कुत्ता पालो तो पशु प्रेमी, भैंस पालो तो गंवार… यह कैसा समाज बना लिया हमने?🤔
यह चित्र सिर्फ हास्य नहीं, बल्कि “समाज की मानसिकता पर गहरा प्रहार” है।
यह दिखाता है कि कैसे एक ही काम “जानवर पालने” को दो अलग-अलग वर्गों में बाँट दिया गया है:
एक “क्लासी” कहलाता है, दूसरा “गंवार”।
हमने समाज को इतना दिखावे का बना दिया है कि सच्चाई और मेहनत अब स्टेटस’ से मापी जाने लगी है।
कुत्ता-बिल्ली पालना “आधुनिकता का पर्योय” हो गया,
लेकिन जो किसान भैंस-बकरी पालता है, वही हमें “गंवार” दिखने लगता है।
सोचिए क्या यह सभ्यता है या मानसिक गुलामी?🥹
गाँव का वह आदमी, जो रोज़ सुबह उठकर भैंस का चारा काटता है,
उसके हाथों में मिट्टी लगी होती है, लेकिन वही मिट्टी इस देश का अन्न देती है।
वह ‘गंवार’ नहीं है वह हमारे जीवन का आधार है।
पर अफसोस! शहर की चमक ने हमें इतना अंधा कर दिया है कि
हमने मेहनत को ही नीचा समझना शुरू कर दिया।
कुत्ता पालने वाला अगर कह दे
“मैं अपने पेट को परिवार समझता हूँ”
तो सब ताली बजाते हैं,
“क्या संवेदनशील व्यक्ति है!”
पर भैंस पालने वाला अगर कह दे
“ये मेरी लाडो है, मेरे परिवार जैसी है,”
तो हम हँस पड़ते हैं…
क्यों? क्योंकि उसका प्यार ‘ब्रांडेड नस्ल’ से नहीं जुड़ा।
असल में यह फर्क जानवरों में नहीं,
हमारी सोच की जात में है।
शहर में जानवर पालना “शौक” कहलाता है,
गाँव में जानवर पालना “ज़रूरत” कहलाता है।
और हमें “ज़रूरत वाले लोग” छोटे लगते हैं,
क्योंकि हमने मेहनत से ज़्यादा दिखावे को मूल्य बना दिया है।
कुत्ता पालने वाले की फोटो इन्स्टाग्राम पर जाती है,
#PetLove #DogMom’ के साथ।
भैंस पालने वाला वही फोटो डाल दे,
तो लोग कहेंगे “अरे भाई ये क्या डाल दिया!”
अरे भाव एक ही है ना प्रेम का, जीवन का, सेवा का।
फर्क सिर्फ फ्रेम में है।
हम ऐसे समाज में पहुँच चुके हैं जहाँ
‘Milk in Starbucks cup’ classy लगता है,
पर वही दूध निकालने वाली गाय भैंस ‘dirty’ लगती है।
हमने ‘Source’ को नीचा और ‘Result’ को ऊँचा मान लिया है।
यही आधुनिकता की सबसे बड़ी बीमारी है।
भैंस पालने वाला जो घाम-धूप में खड़ा रहता है,
उसका हर दिन परिश्रम का उत्सव है।
वह Animal Lover नहीं, Animal Servant है
क्योंकि वह उस जानवर से अपने परिवार का पेट भरता है,
उसकी सेवा करता है,
और बदले में समाज उसे ‘गंवार’ कह देता है।🥹
हमारी शिक्षा ने हमें डिग्री दी है, पर दृष्टि नहीं।
हमने यह तो सीख लिया कि कौन-सा कुत्ता किस नस्ल का है,
पर यह नहीं सीखा कि “भैंस की आँखों में भी वही भाव हैं”
जो तुम्हारे पालतू कुत्ते की आँखों में हैं
विश्वास, ममता और जुड़ाव।😍
ये सिर्फ भैंस-बकरी का मुद्दा नहीं है,
ये मानसिकता का दर्पण है।
हमने “शहर का दिखावा” और “गाँव की सच्चाई” के बीच
एक अदृश्य दीवार खड़ी कर दी है।
और दुख की बात ये है
अब वो दीवार हमारे अंदर भी बस गई है।
कभी गाँव जाओ,
देखना कोई किसान अपनी गाय के सिर पर हाथ फेरता है,
तो उसमें एक माँ जैसी ममता होती है।
वो दूध सिर्फ बेचने के लिए नहीं निकालता,
वो उसे “प्रसाद” मानता है।
पर हम शहर वाले उस प्रसाद को भी
“प्रोडक्ट” समझने लगे हैं।
Animal Lover” बनने के लिए नस्ल या कपड़ा नहीं चाहिए,
चाहिए तो बस दयाभाव।
चाहे वो कुत्ते के लिए हो या भैंस के लिए
प्रेम की भावना वही है।
जिसे हम गंवार कहते हैं,
वो धरती के सबसे बड़े Animal Lover होते हैं,
बस अंग्रेज़ी नहीं जानते।
याद रखो 👇
जो भैंस-बकरी पालता है,
वही तुम्हारे घर की दूध की मिठास है।
जिसे तुम गंवार कहते हो,
वो तुम्हारे बच्चों की सेहत का रक्षक है।
और जिसे तुम Animal Lover कहते हो,
वो सिर्फ फोटो खिंचवाने के लिए प्रेम दिखाता है।
कभी खुद से पूछो
हम जानवरों से प्रेम करते हैं, या उनके साथ अपने image से?
