी श्राप के कारण या संयोगवश भी कर्ण का रथ फँस गया था तो भी उसे समय देना कहीं से भी उचित नहीं था । आखिर ये एक युद्ध था कोई खेल नहीं । पुरे युद्ध में किसी ने किसी को कोई समय नहीं दिया था । कर्ण का अंतिम समय में रथ का पहिया निकालने के लिए कुछ समय मांगना खुद को संभालने और अर्जुन के लय को तोड़ने की एक रणनीति ही थी । पहिया भुमि में धँसने से पहले ही कर्ण बहुत घायल हो चुका था और अर्जुन रौद्रास्त्र चलाने वाला था । रथ भुमि में धँसने के बाद अर्जुन और कर्ण के बीच कुछ देर तक युद्ध हुआ लेकिन अंत में कर्ण युद्ध करते हुए ही मारा गया ।

Unknown's avatar

Author:

Buy, sell, exchange old books 8369123935

Leave a comment