જ્યારે આઈ.કે. ગુજરાલ ભારતના વડા પ્રધાન બન્યા, ત્યારે તેમણે ભારતીય જાસૂસોની સંપૂર્ણ યાદી પાકિસ્તાનને સોંપી દીધી, અને આપણા ઘણા જાસૂસોને નિર્દયતાથી મારી નાખવામાં આવ્યા. તેમણે RAW કામગીરી પણ બંધ કરી દીધી, જેના કારણે 1998 પછી આતંકવાદી હુમલાઓમાં અચાનક વધારો થયો.
પરંતુ પ્રશ્ન એ છે કે ગુજરાલે આ બધું કરીને શું પ્રાપ્ત કર્યું? જવાબ શોધવા મુશ્કેલ છે, પરંતુ જ્યારે દેશભક્તિ ઓછી હોય ત્યારે આવા પગલાં લેવામાં આવે છે. આવા સમયે, દેશની આર્થિક સ્વતંત્રતા અપ્રસ્તુત છે; એકમાત્ર વિચાર એ છે કે પૈસા કેવી રીતે કમાવવા.
ચિદમ્બરમને કારણે, દેશની આર્થિક સ્વતંત્રતા પાકિસ્તાનના હાથમાં આવી ગઈ છે, પરંતુ પાકિસ્તાનને તેનો સહેજ પણ અફસોસ નહીં થાય કારણ કે તેને કોઈ પરવા નથી કે તે કયો દેશ છે કે કેવા પ્રકારનો દેશ છે.
હવે પૃથ્વીરાજ ચવ્હાણે કહ્યું છે કે ઓપરેશન સિંદૂરના પહેલા જ દિવસે ભારત યુદ્ધ હારી ગયું, એક એવો દાવો જે પાકિસ્તાને હજુ સુધી કર્યો નથી. કલ્પના કરો કે કોંગ્રેસ સત્તા માટે કેવી રીતે દોડી રહી છે, જાણે કે તે પાકિસ્તાનીઓ કરતાં પાકિસ્તાન પ્રત્યે વધુ વફાદાર બની ગઈ છે.
શું વાયુસેના ભાજપની રાજકીય પાંખ છે? તે રાષ્ટ્રીય સુરક્ષાનો મામલો છે, અને તેથી જ કોંગ્રેસ હવે દેશની ગુપ્તતા અને અખંડિતતા અંગે આક્રમક બનતી જોવા મળશે, કારણ કે ભાજપ સામે ભ્રષ્ટાચાર કે ગેરશાસનના કોઈ આરોપ નથી.
મત ચોરીના મુદ્દા પર પણ, તેમનું લક્ષ્ય ભાજપ કરતાં જ્ઞાનેશ કુમાર વધુ છે કારણ કે તે બંધારણીય પદ ધરાવે છે. હાલમાં, અદાણી તેમનું લક્ષ્ય છે કારણ કે અદાણી વિદેશમાં ભારતીય કોર્પોરેશનોને સપ્લાયર છે. સેનાને પણ નિશાન બનાવવામાં આવી છે; આસામમાં, તેઓ બાંગ્લાદેશનું રાષ્ટ્રગીત ગાય છે જેથી જો બાંગ્લાદેશ હુમલો કરવાની યોજના બનાવે છે, તો તેઓ તેમને સાથે લઈ જાય.
જો હાફિઝ સઈદ જેવો કોઈ વ્યક્તિ કોઈની પ્રશંસા કરે છે, તો તે વ્યક્તિ પહેલા પોતાનો બચાવ કરશે, પરંતુ રાહુલ ગાંધી હસ્યા. તમે પૂછી શકો છો કે ભાજપ તેમને જેલમાં કેમ નથી નાખતો?
જવાબ એ છે કે તેઓ આ જ ઇચ્છે છે. જ્યારે કોર્ટે અરવિંદ કેજરીવાલને જેલમાં મોકલ્યા, ત્યારે તેમણે એમ ન કહ્યું કે તેઓ જેલમાં જઈ રહ્યા છે કારણ કે તેમણે દારૂ કૌભાંડ કર્યું છે, પરંતુ તેમણે જનતાને ઉશ્કેરવાનો પ્રયાસ કર્યો. જો તમે કોઈપણ વિકસિત દેશ પર નજર નાખો, તો તમને રાહુલ ગાંધી, અરવિંદ કેજરીવાલ કે પૃથ્વીરાજ ચવ્હાણ જેવા નેતાઓ ક્યારેય નહીં મળે.
તમે યુક્રેનની પરિસ્થિતિ જોઈ હશે, અને ભારત પણ બારદાનના ડબ્બા પર બેઠેલું છે. ઉકેલ એ છે કે જનતા જાગૃત થાય અને આ સત્તા ભૂખ્યા રાક્ષસોને ઓળખે જેમના માટે સત્તા જ બધું છે. કોંગ્રેસ તેના અંતની નજીક છે, હવે ફક્ત ત્રણ રાજ્યોમાં અસ્તિત્વ ધરાવે છે. કેરળ સ્થાનિક સ્વરાજ્યની ચૂંટણીમાં તેનો સારો સંકેત નથી.
કોંગ્રેસ 2026 માં કેરળમાં પુનરાગમન કરતી દેખાય છે, અને ભાજપ ખુશ થશે કારણ કે 2031 ની કેરળની ચૂંટણીમાં, તે કોમ્યુનિસ્ટ પાર્ટી સામે નહીં, પરંતુ કોંગ્રેસ સામે લડશે. એક મૂર્ખ દુશ્મન એક બુદ્ધિશાળી કરતાં સારો છે.