कुत्ता पालने से पहले,
एक बार उस किसान की आँखों में झाँको जिसने तुम्हारे घर का दूध भेजा है।
वो सच्चा Animal Lover है,
क्योंकि उसके प्रेम में “फैशन” नहीं, “सेवा” है।
💭 सोचिए — अगर समाज सच्चे कर्मयोगियों को को गंवार कहेगा,
तो हमारी आधुनिकता किस दिशा में जा रही है?
क्या सच में “Animal Lover” होना सिर्फ एक पालतू कुत्ते तक सीमित है?
या फिर भैंस पालने वाला भी उसी श्रेणी में आता है
बस उसका Instagram अकाउंट नहीं है?
अगर यह बात दिल को लगी हो,
तो बस एक बार दिल से सोचिए 🤔
गंवार कौन है? वो जो मेहनत करता है,
या वो जो मेहनत करने वालों का मज़ाक
गंवार कौन है? वो जो मेहनत करता है,
या वो जो मेहनत करने वालों का मज़ाक उड़ाता है?
Month: November 2025
टाइटैनिक की सबसे डरावनी कहानी…🥹🥹
यह कहानी टाइटैनिक के उस हिस्से की है जिसे ज़्यादातर लोग कभी जान ही नहीं पाये। चमकते डेक, संगीत और शानों शौकत के नीचे एक दूसरी दुनिया थी, जहाँ ब्लैक गैंग नाम के लोग काम करते थे। यही असली मेहनती हाथ थे जो टाइटैनिक को चलाते थे।
जहाज के सबसे निचले हिस्से में भट्ठियों का लम्बा इलाका था। चारों ओर अंधेरा, भयंकर गर्मी, कोयले की उड़ती धूल और केवल आग की लाल चमक। यही इन मज़दूरों का रोज़ का माहौल था। कोई ठण्डी हवा नहीं, कोई खिड़की नहीं, बस आग, धुआँ और पसीने से तर शरीर।
फायरमैन भट्ठियों में कोयला झोंकते थे ताकि भाप बनती रहे और इंजन घूमता रहे। Trimmers कोयले को सम्भाल कर रखते थे, ताकि जहाज सन्तुलित रहे। टनों कोयला झाँकने के कारण उनके हाथ जल जाते, कपड़े हमेशा गीले रहते और साँस लेना तक मुश्किल हो जाता। फिर भी यही मेहनत टाइटैनिक को ताक़त देती थी।
फिर वह रात आयी जिसे इतिहास कभी नहीं भूलता। टाइटैनिक बर्फीले पानी में हिमखण्ड से टकराया। ऊपर अफरा तफरी फैलने लगी, लेकिन नीचे ब्लैक गैंग भागे नहीं।
वे जानते थे कि अगर भट्ठियाँ अचानक बन्द हो गयीं तो जहाज और जल्दी डूबेगा। उन्होंने वहीं रहकर पानी रोकने की कोशिश की, भट्ठियाँ बन्द कीं और पम्प और बिजली को जितना हो सके उतने समय तक चलाये रखा। क्योंकि जब तक रोशनी और वायरलेस चलते रहे, ऊपर लोग बचाव नावों में चढ़ते रहे और मदद का सन्देश भेजा जा सका।
इनमें से बहुत से मज़दूर बाहर नहीं निकल पाये। जहाँ ऊपर संगीत और अमीरी थी, वहीं नीचे उन्हीं भट्ठियों के बीच उन्होंने अपनी अन्तिम साँस ली। दूसरों की जान बचाने के लिये अपनी जान बलिदान कर दी।
यह कहानी उन अनसुने नायकों की है जिनकी पसीने और हिम्मत ने टाइटैनिक को चलाया और डूबते समय भी आशा की किरण बुझने नहीं दी। सैल्यूट नायकों को…🙏🙇
😢😢😢🫤🫤🫤🥺🥺🥺🥹🥹🥹
दुःखद 🙏🥹

कांग्रेस ने सब को गुमनाम कर खुद को सामने रखने का कार्य किया।😓😌
