Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

ગૃહિણીઓના કર્મનું ચક્ર….

સવારે ઉઠીને જોયું તો લોટના દરેક ડબ્બા ખાલી હતાં

રોજના કચરા, પોતા, વાસણ, કપડાં, રસોઈ વગેરે રૂટિન કામની સાથે
આવાં વધારાના કામો રોજ થોડાં થોડાં રહ્યા કરે

અમારે ગૃહિણીઓને, લોટ દળાવી લો, ત્યાં નાસ્તા ખતમ, નાસ્તા બનાવીને ડબ્બા ભરી લો, ત્યાં શાકભાજી, ફ્રૂટ અને કરિયાણું ખતમ,

એ લાવીને મુકો ત્યાં, તાજા અથાણાં , પાપડ, મુખવાસ ખાલી,

એને ન્યાય આપો ત્યાં સ્ટોર રૂમ કહે મને ઘૂળ લાગી ગઈ સાફ કરો…

એ સફાઈ પતે ત્યાં દરેક રૂમનાં પડદા બોલે અમે પણ મેલા થયાં,

એને ધોઈને ચોખ્ખા કરો ત્યાં બારી, બારણાં ને પંખા બોલે અમે ન રહી જાય હો….

એ સફાઈ પતાવીએ ત્યાં બેડશીટ, ટુવાલ, પગ લૂછણીયાનો વારો આવી જાય,

વચ્ચે વચ્ચે બાળકોની સ્કુલ મિટિંગો અને દવાખાનાનાં કામો પણ થતાં રહે…

માંડ-માંડ એમ થાય હાંશ આજે કાંઈ વધારાનું કામ નથી ત્યાં ગાડી ભરાઈને મહેમાન આવી જાય,

ફરી એની આગતાસ્વાગતા કરીને વળાવીએ ત્યાં પાછું ચક્ર ફરતું ફરતું લોટનાં ડબ્બે આવીને ઉભું રહે…

આ સાથે જ ટોઇલેટ, બાથરૂમ, ફળિયા, બાલ્કની વગેરેની રોજની સફાઈ તો ભેગીને ભેગી…

આ તો હજુ અડધા કામ જ ગણાવ્યા છે હો…

બધાંની અલગ અલગ રસોઈની ફરમાઈશ તો ગણી જ નથી….

આટલી ભાગદોડ વચ્ચે પણ અમે નવ-નવ દિવસ ગરબા રમીએ અને દિવાળી સેલમાં આટો પણ મારી આવીએ,

બે ઘડી બહેનપણીઓ સાથે ફોનમાં કે રૂબરૂ ગપ્પાં પણ મારીએ અને દરેક વહેવારો પણ સાચવીએ,

પછી ભલેને ચણિયો પહેરવા કાઢીએ ત્યાં બ્લાઉઝ ટુંકું થાય અને બ્લાઉઝ માપનું કરીએ ત્યાં દુપટ્ટો મેચિંગ ન હોય તો પણ દરેક પ્રસંગે પરફેક્ટ તૈયાર જ રહીએ…

સાથે મારા જેવા વાંચન , લેખન, મુવી અને ઠાકોરજીને લાડ લડાવવાના શોખને પણ જાળવી રાખે…

એમ જ કાંઈ અમને શક્તિ સ્વરૂપા નથી ગણવામાં આવતી….

અમે સ્ત્રીઓ પાસે અખુટ શક્તિનો સ્ત્રોત રહેલો છે…

જે રોજ ઉગતા પ્રભાતથી લઈને મોડી રાત સુધી પરિવાર માટે વહેતો રહે છે….

નિઃશુલ્ક, નિસ્વાર્થ ભાવે…
ખરુંને સખીઓ…
જે સ્ત્રી આટલી દોડાદોડીથી નથી થાકતી

એ સ્ત્રી એક શબ્દથી સાવ તૂટી જાય છે…
*તમે આખો દિવસ ઘરમાં કરો છો શું* ?

Posted in हिन्दू पतन

🛑
पाकिस्तान में झेलम नदी के किनारे बसा हुआ भैरा शहर

इस शहर में एक भी मुस्लिम नहीं रहता था पूरा शहर जैन हिंदू और सिखों से भरा था।
यह शहर जीटी रोड पर था,बिजनेस का बहुत बड़ा केंद्र था और सिल्क रुट पर था..!!

