हृदय को झकझोर देने वाला कांड 😭😭😭
अजमेर सेक्स बलात्कार ब्लैकमेल कांड जिसमें सभी मुस्लिम अभियुक्त थे और जिसमें सभी बलात्कार पीड़ित लड़कियां हिंदू थी उसकी कुछ बातें जो मीडिया में नहीं बताई गई
7 हिंदू लड़कियों ने शर्मिंदगी से जब उनके नंगे पिक्चर से ब्लैकमेल किए गए तब उन्होंने आत्महत्या कर लिया
3 हिंदू लड़कियों ने अपने माता-पिता और भाई के साथ सामूहिक आत्महत्या कर लिया क्योंकि उनकी नंगी तस्वीरें से जब ब्लैकमेल किया जा रहा था और कई लोगों तक उनकी तस्वीर पहुंच गई तब वह इतने शर्मसार हुए कि उन्होंने सामूहिक आत्महत्या कर लिया
8 हिंदू लड़कियां मानसिक विक्षिप्त होकर पागल हो गई थी
तीन हिंदू लड़कियों ने मरे हुए भ्रूण को जन्म दिया था और अदालत में सबूत के लिए उन भ्रूण को फॉर्मलडिहाइड में प्रिजर्व करके रखा गया था
कुछ हिंदू लड़कियों का गर्भपात इस तरह से हुआ कि वह भविष्य में कभी मां नहीं बन सकती थी
और एक बुजुर्ग बाप इंसाफ के लिए इस कांड की वजह से अपनी मानसिक विक्षिप्त पागल हो चुकी बेटी को लेकर 32 साल तक अदालत में आता था और उसने कहा कि मेरी बेटी तो इस घटना से पागल हो गई है मैं बुजुर्ग हूं लेकिन फिर भी मैं अपनी बेटी को इंसाफ दिला कर रहूंगा
400 से ज्यादा कंडोM को सबूत के लिए रखा गया था जो बाद में बुरी तरह से बदबू मारने लगे थे फिर भी उन्हें सबूत के लिए संभाल कर रखा गया था
कुल 32 साल तक मुकदमा चला
जब यह घटनाक्रम हुआ तब राजस्थान में कांग्रेस सत्ता में थी आठ आरोपी कांग्रेस पार्टी के बड़े पदाधिकारी थे और धीरे-धीरे उन्होंने कई अन्य मुस्लिम लोगों को अपने गैंग में जोड़ लिया और इस तरह से हिंदू लड़कियों के बलात्कार और उनके ब्लैकमेल करने का पूरा गंदा खेल रचा गया
22 से ज्यादा हिंदू लड़कियों की कभी शादी इसलिए नहीं हो पाई क्योंकि वह अजमेर कांड में पीड़ित थी और आज 50 से 55 साल की अवस्था में भी वह बगैर परिवार के एकाकी जीवन जी रही हैं
फिर भी कुछ लोग बुलडोजर न्याय का विरोध करते हैं
32 साल हो गए न्याय नहीं मिला इसीलिए मैं कहती हूं बुलडोजर न्याय के लिए सबसे जरूरी है
और उस वक्त राजस्थान की कांग्रेस सरकार ने तीन पत्रकारों को जेल भेज दिया था जिन्होंने इस घटना पर एक खबर बनाई थी राजस्थान सरकार ने उनके ऊपर कई गंभीर धाराएं लगाई थी
जब तक राजस्थान में कांग्रेस सत्ता में रही अजमेर के दरिंदे खुलेआम हिंदू लड़कियों का बलात्कार करते रहे और कानून उनका कुछ नहीं बिगड़ा सका क्योंकि राजस्थान की कांग्रेस सरकार उनके साथ थी
जब राजस्थान में सत्ता बदली और राजस्थान में सत्ता परिवर्तन में अजमेर बलात्कार कांड ही सबसे बड़ा मुद्दा था और भैरव सिंह शेखावत मुख्यमंत्री बने तब जाकर आरोपियों को गिरफ्तार किया गया मुकदमा चला बेटियों के बयान दर्ज हुए सुबह इकट्ठा किया गया और अंततः आरोपियों को सजा सुनाई गई
इसीलिए ही बार-बार कहा जाता है कि इस्लाम और कांग्रेस का गठन जोड़ हिंदुओं के लिए आत्मघाती है घातक है
हिंदुओं की विनाश इसी गठजोड़ की वजह से होता है….
जय हिन्द 🙏
Month: August 2025
जीबोनेर झारा पाता
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सरला : गुरुदेव! यह वही #मंदराचल पर्वत है जिसने पृथ्वी को श्रीहीन होने से बचा लिया? फिर तो, इस भारत की दुर्दशाओं को भी इसने देखा होगा न?