1842 में खंडवा जिले के बड़दा गांव में जन्मे टंट्या भील (टंट्या मामा) एक भारतीय स्वतंत्रता सेनानी थे, जिन्हें भारतीय रॉबिन हुड भी कहा जाता है। 1857 के भारतीय विद्रोह के बाद, अंग्रेजों ने बेहद कठोर कार्रवाई की, जिसके बाद ही टंट्या भील ने अंग्रेज़ों के खिलाफ लड़ना शुरू किया। वह उन महान क्रांतिकारियों में से एक थे, जिन्होंने बारह साल तक ब्रिटिश शासन के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष किया।
विदेशी शासन को उखाड़ फेंकने के लिए, अपने अदम्य साहस और जुनून के बल पर वह 12 साल तक लड़ते रहे और आदिवासियों और आम लोगों की भावनाओं के प्रतीक बने। वह ब्रिटिश सरकार के सरकारी खजाने और उनके चाटुकारों की संपत्ति को लूटकर गरीबों और जरूरतमंदों में बांट देते थे।
टंट्या भील, गुरिल्ला युद्ध में निपुण थे। लेकिन एक लंबी लड़ाई के बाद, वर्ष 1888-89 में राजद्रोह के आरोप में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और जबलपुर जेल ले जाया गया, जहां ब्रिटिश अधिकारियों ने उन्हें अमानवीय रूप से प्रताड़ित किया। टंट्या भील की गिरफ्तारी की ख़बर 10 नवंबर 1889 को न्यूयॉर्क टाइम्स के अंक में प्रमुखता से प्रकाशित की गई थी। इस ख़बर में उन्हें ‘भारत का रॉबिन हुड’ बताया गया था।
4दिसंबर 1889 को उन्हें फांसी की सज़ा सुनाई गई थी। भारत के वीर सपूत टंट्या भील को शत् शत् नमन!
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5 नवम्बर 1556, एक निहत्था और घायल शख्स, सामने बैठा, था और अकबर का जल्लाद, बहरम खान, उसे इस्लाम कबूल करने पर जोर डाल रहा था।
ये निहत्था और घायल शख्स था, हेमचंद विक्रमादित्य उर्फ़ हेमू।
वो राजा जिसने 350 वर्ष के मुग़ल सल्तनत को उखड फेका था।
वो राजा जिसने अपने जीवन में लड़े 24 युद्ध में से 22 को जीता था।
वो राजा, जिसके चलते दिल्ली ने कई सो वर्ष बाद हिन्दु रीतीरिवाज़ से हुआ राज्य अभिषेक देखा था।
पानीपत की दूसरी लड़ाई में हेमू ने अकबर की फौज को तिनके की तरह बिखेर दिया था, हेमू की तलवार के सामने, अकबर का कोई भी योद्धा आने को तैयार नही था।
पर शायद भारत की इस भूमि के नसीब में अभी और मुगलिया अत्याचार लिखे थे।
और तभी किसी ने धोखे से हेमू की आँख में एक तीर मार दिया।
जिसके बाद, युद्ध का रूप बिलकुल पलट गया और अकबर की सेना ने हेमू को गिरफ्तार कर लिया।
इस पर भी अकबर का जब कोई भी जल्लाद, हेमू की वीरता से प्रभावित हो, उसका सर कलम करने को राजी नही हुआ,और बहरम खान की लाख यातनायो पर भी हेमू ने इस्लाम नही कबूला।
तो क्रूर बहरम खान ने निहत्थे हेमू का सर कलम कर दिया।
और भारत की भूमि फिर से मुगलों के आधीन हो गई।
आज भारत के अंतिम हिन्दू राजा हेमचन्द्र विक्रमादित्य की पुण्यतिथि पर नमन है इस महान योद्धा को।
गणितज्ञ “लीलावती” का नाम हममें से अधिकांश लोगों ने नहीं सुना है, उनके बारे में कहा जाता है कि वो पेड़ के पत्ते तक गिन लेती थीं।
शायद ही कोई जानता हो कि आज यूरोप सहित विश्व के सैंकड़ो देश जिस गणित की पुस्तक से गणित को पढ़ा रहे हैं, उसकी रचयिता भारत की एक महान गणितज्ञ महर्षि भास्कराचार्य की पुत्री लीलावती हैं, आज गणितज्ञों को गणित के प्रचार और प्रसार के क्षेत्र में लीलावती पुरूस्कार से सम्मानित किया जाता है।
