चंदन देश की कहानी
बहुत पहले की बात है, दूर एक सुंदर देश था – चंदन देश। यह देश बहुत समृद्ध और खुशहाल था। यहाँ के नीले समुद्र, हरे-भरे जंगल और सोने जैसी चमकती रेत वाली ज़मीन पर दूर-दूर से सैलानी आते थे। चंदन देश के लोग बहुत मेहनती और प्रतिभाशाली थे। पूरी दुनिया में उनकी कला और सुंदरता के झंडे गाड़े जाते थे।
चंदन देश की सबसे बड़ी धरोहर थी – ‘स्वर्ण रस’। यह एक ऐसा अनमोल रस था जो ज़मीन से निकलता था और जिसकी पूरी दुनिया में माँग थी। इसी ‘स्वर्ण रस’ की बदौलत चंदन देश दुनिया के सबसे अमीर देशों में गिना जाता था। वहाँ के लोग सुख-शांति से रहते, अच्छे स्कूल और अस्पताल बनते, और सभी के पास काम था।
एक दिन, चंदन देश में एक नया नेता आया – विकराल। वह बहुत मीठी-मीठी बातें करता। वह लोगों से कहता, “देखो, हमारे पास इतना ‘स्वर्ण रस’ है, लेकिन इसके फायदे सिर्फ कुछ बड़े-बड़े सेठ उठा रहे हैं! यह नाइंसाफी है! अगर मैं राजा बनूँगा, तो हर परिवार को महीने में हज़ारों सिक्के बिना काम किए दूँगा! और ‘स्वर्ण रस’ इतना सस्ता कर दूँगा कि एक पैसे में एक बर्तन भर मिलेगा!”
लोगों को विकराल की बातें बहुत भाईं। उन्होंने सोचा, “वाह! बैठे-बैठे पैसे मिलेंगे! क्या अच्छी बात है!” और उन्होंने विकराल को अपना राजा बना दिया।
विकराल राजा बनते ही उसने सब कुछ बदल डाला। उसने कहा, “सब कुछ सबका होना चाहिए!” और उन सभी बड़ी-बड़ी ‘स्वर्ण रस’ की मिलों को छीनकर खुद अपने कब्ज़े में ले लिया। जिन सेठों के पास ये मिलें थीं, वे डरकर देश छोड़कर चले गए। फिर विकराल ने वादा किया हर महीने हज़ारों सिक्के बाँटने शुरू कर दिए।
शुरू-शुरू में तो सब खुश थे। लोगों ने सोचा, “अब तो काम करने की भी ज़रूरत नहीं! पैसे तो आ ही रहे हैं!” धीरे-धीरे लोगों ने मेहनत करना कम कर दिया। खेतों में काम करने वाले, कारखानों में काम करने वाले सबने सोचा, “जब बिना मेहनत पैसे मिल रहे हैं, तो काम क्यों करें?”
लेकिन एक समस्या थी। ‘स्वर्ण रस’ की मिलें अब पहले जैसी कुशलता से नहीं चल रही थीं, क्योंकि विकराल और उसके दोस्तों को उन्हें चलाना नहीं आता था। धीरे-धीरे ‘स्वर्ण रस’ का उत्पादन कम होने लगा। दूसरे देशों को होने वाली आमदनी भी कम हो गई।
जब पैसे की कमी होने लगी, तो विकराल ने एक और तरकीब निकाली। उसने अपने महल में हज़ारों-लाखों नए नोट छापने वाली मशीनें लगवा दीं और बिना सोचे-समझे नोट छापने लगा। उसने सोचा, “ज्यादा नोट होंगे, तो सब अमीर हो जाएँगे!”
लेकिन ऐसा हुआ उल्टा। जितने ज्यादा नोट छपते, उनकी कीमत उतनी ही गिरती जाती। एक समय ऐसा आया कि एक रोटी खरीदने के लिए लोगों को अपनी पीठ पर बोरों में नोट लेकर जाना पड़ता! सड़कों पर नोट इतने बिखरे रहते कि लोग उन्हें कूड़ा समझकर झाड़ू से बुहार देते। नोटों के ढेर को ट्रकों में भरकर कूड़ाघर फेंका जाता।
देश की हालत बहुत खराब हो गई। खाने-पीने की चीज़ें दुकानों पर मिलनी बंद हो गईं। लोग रोटी के लिए घंटों लाइन में लगते। बच्चों के लिए दवा नहीं मिलती थी। स्कूल और अस्पताल बंद होने लगे।
विकराल के बाद उसका बेटा मणिभूषण राजा बना। उसने भी अपने पिता जैसा ही किया। उसने कभी चुनाव नहीं होने दिए और खुद को हमेशा के लिए राजा घोषित कर दिया। जब लोग भूख से परेशान होकर उससे सवाल पूछते, तो वह मंदिर-मस्जिद जाने लगता और अपनी तस्वीरें खिंचवाकर लोगों को दिखाता, “देखो, मैं कितना अच्छा इन्सान हूँ।”
आखिरकार, चंदन देश के लोगों की हालत इतनी खराब हो गई कि उन्हें अपना घर-बार छोड़कर पड़ोसी देशों में जाकर शरण माँगनी पड़ी। वह समृद्ध देश, जहाँ जाने का लोगों का सपना हुआ करता था, आज खंडहर बनकर रह गया।
कहानी का सीख:
यह कहानी हमें तीन बातें सिखाती है:
1. मेहनत का महत्व: बिना मेहनत किए मिलने वाली मुफ्त की चीज़ें कभी टिकाऊ नहीं होतीं। देश की समृद्धि उसके लोगों की मेहनत पर टिकी होती है।
2. जिम्मेदारी की समझ: देश चलाने के लिए मीठे वादों से ज्यादा ज़रूरी है समझदारी और जिम्मेदारी से काम लेना। पैसे के पेड़ नहीं उगते।
3. चुनाव की ताकत: एक अच्छा नागरिक बनने का मतलब है सोच-समझकर वोट देना और अपने नेताओं से सही सवाल पूछना। जनता की ताकत ही सबसे बड़ी ताकत है।
चंदन देश की कहानी याद दिलाती है कि किसी भी देश की सबसे बड़ी पूँजी उसकी जनता की मेहनत, समझदारी और एकजुटता होती है।