આપણે તેલંગાણા અને કર્ણાટકમાંથી તેમને ઉખેડી નાખવા જોઈએ, પરંતુ આપણે એ પણ સુનિશ્ચિત કરવાની જરૂર છે કે પંજાબ અને રાજસ્થાનના લોકો પૃથ્વીરાજ ચવ્હાણના નિવેદન પર ધ્યાન આપે. આ ફક્ત અડધો ડઝન રાજ્યો છે જે સમયાંતરે કોંગ્રેસને ટેકો આપે છે, જોકે તે અપ્રસ્તુત રહે છે. જો કે, રાજ્ય સ્તરે પણ કોંગ્રેસને ખતમ કરવાની જરૂર છે.
ભાજપ કોંગ્રેસને જીવંત રાખવા અને કોઈપણ રીતે તેનું નંબર બે સ્થાન જાળવી રાખવાનો પ્રયાસ કરશે, કારણ કે સ્થિર વિપક્ષ કોઈપણ શાસક પક્ષ માટે વરદાન છે. જોકે, જનતાએ આ જવાબદારી જાતે લેવી પડશે, કારણ કે કોંગ્રેસનું લક્ષ્ય સ્પષ્ટ છે: તે સત્તા ઇચ્છે છે, ભલે તેના માટે રાષ્ટ્રના જીવનનું બલિદાન આપવું પડે.
✍️પરખ સક્સેના✍️
Month: December 2025
एक वकील साहब थे,काँग्रेस मे आ गए, काँग्रेस संगठन मे उनको बहुत सारे पद मिले…इँदिरा गाँधी के करीबी हो गए।
इँदिरा गाँधी ने उनको राज्यसभा भेज दिया। दो बार राज्यसभा मे पहुँचे फिर अचानक एक दिन राज्यसभा से इँदिरा जी के कहने पर इस्तीफा दे दिया।
इँदिरा जी ने कहा बेटा तुम जहाज पकड़ो और अब असम पहुँचो। इँदिरा जी से वकील साहब ने पुछा क्या? इँदिरा जी ने वकील साहब कहा तुम असम पहुँचो वह सब पता चल जायेगा, जो एयरपोर्ट पर लेने आयेगा वही बतायेगा।
वकील साहब झोरी झंडी लेकर असम पहुँचे वहा उनको पता चला की उन्हे हाईकोर्ट का जज बनना है। अब काँग्रेसी वकील साहब जज हो गए उसके बाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश होकर रिटायर भी हो गए।
अब मजे की बात अभी और सुनिए इससे पहले जान लिजिए की देश मे यह इकलौता केस है जहा रिटायर्ड होने के बाद किसी उच्च न्यायालय के रिटायर्ड मुख्य न्यायाधीश को सुप्रीम कोर्ट का जज बनाया गया हो। तो वकील साहब सुप्रीम कोर्ट के जज भी इँदिरा जी की कृपा से बन गए।
रि-अपाईंटमेंट आफ जजेट नही होता है, सो न इससे पहले कभी हुआ न इसके बाद कभी हुआ, एक मात्र डिक्टेटर केस है। कोई भी जज सर्विस के दौरान ही सुप्रीम कोर्ट मे जज बनाये जा सकते है और उनकी नियुक्ति कार्यकाल के दौरान ही हो सकती है लेकिन वकील साहब तो महान थे, खास थे। सो कृपा बरस पड़ी।
उनकी महानता का किस्सा नही जानेंगे तो न तो बात पुरी होगी और नही तो इस देश के एक महापुरुष की कहानी अधूरी रहेगी, यह देश गाँधी परिवार का कर्जदार रह जायेगा, आजादी की लड़ाई की भूमिका मे नेहरू गाँधी परिवार के साथ न्याय नही हो पायेगा। तो इसलिए वह किस्सा जानना निहायत ही जरूरी है।
तो किस्सा कुछ यु है की एक काँग्रेस के नेता थे उनका मामला सुप्रीम कोर्ट मे था। नेता जी का नाम जगन्नाथ मिश्रा था और मामला भ्रष्टाचार का था।यह काँग्रेस के मुख्यमंत्री ललित नारायण मिश्र के भाई थे। जो बिहार मे काँग्रेस के आखिरी मुख्यमंत्री थे।
उनके मामले को लेकर वकील साहब जज बनकर फैसला दिये और सुबह उठकर चाय पी और सुप्रीम कोर्ट से इस्थिपा दे दिया।फैसला बताने की जरूरत नही पड़नी चाहिए। इँदिरा जी ने कहा इधर आ जा गुड्ड, वकील साहब ने कहा जी मैडम। अगली सुबह हुई फिर वकील साहब राज्यसभा चले गये।
आप सोचिए फैसले दिलाने के लिए जजो की नियुक्ति होती थी आज उसी इँदिरा गाँधी का पोता मुख्य चुनाव आयुक्त के चयन पर ज्ञान बाँटते हुए इमान की बात करके जब नियुक्ति पर अपने राजनैतिक हिस्सेदारी की बात करके सत्ता के बराबर हिस्सेदारी की बात कर रहा है। तो कहावत याद आ रही है।
“बाप मरे अंधेरे मे बेटा का नाम पावर हाउस”
अब वकील साहब का नाम नही जानेंगे तो काम नही चलेगा बात कांग्रेस नेता बहरूल इस्लाम की हो रही है और अपने मुख्यमंत्री को बचाने के लिए इँदिरा गाँधी आजादी की यह लड़ाई लड़ रही थी और फिर शहीद भी हो गई तो इस आजादी के संघर्ष की इस कहानी को भी इतिहास याद रखे।
‘मैं खून से नहाता हूं या नकद देखे बिना मैं दांत नहीं मांजता।’ जगन्नाथ मिश्रा

** साल 1914 में यूएन मुखर्जी ने एक छोटी सी पुस्तक लिखी,
नाम था…
#हिन्दू – एक मरती हुई नस्ल’!!!