ठाकुर बिजॉय कृष्ण : हाँ, निर्विवाद रूप से।
सरला : मंदराचल, अपनी तरह क्यों नहीं बना लेते मुझे तुम। मैं विलीन होना चाहती हूं तुममें। मुझे मुक्ति दे दो, मेरे गुरु के सामने। गुरु मुझे क्षमा करें।
#बैद्यनाथजी को साक्षी मानकर उनके प्रांगण में मैंने 7 फेरे लिए थे। #जोड़ासांको में जन्म लेकर अग्नि स्वभाव पाई थी। कलकत्ते ने मुझे पाला, पढ़ाया और दिव्य विचारों से अग्निभाव किया। सम्पूर्ण भारत घूमकर तुम्हारी शरण में आई हूं। बंगाल से लाहौर, पंजाब, हैदराबाद तक मुझे लोग जानते हैं किंतु मैं स्वयं को नहीं जानती हूं।
पहले #ब्रह्म_समाजी हुई। #काली भक्त हुई। अब अपने गुरुदेव #क्रियायोगी_बिजॉय_कृष्ण के शरणागत हूँ। इनकी कृपा से ही यह संभव हुआ है कि मैं तुम्हारी गोदी में बैठकर मुक्ति मांगती हूँ।
सरला कहे जा रही थी। जमे आंसू बरक रहे थे। वो अंदर से व्यक्त हो रही थी। हाँ, वही सरला जिन्हें #गांधीजी ने कहा था कि मेरा स्वदेशी तुम्हारे स्वदेशी आंदोलन से पुराना नहीं है। तुम महिलाओं की प्रेरणा बनोगी। हाँ, हाँ… वही सरला जो कविगुरु #रवींद्रनाथ_टैगोर की सगी बहन की बेटी थी। जो भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के बंगाल के प्रथम सचिव #जानकीनाथ_घोषाल की पुत्री थी। जो अपने समय की चर्चित लेखिका स्वर्णकुमारी देवी की बेटी थी। ‘भारती’ पत्र का संपादक/मालिक थी। नामी वकील और पत्रकार एवं राष्ट्रवादी नेता #रामभुजदत्त_चौधरी की पत्नी थी। जिनकी प्रोपर्टी #देवघर में भी काफी थी। हाँ, वही सरला जो गांधीजी की पौत्री राधा की सास थी।
मंदार पर्वत के ऊपर एक बड़े पत्थर पर बैठकर यह सब कहे जा रही थी। मौन होकर मंदराचल उसकी पीड़ा सुन रहा था। यह शरद ऋतु काल था। शाम होने से पहले ओस गहरा रहा था।
ठाकुर ने कहा : उठो सरला। पुरोधा मंदराचल कह रहे हैं कि तुम अभी कूर्म की पीठ पर हो। जाओ और मन की पीड़ा को ‘जीबोनेर झारा पाता’ लिखो। लेकिन यह सब किसी से कहना मत। अब चलो, मेरे गुरुभाई सान्याल महाशय प्रतीक्षा कर रहे होंगे।
सरला वहां से लौटी और फिर से अपनी लेखनी को तीव्र कर अपने जीवनवृत्त के रूप में लिखती गई। उसमें विभाजन की त्रासदी, कुत्सित राजनीति, शत्रु बनते मित्रों का हिडन एजेंडा जैसा सबकुछ था। उसका नाम ‘जीबनेर झारा पाता’ यानी जीवन के झड़े हुए पत्ते रखा।
सरला अपने समय की उच्चशिक्षा प्राप्त महिला थी। बेथ्यूने कॉलेज से उन्होंने इंग्लिश में मास्टर की डिग्री ली थी। यहीं से प्रथम भारतीय डिग्री वाली महिला डॉक्टर कादम्बिनी गांगुली ने पढ़ाई की थी।
इलाहाबाद में इन्होंने ‘भारत स्त्री महामंडल’ की स्थापना की थी। स्वामी #विवेकानंद की आलोचना के लिए भी यह बहुचर्चित हुई थीं। इनका प्रभाव अपने समय में ऐसा था कि #लाला_लाजपत_राय इनसे मिलने कलकत्ता पहुंच गए थे।
इनके प्रेम प्रसंगों के चर्चे कभी जापान के ओकाकुरा से तो कभी महात्मा गांधी से भी उड़े।
इन्हीं सरला ने एक बार विवेकानंद से पूछा था कि एक अशिक्षित ब्राह्मण को गुरु मानकर पूजा करना क्या आपको शोभा देता है? जबकि यह वही सरला थी जिसने बंगाली महिलाओं को अपनी संस्कृति बचाने के लिए, स्वदेशी को महत्व देने के लिए माथे पर लाल टीका लगाने, पांव में आलता लगाने व सरस्वती पूजा में हिंदुत्व का परिचायक भगवा कपड़े पहनकर आने का आह्वान किया था। बाद में पत्र लिखकर इनको विवेकानंद ने बुलाया और सिस्टर निवेदिता से भी मिलाया।
सरला ने सम्पूर्ण भारत में पहली बार #भारती पत्रिका में प्रकाशित सामग्रियों के लेखकों को पारिश्रमिक देना आरंभ किया था। उन्होंने #शरतचंद्र (चट्टोपाध्याय) की रचना ‘बोरोदीदी’ को छापने से इनकार करते हुए लौटा दिया था। बाद में शरत बाबू के मामाजी ने सरला से समय निकालकर उसे पढ़ने का निवेदन करते हुए पांडुलिपि छोड़कर गए। पठनोपरांत उन्होंने इसे धारावाहिक के रूप में छापा था। बाद में पता चला कि यह वही रचना थी जिसे वापस किया गया था।
अपने समय की फायरब्रांड लेडी थी सरला। बड़ी विद्रोही लेकिन अंग्रेजों के खिलाफ। उसकी परंपरा के खिलाफ। उन्हें पसंद था विजयादशमी को तलवार का पूजन। वे मातृशक्ति की आराधक बन गई थी। पति के साथ मिलकर उर्दू पत्रकारिता भी जमकर किया उन्होंने। ‘हिंदुस्थान’ नाम से उर्दू पत्र पंजाब से निकाला था। सन 1945 में देहावसान से पूर्व वो मन से टूट चुकी थी।
देवघर में उनका ब्याह बाबा वैद्यनाथजी के मन्दिर में 1905 में हुआ था। यह विवाह भी अप्रत्याशित था। वे यहां अपनी बीमार माँ से मिलने आई थी लेकिन ट्रेन से उतरते ही उन्हें दुल्हन की डोली और ढोल-बाजा के साथ लाया गया था। विवाह की कोई सूचना उन्हें नहीं थी। मंदार पर्वत पर वे गुरुदेव बिजॉय कृष्ण चट्टोपाध्याय के साथ गई थी। वहां, भूपेंद्र नाथ सान्याल की कुटिया में ठहरी थी। बाद में सान्याल जी ने अपने गुरुदेव श्यामाचरण लाहिड़ी की स्मृति में आश्रम की स्थापना की।
– Uday Shankar©

– પહેલા શિક્ષણ મંત્રી મૌલાના આઝાદ જેમને કોઈ શાળાનું શિક્ષણ નહોતું, જે ભારતના નાગરિક પણ નહોતા, જેમના દાદા મક્કામાં સ્થાયી થયા હતા, જેઓ મક્કામાં જન્મ્યા હતા અને મક્કા અને ઇજિપ્તના ઇસ્લામિયા અઝહર મદરેસામાં અભ્યાસ કર્યો હતો, નેહરુએ તેમને ભારતના શિક્ષણ મંત્રી બનાવ્યા.
