आपने कभी सोचा है #Congress सत्ता से बाहर है, फिर भी कभी गरीब क्यों नहीं होती?
क्योंकि आज जो काला सच सामने आया है, वही उसका असली कारण है! 😡
जब से मनरेगा लॉन्च हुआ, तब से अब तक करीब 27 लाख ऐसे वर्कर मिले हैं जो अस्तित्व में ही नहीं हैं।
👉 नाम नहीं मिलते
👉 फोटो किसी और की, काम किसी और का
👉 शहर में रहने वाले लोग “गांव में काम” के पैसे ले रहे थे…
👉 कई तो मर चुके लोग भी “काम” कर रहे थे!
ये है कांग्रेस का असली घोटाला मॉडल।
हर दिन 90 करोड़ रुपये की लूट
यानी कुल 34,000 करोड़ रुपये का धंधा, वो भी आज की सरकार के आने के बाद खुल रहा है।
आज सरकार ने 27 लाख फर्जी मनरेगा वर्कर्स को डिलीट किया है क्योंकि e-KYC अनिवार्य कर दिया गया।
सोचिए, इसमें कुछ असली गरीब लोग भी हटाए गए होंगे….
क्योंकि उन्हें नहीं पता कि
👉 बायोमेट्रिक कैसे करना है,
👉 उनका नाम “मुहम्मद”, “मोहम्मद” या “इस्लाम” किस आधार कार्ड में क्या लिखा है,
👉 कई के बने हुए हैं 4–5 अलग-अलग आधार।
ये लोग सिस्टम में उलझ गए… लेकिन कांग्रेस की सालों पुरानी “घोस्ट वर्कर इंडस्ट्री” पकड़ी गई।
सरकार ने कांग्रेस की लाइफलाइन—फर्जी मनरेगा नेटवर्क—की नब्ज पकड़ ली है।
अब पूछो कांग्रेस से—
27 लाख घोस्ट वर्कर्स कौन थे?
किसने बनाए?
उनके नाम से पैसा कौन खा रहा था?
कोई जवाब नहीं।
कोई सफाई नहीं।
बस 34 हज़ार करोड़ की धांधली… और देश को लूटने की आदत।
**सरकार को इस घोटाले को पकड़ने में 11 साल क्यों लगे?
यही तो असली समस्या है!**
सच ये है कि मनरेगा कांग्रेस के समय का नहीं, बल्कि स्थानीय स्तर पर फैले “सिस्टम माफिया” का सबसे बड़ा किला था—जिसे तोड़ने में वक्त लगना ही था।
पर वजहें साफ हैं:
कांग्रेस ने मनरेगा को बनाया ही “पेपर-बेस्ड लूट मशीन”
2014 तक पूरा सिस्टम कागज़ी था—
✔ काग़ज़ी मस्टर रोल
✔ काग़ज़ी उपस्थिति
✔ बिना फोटो, बिना पहचान, बिना ऑडिट
यानी लूट रोकने के लिए कोई डिजिटल सुरक्षा ही मौजूद नहीं थी।
इस गंदगी को साफ़ करना एक दिन का काम नहीं था।
BJP सरकार के बाद भी राज्यों पर निर्भरता — 60% मनरेगा कांग्रेस/अन्य पार्टियों वाले राज्यों में चला
केंद्र सिर्फ पैसे देता है,
वर्कर जोड़ना, नाम चढ़ाना, उपस्थिति भरना, लिस्ट बनाना—सब राज्य सरकारें करती हैं।
राज्यों में वही पुराने अफ़सर, वही पुराने ठेकेदार, वही प्रॉक्सी नेटवर्क सक्रिय रहा।
केंद्र चाहे जितना सख्त हो, राज्य चाहें तो घोटाला दबा सकते हैं।
2014–2024: सिस्टम को डिजिटल करने में समय लगा
सरकार ने धीरे-धीधे मनरेगा को टेक्नोलॉजी से जोड़ा:
✔ आधार सीडिंग
✔ जॉब कार्ड डिजिटाइजेशन
✔ जियोटैगिंग
✔ NMMS फोटो ऐप
✔ e-KYC
इनमें हर चरण में राज्यों ने विरोध, हड़ताल, कोर्ट केस, और डेटा अपडेट रोकने जैसे हथकंडे अपनाए।
इसलिए क्लीन-अप धीमा हुआ।
घोटाला इतना विशाल था कि उसे “एक झटके में पकड़ना” असंभव था
27 लाख घोस्ट वर्कर्स मतलब:
👉 ग्राम सचिव
👉 पंचायत सहायक
👉 ब्लॉक अधिकारी
👉 डेटा एंट्री ऑपरेटर
👉 स्थानीय नेता
👉 ठेकेदार
सभी की मिलीभगत।
ये पूरी घोटाला-इकोसिस्टम थी, न कि एक साधारण स्कैम।
असली क्लीन-अप तभी संभव हुआ जब e-KYC को “अनिवार्य” कर दिया गया (2023–24)
जैसे ही बायोमेट्रिक अनिवार्य हुआ—
घोस्ट वर्कर एक ही दिन में गायब हो गए।
क्योंकि
ना उनका चेहरा था
ना फिंगरप्रिंट
ना उपस्थिति
ना मोबाइल
ना आधार
इसलिए 27 लाख नाम को काटते ही पूरा खेल साफ दिख गया…
राधे – राधे 🙏🙏🙏🚩🚩🚩