आइए जानते हैं महान
“गणितज्ञलीलावती” जी के बारे में जिनके नाम से गणित को पहचाना जाता था :-
दसवीं सदी की बात है, दक्षिण भारत में भास्कराचार्य नामक गणित और ज्योतिष विद्या के एक बहुत बड़े पंडित थे। उनकी कन्या का नाम लीलावती था।
वही उनकी एकमात्र संतान थी। उन्होंने ज्योतिष की गणना से जान लिया कि ‘वह विवाह के थोड़े दिनों के ही बाद विधवा हो जाएगी।’
उन्होंने बहुत कुछ सोचने के बाद ऐसा लग्न खोज निकाला, जिसमें विवाह होने पर कन्या विधवा न हो। विवाह की तिथि निश्चित हो गई। जलघड़ी से ही समय देखने का काम लिया जाता था।
एक बड़े कटोरे में छोटा-सा छेद कर पानी के घड़े में छोड़ दिया जाता था। सूराख के पानी से जब कटोरा भर जाता और पानी में डूब जाता था, तब एक घड़ी होती थी।
पर विधाता का ही सोचा होता है। लीलावती सोलह श्रृंगार किए सजकर बैठी थी, सब लोग उस शुभ लग्न की प्रतीक्षा कर रहे थे कि एक मोती लीलावती के आभूषण से टूटकर कटोरे में गिर पड़ा और सूराख बंद हो गया; शुभ लग्न बीत गया और किसी को पता तक न चला।
विवाह दूसरे लग्न पर ही करना पड़ा। लीलावती विधवा हो गई, पिता और का के धैर्य का बांध टूट गया। लीलावती अपने पिता के घर में ही रहने लगी।
पुत्री का वैधव्य-दु:ख दूर करने के लिए भास्कराचार्य ने उसे गणित पढ़ाना आरंभ किया। उसने भी गणित के अध्ययन में ही शेष जीवन की उपयोगिता समझी।
थोड़े ही दिनों में वह उक्त विषय में पूर्ण पंडिता हो गई। पाटी-गणित, बीजगणित और ज्योतिष विषय का एक ग्रंथ ‘सिद्धांतशिरोमणि’ भास्कराचार्य ने बनाया है। इसमें गणित का अधिकांश भाग लीलावती की रचना है।
पाटीगणित के अंश का नाम ही भास्कराचार्य ने अपनी कन्या को अमर कर देने के लिए ‘लीलावती’ रखा है।
भास्कराचार्य ने अपनी बेटी लीलावती को गणित सिखाने के लिए गणित के ऐसे सूत्र निकाले थे जो काव्य में होते थे। वे सूत्र कंठस्थ करना होते थे।
उसके बाद उन सूत्रों का उपयोग करके गणित के प्रश्न हल करवाए जाते थे।कंठस्थ करने के पहले भास्कराचार्य लीलावती को सरल भाषा में, धीरे-धीरे समझा देते थे।
वे बच्ची को प्यार से संबोधित करते चलते थे, हिरन जैसे नयनों वाली प्यारी बिटिया लीलावती, ये जो सूत्र हैं, बेटी को पढ़ाने की इसी शैली का उपयोग करके भास्कराचार्य ने गणित का एक महान ग्रंथ लिखा, उस ग्रंथ का नाम ही उन्होंने “लीलावती” रख दिया।
आजकल गणित एक शुष्क विषय माना जाता है पर भास्कराचार्य का ग्रंथ ‘लीलावती‘ गणित को भी आनंद के साथ मनोरंजन, जिज्ञासा आदि का सम्मिश्रण करते हुए कैसे पढ़ाया जा सकता है,
इसका नमूना है। लीलावती का एक उदाहरण देखें- ‘निर्मल कमलों के एक समूह के तृतीयांश, पंचमांश तथा षष्ठमांश से क्रमश: शिव, विष्णु और सूर्य की पूजा की, चतुर्थांश से पार्वती की और शेष छ: कमलों से गुरु चरणों की पूजा की गई।
लीलावती, शीघ्र बता कि उस कमल समूह में कुल कितने फूल थे?