પછી મૌલાના આઝાદે એક કટ્ટર મુસ્લિમની શોધ કરી જેને તેઓ ભારતના શિક્ષણ સચિવ બનાવી શકે.
પછી તેમને એક કટ્ટર મુસ્લિમ ખ્વાજા ગુલામ સૈયદ્દીન મળ્યા.
જ્યારે કોંગ્રેસે મૌલાના આઝાદને ભારત રત્ન આપ્યો, ત્યારે તેમના દ્વારા નિયુક્ત શિક્ષણ સચિવ, ખ્વાજા ગુલામ સૈયદ્દીનને પદ્મ ભૂષણ ની ભેટ આપી.
આ સૈયદા હમીદ ખ્વાજા ગુલામ સૈયદ્દીનની પુત્રી છે.
સૈયદા હમીદને ઇન્દિરા ગાંધીના પીએમઓમાં સચિવ બનાવવામાં આવ્યા હતા.
તેઓ વહીવટી સેવામાંથી નહોતા, પણ તેઓ એક કટ્ટર મુસ્લિમ પરિવારમાંથી હતા, તેથી જ ઇન્દિરા ગાંધીએ તેમને ભારતના સર્વોચ્ચ પદ, પીએમઓમાં સચિવ બનાવ્યા.
તેમને પદ્મશ્રી પણ મળ્યો.
પછી મનમોહન સિંહ વડાપ્રધાન બન્યા, સોનિયા ગાંધી અને રાહુલ ગાંધી સુપર વડાપ્રધાન બન્યા. આ કટ્ટર મુસ્લિમ સૈયદા હમીદને તેમને આયોજન પંચનો સભ્ય બનાવીને તેમને દરજ્જો આપવામાં આવ્યો એક કેબિનેટ મંત્રીનું.
આ એ રોગનું નામ છે જેનાથી કોંગ્રેસ પીડાઈ રહી છે.
“ધર્મ અને દેશ વચ્ચે કોણ મોટું છે” ના પ્રશ્ન પર પ્રશ્નાર્થ
તે કહે છે કે જો આ પૃથ્વી અલ્લાહ દ્વારા બનાવવામાં આવી હોય, તો બાંગ્લાદેશી મુસ્લિમોને પણ ભારતમાં રહેવાનો અધિકાર છે. તમે બાંગ્લાદેશી મુસ્લિમોને બહાર કાઢી શકતા નથી.
જીતેન્દ્ર સિંહ
જ્યારે કર્નલ નાથુ સિંહ રાઠોડે નહેરુને કહ્યું – “કોઈ પણ ભારતીયને વડા પ્રધાન બનવાનો અનુભવ નહોતો, તો પછી તમે કેમ બેઠા છો?”
સ્વતંત્રતા પછી, દેશ એક નવા માર્ગ પર ચાલવાનું શીખી રહ્યો હતો. સંસ્થાઓનું નિર્માણ થઈ રહ્યું હતું, પ્રણાલીઓનું નિર્માણ થઈ રહ્યું હતું, અને એક મહત્વપૂર્ણ પ્રશ્ન ઉભો થયો – ભારતીય સેનાનું નેતૃત્વ કોણે કરવું જોઈએ?
પંડિત જવાહરલાલ નહેરુ માનતા હતા કે ભારતીયો પાસે સેના ચલાવવાનો અનુભવ કે ક્ષમતા નથી. તેમના મતે, બ્રિટિશ સેનામાં ભારતીયો હંમેશા નીચલા સ્તર સુધી સીમિત હતા, તેથી સ્વતંત્ર ભારતની સેનાને સંભાળવા માટે એક વિદેશી, અનુભવી જનરલની જરૂર હતી.
આ વિચારીને, તેમણે બ્રિટિશ જનરલ સર રોબ લોકહાર્ટને ભારતના પ્રથમ આર્મી ચીફ બનાવ્યા. પરંતુ 1948 ના અંતમાં, લોકહાર્ટે રાજીનામું આપ્યું – તેઓ ઇંગ્લેન્ડ પાછા ફરવા માંગતા હતા. આ પદ ખાલી હતું, અને નહેરુએ ફરી એકવાર વિદેશી જનરલ શોધવા માટે કેબિનેટની ખાસ બેઠક બોલાવી.
આ બેઠકમાં ઘણા વરિષ્ઠ ભારતીય લશ્કરી અધિકારીઓ પણ હાજર હતા.
નહેરુએ સૂચવ્યું, “આ વિદેશી નામોમાંથી કોને સેના પ્રમુખ બનાવવો જોઈએ? કૃપા કરીને તમારો અભિપ્રાય આપો.”
પછી એક જોરદાર અવાજ સંભળાયો.
તે કર્નલ નાથુ સિંહ રાઠોડ હતા – રાજસ્થાનની ભૂમિથી, જ્યાં મહારાણા પ્રતાપે અકબર ને હરાવ્યો હતો.
નાથુ સિંહ ઉભા થયા અને કહ્યું:
> “જો અનુભવ જ માપદંડ હોય, તો તમને એક ભારતીયને પ્રધાનમંત્રી બનાવવાનો અનુભવ ન હતો – તો તમે આ પદ કેવી રીતે સંભાળ્યું? જો આ જ તર્ક છે, તો પછી એક અંગ્રેજને પ્રધાનમંત્રી બનાવો. વિશ્વનો કયો સ્વાભિમાની દેશ પોતાની સેનાનું નેતૃત્વ વિદેશીને સોંપે છે?”
આ સાંભળીને, નેહરુ ગુસ્સે થયા, અને નાથુ સિંહને તાત્કાલિક સભામાંથી બહાર કાઢી મૂકવામાં આવ્યા.