लोग कहते हैं कि इस शहर का रहने वाला लगभग हर व्यक्ति उस जमाने में लखपति था..क्योंकि सब के सब बड़े व्यापारी थे..!!

इस शहर में घूमते हुए मकान के खंडहर देखकर लगता है..उस जमाने में यह शहर कितना खूबसूरत हुआ करता होगा..!!

बंटवारे के बाद इन्हें अपना घर छोड़ना पड़ा..लेकिन इस शहर के लोगों को यह विश्वास था..कि वह फिर वापस आएंगे इसीलिए उन्होंने अपने गहने और कीमती सामान अपने घरों में छुपा दिए..!!

फिर जब कुछ घरों में से सोने चांदी और कीमती सामान मिले तब आसपास के शहरों में यह खबर फैल गई कि हिंदू,,जैन और सिखों ने काफी सोना अपने-अपने घरों में छुपा रखा है..
उसके बाद इस शहर में हर एक घर को तोड़कर सोना चांदी कीमती सामान तलाशने की होड़ मच गई और इस शहर के सारे घर खोद कर मुस्लिम लोग खजाना तलाशने लगे जो हिंदू और जैन और सिख इस उम्मीद में छुपाए थे कि वह फिर से अपने घरों में वापस आएंगे..!!

साभार……

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बात मुर्गे की जरूर है
          मगर
मुर्गे की बिल्कुल नहीं है

एक आदमी एक मुर्गा खरीद कर लाया।
*एक दिन वह मुर्गे को मारना चाहता था,* _इसलिए उस ने मुर्गे को मारने का बहाना सोचा_ और मुर्गे से कहा,
`”तुम कल से बाँग नहीं दोगे, नहीं तो मै तुम्हें मार डालूँगा।”`

मुर्गे ने कहा,
> _”ठीक है, सर, जो भी आप चाहते हैं, वैसा ही होगा !”_

सुबह , जैसे ही मुर्गे के बाँग का समय हुआ, मालिक ने देखा कि
मुर्गा बाँग नहीं दे रहा है,
लेकिन हमेशा की तरह,
_अपने पंख फड़फड़ा रहा है।_

मालिक ने अगला आदेश जारी किया कि _कल से तुम अपने पंख भी नहीं फड़फड़ाओगे, नहीं तो मैं वध कर दूँगा।_

अगली सुबह,
बाँग के समय,
मुर्गे ने आज्ञा का पालन करते हुए,
अपने पंख नहीं फड़फड़ाए,
लेकिन आदत से मजबूर था,
_अपनी गर्दन को लंबा किया और उसे उठाया_

मालिक ने परेशान होकर अगला आदेश जारी कर दिया कि
*कल से गर्दन भी नहीं हिलनी चाहिए।*
अगले दिन मुर्गा चुपचाप मुर्गी बनकर सहमा रहा और कुछ नहीं किया।

मालिक ने सोचा
ये तो बात नहीं बनी,
इस बार मालिक ने भी कुछ ऐसा सोचा जो वास्तव में मुर्गे के लिए नामुमकिन था।

मालिक ने कहा कि
*_कल से तुम्हें अंडे देने होंगे नहीं तो मै तेरा वध कर दूँगा।_*

“`अब मुर्गे को अपनी मौत साफ दिखाई देने लगी और वह बहुत रोया“`

मालिक ने पूछा, “क्या बात है?”
मौत के डर से रो रहे हो?

मुर्गे का जवाब बहुत सुंदर और सार्थक था।

मुर्गा कहने लगा:

> *_`”नहीं, मै इसलिए रो रहा हूँ कि, अंडे न देने पर मरने से बेहतर होता मैं बाँग देकर ही मरता…`_”*

* बाँग मेरी पहचान और अस्मिता थी ,
_मैंने सब कुछ त्याग दिया और तुम्हारी हर बात मानी , लेकिन जिसका इरादा ही मारने का हो तो उसके आगे समर्पण नहीं संघर्ष करने से ही जान बचाई जा सकती है, जो मैं नहीं कर सका…”_

* “`अपने अस्तित्व, अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए संघर्ष करना पड़े तो पीछे नहीं हटना चाहिए…“`