** सोचिए 108 साल पहले,
उन्हें पता था!!
** 1911 की जनगणना को देखकर ही 1914 में मुखर्जी ने पाकिस्तान बनने की भविष्यवाणी कर दी।
** उस समय संघ नहीं था,
सावरकर नहीं थे,हिन्दू महासभा नहीं थी।
** तब भी मुखर्जी ने वो देख लिया जो पिछले 100 सालों में एक दर्जन नरसंहार और एक तिहाई भूमि से हिन्दू विलुप्त करा देने के बाद भी राजनैतिक विचारधारा वाले सेक्युलर हिन्दू नहीं देख पा रहे।
** इस किताब के छपते ही सुप्तावस्था से कुछ हिन्दू जगे।
अगले साल 1915 में पं मदन मोहन मालवीय जी के नेतृत्व में हिन्दू महासभा का गठन हुआ।
आर्य समाज ने शुद्धि आंदोलन शुरू किया जो…..
एक मुस्लिम द्वारा स्वामी श्रद्धानंद की हत्या के साथ समाप्त हो गया।
** 1925 में हिन्दुओं को संगठित करने के उद्देश्य से संघ बना।
** लेकिन ये सारे मिलकर भी वो नहीं रोक पाए जो यूएन मुखर्जी 1915 में ही देख लिया था।
** गांधीवादी अहिंसा ने इस्लामिक कट्टरवाद के साथ मिलकर मानव इतिहास के सबसे बड़े नरसंहार को जन्म दिया और काबुल से लेकर ढाका तक हिन्दू शरीयत के राज में समाप्त हो गए।
** जो बची भूमि हिन्दुओं को मिली वो हिन्दुओं के लिए मॉडर्न संविधान के आधार पर थी और मुसलमानों के लिए…..
शरीयत की छूट,
धर्मांतरण की छूट,
चार शादी की छूट,
अलग पर्सनल लॉ की छूट,
हिन्दू तीर्थों पर कब्जे की छूट,
सब कुछ स्टैंड बाय में है।
** हिन्दू एक बच्चे पर आ गए हैं,
वहां आज भी आबादी बढ़ाना शरीयत है।
** जो लोग इसे केवल राजनीति समझते हैं उन्हें एक बार इस स्थिति की गंभीरता का अंदाजा लगाना चाहिए 2022 में 1915 से क्या बदला है?
** आज भी साल के अंत में वो अपना नफा गिनते हैं,
हम अपना नुकसान।
** हमें आज भी अपने भविष्य के संदर्भ में कोई जानकारी नहीं है।
** आज भी संयुक्त इस्लामिक जगत हम पर दबाव बनाए हुए हैं कि हम अपने तीर्थों पर कब्जा सहन करें, लेकिन उपहास और अपमान की स्थिति में उसी भाषा में पलटकर जवाब भी न दें।
** मराठों ने बीच में आकर 100-200 साल के लिए स्थिति को रोक दिया जिससे हमें थोड़ा और समय मिल गया है लेकिन ये संघर्ष अभी खत्म नहीं हुआ है।
** अपने बच्चों को देखिए आप उन्हें कैसा भविष्य देना चाहते हैं।
मरती हुई हिन्दू नस्ल जैसा कि 1915 में यूएन मुखर्जी लिख गए थे।
** अपने समय का एक समय,
अपनी कमाई का एक हिस्सा,
बिना किसी स्वार्थ के हिन्दू जनजागरण में लगाइये,
अगर ये कोई भी दूसरा नहीं कर रहा तो खुद करिए।
** नहीं तो…. आपके बच्चे अरबी मानसिकता के गुलाम, चौथी बीवी या फिदायन हमलावर बनेंगे और इसके लिए सिर्फ आप जिम्मेदार होंगे।
#Hindu dying race नहीं है,
हम सनातन हैं।
** और ये आखिरी सदी है,
जब हम लड़ सकते हैं।
इसके बाद हमारे पास भागने के लिए कोई जगह नहीं है।
** बेशर्मी और निर्लज्जता की हद देखिए…..
** एक हिन्दू महिला ( नुपुर शर्मा ) के विरुद्ध लगातार आग उगल रहे हैं, जान से मारने के फतवे दे रहे हैं, बलात्कार की धमकी दे रहे हैं और ये हाल तब है जब ये मात्र 25% है **
** गम्भीरता से सोचिए……
आपके सामने आपकी महिला को कट्टरपंथी खुलेआम गर्दन काटने, बलात्कार की धमकी दे रहे हैं, पोस्टर चिपका रहे हैं, जहां आप बाहुल्य समाज हैं.
** उनका दुस्साहस देखिए आपके इलाके में जाकर आपकी महिला के विरुद्ध प्रदर्शन में आपकी दुकानें बंद करवाने पहुंच गए. नही माने तो पत्थरबाज़ी कर दंगा कर दिया। **
** ये हाल तब है जब वे 20 दिनों से लगातार फव्वारा चिल्ला रहे हैं।
** यहां मसला केवल एक महिला का नही बल्कि गर्दन काटने को उतारू उस कट्टरपंथ मानसिकता का है, जिसका प्रतिकार बहुत आवश्यक है।
** समय रहते इसे बढ़ने से रोकना बहुत आवश्यक है, वरना देश जंगलराज हो जाएगा।
** इसे यही रोकिये, हल्के में मत लीजिए। **
** मानवता वाली भूमि को रेगिस्तान बनने से रोक लीजिए….
** आप घिर चुके हैं……
** ठीक उसी प्रकार जैसे….
शतरंज मे राजा को प्यादे,
जंगल मे शेर को भेड़िए,
और चक्रव्यूह में अभिमन्यु…….