પરંતુ તે દિવસે જે વાતે નેહરુને દુઃખ પહોંચાડ્યું, તે જ વાત સંરક્ષણ પ્રધાન સરદાર બલદેવ સિંહને સ્પર્શી ગઈ. તેમણે તરત જ નાથુ સિંહનો સમગ્ર લશ્કરી રેકોર્ડ માંગ્યો. પછી ખબર પડી કે:
નાથુ સિંહે બર્મા યુદ્ધમાં મોરચા પરથી નેતૃત્વ કર્યું હતું,
તેમણે બીજા વિશ્વયુદ્ધમાં ઘણી સફળ લશ્કરી ઝુંબેશોનું નેતૃત્વ કર્યું હતું,
અને તેઓ માત્ર શિસ્તબદ્ધ જ નહીં, પણ નેતૃત્વ કૌશલ્યમાં પણ અજોડ હતા.
બલદેવ સિંહે તેમને આર્મી ચીફ બનાવવાની ભલામણ કરી, પરંતુ નેહરુની નારાજગીને કારણે આવું થયું નહીં.
જોકે, નાથુ સિંહની હિંમત સફળ રહી – અને તે જ વર્ષે જનરલ કે.એમ. કરિયપ્પાને સ્વતંત્ર ભારતના પ્રથમ કાયમી ભારતીય આર્મી ચીફ તરીકે નિયુક્ત કરવામાં આવ્યા.
🇮🇳 નાથુ સિંહ રાઠોડ – એક એવું નામ જે આજે પણ આપણને ગર્વ કરાવે છે
તેમનો અવાજ ભારતના આત્મસન્માનનો અવાજ હતો –
જય હિન્દ 🚩
વંદે માતરમ્ 🚩

वक्त कैसे बदला लेता है!
सौराष्ट्र के पोरबंदर और अमरेली के कई लोग अफ्रीका के कई देशों में जाकर वहां बहुत बड़े उद्योगपति बन गए. जैसे नानजीभाई मेहता ~ माधवानी ग्रुप के माधवानी और विसावाड़ा के केशवाला ग्रुप के केशवाला.
फिर इनकी फैक्ट्रियों में काम करने के लिए पोरबंदर के आसपास के कई छोटे-छोटे गांव के लोग मेहनत मजदूरी करने 19वीं सदी के शुरुआत में छोटे-छोटे जहाजों में बैठकर अफ्रीका गए ।
पोरबंदर का एक छोटे से गांव का एक दलित हिन्दू युवक मजदूरी करने के लिए एक स्ट्रीमर में बैठकर युगांडा गया
बाद में उसने अपनी पत्नी को भी बुला लिया. वक्त गुजरता गया. वह दलित हिन्दू दंपत्ति एक बच्चे का पिता बना. वह बच्चा युगांडा का नागरिक बना ।
वक्त गुजरा. वह दलित बच्चा बड़ा हुआ. उसने भी शादी किया और उसे दो बेटियां और एक बेटा हुए।
वक्त गुजरता गया. 1972 में युगांडा में क्रूर तानाशाह नरभक्षी #ईदी_अमीन ने तख्तापलट किया और उसने रातों-रात फतवा निकालकर मूल युगांडा के कालों के अलावा सभी देश के लोगों को भले ही वह युगांडा के नागरिक ही क्यों ना हो, उनका सारा धंधा मिलकत सामान जप्त कर लिया और उन्हें युगांडा के नागरिक होते हुए भी देश छोड़ने का आदेश दे दिया।
भारत पाकिस्तान बांग्लादेश के तमाम मूल निवासी, जो दो या तीन पीढ़ियों से युगांडा में रहते थे, उन सबको उसने युगांडा से बाहर जाने का फरमान दे दिया।
हालात ऐसे हो गए कि युगांडा के हब्शी सैनिक भारतीय बस्तियों, जिसमें सबसे ज्यादा गुजराती थे, उनकी बस्ती में जाते थे और वहां तमाम अत्याचार करते थे.
भारत सरकार ने उन गुजरातियों को #युगांडा से निकाला. बहुत से ऐसे लोगों को ब्रिटेन ने अपने देश में शरण दे दिया।
पहले उन्हें ब्रिटिश कैंप में रखा गया ।
वह दलित दंपत्ति भी अपनी एक 14 साल की बच्ची और दो छोटे बच्चों को लेकर महीनों तक रिफ्यूजी कैंप में रहा.
उस दलित बच्ची का नाम था, #बसंती_मकवाना. और वह दलित दंपत्ति कई सौ किलोमीटर पैदल चलकर ब्रिटिश कैंप में गए थे. रास्ते में उनके एक बच्चे का दु:खद निधन भी हो गया ।
बाद में ब्रिटिश सरकार ने उस कैंप में रहने वाले तमाम शरणार्थियों को ब्रिटेन भेज दिया, जिसमें वह छोटी 14 साल की किशोरी बच्ची बसंती मकवाना भी अपने मां बाप और एक भाई के साथ ब्रिटेन आ गई ।
वक्त गुजरता गया.
समय बदला. कई सालों बाद ईदी अमीन का भी तख्तापलट हो गया और उसे भी देश छोड़कर भागना पड़ा. वो कई टन सोना और कई मिलियन डॉलर प्लेन में रखकर, सऊदी अरब भाग आया।
फिर और कुछ दशक गुजरे.