ठंडे दिमाग से पढ़कर जरूर सोचिएगा,
यहां मुर्गे की बात नही है…

> *सोचो विचारो समझो !!!*

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जापान से एक आदमी अफ्रीका के लिए यात्रा किया। उसी जहाज से एक अमरीकी भी यात्रा कर रहा था। वे दोनों अफ्रीका पहुचे। वे दोनों एक ही जहाज से पहुंचे। एक ही समय पहुंचे। एक ही काम से पहुंचे, यह उन्हें पता नहीं था। वह जो अमरीकी युवक था वह भी एक बहुत बड़ी जूतोें की कंपनी का बेचने वाला एजेंट था, सेल्समैन था। वह भी अफ्रीका गया था कि अपनी कंपनी के जूते वहां बिकने की व्यवस्था कर सके और वह जापानी भी जापान की एक जूता बेचने वाली कंपनी का विक्रेता था। वह भी इसीलिए गया हुआ था।

वे दोनों एक ही जहाज से अफ्रीका में उतरे। रास्तों से गुजर कर वे अपने होटल तक पहुंचे, एक ही होटल में ठहरे। एक ही रास्ते से गुजरे। उन्हीं लोगों को दोनों ने देखा।

अमरीकी ने जाकर वहां से अमेरिका केबल किया, मैं लौटते जहाज से वापस आ रहा हूं। अफ्रीका में जूते नहीं बिक सकेंगे, क्योंकि यहां कोई जूता पहनता ही नहीं है। सभी लोग नंगे पैर हैं। यहां हमारे लिए कोई सुविधा नहीं, यहां सब व्यर्थ है हमारा आना। मैं वापस लौट रहा हूं।

जापानी ने भी उसी वक्त केबल किया जापान कि एक लाख जूते की जोड़ियां फौरन भेज दें, यहां बिक्री की बहुत संभावना है। कोई भी जूता नहीं पहने हुए है। एक भी आदमी के पास जूते नहीं हैं। बहुत बड़ा बाजार है। फौरन एक लाख जोड़ी तो भेज ही दें; क्योंकि एकदम से बिक्री शुरू हो जाएगी।

अमरीकी वापस लौट गया, क्योंकि कोई आदमी जहां जूता ही नहीं पहनता; वहां जूता कौन खरीदेगा? जहां जूते पहनने का रिवाज ही नहीं वहां जूते का सवाल ही क्या उठाना है?

इन दोनों की दृष्टियां भिन्न थीं। एक ने बाजार खोज लिया, एक ने बाजार खो दिया।

जीवन के बाजार में हम सब उतरते हैं। कुछ लोग बाजार खो देते हैं, कुछ लोग बाजार को उपलब्ध कर लेते हैं।

जो लोग विश्लेषण से देखते हैं, उन्हें जीवन असार दिखाई पड़ता है। वे फौरन केबल करते हैं परमात्मा को आवागमन से छुटकारा दिलाओ, हम वापस आना चाहते हैं, जीवन व्यर्थ है! यहां कोई सार नहीं। हे पतितपावन! हमें जल्दी वापस बुला लो। यहां हम नहीं रहना चाहते।

लेकिन जो जीवन को संश्लेषण की दृष्टि से देखते हैं, वे परमात्मा से कहते हैं, धन्यवाद है तुझे, कि जीवन में हमें भेजने का मौका तूने दिया और इस योग्य समझा। जीवन में बड़ा आनंद है, जीवन में बड़े मौके हैं, जीवन एक बड़ी अॅापरच्युनिटी, एक बड़ा अवसर है। अनुगृहीत हैं हम तेरे कि तूने हमें इस योग्य समझा कि इस जीवन में भेजा।

रवींद्रनाथ ने मरने के दो दिन पहले एक गीत लिखा। और उस गीत में कहा कि हे परमात्मा! मैं किन शब्दों में तुझे धन्यवाद दूं, कि तूने मुझे जीने का मौका दिया। तेरा जीवन बहुत अदभुत था। और अगर कुछ दुख भी इस जीवन में मुझे मिले होंगे, तो वह मेरी भूल से मिले होंगे, तेरे जीवन के कारण नहीं।