उत्तर-120 कमल के फूल।
वर्ग और घन को समझाते हुए भास्कराचार्य कहते हैं लीलावती, वर्गाकार क्षेत्र और उसका क्षेत्रफल वर्ग कहलाता है।
दो समान संख्याओं का गुणन भी वर्ग कहलाता है। इसी प्रकार तीन समान संख्याओं का गुणनफल घन है और बारह कोष्ठों और समान भुजाओं वाला ठोस भी घन है।
“मूल” शब्द संस्कृत में पेड़ या पौधे की जड़ के अर्थ में या व्यापक रूप में किसी वस्तु के कारण, उद्गम अर्थ में प्रयुक्त होता है।
इसलिए प्राचीन गणित में वर्ग मूल का अर्थ था ‘वर्ग का कारण या उद्गम अर्थात् वर्ग एक भुजा।
इसी प्रकार घनमूल का अर्थ भी समझा जा सकता है। वर्ग तथा घनमूल निकालने की अनेक विधियां प्रचलित थीं।
लीलावती के प्रश्नों का जबाब देने के क्रम में ही “सिद्धान्त शिरोमणि” नामक एक विशाल ग्रन्थ लिखा गया, जिसके चार भाग हैं- (1) लीलावती (2) बीजगणित (3) ग्रह गणिताध्याय और (4) गोलाध्याय।
‘लीलावती’ में बड़े ही सरल और काव्यात्मक तरीके से गणित और खगोल शास्त्र के सूत्रों को समझाया गया है।
अकबर के दरबार के विद्वान फैजी ने सन् 1587 में “लीलावती” का फारसी भाषा में अनुवाद किया।
अंग्रेजी में “लीलावती” का पहला अनुवाद जे. वेलर ने सन् 1716 में किया। कुछ समय पहले तक भी भारत में कई शिक्षक गणित को दोहों में पढ़ाते थे। जैसे कि पन्द्रह का पहाड़ा तिया पैंतालीस, चौके साठ, छक्के नब्बे अट्ठ बीसा, नौ पैंतीस।
इसी तरह कैलेंडर याद करवाने का तरीका भी पद्यमयसूत्र में था, “सि अप जूनो तीस के, बाकी के इकतीस, अट्ठाईस की फरवरी चौथे सन् उनतीस” इस तरह गणित अपने पिता से सीखने के बाद लीलावती भी एक महान गणितज्ञ एवं खगोल शास्त्री के रूप में जानी गईं…
मनुष्य के मरने पर उसकी कीर्ति ही रह जाती है अतः आज गणितज्ञो को लीलावती पुरूस्कार से सम्मानित किया जाता है। हमारे पास बहुत कीमती इतिहास है जिसे छोड़कर हम आधुनिकता की दौड़ में विदेशों की नकल कर रहे हैं।
श्रीकृष्ण की अद्भुत लीला: रानी सत्यभामा के घमंड का नाश
श्री कृष्ण भगवान द्वारका में रानी सत्यभामा के साथ सिंहासन पर विराजमान थे, निकट ही गरुड़ और सुदर्शन चक्र भी बैठे हुए थे, तीनों के चेहरे पर दिव्य तेज झलक रहा था।
बातों ही बातों में रानी सत्यभामा ने श्रीकृष्ण से पूछा कि हे प्रभु, आपने त्रेता युग में राम के रूप में अवतार लिया था, सीता आपकी पत्नी थी। क्या वे मुझसे भी ज्यादा सुंदर थी?
द्वारकाधीश समझ गए कि सत्यभामा को अपने रूप का अभिमान हो गया है। तभी गरुड़ ने कहा कि भगवान क्या दुनिया में मुझसे भी ज्यादा तेज गति से कोई उड़ सकता है?
इधर सुदर्शन चक्र से भी रहा नहीं गया और वे भी कह उठे कि भगवान, मैंने बड़े-बड़े युद्धों में आपको विजयश्री दिलवाई है, क्या संसार में मुझसे भी शक्तिशाली कोई है?
भगवान मन ही मन मुस्कुरा रहे थे। वे जान रहे थे कि उनके इन तीनों भक्तों को अहंकार हो गया है और इनका अहंकार नष्ट करने का समय आ गया है, ऐसा सोचकर उन्होनें गरुड़ से कहा कि हे गरुड़।
तुम हनुमान के पास जाओ और कहना कि भगवान राम, माता सीता के साथ उनकी प्रतीक्षा कर रहे है। गरुड़ भगवान की आज्ञा लेकर हनुमान को लाने चले गए।
इधर श्रीकृष्ण ने सत्यभामा से कहा कि देवी, आप सीता के रूप में तैयार हो जाएं और स्वयं द्वारकाधीश ने राम का रूप धारण कर लिया।
मधुसूदन ने सुदर्शन चक्र को आज्ञा देते हुए कहा कि तुम महल के प्रवेश द्वार पर पहरा दो और ध्यान रहे कि मेरी आज्ञा के बिना महल में कोई प्रवेश न करे।
भगवान की आज्ञा पाकर चक्र महल के प्रवेश द्वार पर तैनात हो गए।
गरुड़ ने हनुमान के पास पहुंचकर कहा कि हे वानर श्रेष्ठ। भगवान राम, माता सीता के साथ द्वारका में आपसे मिलने के लिए प्रतीक्षा कर रहे है। आप मेरे साथ चलें। मैं आपको अपनी पीठ पर बैठाकर शीघ्र ही वहां ले जाऊंगा।
हनुमान ने विनयपूर्वक गरुड़ से कहा, आप चलिए, मैं आता हूं।
गरुड़ ने सोचा, पता नहीं यह बूढ़ा वानर कब पहुंचेगा?
फिर गरुड़ अकेले ही महल पहुंच गए. महल पहुंचकर गरुड़ देखते
है कि हनुमान तो उनसे पहले ही महल में प्रभु के सामने बैठे है। गरुड़ का सिर लज्जा से झुक गया।
तभी श्रीराम ने हनुमान से कहा कि पवनपुत्र, तुम बिना आज्ञा के महल में कैसे प्रवेश कर गए? क्या तुम्हें किसी ने प्रवेश द्वार पर रोका नहीं?