ईदी अमीन को सऊदी अरब में किडनी की बहुत खतरनाक बीमारी हो गई. सऊदी अरब के जद्दा शहर के सबसे बड़े हॉस्पिटल में उसे वीआईपी मरीज कि तरह लाया गया, क्योंकि ईदी अमीन के पास पैसे की कोई कमी नहीं थी. वह कई जहाजों में भरकर डॉलर लेकर सऊदी अरब आया था ।
दुनिया के सभी देशों में खोज की गई कि कौन सा डॉक्टर है, जो किडनी का बहुत अच्छा स्पेशलिस्ट है, यानी नेफ्रोलॉजिस्ट है ।
तब पता चला कि कनाडा में एक महिला डॉक्टर है, जो किडनी की बहुत बड़ी डॉक्टर है।
उस महिला डॉक्टर को तुरंत विशेष विमान से सऊदी अरब बुलाया गया. उस महिला डॉक्टर ने सऊदी अरब के विख्यात हॉस्पिटल में आकर ईदी अमीन का बहुत ही रिस्की हीमोडायलिसिस किया और ज्यादा अच्छे इलाज के लिए उसे एक एयर एंबुलेंस से कनाडा के हॉस्पिटल में शिफ्ट किया ।
ईदी अमीन ने कई बार उसे फीस लेने के लिए कहा, लेकिन उस महिला डॉक्टर ने हर बार फीस के लिए मना किया ।
फिर ईदी अमीन एकदम ठीक हो गया उसे वापस सऊदी अरब लाया गया ।
सऊदी अरब में वह चलने-फिरने लायक हो गया ।
फिर ईदी अमीन ने हाथ जोड़कर उस महिला डॉक्टर से निवेदन किया कि अब तो आप अपनी फीस ले लीजिए. आपकी वजह से आज मैं जिंदा हूं. मैं अपने पैरों पर खड़ा हो गया. और मेरे पास पैसे की कोई कमी नहीं है. आपको फीस लेनी ही पड़ेगी।
तब उस महिला डॉक्टर ने कहा कि फीस की बात तो जाने ही दीजिए. अब मैं आपको अपने बारे में बताती हूं-
उस महिला डॉक्टर ने कहा, मेरा नाम डॉक्टर #बसंती_मकवाना है. मैं एक भारतीय मूल की हूं. कभी आपके ही देश युगांडा की नागरिक थी ।
मैं गुजरात के महात्मा गांधी की धरती पोरबंदर से हूं। आपकी वजह से मेरा एक प्यारा छोटा भाई इलाज के बगैर मारा गया, क्योंकि हम कई सौ किलोमीटर पैदल जा रहे थे. आप के सैनिकों ने हमारे ऊपर बेहद अत्याचार किया. मेरे मां-बाप उन सैनिकों के सामने हाथ जोड़कर निवेदन करते थे. फिर भी हमने अत्याचार सहा।
अंत में हम महीनों तक शरणार्थी शिविर में रहे. दाने-दाने के मोहताज थे हम. घंटों लाइन लगाकर हमें एक पैकेट बिस्किट मिलता था.
किसी तरह से हम ब्रिटेन आ गए. मैंने सिर्फ 14 साल की उम्र में आपकी वजह से जिंदगी के सबसे कठोर अनुभव झेले.
मैंने पढ़ाई की. जीवित रहने के लिए कठोर मेहनत की। बाद में मैंने लंदन से एमबीबीएस किया. एमएस किया. और मैंने अमेरिका से किडनी में विशेषज्ञता हासिल की।
इतना ही नहीं, आपने जो मेरे माता पिता को जो आघात दिए, उनकी वजह से, कुछ ही सालों बाद उनका भी दुःखद निधन हो गया था।
आपके प्रतिनिधि जब कनाडा में मेरे हॉस्पिटल में आए कि आपको सऊदी अरब में एक वीवीआइपी मरीज का इलाज करना है और आपको मुंह मांगा पैसा दिया जाएगा, तो मैंने मना किया.
फिर मैंने उत्सुकता बस पूछा कि उस मरीज का नाम क्या है? तब उन्होंने बताया ईदी अमीन।
तब ही मैंने सोच लिया था कि मैं एक पैसा भी नहीं लूंगी। लेकिन मैं आपकी चिकित्सा अवश्य ही करूंगी।
यह सुनकर, ईदी अमीन फूट-फूट कर रोने लगा। डॉक्टर बसंती मकवाना के पैरों पर गिर कर, क्षमा याचना करने लगा. और डॉक्टर बसंती मकवाना बिना पैसे लिए ही कनाडा अपने हॉस्पिटल में चली गई.
बाद में कई बार उन्हें ईदी अमीन के इलाज के लिए कनाडा से सऊदी अरब बुलाया गया. लेकिन एक बार भी उन्होंने फीस नहीं ली.
और अंत में डॉक्टर बसंती मकवाना के सामने ही 16 अगस्त 2003 को रोते हुए, चिल्लाते हुए, पागलों की तरह सिर पटकते हुए, ईदी अमीन मर गया।
मरने से पहले उसने अपनी वसीयत में लिखा था कि उसकी जो भी दौलत हो, वह डॉक्टर बसंती मकवाना को दे दी जाए.
लेकिन खुद्दार डॉक्टर बसंती मकवाना ने उसकी दौलत को लात मार दी।
(अभी हाल ही में गुजरात के एक दिनेश भाई गढवी कनाडा गए थे. तब वह फुर्सत में डॉक्टर बसंती मकवाना से मिले और बसंती मकवाना ने यह सब बातें उन्हें बताई)
भारतीयों ने पुरातन काल में सम्पूर्ण विश्व में बिना युद्ध किए, बिना रक्त बहाए, सनातन धर्म कैसे प्रसारित किया होगा, उसकी एक झलक उपरोक्त प्रसंग में स्पष्ट ही देखने को मिलती है।
#सेवा_परमोधर्मः
#वसुधैव_कुटुंबकम्
#हमारी_संस्कृति – #हमारा_गौरव

अग्निवेश नामक एक वामपंथी आर्यसमाज जॉइन करता है और देखते ही देखते आर्य प्रतिनिधि सभा में फूट डालकर एक गुट पर कब्जा करता है।
वह सामाजिक कार्यकर्ता होने का दिखावा करते हुए जगह जगह हिन्दू धर्म पर चोट करने के व्याख्यान देता फिरता है।
अग्निवेश एक एनजीओ स्थापित करता है बचपन बचाओ।
कैलाश सत्यार्थी भी इसी प्रकार के दो-तीन एनजीओ बनाता हैं। कुछ पुस्तकें लिखता है।
फिर ये दोनों अलग अलग समय विदेशी देशी पुरस्कारों से पुरस्कृत होते हैं।
फिर चीन इन दोनों दलालों को करोड़ों रुपए देता है।
चीन भारत में कालीन यानी कारपेट बेचना चाह रहा था!