** शरजील इमाम ने “चिकेन नेक” की बात की, आप जानते हैं हर शहर का एक चिकन नेक होता है! हर बाजार का एक चिकेन नेक होता है, और सभी चिकन नेक पर उनका कब्जा है।
** आप अपने शहर के मार्केट निकल जाइए अपना लैपटाप बनवाने मोबाईल बनवाने या कपड़े सिलवाने आप को अंदाजा नही है कि चुपचाप *”बिजनेस जिहाद”* कितना हावी हो चुका है।
** गुजरात का जामनगर हो, लखनऊ का हजरतगंज, मुम्बई का हाजी अली, गोरखपुर का हिंदी बाजार या दिल्ली का करोलबाग “चेक मेट” हो चुके हैं,
अब हर जगह इनका कब्जा हो चुका है!
** उतने जमीन पर आप के मंदिर नही हैं जितनी जमीनें उनके पास “कब्रिस्तान” के नाम पर रसूल की हो चुकी हैं!
एक दर्जी की दुकान पर सिलाई करने वाले सभी उनके हम-मजहब है, चैन से लगायत बटन तक के सप्लायर नमाजी हैं! ढाबे उनके, होटल उनके, ट्रांसपोर्ट का बड़ा कारोबार हो या ओला उबर का ड्राइवर सब जुमा वाले हैं।
** आप शहर में चंदन जनेऊ ढूढते रहिए नहीं पाएंगे, वहीं हर चौराहे पर एक कसाई बैठा है।
** घिर चुके हैं आप !
** उपाय इसका इतना आसान नही है, गहराई से काम करना होगा, अपनी दुकानें बनानी होंगी, अपना भाई हर जगह बैठाना होगा।
*वरना #गजवा_ए_हिंद चुपचाप पसार चुका है अपना पांव, बस घोषणा होनी बाकी है।*
** शेर दहाड़ते ही रह गया, भेड़िए जंगल पर कब्ज़ा बना कर बैठ चुके हैं।
** आँखे बंद करिए और ध्यान दीजिए हर जगह आप को नारा ए तकबील “अल्लाहु अकबर”!! सुनाई देगा……
** और अगर नहीं सुनाई दे रहा है तो मुगालते मे हैं आप।
** बस एक जवाब लिख दीजिए… और बता दीजिए कि “कब जागेंगे आप”??
कब तक सेकुलर का चोला ओढ़े रहेंगे..?
**हिंदू एक मरती नस्ल **
***********************
सभी हिन्दू अपने मित्रो को अधिक से अधिक यथाशीघ्र शेयर कीजिए।।
#We_support_hindutava_unity
जि राम जि
एक तीर से दो शिकार तो खैर हमलोग बचपन से ही सुनते आ रहे हैं..
लेकिन, आज मोदी सरकार ने एक तीर से 3 शिकार करके दिखा दिया.
क्योंकि, आज मोदी सरकार द्वारा पारित नई रोजगार योजना “जी राम जी” न सिर्फ मनरेगा के भ्रष्टाचार पर प्रहार है बल्कि इसके निहितार्थ कुछ और भी हैं.
असल में आजकल विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा फ्री की रेवड़ियाँ बांटने का चलन जोरों पर है.
और, मनरेगा के 90% फंड केंद्र सरकार द्वारा दिये जाते थे.
इसीलिए, विभिन्न राज्य सरकारें पात्र-कुपात्र आदि सभी को मनरेगा से जोड़कर “मनरेगा नाम का लूट है, लूट सके सो लूट” का तराना गाते हुए लूट में लगी हुई थी.
अब चूँकि, मनरेगा में राज्य सरकारों का पैसा लगना नहीं था इसीलिए मनरेगा में लूट मचा कर वे अपने अवैध घुसपैठियों के वोट बैंक की तुष्टिकरण करते रहती थी.
लेकिन, अब जी राम जी योजना में केंद्र की सिर्फ 60% की भागीदारी रहेगी और राज्य सरकारों को 40% अपनी तरफ से देना होगा.
और, जाहिर सी बात है कि… दूसरों का पैसा तो सब लूटना चाहते हैं लेकिन अपनी पॉकेट का चवन्नी भी गिर जाए तो कलेजा फटने लगता है.
इसीलिए, अब नई योजना में नहीं के बराबर लूट की संभवाना है…
क्योंकि, ये पूरी तरह से डिजिटल होगा और बायोमेट्रिक से जुड़ा होगा.
बाकी, मोदी सरकार ने नाम से ही स्पष्ट कर दिया है कि…. जिन्हें राम नाम से आपत्ति हो वो चाहें तो भाड़ में जा सकते हैं..
क्योंकि, इस योजना के जरिए मोदी सरकार ने ऑफिशियल रूप से इस बात पर मुहर लगा दी है कि….
“जो राम का नहीं, वो किसी काम का नहीं”
बाकी, इस योजना को गांडी नाम को तेलांडा में भेजने के लिए तो जाना ही जाएगा..!
मतलब कि… एक तीर से तीन शिकार…!!
यूँ ही दुनिया भर में मोदी और शाह के नाम का भोकाल थोड़े न है…!!
એક મુસાફર એક મઠની મુલાકાતે જાય છે. ત્યાંના લોકો તેને રહેવા માટે જગ્યા અને ખાવા-પીવાની સુવિધા આપે છે.પણ દરરોજ સાંજે તેને એક વિચિત્ર અવાજ સંભળાય છે.
જ્યારે તે એક સાધુને આ અવાજ વિશે પૂછે છે, ત્યારે સાધુ કહે છે: “હું તમને આ અવાજનું કારણ નહીં જણાવી શકું, કારણ કે તમે સાધુ નથી.”
