Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक कहानी सुनी थी कि #चीन में कभी एक बहुत बड़े विचारक आए, वहाँ के छोटे से स्कूल के #बौद्ध बच्चों से बात की और उनसे पूछा “अगर बुद्ध तुम्हारे सामने आयें और तुमसे तुम्हारा टिफिन तोड़ दें तो क्या करोगे?”

बच्चा बोला “वो हमारे #भगवान है, मैं उनकी पूजा करूँगा”

और अगर वो तुम्हारा घर तोड़ दें तो?

बच्चा थोड़ा सोचकर बोला, “कोई बात नहीं, तब भी उनकी पूजा करूँगा”
और अगर वो तुम्हारा देश तोड़ दें तो?

बच्चा अचानक भड़का और दाँत पीसकर बोला “फिर मैं उन्हें जीवित नहीं छोड़ूँगा”

विचारक को समझ आया कि चीन के नागरिकों के लिए उनका देश उनके घर, भोजन और धर्म से भी ऊपर है। 

ऐसे ही एक समय जापान से अमेरिका की ओर जाते एक जहाज में, लो क्लास का एक वर्कर लगातार चिल्ला रहा था कि “जापान से ज़्यादा घटिया देश कोई नहीं है, इतनी लंबी दूरी की यात्रा में उसे खाना भी नहीं मिल रहा है”

इस बात पर उसने इतना रौला पाया कि एक जापानी नागरिक उठा और अपनी खाने की थाली उसके सामने रखते बोला “ले, तुझे खाना चाहिए तो मेरा ले ले, पर जापान की बुराई में एक शब्द और बका न तो तुझे उठाकर समुंदर में फेंक दूँगा”

अब ये तस्वीर देखिए। कांधार हाईजैक का नाटकीय चित्रण है।

170 भारतीय खुश हैं कि फाइनली सरकार ने उनकी रिहाई के लिए पैसा और आतंकी दोनों गँवाने का फ़ैसला कर लिया है। यहाँ #₹अजीत डोभाल नारा लगाते हैं कि “#भारत_माता_की…” और किसी की हिम्मत नहीं पड़ती कि वो ‘#जय’ कह सके!

ये घटना कोई फ़िल्मी क्रीएटिवटी नहीं, हक़ीकत है।

हम आप दर्जनों लोग इस घटना पर उन 170 लोगों को गालियाँ दे सकते हैं, उन्हें कायर कह सकते हैं… पर क्या हम ये सोचने-विचारणे की कोशिश कर सकते हैं कि हमारे देश में #देशभक्ति सिर्फ 15 अगस्त और 26 जनवरी तक सीमित क्यों रह जाती है? क्यों हम सिनेमा हॉल में ही देशभक्त नज़र आते हैं?

कहीं जापान और चीन के आम नागरिकों के लिए देश इसलिए तो सर्वोपरि नहीं कि उनके शीर्ष पद पर बैठे नेताओं के लिए भी #नागरिक सर्वोपरि हैं?

हम’में से हर दूसरा आदमी चाहता है कि कैसे न कैसे उसका योरप, कनाडा या अमेरिकन वीसा लग जाए तो वो इन टूटी सड़कों के जंजाल से बाहर निकले।

देश है क्या एक आइडिया ही तो है, एक जगह जिसकी चार दीवारी के अंदर हम सुरक्षित और समृद्ध हैं। जब #भारतीय नागरिक देश से बाहर किसी गल्फ, यूरोप या नॉर्थ अमेरिका जाता है तो उसका लौटने का मन नहीं करता। वहाँ के सख्त नियम, बेहतर सड़कें, अच्छा मेहनताना और साफ़-सफ़ाई उसका मन इसलिए मोह लेती है कि ये सब उसे इस देश में नहीं मिलता।

हम सिनेमा हॉल में ‘सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्तां हमारा” गाते हैं और बाहर निकलते ही सफ़ेद दीवार पर गुटखा थूक देते हैं तो हिंदुस्तान कहाँ से टॉप क्वालिटी रह जाता है?

अधिकांश शहरों में वहाँ हर साल बरसात में सड़क टूटती है। और ऑक्टोबर में बन जाती है, कयी बार दिसम्बर में भी नहीं बनती है। धूल का इतना गुबार उठता है कि स्कूल के बच्चे खाँसते-खाँसते घर पहुँचते हैं।
दिल्ली तो गैस चैम्बर बन ही चुका है। बाक़ी शहरों की डिटेल्स आप बेहतर बता सकते हैं।

मैं तो इतना कह सकता हूँ कि अपने देश के लिए मर मिटने की एक्स्पेक्टैशन सिर्फ और सिर्फ फौजियों से करके हम देश को महान बनाने से रहे…

जनमानस में देश के प्रति वाकई प्रेम जगाना है तो सिर्फ फ़िल्में बनाने से काम नहीं चलेगा, पोलिसीज़ बेहतर बनानी होंगी, करप्शन पर सजायें सख्त करनी ही पड़ेंगी, एजुकेशन को बेहतर बनाना ही होगा और बेसिक आर्मी ट्रेनिंग हर एक व्यक्ति के लिए #अनिवार्य करनी होगी।

आज सोचेंगे, कल नीति बनेगी तब जा के 2050 तक कुछ बदलाव होता दिखेगा।
तबतक हम इसी में संतोष ढूंढते रहेंगे कि देखो हमारी तो सिर्फ सड़कें टूटी है, पड़ोसी का तो देश टूट गया है, हा……हा…

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