लेकिन पूर्वी उत्तर प्रदेश के भदोही जो अपने कालीन उद्योग के लिए पूरे विश्व में प्रख्यात था और भदोही के कालीन बेहद अच्छे और सस्ते होते थे इसलिए चीन अपने कालीन यानी कारपेट को भारत में नहीं बेच पा रहा था ।
भदोही में एक दो नहीं बल्कि हजारों कालीन की यूनिट थी जो अपने कालीन को विदेशों में एक्सपोर्ट करती थी। एक जमाने में भदोही ने ईरान के कालीन इंडस्ट्रीज को भी टक्कर दिया!
फिर चीन के ये दलाल कैलाश सत्यार्थी और अग्निवेश एक फर्जी फिल्म बनाते हैं, जिसमें यह दिखाया जाता है कि छोटे-छोटे बच्चों को जबरदस्ती पकड़कर भदोही लाया जाता है और उन्हें बधुआ मजदूर बनाकर उनसे दिन-रात कालीन बनवाया जाता है।
उन्होंने अपने दावे में एक फर्जी तर्क यह लगा दिया कि छोटे बच्चों की उंगलियां पतली होती हैं इसलिए धागों के बीच में आसानी से चली जाती है और गांठ बांधने में आसानी रहती है और इन्होंने कई ऐसे बच्चों के वीडियो बनाएं जिसमें बच्चों की उंगलियों में खून दिखाने के लिए लाल रंग लगा दिया गया।
उसके बाद इस फिल्म को लेकर कैलाश सत्यार्थी और अग्निवेश अमेरिका यूरोप सहित दुनिया के कई देशों में जाते हैं और वहां बकायदा प्रोजेक्टर पर फिल्म दिखाते हैं कि आप लोग भारत से कालीन मत खरीदिए क्योंकि भारत में बच्चों से कालीन बनाया जाता है, और देखिए बच्चों की हालत कितनी खराब होती है?
और वह फिल्म देख कर तमाम विदेशी कंपनियां जो भारत से कालीन खरीदती थी उन्होंने कालीन खरीदना बंद कर दिया।
फिर जब भदोही का कालीन उद्योग बर्बाद होने लगा तब सरकार ने एक और कोशिश की उन्होंने कालीन को एक ऐसा मार्का (रुगमार्क) देना शुरू किया जो इस बात का प्रमाण करता था कि इसे बच्चों ने नहीं बनाया है जैसे डायमंड के लिए एक सर्टिफिकेट होता है कि यह ब्लड डायमंड नहीं है उसी तरह उन्होंने रुगमार्क नामक एक सर्टिफिकेट बनाया जो इस बात का प्रमाण था कि इस कालीन को बच्चों ने नहीं बनाया है।
लेकिन यह लॉबी इतनी तगडी है कि अग्निवेश और कैलाश सत्यार्थी के लोग कालीन फैक्ट्रियों में जाते हैं, मालिकों को धमकाते हैं, उन्हें ब्लैकमेल करते हैं, फर्जी मुकदमे और इवेंट बनाते हैं। अखबार, मीडिया में ऐसी बहस होती है। बालश्रम और बचपन बचाओ का आर्तनाद होता है।
इस तरह भदोही का कालीन उद्योग पूरी तरह से बर्बाद हो जाता है।
तब इसमें चीन की एंट्री होती है।
आज आप भारत के किसी भी मॉल में जाइए वहां आपको मेड इन चाइना कालीन मिलेगा!!
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अग्निवेश नामक एक वामपंथी आर्यसमाज जॉइन करता है और देखते ही देखते आर्य प्रतिनिधि सभा में फूट डालकर एक गुट पर कब्जा करता है।
वह सामाजिक कार्यकर्ता होने का दिखावा करते हुए जगह जगह हिन्दू धर्म पर चोट करने के व्याख्यान देता फिरता है।
अग्निवेश एक एनजीओ स्थापित करता है बचपन बचाओ।
कैलाश सत्यार्थी भी इसी प्रकार के दो-तीन एनजीओ बनाता हैं। कुछ पुस्तकें लिखता है।
फिर ये दोनों अलग अलग समय विदेशी देशी पुरस्कारों से पुरस्कृत होते हैं।
फिर चीन इन दोनों दलालों को करोड़ों रुपए देता है।
चीन भारत में कालीन यानी कारपेट बेचना चाह रहा था!
लेकिन पूर्वी उत्तर प्रदेश के भदोही जो अपने कालीन उद्योग के लिए पूरे विश्व में प्रख्यात था और भदोही के कालीन बेहद अच्छे और सस्ते होते थे इसलिए चीन अपने कालीन यानी कारपेट को भारत में नहीं बेच पा रहा था ।
भदोही में एक दो नहीं बल्कि हजारों कालीन की यूनिट थी जो अपने कालीन को विदेशों में एक्सपोर्ट करती थी। एक जमाने में भदोही ने ईरान के कालीन इंडस्ट्रीज को भी टक्कर दिया!
फिर चीन के ये दलाल कैलाश सत्यार्थी और अग्निवेश एक फर्जी फिल्म बनाते हैं, जिसमें यह दिखाया जाता है कि छोटे-छोटे बच्चों को जबरदस्ती पकड़कर भदोही लाया जाता है और उन्हें बधुआ मजदूर बनाकर उनसे दिन-रात कालीन बनवाया जाता है।
उन्होंने अपने दावे में एक फर्जी तर्क यह लगा दिया कि छोटे बच्चों की उंगलियां पतली होती हैं इसलिए धागों के बीच में आसानी से चली जाती है और गांठ बांधने में आसानी रहती है और इन्होंने कई ऐसे बच्चों के वीडियो बनाएं जिसमें बच्चों की उंगलियों में खून दिखाने के लिए लाल रंग लगा दिया गया।
उसके बाद इस फिल्म को लेकर कैलाश सत्यार्थी और अग्निवेश अमेरिका यूरोप सहित दुनिया के कई देशों में जाते हैं और वहां बकायदा प्रोजेक्टर पर फिल्म दिखाते हैं कि आप लोग भारत से कालीन मत खरीदिए क्योंकि भारत में बच्चों से कालीन बनाया जाता है, और देखिए बच्चों की हालत कितनी खराब होती है?