फिर से दोहराता हूं, रवींद्रनाथ ने गाया कि अगर तेरे जीवन से कुछ दुख भी मुझे मिले होंगे, तो वह मेरी भूल से मुझे मिले, तेरे जीवन के कारण नहीं। तेरा जीवन तो बहुत धन्य था। और मेरी एक ही प्रार्थना है कि अगर तूने मुझे इस जीवन में देख कर अपात्र न समझ लिया हो, तो बार-बार मुझे जीवन के दर्शन का मौका देना, मैं बार-बार लौट आना चाहता हूं। शायद अगली बार मैं आऊं तो मैं ज्यादा पात्र होकर आऊं। जो भूलें मैंने आज की वे कल न करूं। जीवन तूने दिया, धन्यवाद! और आगे भी जीवन देना इसकी प्रार्थना है।

इस हृदय को मैं धार्मिक हृदय कहता हूं। इस हृदय को मैं जानने वाला हृदय कहता हूं। इस हृदय ने जीवन के मंदिर को बनाया और जाना, ऐसा मैं कहता हूं। जीवन का निषेध नहीं, लाइफ निगेशन नहीं, जीवन का स्वीकार, लाइफ अफर्मेशन पहला सूत्र है जीवन की क्रांति की दिशा में। जो लोग अपने जीवन को बदलना चाहते हैं, पहले तो उन्हें जीवन से मित्रता साधनी होगी, शत्रुता नहीं। पहले तो उन्हें जीवन से आलिंगन लेना होगा, पीठ नहीं फेर लेनी होगी। पहले तो उन्हें जीवन के रस में विभोर होना होगा।

तो पहला सूत्रः आज की सांझ मुझे आपसे बात करनी है और वह यह है कि जीवन को विश्लेषण की दृष्टि से देखना बंद कर दें, अन्यथा आपके हाथ में राख के सिवाय कुछ भी नहीं लगेगा। जीवन को देखें संश्लेषण की दृष्टि से और आपके हाथ में रस उपलब्ध होना शुरू हो जाएगा।

ओशो – सत्य की पहली किरण

Posted in भारतीय मंदिर - Bharatiya Mandir

રાણીની વાવ


આજનું જાણવા જેવું

રાણકી વાવ ના તળપદા નામથી ઓળખાતી રાણી ની વાવ વર્લ્ડ હેરિટેજ (વૈશ્વિક ધરોહર) માં સ્થાન પામેલી છે. સો રૂપિયાની નોટ પર તેને સ્થાન મળ્યું છે. 1063 ઇસવીમાં રાણી ઉદયમતીએ તેમના પતિના માનમાં બંધાવેલ આ વાવ ખૂબ જ આકર્ષક અને હિંદુ સંસ્કૃતિના દેવી-દેવતાઓની મૂર્તિઓ તથા અપ્સરાઓની આહલાદક કૃતિઓથી સમૃદ્ધ છે. વર્ષો સુધી સરસ્વતી નદીના કાંપમાં દટાયેલી આ વાવ છેક 20મી સદીમાં (1980) સરકારના ધ્યાને આવી. નવ નવ સદીઓથી દટાયેલી આ વાવ તે વખતના બાંધકામની શ્રેષ્ઠતા બતાવે છે.

હાલ તેની આસપાસ ખૂબ જ સરસ મજાનું ગાર્ડન વિકસિત કરેલું છે. સારી રીતે તેની જાળવણી પણ થાય છે. 40 રૂપિયા ટિકિટમાં આપણે આ સ્થળ માણી શકીએ છીએ. સાત માળની ઊંડાઈ ધરાવતી આ વાવ તે વખતના લોકોની પાણીની જરૂરિયાત સંતોષતી હશે.

રાજા મહારાજા ના વારસદારો તથા તેમની આસપાસ “વાહ વાહી” કરતા ખુશામતખોરો અને તેમની “હા માં હા” મિલાવવાવાળા લોકો કઈ પરિસ્થિતિમાં હશે તે આપણે જાણતા નથી. આ એક પંક્તિ ઘણુંબધું કહી જાય છે.

“દીઠાં છે અમે શાહ આલમના સગાઓ,
સીડીએ જામા મસ્જિદની ભીખ માંગતા.”

સંકલન :- કકુભા બી રાઠોડ. શ્રી ચગિયા પ્રાથમિક શાળા. તા સુત્રાપાડા. જી ગીર સોમનાથ.