મુસાફરને આ જાણવાની ખૂબ જ ઉત્સુકતા જાગે છે, તેથી તે શરૂઆતમાં મઠમાં ત્રણ વર્ષ વિતાવે છે, લાકડા કાપે છે અને પાણી ભરે છે. અને સેવા કરે છે ત્યારબાદ તે ફરીથી સાધુઓને અવાજ વિશે પૂછે છે.
સાધુઓ કહે છે: “અમે તમને નહીં જણાવી શકીએ, કારણ કે તમે સાધુ નથી.”
તેથી મુસાફર એક શિષ્ય તરીકે બીજા ત્રણ વર્ષ વિતાવે છે, છોડને પાણી પાય છે અને રસોઈ બનાવે છે. ફરીથી તે સાધુઓને અવાજ વિશે પૂછે છે.
સાધુઓ કહે છે: “અમે તમને નહીં જણાવી શકીએ, કારણ કે તમે સાધુ નથી.”
એટલે મુસાફર હવે ધાર્મિક ગ્રંથોનો અભ્યાસ કરવા લાગે છે અને બીજા ત્રણ વર્ષ વિતાવે છે, પછી તે ફરી સાધુઓને અવાજ વિશે પૂછે છે.
સાધુઓ કહે છે: “અમે તમને નહીં જણાવી શકીએ, કારણ કે તમે સાધુ નથી.”
મુસાફર ધ્યાન અને પ્રાર્થના કરવામાં બીજા ત્રણ વર્ષ વિતાવે છે.
છેવટે, એક સમારોહ યોજવામાં આવે છે જેમાં મુસાફરને ‘સાધુ’ જાહેર કરવામાં આવે છે.
હવે તે એક સાધુને અવાજના ઉદ્ગમ વિશે પૂછે છે.
સાધુ કહે છે: “હવે તો તું પોતે જ એક સાધુ છે, જા અને જાતે જ જોઈ લે.”
સાધુ તે નવા બનેલા સાધુ (મુસાફર) ને એક માર્ગ તરફ લઈ જાય છે.
એ માર્ગ એક મોટા ઓરડા તરફ જાય છે.
એ ઓરડો બીજા એક માર્ગ તરફ જાય છે.
એ માર્ગ એક નાના ઓરડા તરફ જાય છે.
ત્યાં, મુસાફર અંતે જુએ છે કે “તે વિચિત્ર અવાજનું કારણ શું છે.”
પણ… હું તમને નહીં જણાવી શકું કે તે શું છે, કારણ કે તમે સાધુ નથી!
અસ્તુ…
वह मस्जिद से बाहर निकला था और सरदार पटेल पर हमला किया था।
हमें सिखाया गया कि महात्मा गांधी की हत्या नाथूराम गोडसे ने की थी,
लेकिन हमें कभी नहीं सिखाया गया कि 14 मई 1939 को भावनगर में सरदार वल्लभभाई पटेल पर किसने हमला किया,
किसने उनकी हत्या करने की कोशिश की, और अदालत ने कितने आरोपियों को फांसी या आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई।
भावनगर में 14 और 15 मई 1939 को भावनगर राज्य प्रजा परिषद का पाँचवाँ अधिवेशन आयोजित होना था, जिसकी अध्यक्षता सरदार वल्लभभाई पटेल करने वाले थे।
जब सरदार पटेल भावनगर पहुँचे, तो रेलवे स्टेशन से एक भव्य शोभायात्रा निकाली गई।
सरदार पटेल एक खुली जीप में बैठे हुए थे, दोनों ओर खड़ी जनता का अभिवादन स्वीकार कर रहे थे।
जब जुलूस खार गेट चौक पहुँचा, तो नगीना मस्जिद में छिपे हुए 57 तथाकथित शांतिप्रिय लोग तलवारें, चाकू और भाले लेकर जीप की ओर दौड़ पड़े।
दो युवकों — बच्छुभाई पटेल और जाधवभाई मोदी — ने यह दृश्य देखा।
उन्होंने तुरंत सरदार पटेल को चारों ओर से घेर लिया ताकि उन्हें बचा सकें, और अपनी जान की परवाह किए बिना, वे उन वारों को अपने ऊपर ले लिए जो सरदार पटेल के लिए किए गए थे।
उन्होंने सरदार पटेल की ढाल बनकर अपने प्राणों की आहुति दे दी।
हमलावरों ने दोनों युवकों पर तलवार से कई वार किए — बच्छुभाई पटेल वहीं शहीद हो गए, जबकि जाधवभाई मोदी ने अस्पताल में दम तोड़ दिया।
आज भी उन वीर युवकों की प्रतिमाएँ उसी स्थान पर स्थापित हैं जहाँ उन्होंने अपने प्राण न्योछावर किए थे।
तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने इस घटना की गहन जांच की और एक विशेष न्यायालय गठित किया।
57 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया, जिनमें से:
• आजाद अली
• रुस्तम अली सिपाही — को फांसी की सज़ा सुनाई गई।
निम्नलिखित 15 अपराधियों को आजीवन कारावास की सज़ा दी गई:
• कासिम दोसा घांची
• लतीफ मियां काज़ी
• मोहम्मद करीम सैनिक
• सैयद हुसैन
• चंद्र गुलाब सैनिक
• हाशिम सुमरा ताह
• लुहार मूसा अब्दुल्ला
• अली मियां अहमद मियां सैयद
• अली मामद सुलेमान
• मोहम्मद सुलेमान कुम्भार
• अबू बकर अब्दुल्ला
• लुहार अहमदिया
• मोहम्मद मियां काज़ी
उन्होंने अदालत में कहा कि सरदार वल्लभभाई पटेल ने कोलकाता में मुस्लिम लीग के खिलाफ भाषण दिया था,
जिसके कारण उनकी हत्या की साजिश रची गई।
यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि सरदार पटेल की मृत्यु के बाद, नेहरू सरकार ने इस ऐतिहासिक घटना को इतिहास की पुस्तकों से मिटा दिया,
ताकि आने वाली पीढ़ियाँ यह न जान सकें कि सरदार पटेल पर भी एक घातक हमला और हत्या का षड्यंत्र हुआ था।
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नेहरु का ये मानना था की देश की सेना को सँभालने के लिए भारतीयों के पास काबिलियत और अनुभव नहीं है इसलिए भारतीय सेना का अध्यक्ष कोई विदेशी होना चाहिए क्योकि अंग्रेजो की सेना में भारतीय निचले तबके पर ही रहे और उन्होंने आजाद भारत की सेना का पहला अध्यक्ष बनाया एक अंग्रेज जनरल रॉब लॉकहार्ट को ।
1948 के अंत में रॉब लोकहार्ट ने इस्तीफा दे दिया क्योकि वो इंग्लैंड में ही रहना चाहते थे और सेना अध्यक्ष का पद खाली हो गया एक नए अंग्रेज सेना अध्यक्ष को नियुक्त करने के लिए नेहरु ने मंत्रिमंडल की मीटिंग बुलाई , उस मीटिंग में कुछ भारतीय लेफ्टिनेंट रैंक के ऑफिसर भी थे ।
नेहरु ने बोलना शुरू किया , क्योकि भारतीयों के पास सेना सँभालने का अनुभव नहीं है इसलिए इन नामो में से आपको कौन सा विदेशी जनरल ठीक लगता है पर अपनी राय दे ।
इस पर कर्नल नाथू सिंह राठोर खड़े हुए और नेहरु से बोले … “किसी भारतीयों को प्रधानमंत्री होने का भी अनुभव नहीं है,तो आप यहाँ क्यों बैठे है इस पद पर भी किसी अंग्रज को बिठाइये, दुनिया में एसा कौन सा देश है जो अपनी सेना का अध्यक्ष विदेशी को बनाता है” ।
ये सुनते ही नेहरु तिलमिला गए और उनको बाहर कर दिया । रक्षा मंत्री बलदेव सिंह, नाथू सिंह के इस साहस से खुश हुए और उन्होंने उनके पुरे रिकॉर्ड मंगवाए , तो पता चला नाथू सिंह बर्मा में और विश्व युद्ध में सेना की टुकड़ी का सफल नेतृत्व कर चुके थे और उन्होंने नेहरु को नाथू सिंह को ही सेना अध्यक्ष बनाने की शिफारिश कर दी ।
पर क्योकि नेहरु नाराज थे उन्हें नहीं बनाया गया लेकिन दुसरे भारतीय सीएम्_करिअप्पा को सेना अध्यक्ष बनाया ।
ये नाथू सिंह राठोर उन्ही महाराणा प्रताप की धरती से थे, जिन्हें मुग़ल कभी हरा नहीं पाए ।
जय हिन्द,,जय भारत,,,..
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તમારા ડોક્ટરને 20 વર્ષ પછી ખબર પડે કે તે સમયે ઓપરેશન ખોટું કર્યું હતું તો?
એક અમેરિકન લેખિકા Betty Friedan એ પોતાની આજુબાજુની કેટલીક મહિલાઓનો સર્વે કરીને એવું તારણ કાઢ્યું કે “આ તમામ મહિલાઓનો પરિવાર છે, બાળકો છે અને મોટા ભાગે સંપન્ન છે. છતાં તેમનામાં એક અલગ જ પ્રકારનો અજંપો ( અસંતોષ અને મુંજવણની સ્થિતિ ) છે. પણ એ લોકોને ખબર જ નથી કે આ અજંપો શેનો છે?”
આ લેખિકાએ આ વસ્તુનો આધાર લઈને આ અસંતોષને નામ આપ્યું “The Problem That Has No Name” અર્થાત કે એવી સમસ્યા જેનું નામ નથી. આ બાબતને આધાર બનાવીને ઈ.સ. 1961 માં એક પુસ્તક લખ્યું ‘The Feminine Mystique‘
આ પુસ્તકમાં લેખિકાએ કહ્યું કે પરિવાર, પતિ અને બાળકોથી સ્ત્રીની ઓળખ ન જ હોવી જોઈએ. માટે તમામ સ્ત્રીઓએ આ બંધનમાંથી મુક્ત થઈને પોતાની ઓળખ ઉભી કરવી જોઈએ અને ઓળખ ઉભી કરવામાં કઈ પણ વચ્ચે આવે તે ત્યાગી મુકો.
આ પુસ્તક વીજળીવેગે આખા અમેરિકા અને યુરોપનાં દેશમાં ફેલાઈ ગયું અને લાખો કોપી વેચાઈ અને વંચાઈ. ફક્ત વચવા પૂરતી જ નહીં લાખો સ્ત્રીઓએ આ પુસ્તકને આઝાદીનો મેનુફેસ્ટો બનાવીને જીવવા લાગી. આ પુસ્તકનાં કારણે આખા યુરોપ અને અમેરિકામાં ફેમિનિસ્ટની લહેર આવી ગઈ.
આજે તમને ભારતમાં જે પણ ફેમિનિસ્ટ ઝમકુડીઓ કૂદાકૂદ કરતી જોવા મળે, એ લોકોનાં મૂળવાઓ પ્રત્યક્ષ અને અપ્રત્યક્ષ રીતે તમને Betty Friedan અને તેમના પુસ્તક સાથે જોવા મળે.
આ પુસ્તક પૂરતા મર્યાદિત ન રહેતા Betty Friedan એ એક સંસ્થા બનાવી NOW ( National Organization for Women ) તેની અધ્યક્ષ બનીને ફેમિનિસ્ટ વિચારધારાને આગળ વધારવા માટે અભિયાન ચલાવ્યું.