और वह फिल्म देख कर तमाम विदेशी कंपनियां जो भारत से कालीन खरीदती थी उन्होंने कालीन खरीदना बंद कर दिया।
फिर जब भदोही का कालीन उद्योग बर्बाद होने लगा तब सरकार ने एक और कोशिश की उन्होंने कालीन को एक ऐसा मार्का (रुगमार्क) देना शुरू किया जो इस बात का प्रमाण करता था कि इसे बच्चों ने नहीं बनाया है जैसे डायमंड के लिए एक सर्टिफिकेट होता है कि यह ब्लड डायमंड नहीं है उसी तरह उन्होंने रुगमार्क नामक एक सर्टिफिकेट बनाया जो इस बात का प्रमाण था कि इस कालीन को बच्चों ने नहीं बनाया है।
लेकिन यह लॉबी इतनी तगडी है कि अग्निवेश और कैलाश सत्यार्थी के लोग कालीन फैक्ट्रियों में जाते हैं, मालिकों को धमकाते हैं, उन्हें ब्लैकमेल करते हैं, फर्जी मुकदमे और इवेंट बनाते हैं। अखबार, मीडिया में ऐसी बहस होती है। बालश्रम और बचपन बचाओ का आर्तनाद होता है।
इस तरह भदोही का कालीन उद्योग पूरी तरह से बर्बाद हो जाता है।
तब इसमें चीन की एंट्री होती है।
आज आप भारत के किसी भी मॉल में जाइए वहां आपको मेड इन चाइना कालीन मिलेगा!!
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मैंने सुना है, फ्रान्स की क्रांति के समय, वहां का जो सबसे खतरनाक कारागृह था, जहां आजीवन कैदी रखे जाते थे, क्रांतिकारियों ने उसे तोड़ दिया। उस कारागृह में ऐसे लोग बंदी थे, कोई बीस वर्ष से, कोई तीस वर्ष से, कोई पचास वर्ष से भी उस कारागृह की जंजीरें और बेड़ियां, सदा के लिए लगती थी। फिर जब आदमी मरता था, तो उसके हाथ तोड़ कर ही, खोली जाती थी। क्योंकि बीच में खुलने का कोई सवाल नहीं था, वह सिर्फ आजन्म कैदियों के लिए था। क्रांतिकारियों ने जाकर जेल की दीवारें तोड़ दीं, दरवाजे. तोड़ दिये, कारागृह में बंद कैदियों को बाहर निकाला। और जबरजस्ती उनकी जंजीरें तोड़ दीं। कई कैदियों ने इंकार भी किया। उन कैदियों ने कहा कि हम अपनी कोठरियों के बाहर हम नहीं आ सकते हैं। हम अंधेरे के आदि हो गए हैं। रोशनी में आंखों को तकली.फ होती है। लेकिन क्रांतिकारी नहीं माने। उन्होंने उनकी जंजीरें भी तोड़ दी, और उन्हें जेल खाने से बाहर कर दिया। एक चमत्कार घटा, लेकिन यह चमत्कार दुनिया को रहा होगा, हम समझ सकते हैं कि यह चमत्कार नहीं, बड़ा स्वाभाविक है। सांझ होते-होते आधे कैदी वापस लौट आए। और उन्होंने क्रांतिकारियों से कहा हम बाहर जाने से इंकार करते हैं। और बिना जंजीरों के हम जी नहीं सकते, क्योंकि वह हमारे शरीर के हिस्से हो गई हैं। अब जब हम चलते हैं तो हमें ऐसा लगता है हम नंगे-नंगे हैं, कुछ खाली-खाली है। हमारी जंजीरें हमें वापस लौटा दो। स्वाभाविक है, जिनके हाथ-पैरों में, सेरों व.जन की जंजीरे पड़ी रही हों, वर्षों तक जो उनके साथ सोए हों, उठे हों, जागे हों, बैठे हों, वह जंजीरें अब जंजीरें नहीं, उनके शरीर के हिस्से हो गई हैं। उनके बिना अब उन्हें नींद न आ सकेगी। ऐसा ही हमारे देश के साथ हुआ है। हमारा अधूरा अध्यात्म, सच है, लेकिन आधा सच। और हमने भौतिकवाद मैटेरियलिज्म को इंकार पर उसे खड़ा किया है। भारत के जिंदगी के अधिकतम दुर्भाग्य का कारण, भारत का भौतिकवाद को इंकार करना है। क्योंकि जैसे ही हम भौतिकवाद को इंकार करते हैं, पूरा जीवन अस्वीकृत हो जाता है। क्योंकि जीवन के सारे आधार भौतिक हैं। शरीर भी भौतिक है, मस्तिष्क भी भौतिक है, .जमीन भी भौतिक है, वृक्ष, पाधे, पशु-पक्षी यह सारा जीवन भौतिक है। इस भौतिक जीवन में अध्यात्म के फूल लगते हैं जरूर, लेकिन यह भौतिक जीवन जब सम्पन्न हो, समृद्ध हो, यह भौतिक जीवन जब संतृप्त हो, जब यह भौतिक जीवन पूरी तरह भरा-पूरा हो, ओवरलोइंग हो, असल में अध्यात्म भौतिक जीवन की ओवरलोइंग है। ऊपर से बह जाना है। मेरी दृष्टि मे अध्यात्म आखिरी लग्जरी है। आखिरी विलास है जो मनुष्य जाति उपलब्ध कर सकती है। लेकिन जिन्होंने भौतिक जीवन को इंकार कर दिया हो, एक आदमी अपने शरीर को इंकार करे, भोजन बंद कर दे, पानी देना बंद कर दे, श्वांस लेना बंद कर दे, क्योंकि यह सब भौतिक हैं। कितनी देर उसकी आत्मा टिकेगी ? और अगर उसकी आत्मा खो जाए, तो कौन जिम्मेदार होगा? आत्मा को बचाने की कोशिश में हमने आत्मा भी खो दी है। आत्मा की चर्चा हम करते रहे हैं, हमसे आत्महीन लोग खोजने कठिन हैं। क्योंकि एक हजार साल तक अगर लोग गुलाम रह सकते हों तो उनके भीतर आत्मा है, यह मानने में शक होता है। और अगर तीन हजार साल तक दीन, दरिद्र रह सकते हों तो यह मानने में थोड़ी सी हिम्मत जुटानी पड़ती है, कि वह जीवित हैं।