हनुमान ने हाथ जोड़ते हुए सिर झुकाकर अपने मुंह से सुदर्शन चक्र को निकालकर प्रभु के सामने रख दिया। हनुमान ने कहा कि प्रभु, आपसे मिलने से मुझे इस चक्र ने रोका था इसलिए इसे मुंह में रख मैं आपसे मिलने आ गया। मुझे क्षमा करें। ये सुनकर भगवान मन ही मन मुस्कुराने लगे।
हनुमान ने हाथ जोड़ते हुए श्रीराम से प्रश्न किया- हे प्रभु। आज आपने माता-सीता के स्थान पर किस दासी को इतना सम्मान दे दिया कि वह आपके साथ सिंहासन पर विराजमान है?
अब रानी सत्यभामा के अहंकार भंग होने की बारी थी। उन्हें सुंदरता का अहंकार था, जो पल भर में चूर हो गया था।
रानी सत्यभामा, सुदर्शन चक्र और गरुड़ जी तीनों का गर्व चूर-चूर हो गया था। वे भगवान की लीला समझ रहे थे। तीनों की आंखों से आंसू बहने लगे और वे भगवान के चरणों में झुक गए।
इस प्रकार श्रीकृष्ण ने एक ही बार में तीनों का अंहकार खत्म किया.
अहंकार पतन का कारण बनता है। हमें कभी भी अपने रूप, बल या शक्ति पर घमंड नहीं करना चाहिए।
જ્યારે કર્નલ નાથુ સિંહ રાઠોડે નહેરુને કહ્યું – “કોઈ પણ ભારતીયને વડા પ્રધાન બનવાનો અનુભવ નહોતો, તો પછી તમે કેમ બેઠા છો?”
સ્વતંત્રતા પછી, દેશ એક નવા માર્ગ પર ચાલવાનું શીખી રહ્યો હતો. સંસ્થાઓનું નિર્માણ થઈ રહ્યું હતું, પ્રણાલીઓનું નિર્માણ થઈ રહ્યું હતું, અને એક મહત્વપૂર્ણ પ્રશ્ન ઉભો થયો – ભારતીય સેનાનું નેતૃત્વ કોણે કરવું જોઈએ?
પંડિત જવાહરલાલ નહેરુ માનતા હતા કે ભારતીયો પાસે સેના ચલાવવાનો અનુભવ કે ક્ષમતા નથી. તેમના મતે, બ્રિટિશ સેનામાં ભારતીયો હંમેશા નીચલા સ્તર સુધી સીમિત હતા, તેથી સ્વતંત્ર ભારતની સેનાને સંભાળવા માટે એક વિદેશી, અનુભવી જનરલની જરૂર હતી.
આ વિચારીને, તેમણે બ્રિટિશ જનરલ સર રોબ લોકહાર્ટને ભારતના પ્રથમ આર્મી ચીફ બનાવ્યા. પરંતુ 1948 ના અંતમાં, લોકહાર્ટે રાજીનામું આપ્યું – તેઓ ઇંગ્લેન્ડ પાછા ફરવા માંગતા હતા. આ પદ ખાલી હતું, અને નહેરુએ ફરી એકવાર વિદેશી જનરલ શોધવા માટે કેબિનેટની ખાસ બેઠક બોલાવી.
આ બેઠકમાં ઘણા વરિષ્ઠ ભારતીય લશ્કરી અધિકારીઓ પણ હાજર હતા.
નહેરુએ સૂચવ્યું, “આ વિદેશી નામોમાંથી કોને સેના પ્રમુખ બનાવવો જોઈએ? કૃપા કરીને તમારો અભિપ્રાય આપો.”
પછી એક જોરદાર અવાજ સંભળાયો.
તે કર્નલ નાથુ સિંહ રાઠોડ હતા – રાજસ્થાનની ભૂમિથી, જ્યાં મહારાણા પ્રતાપે અકબર ને હરાવ્યો હતો.
નાથુ સિંહ ઉભા થયા અને કહ્યું:
> “જો અનુભવ જ માપદંડ હોય, તો તમને એક ભારતીયને પ્રધાનમંત્રી બનાવવાનો અનુભવ ન હતો – તો તમે આ પદ કેવી રીતે સંભાળ્યું? જો આ જ તર્ક છે, તો પછી એક અંગ્રેજને પ્રધાનમંત્રી બનાવો. વિશ્વનો કયો સ્વાભિમાની દેશ પોતાની સેનાનું નેતૃત્વ વિદેશીને સોંપે છે?”
આ સાંભળીને, નેહરુ ગુસ્સે થયા, અને નાથુ સિંહને તાત્કાલિક સભામાંથી બહાર કાઢી મૂકવામાં આવ્યા.
