देश के प्रति गाँधी के अपराध (भाग 4)
हत्या करने के लिए उकसाते गाँधी
1920 में भारत की अधिकतर मस्जिदों से दो पुस्तकें वितरित की जा रही थीं- ‘कृष्ण तेरी गीता जलानी पड़ेगी’ और ‘उन्नीसवीं सदी का लंपट महर्षि’। ये दोनों पुस्तकें ‘अनाम’ थीं, इनमें किसी लेखक या प्रकाशक का नाम नहीं था, और इन दोनों पुस्तकों में भगवान श्री कृष्ण, हिंदू धर्म इत्यादि पर बहुत अश्लील, अत्यन्त घिनौनी बातें लिखी गई थीं और इनमें अनेक देवी-देवताओं के बहुत अश्लील रेखाचित्र भी बनाए गए थे। यह बात जब गांधी तक पहुंची, तो उन्होंने इसे ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ की बात बताकर उपेक्षित कर दिया और कहा कि भारत में सबको अपनी बात रखने का अधिकार है।
लेकिन इन दोनों पुस्तकों से, भारत का हिन्दू जनमानस बहुत उबल रहा था। इसलिए 1923 में लाहौर स्थित ‘राजपाल प्रकाशन’ के मालिक महाशय राजपाल ने एक पुस्तक प्रकाशित की, जिसका नाम था- “रंगीला रसूल”। इसमें कटासुरों के पैगम्बर मोहम्मद के जीवन के बारे में बहुत सी बातें थीं। इसमें भी लेखक का नाम गुप्त रखा गया था, हालांकि उसके लेखक पंडित चमूपति थे, जो इस्लाम के जाने-माने आर्यसमाजी विद्वान थे। इस पुस्तक में कहीं कोई झूठ नहीं था, बल्कि अनेक सबूतों के साथ आयत नंबर, हदीस नंबर इत्यादि देकर लिखी गई थीं।
डेढ़ वर्षों तक ‘रंगीला रसूल’ बिकती रही, पूरे भारत में कहीं कोई बवाल नहीं हुआ। लेकिन एक दिन अचानक 28 मई 1924 को गांधी ने अपने समाचारपत्र ‘यंग इंडिया’ में एक लंबा-चौड़ा लेख लिखकर “रंगीला रसूल“ पुस्तक की खूब निंदा की, और अंत में लिखा- “मुसलमानों को स्वयं ऐसी पुस्तक लिखने वालों को सजा देनी चाहिए।”
गांधी का यह लेख पढ़कर, पूरे भारत के मुसलमान भड़क गए और महाशय राजपाल जी के ऊपर 3 वर्षों में 5 बार हमले हुए, लेकिन गांधी ने एक बार भी किसी हमले की निंदा नहीं की।
कुछ मुस्लिम विद्वानों ने उस पुस्तक ‘रंगीला रसूल’ के प्रकाशक पर लाहौर उच्च न्यायालय (हाई कोर्ट) में वाद दायर किया। हाईकोर्ट ने चार इस्लामिक विद्वानों को न्यायालय में खड़ा करके उनसे पूछा कि इस पुस्तक की कौन सी पंक्ति सही नहीं है, आप वह बता दीजिए। सभी ने माना कि इस पुस्तक में कोई गलत बात नहीं लिखी गई है। इसलिए लाहौर उच्च न्यायालय ने महाशय राजपाल पर मुकदमा खारिज कर दिया और उन्हें बाइज्जत बरी कर दिया।
उसके बाद, 3 अगस्त 1924 को गांधी ने अपने ‘यंग इंडिया’ समाचारपत्र में एक और भड़काने वाला लेख लिखा। इस लेख में उन्होंने इशारों में लिखा था कि “जब व्यक्ति को न्यायालयों से न्याय नहीं मिले, तब उसे अपनेआप प्रयास करके न्याय ले लेना चाहिए।” दूसरे शब्दों में गाँधी कटासुरों को महाशय राजपाल की हत्या करने के लिए उकसा रहे थे।
उसके बाद महाशय राजपाल के ऊपर दो बार और हमले के प्रयास हुए और अंत में 6 अप्रैल 1929 का हमला जानलेवा साबित हुआ, जिसमें मोहम्मद इल्मदीन नामक युवक ने, गदा से महाशय राजपाल के ऊपर कई वार किए, जिनसे उनकी जान चली गई।
जिस दिन उनकी हत्या हुई, उसके 4 दिन बाद गांधी लाहौर में आये थे, लेकिन वे महाशय राजपाल के घर पर शोक प्रकट करने नहीं गये और न ही अपने किसी संपादकीय में उनकी हत्या की निंदा की।
इस हत्या से देश में पूरा हिंदू समाज उबल उठा था, और अंग्रेजों को लगा कि यदि उन्होंने हत्यारे को जल्दी फांसी नहीं दी, तो अंग्रेजी शासन को भी खतरा हो सकता है। अतः अंग्रेजों ने मुकदमा चलाकर महाशय राजपाल के हत्यारे मो. इल्मदीन को फांसी की सजा सुना दी। इस पर 4 जून 1929 को गांधी ने अंग्रेज वायसराय को चिट्ठी लिखकर महाशय राजपाल के हत्यारे की फांसी की सजा को माफ करने का अनुरोध किया था।
उसके अगले दिन, अपने समाचारपत्र ‘यंग इंडिया’ में गाँधी ने एक लेख लिखा था, जिसमें उसमें यह साबित करने का प्रयत्न किया था कि यह हत्यारा तो निर्दाेष है, नादान है, क्योंकि उसे अपने धर्म का अपमान सहन नहीं हुआ और उसने गुस्से में आकर यह हत्या करने का निर्णय लिया।
लेकिन अंग्रेजों ने 31 अक्टूबर 1929 को महाशय राजपाल के हत्यारे मोहम्मद इल्मदीन को लाहौर जेल में फांसी पर चढ़ा दिया। तब 2 नवंबर 1929 को गांधी ने ‘यंग इंडिया’ में इल्मदीन को फांसी देने को इतिहास का काला दिन लिखा था। यह थी गाँधी की अहिंसा। मेरे विचार से हत्या करने के लिए उकसाने के आरोप में गाँधी पर भी केस चलना चाहिए था और उनको कठोर दंड मिलना चाहिए था।
— डॉ. विजय कुमार सिंघल
पौष शु. 8, सं. 2082 वि. (28 दिसम्बर, 2025)
#gandhi_ke_apradh