પણ, ધીરે ધીરે આ અભિયાનની આડ અસરો જોવા મળી, મહિલાઓ આ પુસ્તક વાંચીને આઝાદીનાં નામ પર પરિવારનો ત્યાગ કરવા લાગી, મરજી મુજબ કોઈ સાથે જોડાવું અને તેને છોડવું. આ પુસ્તકથી અગણિત મહિલાઓએ છુટાછેડા લીધા અને અનેક ઘરો તૂટ્યો કેટલાય બાળકો રઝળી પડ્યા કેયલાય પુરુષોનું જીવન બરબાદ થઇ ગયું. આખા યુરોપમાં કુટુંબ વ્યવસ્થા પર પ્રશ્નાર્થ ચિન્હ ઉભો થઇ ગયો. મહિલાઓ પરિવાર, બાળકો અને લગનને પછાત હોવાની નિશાની માનવા લાગી. ધીરે ધીરે કેટલાક પ્રબુદ્ધ લોકો આગળ આવ્યા અને આનો વિરોધ કર્યો.
અંતે Betty Friedan ને પણ અહેસાસ થયો કે આતો ‘બકરું કાઢતા ઊંટ પેસી ગયો’ છે. પરિવારો તૂટ્યા એ તો ઠીક પણ જે મહિલાઓએ આ નિર્ણય લીધા હતા એ પણ હવે એકલી પાડવા લાગી અને ડિપ્રેશનનો શિકાર થવા લાગી હતી. અને એનો જવાબ લેખિકા પાસે હતો જ નહીં.
માટે, પ્રથમ પુસ્તકનાં 20 વર્ષ બાદ ઈ.સ. 1981 માં Betty Friedan એ પોતાનું એક નવું પુસ્તક લખ્યું ‘The Second Stage‘ આશ્ચર્ય સાથે આ પુસ્તકમાં તેમણે ફેમિનિસ્ટનો વિરોધ કર્યો અને તેમણે સ્પષ્ટ કહ્યું કે મારાં વિચારોને મહિલાઓએ અલગ રીતે અને કટ્ટરતા પૂર્વક લઇ લીધા છે. આઝાદીની મુહિમ ક્યારે પુરુષ અને પરિવાર વિરોધમાં રૂપાંતર થઇ ગઈ એ દુઃખદ છે.
તેમણે સ્પષ્ટ કહ્યું કે “સમાનતાનો અર્થ એ નથી કે મહિલા પરિવાર અને સમાજથી દૂર થઇ જાય”. વધુમાં કહેવું પડ્યું કે કેરિયર અને ઓળખ સાથે સાથે પરિવાર અને બાળકોની ભાવનાત્મક જરૂરિયાત પણ એટલી જ અગત્યની છે, આમ મહિલાઓએ બેલેન્સ કરવું જરૂરી છે.
કહેવાય છે કે ‘હાથનાં કર્યા હૈયે વાગે‘ એમ તમામ નારિવાદીઓએ Friedan નો વિરોધ કર્યો અને આરોપ લગાવ્યો કે તમે ફેમિનીઝમની લડાઈને નબળી પાડી રહ્યા છો અને આતો તમારા મૂળ વિચારની વિપરીત વાત છે.
આમ ઘણી વાત આપણને ટૂંકા ગાળા માટે સારી લાગતી હોય પણ લાંબા ગાળે તેની આડ અસર જોવાની આપણામાં દીર્ઘદ્રષ્ટિ ન હોય તો કોઈ દિવસ સામાજિક ઉપદેશ આપવા માટે આગળ ન આવવું જોઈએ. Friedan દ્વારા બીજું પુસ્તક લખવામાં આવ્યું તે 20 વર્ષ દરમિયાન બરબાદ થયેલા પરિવારનો હિસાબ કોણ આપશે?
બસ, આપણે ત્યાં પણ આવી ઘણી નકલી ફેમિનિસ્ટ ઝમકુંડીઓ છે જેની ટૂંકી દ્રષ્ટિથી લોકોને માર્ગદર્શન આપીને લોકોને ઉશકેરવા નીકળી પડે છે. પણ એ લોકોને જ ખ્યાલ નથી કે એ લોકોનો હેતુ શું છે? અથવા કે પામવા માટે એ લોકો આહવાન કરે છે તેના બદલામાં શું ઘુમાવવું પડે તેનો હિસાબ છે?
ભારતમાં કુટુંબ વ્યવસ્થાને જાળવી રાખનાર તમામ નારીશક્તિઓને નમન 🙏
નોટ: ફરીથી કહું છું “ઝાડથી અલગ થઈને ઝાડ આઝાદ નથી થતું પણ ધારાશયી થાય છે.
– મહેશ પુરોહિત, નવસારી
( ફેમિનિસ્ટ રોગનાં નિષ્ણાંત )




छदम देशभक्ति
इग्लैंड और फ्रांस के बीच चलने वाली एक ट्रेन जो इग्लैंड जा रही थी उसमें मुसाफिर लगभग भर चुके थे सिर्फ एक सीट खाली रह गई थी ट्रेन चलने से थोड़ी देर पहले एक अंग्रेज शख्स आया और उस सीट पर बैठ गया बगल में पहले से ही एक फ्रांसीसी खातून बैठी हुई थी —
फ़्रांसीसी खातून के चेहरे से परेशानी साफ झलक रही थी उसके चेहरे पर अत्यधिक तनाव देखकर अंग्रेज से रहा न गया वह पूछ बैठा आप क्यो इतनी परेशान हैं ?