~ओशो
मिलट्री के कमांडर से कुछ जवानो ने शिकायत की आप सिक्खो के ग्रंथ को हमारे ग्रंथ से ज्यादा आदर देते हैं जबकि सारे ग्रंथो का सार एक ही है;
कमांडर ने कहा ऐसा नही है, आप लोग ऐसा कीजिए कल अपने-अपने ग्रंथ ले आईए मै इसका जवाब भी आपको कल दूंगा। दूसरे दिन सुबह सब से पहले पंडित जी अपनी गीता को झोले मे डाले बगल मे दबाये पहुंचे; फिर एक मुल्ला जी कुरान-शरीफ को कपड़े मे लपेट कर लाये ; उसी तरह से पादरी भी बाईबल लेकर पहुंचा। कमांडर उन तीनो को इज्जत के साथ बैठाया और इंतजार करने लगे सिक्खों के पहुचने का…
तभी सभी ने देखा कि ढोलक व छैने के साथ वाहेगुरू का जाप करते कुछ सिख अपने सिर के ऊपर गुरू ग्रंथ साहिब जी स्वरूप उठाये आगे-आगे जल छिड़कते चले आ रहे हैं, यह देख कमांडर सहित वे तीनो भी आदर मे खड़े होकर नतमस्तक हुए, कमांडर मुस्कुराते हुए उन तीनो की तरफ देखा और कहा आप तीनो अपने -अपने ग्रंथो को यू ही कपड़े मे लपेटे बगल मे दबाये चले आये । आप लोगो ने देखा सिक्ख कैसे आदर सत्कार के साथ अपने गुरू ग्रंथ साहिब जी को लेकर आये; आप लोग भी इनसे सीखिए।
सार; अपने अपने धर्म ग्रंथों का आदर कीजिए🙏
एक दिन मौत जंगल से गुजर रही थी।
रास्ते में उसे एक छोटी सी लड़की मिली।
जब उसने मौत को उसके काले, चमकदार, सुंदर घोड़े पर देखा, तो बड़ी मासूमियत से पूछा:
“क्या आप भी रास्ता भटक गए हैं?”
मौत ने उसे देखा और हल्की सी मुस्कान के साथ कहा:
“हाँ, मैं भी भटक गया हूँ। और तुम? क्या तुम्हें घर का रास्ता पता है?”
लड़की ने जवाब दिया:
“नहीं… पर अब मुझे डर नहीं लग रहा, क्योंकि आप मेरे साथ हो। अब मैं अकेली नहीं हूँ।”
मौत हैरान हो गई। उसने पूछा:
तुम मुझसे नहीं डरती? क्या तुम जानती हो मैं कौन हूँ? मैं मौत हूँ!”
लड़की ने शांत भाव से कहा:
“अगर आप मुझे लेने आए हो तो ठीक है।
लेकिन क्या मैं आपसे एक निवेदन कर सकती हूँ?”
मौत बोली:
“हाँ, बताओ। मौत से क्या मांगोगी?”
लड़की के चेहरे पर उदासी थी। उसने कहा:
“मेरी माँ को बचा लीजिए। वो बहुत बीमार है।
इसीलिए मैं जंगल में औषधियाँ लेने आई थी और रास्ता भटक गई।
मुझे डर है अगर मैं घर नहीं लौटी तो वो मेरे ग़म और अपनी बीमारी से मर जाएंगी।
हमारे पास कोई नहीं है। पापा तो पिछले साल ही गुजर गए थे।
अब माँ ही मेरा सब कुछ हैं।”
मौत पहली बार शर्मिंदा और दुखी हुई।
वो तो लड़की को बिना वापसी के ले जाने आई थी, लेकिन अब उसका मन बदल गया।
वे दोनों साथ-साथ चलने लगे –
लड़की नंगे पाँव दर्द से कराहती हुई, और मौत अपने घोड़े पर सवार।
कुछ देर बाद उनका घर दूर से दिखने लगा।
मौत रुक गई, और लड़की आगे बढ़ने लगी।
लड़की ने पीछे मुड़कर देखा और पूछा:
“आप क्यों नहीं आ रहे? चलिए ना!”
मौत ने जवाब दिया:
“अब मैं आगे नहीं जा सकता!”
लड़की हैरान होकर बोली:
“तो क्या आप मुझे नहीं ले जाएंगे? क्या मैं आपके साथ नहीं जाऊंगी?”
मौत ने उसकी मासूम आँखों में देखते हुए कहा:
“नहीं। अभी नहीं।
तुम्हें अपनी माँ का ख़याल रखना है।
जब सही समय आएगा, तब मैं तुम्हारे और तुम्हारी माँ के लिए आऊँगा।
और तब तुम दोनों मेरे साथ चलोगी।”
लड़की की आँखों में खुशी की चमक दौड़ गई।
उसने कहा:
“शुक्रिया। मैं आपका इंतजार करूँगी…
क्योंकि अब मुझे पता है – आप बुरे नहीं हैं।”
यह सुनकर मौत ने अपने घोड़े को एड़ लगाई।
घोड़ा धरती को चीरता हुआ दौड़ पड़ा और देखते ही देखते मौत का काला साया जंगल के अंधेरे में गायब हो गया।
—
मौत बुरी नहीं होती।
वो तो बस तब डरावनी लगती है जब वो समय से पहले आ जाए।
✅✨
(यह कहानी स्पेनिश लोककथा पर आधारित है।)