एक बड़ी महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक घटना है, तिब्बत में घटी। भरोसा न आए ऐसी घटना है, मगर घटी। आदमी के मोह के संबंध में खबर देती है। लामाओं का एक आश्रम तिब्बत में है, उस आश्रम का यही नियम था कि जो भी मरे, आश्रम के नीचे ही पहाड़ की गहराइयों में बड़ी खंदकें थीं। उन खंदकों में मरघट था, वहां लाश को डाल देते थे अंदर। गुफाएं थीं, खोह थी। चट्टान हटाकर लाश को नीचे डाल देते थे, चट्टान फिर लगा देते थे।
एक आदमी मरा, वह पूरा मरा नहीं था, अधमरा था। अभी होश कुछ-कुछ चला गया था, लेकिन लोगों ने जल्दी की होगी। मरे आदमी को जल्दी विदा करने की फिक्र थी। उन्होंने उठा दिया पत्थर और लामा को डाल दिया नीचे। कोई घंटे-दो घंटे वह होश में आ गया। अब उस चट्टान के नीच से कितना ही चिल्लाए, आवाज बाहर न जाए। और आवाज अगर जाए भी बाहर तो क्या तुम सोचते हो, कोई चट्टान हटाएगा? घबड़ाएंगे लोग कि पता नहीं भूत हो गया, प्रेत हो गया, क्या हो गया! और चट्टानें रख देंगे ऊपर कि किसी तरह अंदर ही दबा रहे, अब बाहर न निकल आए।
अब यह आदमी बिल्कुल बूढ़ा था। और बड़ी मुश्किल में पड़ गया। भयंकर अंधकार! और वहां सैकड़ों लाशें सड़ चुकी थीं, उनकी भयंकर बदबू! भूख भी लगने लगी। चिल्लाता भी रहा तो और भूख लगने लगी। प्यास भी लगने लगी। तुम चकित होओगे जानकर, वह सड़ी हुई लाशों का मांस खाता रहा। और गुफा की दीवालों से जो आश्रम का नाली इत्यादि का गंदा पानी उतर आता था, उसको चाट-चाटकर पीता रहा। लाशों में जो कीड़े-मकोड़े पड़ गए थे वे भी खाने लगा। करेगा क्या? जिंदगी का मोह ऐसा है।
और बड़े आश्चर्य की बात है…और प्रार्थना करने लगा। बौद्ध भिक्षु! परमात्मा को कभी माना नहीं था, लेकिन अब प्रार्थना करने लग गया। ऐसी कठिनाइयों में लोग परमात्मा को मान लेते हैं। परमात्मा के सिवा अब कोई सहारा नहीं दिखाई पड़ता था उसे। और प्रार्थना क्या करता था? प्रार्थना ऐसी, जो कि बुद्ध-धर्म के बिल्कुल खिलाफ। जिंदगी भर बौद्ध भिक्षु रहा! प्रार्थना यह थी कि अब कोई आश्रम में मर जाए। क्योंकि जब कोई मरे तभी चट्टान हटे। न कोई मरे तो चट्टान हटनेवाली नहीं है। कोई मर जाए आश्रम में। सोचता था कौन मरे। और एक ही प्रार्थना चौबीस घंटे। काम भी दूसरा नहीं था कि कोई मरे। हे भगवान, किसी को मार। किसी को भी मार, मगर जल्दी कर। ज्यादा देर हो गई तो मैं मर जाऊंगा।
आदमी को खुद जिंदा रहना हो तो वह किसी को भी मारने को तैयार हो जाए। यही तो सारे जिंदगी की गलाघोंट प्रतियोगिता है। सब एक-दूसरे का गलाघोंट रहे हैं। उस आदमी पर दया करना। उसने कुछ गलत प्रार्थना नहीं की। कितनी ही गलत मालूम पड़े, कितनी ही हिंसात्मक मालूम पड़े।
पांच साल बाद कोई मरा। कहते हैं न, देर है अंधेर नहीं। परमात्मा ने भी खूब देर से सुनी, पांच साल लग गए! सरकारी कामकाज! फाइल पहुंचते-पहुंचते भी तो समय लगता है। पहुंची होगी जब तक प्रार्थना, पांच साल बाद कोई मरा। चट्टान हटी। लोग तो दंग रह गए। जब उन्होंने चट्टान हटाई तो वह बाहर निकला आदमी। उसे देखकर एकदम घबड़ा गए। पहचान भी नहीं आया। सारे बाल शुभ्र हो गए थे। और बाल इतने बड़े हो गए थे कि जमीन छू रहे थे। दाढ़ी के बाल जमीन छू रहे थे। आंखें उसकी खराब हो गई थीं बिल्कुल क्योंकि पांच साल अंधकार में रहा। भयंकर बदबू उसकी देह से आ रही थी क्योंकि मांस सड़ा-सड़ाया, कीड़े-मकोड़े, गंदा पानी, यही उसका आहार था।
हो सकता है जब साधना करता था ऊपर तो सिर्फ दुग्धाहार करता रहा हो, उपवास करता रहा हो, शुद्ध फलाहार करता रहा हो। ऐसी ऊंची-ऊंची बातें सूझती हैं जब सुविधा होती है। लेकिन जहां सुविधा न हो वहां कोई उपवास करे! भरे पेट लोग उपवास करते हैं, भूखे पेट लोग उपवास करते। गरीब आदमी का धार्मिक दिन आता है तो उस दिन हलुआ-पूड़ी बनाता है। अमीर आदमी का धार्मिक दिन आता है तो उपवास करता है। जैनी अकारण उपवास नहीं करते, धन है तो उपवास करना पड़ता है। धार्मिक दिन–उपवास करना पड़ता है।
अब यह आदमी तो भूखा मर रहा था और उपवास का सोचा ही नहीं पांच साल इसने। और इतना ही नहीं, जब वह बाहर निकला तो वह बहुत-से कपड़े साथ लेकर निकला। क्योंकि तिब्बत में रिवाज है कि जब कोई मर जाता है तो उसके साथ दो जोड़ी कपड़े भी रख देते हैं। तो उसने सब मुर्दों के कपड़े इकट्ठे कर लिए थे कि जब निकलूंगा…आदमी का मन! और तिब्बत में यह भी रिवाज है, जब कोई मरता है तो उसके साथ दस-पांच रुपए भी रख देते हैं। उसने सब रुपए भी इकट्ठे कर लिए थे। एक पोटली में रुपए बांधे हुए था और एक पोटली में सारे कपड़े बांधे हुए था।
जब वे दोनों पोटलियां उसने बाहर खींची, लोगों ने कहा, यह क्या कर रहे हो? तुम अभी जिंदा हो? उसने कहा, मैं जिंदा हूं और भला-चंगा हूं। और यह पांच साल की मेरी कमाई है। एक पैसा नहीं छोड़ा है कहीं। सब ढूंढ डाला। काम भी नहीं था कोई दूसरा।
मर भी जाए आदमी, मुर्दाघर में भी पड़ा हो तो पैसा इकट्ठा करेगा। जिंदगीभर की आदतें ऐसी ही चली नहीं जातीं। फिर आदतों का सवाल परिस्थितियों से नहीं है, आदतों का सवाल मनःस्थितियों से है।
ओशो, नाम सुमिर मन बावरे–(प्रवचन-7)