પરંતુ તે દિવસે જે વાતે નેહરુને દુઃખ પહોંચાડ્યું, તે જ વાત સંરક્ષણ પ્રધાન સરદાર બલદેવ સિંહને સ્પર્શી ગઈ. તેમણે તરત જ નાથુ સિંહનો સમગ્ર લશ્કરી રેકોર્ડ માંગ્યો. પછી ખબર પડી કે:
નાથુ સિંહે બર્મા યુદ્ધમાં મોરચા પરથી નેતૃત્વ કર્યું હતું,
તેમણે બીજા વિશ્વયુદ્ધમાં ઘણી સફળ લશ્કરી ઝુંબેશોનું નેતૃત્વ કર્યું હતું,
અને તેઓ માત્ર શિસ્તબદ્ધ જ નહીં, પણ નેતૃત્વ કૌશલ્યમાં પણ અજોડ હતા.
બલદેવ સિંહે તેમને આર્મી ચીફ બનાવવાની ભલામણ કરી, પરંતુ નેહરુની નારાજગીને કારણે આવું થયું નહીં.
જોકે, નાથુ સિંહની હિંમત સફળ રહી – અને તે જ વર્ષે જનરલ કે.એમ. કરિયપ્પાને સ્વતંત્ર ભારતના પ્રથમ કાયમી ભારતીય આર્મી ચીફ તરીકે નિયુક્ત કરવામાં આવ્યા.
🇮🇳 નાથુ સિંહ રાઠોડ – એક એવું નામ જે આજે પણ આપણને ગર્વ કરાવે છે
તેમનો અવાજ ભારતના આત્મસન્માનનો અવાજ હતો –
જય હિન્દ 🚩
વંદે માતરમ્ 🚩

यह नाम ‘कौर’ (Kaur), जो आप सिख महिलाओं के नामों के बाद देखते हैं, वास्तव में संस्कृत शब्द ‘कुमारी’ से आया है।
प्राचीन काल में महिलाओं के लिए उपनाम (surname) का कोई प्रचलन नहीं था — उन्हें केवल उनके पहले नाम से जाना जाता था, और यदि वे अविवाहित होती थीं तो उनके नाम के बाद ‘कुमारी’ लगाया जाता था।
विवाह के बाद उसी नाम के साथ ‘देवी’ जुड़ जाता था।
उदाहरण के लिए —
सरिता कुमारी (Sarita Kumari) विवाह के बाद सरिता देवी (Sarita Devi) बन जाती थीं।
मुझे कुमारी और देवी जैसे प्रत्ययों (suffixes) के बारे में तो पता था, लेकिन यह जानना अत्यंत रोचक है कि सिखों द्वारा प्रयोग किया जाने वाला ‘कौर’ वास्तव में ‘कुमारी’ से विकसित हुआ — जो कालांतर में ‘कुंवारी’ और फिर ‘कौर’ बन गया।
कुछ विद्वानों का यह भी मत है कि ‘कौर’ (महिलाओं के लिए) और ‘सिंह’ (पुरुषों के लिए) जैसे धार्मिक उपनामों को अपनाने का एक उद्देश्य जातिवाद (casteism) को समाप्त करना भी था।
सिख आज भी इस प्राचीन परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।
आज हम विवाह से पहले अपने पिता का नाम और विवाह के बाद अपने पति का नाम जोड़ते हैं; किंतु संभवतः यह परंपरा भारत के ब्रिटिश उपनिवेश बनने के बाद विकसित हुई।
इसी प्रकार, उत्तर कर्नाटक और महाराष्ट्र के कोंकण क्षेत्र में विवाह के बाद ‘देवी’ की जगह ‘बाई’ लगाया जाता है, जबकि तमिलनाडु में विवाहोपरांत महिलाओं के नाम के साथ ‘अम्मल’ जोड़ा जाता है।
यह देखना अत्यंत सुंदर और सांस्कृतिक रूप से अर्थपूर्ण है कि विवाह के पश्चात महिला को ‘देवी’ या ‘माता’ के स्वरूप में देखा जाता है।
— सहाना सिंह (Sahana Singh)
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कर्नल जेम्स स्किनर की रचना ‘तज़किरत-उल-उमरा’ (‘Biographies of the Nobles’) के एक पृष्ठ से अंश। इसमें रादाौर के रूप सिंह की विधवा सिख रानी को दर्शाया गया है, लगभग सन् 1836 का चित्र।
औरंगजेब ने पूछाः “मतिदास कौन है?”…
तो भाई मतिदास ने आगे बढ़कर कहाः “मैं हूँ मतिदास। यदि गुरुजी आज्ञा दें तो मैं यहाँ बैठे बैठे दिल्ली और लाहौर का सभी हाल बता सकता हूँ। तेरे किले की ईंट से ईंट बजा सकता हूँ।”
औरंगजेब गुर्राया और उसने भाई मतिदास को धर्म परिवर्तन करने के लिए विवश करने के उद्देश्य से अनेक प्रकार की यातनाएँ देने की धमकी दी। खौलते हुए गरम तेल के कड़ाहे दिखाकर उनके मन में भय उत्पन्न करने का प्रयत्न किया, परंतु धर्मवीर पुरुष अपने प्राणों की चिन्ता नहीं किया करते। धर्म के लिए वे अपना जीवन उत्सर्ग कर देना श्रेष्ठ समझते हैं।
जब औरंगजेब की सभी धमकियाँ बेकार गयीं, सभी प्रयत्न असफल रहे, तो वह चिढ़ गया। उसने काजी को बुलाकर पूछाः “बताओ इसे क्या सजा दी जाये?”