उस खातून ने हिचकिचाहट के साथ कहा मेरे पास इग्लैंड के कानून के मुताबिक रखने वाली रकम से ज्यादा रकम है जो दस हजार पाउंड बनते हैं फ्रांस में इतनी रकम रखना जुर्म नही है मगर इग्लैंड में जुर्म है न जाने वहां मेरे साथ क्या सलूक होगा?
अंग्रेज बोला यह तो कोई मसला नही है अगर आप राजी हों तो आधी रकम मुझे देदें बाकी 5000 पाउंड आपके पास रहेगा हो सकता है किसी को पुलिस ने गिरफ्तार भी कर लिया तो आधी रकम बच जायेगी आप मुझे लन्दन और फ्रांस का पता लिखकर देदें ऐसी सूरत में मैं आपका पैसा आपको वापस कर दुंगा खातून ने अपना पता लिखकर दे दिया –
रेल से उतरने के बाद फ़्रांसीसी खातून पुलिस के चेकिंग से बिना किसी रूकावट के गुजर चुकी थी कि अंग्रेज जोर से चीख पड़ा और पुलिस को उस खातून की तरफ इशारा करते हुए बोला जनाब उस औरत को पकड़े वह दस हजार पाउंड गैर कानूनी तौर पर लेकर जा रही है उसमें से आधी मेरे पास और आधा पांच हजार पाउंड उसके पास है जनाब मैं इग्लैंड का “देश भक्त “शहरी हूँ और मैं अपने महबूब देश से गद्दारी करने का सोच भी नही सकता मैंने जानबूझकर उसकी मदद की ताकि अपने “महान देश”से मेरी देश भक्ती साबित हो सके-
पुलिस ने खातून की दोबारा तलाशी ली और आधी रकम बरामद करली खातून ने अपना जुर्म कबूल भी कर लिया अंग्रेज ने भी अपने पास रखी आधी रकम पुलिस के हवाले कर दिया
पुलिस अफसरान ने मनी लांड्रिंग से देश की इकॉनमी को पहुंचने वाले नुकसान के बारे में बात करते हुए अंग्रेज का शुक्रिया अदा किया उसकी देश भक्ती की जमकर तारीफ करते हुए इज्जत के साथ जाने दिया और उस फ्रांसीसी खातून को दूसरी ट्रेन से वापस फ्रांस भेज दिया —
कुछ दिन बाद फ्रांसीसी खातून के दरवाजे पर दस्तक हुई जवाब में उसने दरवाजा खोला तो सामने अंग्रेज खड़ा था हैरानी और गुस्से के मिलेजुले हालत में खातून बोली तुम कितने झूठे और मक्कार आदमी हो कि धोखे से मेरे पैसे पुलिस को बरामद करा दी और कितने बेशरम हो कि सामने आकर खड़े भी हो गये।
अंग्रेज ने खातून के किसी भी बात पर रिएक्शन देने के बजाये उसे एक लिफाफा थमाया जिसमें 15000 पाउंड थे और सपाट लहजे में बोला यह आपकी रकम है और बाकी पैसे मेरी तरफ से आपके लिए इनाम है।
फ्रांसीसी खातून उसकी बात सुनकर हैरान रह गई कि यह क्या माजरा ह?
अंग्रेज कहने लगा मोहतरमा आपका गुस्सा जायज है मगर उस वक्त मैं पुलिस का ध्यान अपने बैग से हटाना चाहता था जिसमें पहले से ही तीन मिलियन पाउंड थे मुझे इस लिये यह नाटक करनी पड़ी जिसमें आपके दस हजार पाउंड चले गये मगर मेरे लिए यह सौदा जरा भी महंगा नही था !
कभी कभी चीख चीख कर देशभक्ती,कानून की पासदारी और गैरत का दावा करने वाला शख्स दरअसल चोर भी हो सकता है।
जो देशभक्ती की आड़ लेकर अपने आपको बचा रहा होता है !
सोचिए ज़रा… 🌍
दुनिया के शाही ख़ानदानों से जुड़ा एक नाम, जिनका संबंध सीधे हज़रत मुहम्मद साहब के वंश से जोड़ा जाता है — प्रिंस अल हुसैन बिन अब्दुल्ला द्वितीय।
और कहा जाता है कि वही शख़्सियत, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के लिए ड्राइवर की भूमिका में दिखाई देती है।
अब इसे घटना कहिए, प्रतीक कहिए या समय की सबसे बड़ी तस्वीर —
लेकिन संदेश साफ़ है।
यह सिर्फ़ किसी व्यक्ति का किसी गाड़ी की सीट पर बैठना नहीं है,
यह उस सम्मान, प्रभाव और कद की झलक है,
जो आज भारत के प्रधानमंत्री के नाम से जुड़ चुका है।
जहाँ कभी सत्ता शान और अहंकार का प्रतीक मानी जाती थी,
वहीं आज सत्ता विनम्रता, विश्वास और वैश्विक स्वीकार्यता का नाम बन चुकी है।
जब दुनिया के राजघरानों से जुड़े लोग
किसी भारतीय नेता के साथ इस तरह जुड़ाव महसूस करें,
तो यह केवल मोदी जी की नहीं —
भारत की बढ़ती प्रतिष्ठा की कहानी होती है 🇮🇳
यह दृश्य उन लोगों के लिए भी एक जवाब है
जो आज भी भारत को पुराने चश्मे से देखते हैं।
आज भारत न झुकता है, न डरता है —
आज भारत नेतृत्व करता है।
अगर आपको भी लगता है कि
यह सिर्फ़ एक तस्वीर नहीं,
बल्कि बदलते भारत की पहचान है —
तो ❤️ दबाइए,
अपनी राय कमेंट में लिखिए
और इस भावना को आगे बढ़ाइए।
क्योंकि कुछ पल इतिहास बनते हैं…
और कुछ पल इतिहास की दिशा बदल देते हैं।