काजी ने हुक्म सुनाया कि ‘इस काफिर को इस्लाम ग्रहण न करने के आरोप में आरे से लकड़ी की तरह चीर दिया जाये।’
औरंगजेब ने सिपाहियों को काजी के आदेश का पालन करने का हुक्म जारी कर दिया।
दिल्ली के चाँदनी चौक में भाई मतिदास को दो खंभों के बीच रस्सों से कसकर बाँध दिया गया और सिपाहियों ने ऊपर से आरे के द्वारा उन्हें चीरना प्रारंभ किया। किंतु उन्होंने ‘सी’ तक नहीं की। औरंगजेब ने एक बार फिर फिर कहाः “अभी भी समय है। यदि तुम इस्लाम कबूल कर लो, तो तुम्हें छोड़ दिया जायेगा और धन दौलत से मालामाल कर दिया जायेगा।”
वीर मतिदास ने निर्भय होकर कहाः “मैं जीते जी अपना धर्म नहीं छोड़ूँगा।”
ऐसे थे धर्मवीर मतिदास ! जहाँ आरे से चिरवाया गया, आज वह चौक ‘भाई मतिदास चौक’ के नाम से प्रसिद्ध है।

टिकिट चेकर के झापड़ ने
प्रेमनाथ को बना दिया था
एम्पायर टाकीज का मालिक।
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अपने दमदार अभिनय के लिए प्रसिद्ध रहे अभिनेता प्रेमनाथ जबलपुर के गौरव पुत्र थे। उनने अंग्रेजों द्वारा बनाई गई एम्पायर टाकीज को भी खरीद लिया था। इस टाकीज को खरीदने का किस्सा भी लाजवाब है।
प्रेमनाथ जब स्कूल में पढते थे तब एक बार वो एम्पायर टाकीज की दीवाल फांदकर बिना टिकट लिए पिक्चर देखने बैठ गए। जब टिकिट चेकर टिकिट चेक करने आया तो किशोर प्रेमनाथ से टिकिट मांगी तो उनने टिकिट न होने की बात कही और बताया कि वो बाउंड्री वाल फांदकर अंदर आ गए। टिकिट चेकर ने प्रेमनाथ को एक झापड़ मारा और पकडकर बाहर लाया और बोला जैसे तुम दीवार फांदकर आये थे वैसे ही फांदकर बाहर भागो। जाने के पहले किशोर प्रेमनाथ ने टिकिट चेकर से कहा कि देखना एक दिन मैं इस टाकीज को खरीद लूंगा।
प्रेमनाथ जब बडे़ हुए और पिता की मर्जी के खिलाफ अभिनय करने मुंबई चले गए। 1952 में उन्होंने एम्पायर टाकीज खरीद ली। मालिक बनने के बाद जब प्रेमनाथ ने टाकीज का उद्घाटन किया तो जिद्दी प्रेमनाथ का रूप सामने दिखा। प्रेमनाथ उसीतरह से बाउंड्री वाल फांदकर टाकीज के भीतर गये जैसे वो किशोर अवस्था में दीवार फांदकर टाकीज के भीतर गये थे। यह संयोग रहा कि प्रेमनाथ को झापड़ मारने वाला टिकिट चेकर तब भी काम कर रहा था। प्रेमनाथ ने उस टिकिट चेकर को बुलाया। घबराते हुए टिकिट चेकर प्रेमनाथ के सामने आया। लेकिन उस नजारे को देखकर सब लोग दंग रह गए जब प्रेमनाथ उसी कुर्सी पर बैठे जिससे उन्हें टिकिट चेकर ने उठाकर भगाया था।
कुर्सी से उठकर प्रेमनाथ ने झापड़ मारने वाले टिकिट चेकर को बिठाया और फूलमाला पहनाकर उसका स्वागत किया उसे मिठाई भी खिलाई। फिर प्रेमनाथ ने टिकिट चेकर को गले लगाया और उससे बोले यदि तुमने मुझे झापड़ मार कर भगाया न होता तो आज मैं इस एम्पायर टाकीज का मालिक नहीं बनता।
ऐसे दिलदार थे जबलपुर के गौरव प्रेमनाथ अमर प्रेमनाथ। आज पुण्यतिथि पर उन्हें श्रृद्धांजलि।
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